NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
नेतरहाट : बार–बार विस्थापित होते आदिवासी
इस बार इस इलाके के सघन आदिवासी बसावट वाले 8 गांवों को हमेशा के लिए यहाँ से हटकर कहीं और बसने का आदेश मिला है, क्योंकि अब यहाँ बाघ रहेंगे।
अनिल अंशुमन
08 Oct 2018
नेतरहाट, झारखण्ड
Image Courtesy: netarhatvidyalaya

ऐसा प्रतीत होता है मानो झारखण्ड के मिनी कश्मीर कहे जाने वाले नेतरहाट पठार क्षेत्र के आदिवासियों के लिए विस्थापन का दंश एक स्थायी नियति सा बना दिया गया है। प्रकृति की सभी नैसर्गिक सुन्दरता से सुसज्जित यह इलाका राज्य का चर्चित पर्यटन स्थल है जिसे बेतला राष्ट्रीय उद्यान के नाम से भी जाना जाता है। जब यह बन रहा था तब सरकार ने तो यहाँ के आदिवासियों को यह भरोसा दिलाया था कि इससे उनका विकास होगा और उन्हें यहाँ से कभी नहीं उजाड़ा जाएगा लेकिन विडंबना है कि पार्क बनने के बाद से ही जब-जब इस इलाके में किसी नए विकास की योजना घोषित होती है तो उसकी क़ीमत यहाँ पर वर्षों से रह रहे आदिवासियों को ही अपनी ज़मीन खोकर चुकानी पड़ती है। इस कारण अब उन्हें प्रतिवाद में आन्दोलन का आक्रामक रास्ता लेना पड़ रहा है।

इस बार इस इलाके के सघन आदिवासी बसावट वाले 8 गांवों को हमेशा के लिए यहाँ से हटकर कहीं और बसने का आदेश मिला है, क्योंकि अब यहाँ बाघ रहेंगे,  जो अभी संख्या लिहाज से बमुश्किल इक्का-दुक्का ही होंगे और वे भी ज़ल्द किसी को दीखते नहीं। लेकिन सरकार को तो आदिवासियों की ज़मीन किसी न किसी बहाने से लेनी है इसलिए पिछले 27 अप्रैल 2017 को ‘पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ झारखण्ड सरकार ने इस बाबत राजपत्र-अधिसूचना जारी कर दी। पलामू व्याघ्र संरक्षण प्लान के तहत कोर एरिया के नाम पर इन 8 गांवों के सभी आदिवासियों को यहाँ से विस्थापित होकर कहीं अन्यत्र बसना होगा, जिसके लिए प्रति आदिवासी परिवार को सरकार की ओर से 10 डिसमिल ज़मीन और 10 लाख रुपये मिलेंगे।    

सनद रहे कि ये पूरा इलाका देश के संविधान की पांचवीं अनुसूची का क्षेत्र भी घोषित है, जिसके तहत यहाँ बसने वाले आदिवासी समुदायों की ग्राम सभाओं को ये संवैधानिक प्रावधान हासिल है कि उनकी अनुमति के बगैर बाहर से कोई भी काम नहीं थोपा जा सकता है। बावजूद इसके सरकार ने इन ग्राम सभाओं के साथ बिना किसी विमर्श व बातचीत के 8 गांवों के आदिवासियों को हमेशा के लिए अपना गाँव खाली करने का फरमान दे दिया है, जिसके विरोध में इन आठों गांवों की ग्राम सभाओं ने भी गाँव न खाली करने सम्बन्धी पत्र सम्बंधित विभाग व सरकार को भेज दिया है। सरकार द्वारा घोषित पलामू टाइगर रिजर्व एरिया में 10 किमी. की परिधि में 189 गावों के 32 हज़ार घर शामिल हैं। इन गांवों के आदिवासियों में भी काफी भय व्याप्त है कि देर सबेर किसी न किसी बहाने उन्हें भी उजाड़ ही दिया जाएगा। व्याघ्र संरक्षण प्लान के अलावा इस क्षेत्र में 3 किमी चौड़ा और कई किमी. लंबा हाथियों का गलियारा ‘एलिफैंट कॉरिडोर’ बनाने की घोषणा भी हो गयी है, जिससे सैकड़ों आदिवासी गांवों पर किसी न किसी रूप से भयावह विस्थापन की तलवार लटक रही है।

