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न्याय बचेगा तभी बचेगी न्यायपालिका
दोनों आरोप चाहे वह यौन प्रताड़ना के हों या फिर उसे झूठा बताते हुए लगाए गये हों, जांच की मांग तो करते हैं।
प्रेम कुमार
22 Apr 2019
सांकेतिक तस्वीर
Image Courtesy: The Logical Indian

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई पर यौन प्रताड़ना का आरोप वास्तव में बहुत गम्भीर है। अगर यह आरोप गलत साबित होता है तो इसकी गम्भीरता और भी बढ़ जाती है क्योंकि तब उसमें झूठ और साजिश का पक्ष भी आ जाता है। चीफ जस्टिस इसी की ओर इशारा कर रहे हैं और न्यायपालिका को ख़तरे में बता रहे हैं। मगर, मौका ऐसा है कि इसे एक आरोपी के ‘विक्टिम कार्ड’ के तौर पर देखा जाता है। दोनों आरोप चाहे वह यौन प्रताड़ना के हों या फिर उसे झूठा बताते हुए लगाए गये हों, जांच की मांग तो करते हैं।

आरोपों की अनदेखी जस्टिस मिश्रा ने भी की, जस्टिस गोगोई भी कर रहे हैं

“न्यायपालिका ख़तरे में है”- सम्भव है कि चीफ जस्टिस रंजन गोगोई सही कह रहे हों क्योंकि यह आवाज़ 16 महीने पहले भी फ़िजां में गूंजी थी और उस वक्त भी आवाज़ बुलन्द करने वालों में जस्टिस रंजन गोगोई शामिल थे। तब चार जजों के आरोपों का तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने जवाब देना जरूरी नहीं समझा था। तब और अब में कोई फर्क आया है क्या? अब वर्तमान चीफ जस्टिस रंजन गोगोई लगभग अपने पूर्ववर्ती समकक्ष के नक्शे कदम पर चलते हुए कह रहे हैं कि वे आरोप को जवाब देने लायक नहीं समझते। तब किसी ने चीफ जस्टिस पर उंगली नहीं उठायी थी और अब उंगली न उठे, ऐसा हो नहीं सकता।

क्या चीफ जस्टिस सुप्रीम कोर्ट से ऊपर हैं?

अक्सर ये सवाल पूछे जाते हैं कि क्या कोई सुप्रीम कोर्ट से ऊपर है? आज यह सवाल नयी शक्ल ले चुका है। क्या सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस का वजूद सुप्रीम कोर्ट से ऊपर है? अगर कोई ये कहे कि चीफ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट एक-दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते, तो यह बात कभी मानी नहीं जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट है तभी चीफ जस्टिस हैं। वर्तमान में सभी 27 जस्टिस मिलकर सुप्रीम कोर्ट हैं। इसमें प्रैक्टिस करने वाले वकील, कर्मचारी, अधिकारी सभी इसका अभिन्न हिस्सा हैं। ऐसे में चीफ जस्टिस कभी भी सुप्रीम जस्टिस में बाधा बनकर सामने खड़े नहीं हो सकते।

अब भी अनसुलझा है रोस्टर का सवाल

चार जजों ने रोस्टर विवाद उठाते हुए यही तो कहा था कि चीफ जस्टिस बाकी जस्टिस की तरह हैं। वे किसी के सीनियर नहीं हैं। आखिर चीफ जस्टिस अपने विरुद्ध शिकायतों की सुनवाई कैसे कर सकते हैं! रोस्टर का सवाल एक बार फिर अनसुलझा दिख रहा है। चीफ जस्टिस का व्यवहार और उनकी दलीलें चौंकाने वाली हैं :

