NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
नोटबन्दी पर विश्वसनीयता का सवाल
जिम्मेवारी भी पूरी तरह से सिर्फ और सिर्फ नरेन्द्र मोदी पर आती है
वीरेन्द्र जैन
30 Nov 2016
नोटबन्दी पर विश्वसनीयता का सवाल
नोटबन्दी के कारण हुयी पचास से अधिक मौतों, मुद्रा के संकट से उत्पन्न बाजार के लकवाग्रस्त होने, अर्थव्यवस्था और बैंकिंग व्यवस्था पर तरह तरह के संकट आने से घबराहट का जो माहौल बना उस घटनाक्रम से नरेन्द्र मोदी की बची खुची छवि पर गहरा दाग लगा है। उससे पहले उन्हें भूमि अधिग्रहण पर अपनी सरकार का फैसला वापिस लेना पड़ा था, और जीएसटी आदि मुद्दों पर भी समझौता करना पड़ा था। अपने वादों को चुनावी जुमला बता कर उन्होंने अपनी विश्वसनीयता को कम किया था व सीमा पर घोषित शत्रु से निबटने में पिछली सरकार जैसा ही काम करने से उनका बहादुरी का मेकअप धुल चुका था। असम के उग्रवादियों पर वर्मा की सीमा में घुस कर हमला करने की अतिरंजना से लेकर जे एन यू, सर्जिकल स्ट्राइक आदि के सरकारी सच में असत्य के अंश पकड़े जाने से उनके समर्थकों को ठेस लग चुकी थी। लोकसभा चुनाव के ठीक बाद दिल्ली और बिहार के चुनावों में मिली पराजय से जन भावनाओं में आये बदलाव के संकेत मिल गये थे। कहने की जरूरत नहीं कि लोकसभा चुनावों के दौरान मोदी की प्रचार एजेंसियों ने उनकी छवि एक राबिनहुड की बनायी थी जो 56 इंच के सीने वाला था और आते ही सारे संकटों को दूर कर देने वाला था। पिछली केन्द्र सरकार के कारनामों से परेशान अवतारवाद में भरोसा करने वाले समाज के एक हिस्से ने उन्हें अवतार की तरह देखा भी था जो लोकसभा में उनकी जीत का कारण बना था।
उल्लेखनीय है कि मोदी और अमितशाह की जोड़ी ने भारतीय जनता पार्टी को मोदी जनता पार्टी में बदल दिया था व भाजपा के सारे पुराने प्रमुख नेताओं को हाशिए पर धकेल दिया था। इसलिए जिम्मेवारी भी पूरी तरह से सिर्फ और सिर्फ नरेन्द्र मोदी पर आती है क्योंकि यह उनका ही फैसला था जिसे उन्होंने अपने दल ही नहीं अपितु अपने मंत्रिमण्डल के सदस्यों तक से साझा नहीं किया। शरद यादव ने तो संसद में सदन के पटल पर आरोप लगाया कि मोदी ने इस कार्यवाही को वित्त मंत्री अरुण जैटली तक से छुपाये रखा। समाचार के अनुसार जिन छह सदस्यों के साथ अंतिम दौर की बैठक हुयी उन्हें भी तब तक कमरे से बाहर नहीं आने दिया गया जब तक कि श्री मोदी ने टेलीविजन पर राष्ट्र के नाम सन्देश प्रसारित नहीं कर दिया।
 
नोटबन्दी के फैसले के तीन प्रमुख उद्देश्य बताये गये थे जिन पर पूरे देश और सभी राजनीतिक दलों की लगभग सहमति थी किंतु जैसा कि कोलकता हाईकोर्ट ने कहा है कि योजना लागू करने से पहले पूरा होमवर्क नहीं किया गया जिससे पूरे देश को तकलीफ हुयी व व्यवस्था के प्रति इतना अविश्वास पैदा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने देश की सड़कों पर हिंसा फैलने की सम्भावना व्यक्त की। बाद में राजनीतिक दलों ने इस कमजोरी का पूरा लाभ लिया जो उनकी जिम्मेवारी का हिस्सा था और जिसका उन्हें हक भी था।
 
एक बार विश्वास भंग हो जाने के बाद अब मोदी समर्थक भी कहने लगे हैं कि इस सरकार का इरादा काले धन से मुक्ति पाने का इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि इसका जन्म भी काले धन के सहारे ही हुआ था। चुनावी खर्चों पर ध्यान रखने वाली संस्थाओं ने बताया था कि इन्होंने लोकसभा में कम से कम दस हजार करोड़ रुपये खर्च किये थे जिसका बड़ा हिस्सा काले धन का ही था। दूसरे जो इनका समर्थक वर्ग है उसी के पास काले धन का बड़ा हिस्सा है और उसे भरोसा रहा है कि उनकी सरकार काले धन के खिलाफ कुछ नहीं करेगी। शत्रु देश से नकली करेंसी आने के सवाल पर लोगों का सोचना है कि यह मुख्य रूप से शत्रुता पर निर्भर है और जो देश एक तरह की नकली करेंसी भेज सकता है वह कुछ समय बाद दूसरे तरह की नई करेंसी भी भेज सकता है, इसलिए इससे निबटने के लिए सुरक्षातंत्र को मजबूत करना ज्यादा जरूरी है। देश में बाजार, शिक्षा और चेतना का स्तर देखते हुए प्लास्टिक मनी व इलैक्ट्रोनिक ट्रांसफर में मामूली सी वृद्धि ही सम्भव है। जहाँ तक कश्मीर जैसे अलगाववादी आन्दोलन में अवैध करेंसी के स्तेमाल का सवाल है तो इसमें कितना सच है और कितना अनुमान है यह तय होना शेष है।
 