राज्य सरकार द्वारा संविधान की पांचवी अनुसूची के आदिवासी संरक्षण के अधिकारों का यूं खुल्लम-खुल्ला उलंघन होता देख पूरे क्षेत्र के आदिवासी ‘जान देंगे , ज़मीन नहीं देंगे’ की घोषणा के साथ एकजुट होकर जगह–जगह विरोध सभाएं कर रहें हैं। विस्थापित आदिवासियों के संघर्ष का नेतृत्व कर रही ‘केन्द्रीय जन संघर्ष समिति’ के युवा नेता जेरोम जेराल्ड कुजूर पर तो सरकार ने अभी से ही विशेष निगरानी के आदेश जारी कर दिए हैं। साथ ही अपने आला अधिकारीयों से मीडिया में बयान जारी करवा रही है कि– किसी को जबरन नहीं हटाया जा रहा है। यह सब सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा फैलाया गया भ्रामक प्रचार है. लेकिन जब जेरोम जेराल्ड कुजूर ने पूछा कि सरकार जनता को बताये कि जब उनकी मंशा साफ़ है तो बीते महीने जिले के डीसी,  डीएफओ तथा सांसद–विधायक की गुप्त बैठक कर उसमें कैसा ‘प्रोजेक्ट प्रोपोजल’ पेश कर वार्ता रखी गयी थी? साथ ही इस इलाके के सभी इको डेवलेपमेंट कमेटी के सदस्यों को स्थानीय ग्राम सभाओं से सहमति/ असहमति लेने के विशेष पत्र जारी किये गए?  इसपर सरकार व प्रशासन पूरी तरह मौन है।

90 के दशक में सम्पूर्ण पठारी इलाका तब अचानक से अधिक ख़बरों की दुनिया में सुर्ख़ियों में आया जब भारत सरकार ने यहाँ के एक बड़े भूभाग को भारतीय सेना के ‘सैन्याभ्यास के लिए सुरक्षित’ घोषित कर सैन्याभ्यास शुरू करवा दिया था। इस “नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज” के विरोध में यहाँ के स्थानीय आदिवासियों व ग्रामीणों ने महीनों जबरदस्त आन्दोलन किया था। लोगों के विरोध का तेवर ऐसा था कि जब सेना की बख्तर बंद गाड़ियां यहाँ सैन्याभ्यास  के लिए आती थीं तो सैकड़ों की संख्या में गावं के लोग अपने बीवी–बच्चों को लेकर सेना की गाड़ियों के आगे लेट जाते थे। बाद में तो कई स्थानों पर ग्रामीण आदिवासियों ने सेना के लिए ‘प्रतिबंधित क्षेत्र’ घोषित तक कर दिया था। इस बड़े आक्रोश का मुख्य कारण था कि सेना के युद्धाभ्यास के दौरान बम और गोलियों के चलने से यहाँ रहने वालों की जान ही सांसत में पड़ गयी थी। नित दिन अपने जंगल क्षेत्र में जाकर पशु चरानेवालों व लकडियाँ बीनने वालों में कौन कहाँ घायल हो जाय, कहना मुश्किल था। पहले तो उन्हें राष्ट्रीय हित का हवाला देकर चुप करा दिया गया फिर सेना की धौंस–धमकी दी जाने लगी। जब लोगों को लगा कि यदि ये सैन्याभ्यास इसी तरह से जारी रहा तो कोई सही सलामत नहीं रह पायेगा। फलतः भारी दमन के बावजूद लोगों के बढ़ते जन विक्षोभ ने एक बड़े दवानल का रूप ग्रहण कर लिया, जिससे अंततोगत्वा सरकार को सैन्याभ्यास कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा था। हालांकि वर्तमान सरकार इसे फिर से शुरू करने की गुपचुप तैयारी में लगी हुई है।