  • चीफ जस्टिस रंजन गोगोई यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला पर ही आरोप लगा रहे हैं। महिला के अतीत की याद दिला रहे हैं।
  • गोगोई 20 सालों के कार्यकाल में ईमानदारी का उल्लेख कर अपना बचाव कर रहे हैं।
  • चीफ जस्टिस ऐसी आशंका जता रहे हैं कि उनके विरुद्ध षडयंत्र रचा जा रहा है।
  • वे दावा भी कर रहे हैं कि अगले हफ्ते महत्वपूर्ण मुकदमों से उन्हें दूर करने की कोशिशों को वे सफल नहीं होने देंगे।
  • वे कुछ लोगों के जेल मे रहने और जेल से छूटने का जिक्र कर अपने ऊपर लगे आरोपों को उनसे जोड़ते भी हैं।

आरोप साबित हुए तो क्या न्यायपालिका का सम्मान घटेगा?

प्रश्न ये है कि आम आरोपी और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस में फर्क क्या है? किसी महिला पर पलट कर आरोप लगाना आरोपियों का शगल रहा है। षडयंत्र की आशंका बगैर सबूत के कोई मायने नहीं रखती। जबरन पद पर बने रहना हर आरोपी की अंतिम दम तक कोशिश रहती है। वास्तव में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई पर यौन प्रताड़ना का आरोप है जिस पर यकीन करने का मन नहीं करता। इस आरोप का गलत साबित होना न्यायपालिका के हित में होगा। मगर, आरोप सही साबित होने पर न्यायपालिका का सम्मान घटेगा नहीं, बल्कि बढ़ेगा। जस्टिस रंजन गोगोई इसी पहलू की उपेक्षा कर रहे हैं। वे चीफ जस्टिस के बजाय एक आरोपी की तरह जवाब दे रहे हैं।

क्या है न्याय का धर्म?

आखिर यह स्थिति पैदा क्यों हुई? एक महिला कर्मचारी चीफ जस्टिस पर आरोप लगाए, तो उसे इसके लिए हिम्मत कहां से मिली? चीफ जस्टिस रंजन गोगोई उन लोगों की ओर इशारा कर रहे हैं जो जेल में बंद थे और अब बाहर हैं। वे कह रहे हैं कि आगे कुछ हफ्तों में महत्वपूर्ण सुनवाई होनी है, इसी वजह से ऐसा किया जा रहा है। मगर, उन्हें ये बातें अपनी अदालत से अलग किसी और के अदालत में कहनी होंगी। उन्हें एक पक्ष बनकर अपनी बातें साबित करनी होगी। यही न्याय का धर्म है।

आरोप का रफ़ाल कनेक्शन?

रफ़ाल का मामला बड़ा मामला है। इसमें भ्रष्टाचार होने की बात साबित करना अदालती लड़ाई भी है, राजनीतिक भी। आवाज़ दबाने की कोशिश दोनों मोर्चों पर जारी है। जिस तरह से सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट से केंद्र सरकार ने झूठ बोला और सच सामने आने के बावजूद फैसले पर फर्क नहीं पड़ा, इसने कानून के जानकारों को चौंकाया है। एक बार फिर जब रफ़ाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह तय कर दिया है कि लीक हुए दस्तावेज के आधार पर रफ़ाल की सुनवाई होगी और इसकी सुनवाई इसी हफ्ते होनी है तो यह मुमकिन है कि मामले से जुड़े चीफ जस्टिस को ‘दागी’ या ‘संदिग्ध’ बना देना एक साजिश का हिस्सा हो। यौन प्रताड़ना के आरोप उस साजिश का हिस्सा भी हो सकता है।

आपको स्मरण होगा कि सीबीआई के चीफ रहे आलोक वर्मा भी तब आरोपों में घिरे थे जब उन तक रफ़ाल के कागज पहुंचे और वे उसकी जांच पर फैसला लेने जा रहे थे। आधी रात का ड्रामा, जबरन छुट्टी पर भेजना और नये-नये एंगल के बीच अदालती प्रक्रिया में आलोक वर्मा रिटायर हो गये।

रफ़ाल पर फैसले से पहले क्यों एकांत में मिले थे पीएम-चीफ जस्टिस?