अब समस्या यह है कि बिल्ली बोरे में कैसे जायेगी? कुछ राज्यों में आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए राजनीतिक दल असंतोष को भुनाने के लिए तैयार हैं इस बहाने वे अपने पक्ष के काले धन को निबटाने के उपाय भी तलाश रहे हैं क्योंकि उनका अपना भविष्य भी इन्हीं चुनावों पर निर्भर है। समाजवादी पार्टी के मुख्यमंत्री तो मन्दी के समय में काले धन के लाभ भी गिनाने लगे हैं। मोदी के गठबन्धन में शामिल शिव सेना जैसे दल तो मुखर विरोध कर रहे हैं किंतु अकाली दल भी संतुष्ट नजर नहीं आ रहा। अरुण जैटली कह चुके हैं कि फैसले को वापिस नहीं लिया जा सकता। अगर फैसला वापिस लिया गया तो एक बड़ा वर्ग जो परेशानियां सह कर भी घोषित उद्देश्यों के कारण समर्थन कर रहा था, असंतुष्ट हो सकता है।
 
सब कुछ मिला कर नीतियों की कमजोरियां, कार्यांवयन में ढुलमुलपन, नेतृत्व में सामूहिकता की कमी, निहित स्वार्थों का दबाव, जनता की समस्याओं के प्रति उदासीनता आदि ही सामने आ रहा है। इस पर भी साम्प्रदायिकता फैलाने वाले संगठनों का दबाव भी सरकार की छवि को निरंतर बिगाड़ता रहता है। मोदी जी ने अपने सांसदों को जनता को समझाने की जिम्मेवारी सौंपी थी जिसे उन्होंने बेमन से स्वीकार किया है। निदा फाज़ली के शब्दों में कहा जाये तो-
 
कभी कभी यूं भी हमने अपने मन को समझाया है
जिन बातों को खुद नहिं समझे, औरों को समझाया है
 
देश की सरकार विश्वास के गहरे संकट से जूझ रही है

बाकी खबरें

  • UP Teachers Protest
    अब्दुल अलीम जाफ़री
    यूपी : आगामी चुनाव से पहले लाखों शिक्षकों ने योगी सरकार से पुरानी पेंशन योजना बहाल करने को कहा
    02 Dec 2021
    विरोध करने वाले शिक्षकों ने संविदा कर्मचारियों को नियमित करने, पूर्व वेतन आयोग के अनुसार कर्मचारियों की वेतन वृद्धि, पुरानी पेंशन योजना की बहाली, डीए की किस्त और बक़ाया राशि जारी करने सहित कई मांगें…
  • bhopal gas tragedy
    अनिल जैन
    भोपाल गैस त्रासदी के 37 बरस, अभी भी थमा नहीं है लोगों का मरना! 
    02 Dec 2021
    आज से ठीक 37 वर्ष पहले दो और तीन दिसंबर 1984 की दरम्यानी रात को यूनियन कार्बाइड के कारखाने से निकली जहरीली गैस (मिक यानी मिथाइल आइसो साइनाइट) ने अपने-अपने घरों में सोए हजारों लोगों को एक झटके में ही…
  • putin
    एम. के. भद्रकुमार
    मजबूत गठजोड़ की ओर अग्रसर होते चीन और रूस
    02 Dec 2021
    चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अखबार ग्लोबल टाइम्स ने उच्च-स्तरीय “स्रोत” के हवाले से खुलासा किया है कि बीजिंग का 2022 के शीतकालीन ओलंपिक में अमेरिकी एवं पश्चिमी राजनेताओं को आमंत्रित करने का कोई इरादा…
  • left
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    दिल्ली: अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ बढ़ते हमलों के विरोध में सीपीआई(एम) का प्रदर्शन
    02 Dec 2021
    इस प्रदर्शन को सीपीआई(एम) पोलित ब्यूरो सदस्य बृंदा करात, प्रकाश करात, हन्नान मौल्ला और दिल्ली राज्य कमेटी के नेताओं ने संबोधित किया। इस प्रदर्शन में सांप्रदायिकता का दंश झेल चुके उत्तर पूर्वी दिल्ली…
  • covid
    संदीपन तालुकदार
    ओमिक्रॉन: घबराने की नहीं, सावधानियां रखने की ज़रूरत है
    02 Dec 2021
    विश्व स्वास्थ्य संगठन की हालिया सूचना के मुताबिक़, यह साफ़ नहीं है कि ओमिक्रॉन डेल्टा वैरिएंट समेत, पिछले वैरिएंट की तुलना में तेजी से फैल सकता है या नहीं। फिर भी यह सुझाव है कि अब भी उतनी ही सावधानी…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License