बहरहाल, टाइगर रिज़र्व क्षेत्र बनाने के नाम पर 8 गांवों को उजाड़े जाने के खिलाफ शुरू हुआ स्थानीय आदिवासियों का विरोध भी धीरे–धीरे एक बड़ा आयाम ले रहा है। राज्य के कई जन संगठनों के साथ–साथ विपक्षी राजनीतिक दल भी इस विरोध के पक्ष में खड़े हो रहें हैं, जिससे लग रहा है कि शायद नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज के विरोध जैसा आन्दोलन का माहौल फिर से न अंगडाई लेने लगे।

Jharkhand
netarhat
jharkhand tribals
Displacement

Related Stories

झारखंड: बोर्ड एग्जाम की 70 कॉपी प्रतिदिन चेक करने का आदेश, अध्यापकों ने किया विरोध

झारखंड : नफ़रत और कॉर्पोरेट संस्कृति के विरुद्ध लेखक-कलाकारों का सम्मलेन! 

झारखंड की खान सचिव पूजा सिंघल जेल भेजी गयीं

झारखंडः आईएएस पूजा सिंघल के ठिकानों पर छापेमारी दूसरे दिन भी जारी, क़रीबी सीए के घर से 19.31 करोड़ कैश बरामद

खबरों के आगे-पीछे: अंदरुनी कलह तो भाजपा में भी कम नहीं

आदिवासियों के विकास के लिए अलग धर्म संहिता की ज़रूरत- जनगणना के पहले जनजातीय नेता

‘मैं कोई मूक दर्शक नहीं हूँ’, फ़ादर स्टैन स्वामी लिखित पुस्तक का हुआ लोकार्पण

झारखंड: पंचायत चुनावों को लेकर आदिवासी संगठनों का विरोध, जानिए क्या है पूरा मामला

झारखंड : हेमंत सोरेन शासन में भी पुलिस अत्याचार बदस्तूर जारी, डोमचांच में ढिबरा व्यवसायी की पीट-पीटकर हत्या 

झारखंड रोपवे दुर्घटना: वायुसेना के हेलिकॉप्टरों ने 10 और लोगों को सुरक्षित निकाला


बाकी खबरें

  • modi
    अनिल जैन
    खरी-खरी: मोदी बोलते वक्त भूल जाते हैं कि वे प्रधानमंत्री भी हैं!
    22 Feb 2022
    दरअसल प्रधानमंत्री के ये निम्न स्तरीय बयान एक तरह से उनकी बौखलाहट की झलक दिखा रहे हैं। उन्हें एहसास हो गया है कि पांचों राज्यों में जनता उनकी पार्टी को बुरी तरह नकार रही है।
  • Rajasthan
    सोनिया यादव
    राजस्थान: अलग कृषि बजट किसानों के संघर्ष की जीत है या फिर चुनावी हथियार?
    22 Feb 2022
    किसानों पर कर्ज़ का बढ़ता बोझ और उसकी वसूली के लिए बैंकों का नोटिस, जमीनों की नीलामी इस वक्त राज्य में एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। ऐसे में गहलोत सरकार 2023 केे विधानसभा चुनावों को देखते हुए कोई जोखिम…
  • up elections
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव, चौथा चरण: केंद्रीय मंत्री समेत दांव पर कई नेताओं की प्रतिष्ठा
    22 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश चुनाव के चौथे चरण में 624 प्रत्याशियों का भाग्य तय होगा, साथ ही भारतीय जनता पार्टी समेत समाजवादी पार्टी की प्रतिष्ठा भी दांव पर है। एक ओर जहां भाजपा अपना पुराना प्रदर्शन दोहराना चाहेगी,…
  • uttar pradesh
    एम.ओबैद
    यूपी चुनाव : योगी काल में नहीं थमा 'इलाज के अभाव में मौत' का सिलसिला
    22 Feb 2022
    पिछले साल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि "वर्तमान में प्रदेश में चिकित्सा सुविधा बेहद नाज़ुक और कमज़ोर है। यह आम दिनों में भी जनता की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त…
  • covid
    टी ललिता
    महामारी के मद्देनजर कामगार वर्ग की ज़रूरतों के अनुरूप शहरों की योजना में बदलाव की आवश्यकता  
    22 Feb 2022
    दूसरे कोविड-19 लहर के दौरान सरकार के कुप्रबंधन ने शहरी नियोजन की खामियों को उजागर करके रख दिया है, जिसने हमेशा ही श्रमिकों की जरूरतों की अनदेखी की है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License