संविधान सभा की जयंती समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के बीच एकांत  मुलाकात भी परम्परा तोड़ कर हुई थी। कहने को कह सकते हैं कि ऐसी मुलाकात में हर्ज क्या है। मगर, रफ़ाल पर फैसला देने से 20 दिन पहले इस मुलाकात की अहमियत इस बात में है कि परम्परा तोड़ी गयी। प्रधानमंत्री कार्यपालिका के प्रमुख होते हैं और न्यायपालिका को कार्यपालिका के प्रभाव से मुक्त रखा जाए, इसलिए इस परम्परा को बचाए रखा गया था। जब ऐसी परम्परा टूटती हैं तो उसके परिणाम भी बड़े होते हैं। बाद के दिनों में रफ़ाल मामले में हो रही प्रगति ने इस बात को साबित किया है।

रफ़ाल फैसले में दिखे थे 3 स्पष्ट झूठ

पीएम-चीफ जस्टिस मुलाकात के तीन हफ्ते के भीतर रफ़ाल मामले में फैसला आया। खुद चीफ जस्टिस उसका हिस्सा थे। फैसले में तीन स्पष्ट झूठ सीलबंद लिफाफे के नाम पर सच मान लिए गये थे। ये तीन झूठ थे

  • राफाल डील से जुड़ी कीमत के विवरण सीएजी से साझा किए गये।
  • सीएजी का परीक्षण लोक लेखा समिति ने किया।
  • सीएजी रिपोर्ट का संशोधित हिस्सा सदन में रखा गया, जो पब्लिक डोमेन में है।

केंद्र सरकार की ओर से अपनी गलती मान लिए जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कोई बदलाव क्यों नहीं आया?  मोदी सरकार रफ़ाल मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अपने लिए क्लीन चिट मानकर पेश करती रही।

SC ने नहीं कहा, ‘चौकीदार चोर है’, क्यों नहीं कहा- “चौकीदार चोर नहीं है”?

आगे रफ़ाल मामले पर ही जब प्रशांत भूषण व अन्य की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने लीक हुए दस्तावेज के आधार पर सुनवाई को स्वीकार किया, तो राहुल गांधी ने इसे ‘चौकीदार चोर है’ के सबूत के तौर पर पेश किया। मगर, न सिर्फ इस बात के लिए राहुल गांधी को सुप्रीम कोर्ट ने गलत ठहराया गया, बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह जोड़ा कि “सुप्रीम कोर्ट ने नहीं कहा है कि चौकीदार चोर है”। आखिर सुप्रीम कोर्ट ने एक और पंक्ति क्यों नहीं लिखी- “सुप्रीम कोर्ट ने नहीं कहा है कि चौकीदार चोर नहीं है।”

भ्रष्टाचार के मामले में दबाव की बात छिपी नहीं है। मगर, चीफ जस्टिस रंजन गोगोई अगर इशारा कर रहे हैं कि यह दबाव यौन प्रताड़ना के आरोप के रूप में भी है, तो चिन्ता बढ़ जाती है। स्थिति यह है कि जिन पर भ्रष्टाचार का बोझ है वे चीफ जस्टिस पर यौन प्रताड़ना का आरोप उड़ेल कर निश्चिंत हो जाएंगे और चीफ जस्टिस का वक्त इन आरोपों से जूझने में बीत जाएगा। ऐसी स्थिति से निबटने का रास्ता खुद चीफ जस्टिस को निकालना होगा। मामले तो आते और जाते रहेंगे, मगर न्याय प्रक्रिया दाग़दार न हो इसे सुनिश्चित करना अधिक ज़रूरी है।

(लेखक टीवी और प्रिंट पत्रकारिता से लंबे समय से जुड़े रहे हैं और इन दिनों एक पत्रकारिता संस्थान में फ़ैक्लटी हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

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