तक़रीबन 4,000 साल पहले प्राचीन हड़प्पावासी अपनी सभ्यता की पराकाष्ठा के दौरान क्या खाते रहे होंगे ? क्या प्राचीन दक्षिण एशियाई लोग शाकाहारी थे ?
इन सवालों के जवाब के कुछ सुराग़ हमें जर्नल ऑफ़ आर्कियोलॉजिकल साइंस में हाल ही में प्रकाशित कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय स्थित पुरातत्व विभाग की पूर्व पीएचडी छात्रा, डॉ अक्षिता सूर्यनारायण द्वारा सह-लिखित एक पेपर से मिलता है। डॉ सूर्यनारायण और उनकी टीम ने उत्तर पश्चिम भारत में स्थित हड़प्पा सभ्यता के ग्रामीण और शहरी पुरातात्विक स्थलों से बरामद किये गये 172 चीनी मिट्टी के बर्तनों के टुकड़ों के लिपिड (कार्बनिक यौगिकों जैसे फैटी एसिड या उनके व्युत्पन्न) अवशेषों को निकाला और उनका विश्लेषण किया। इन बर्तनों से निकाले गये लिपिड से हमें इन बर्तनों में पशु उत्पादों की पर्याप्त मात्रा का सीधा-सीधा सुबूत देते हैं।
सूर्यनारायण ने बताया,"सिंधु क्षेत्र में मिले मिट्टी के बर्तनों में लिपिड अवशेषों के हमारे अध्ययन में इन बर्तनों में सूअर जैसे जुगाली नहीं करने वाले पशुओं के उत्पादों की पर्याप्त मात्रा दिखाती है, गैर-जुगाली करने वाले जानवरों या भैंस और भेड़ या बकरी के मांस के साथ-साथ दुग्ध उत्पाद की पर्याप्त मात्रा भी दिखाती है।"

हड़प्पा से मिले मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े का प्रतिकात्मक चित्र (साभार: हड़प्पा डॉट कॉम,कनारी बुटी से मिले मिट्टी के बर्तन और टाइल)
हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति की निशानदेही पाकिस्तान स्थित मेहरगढ़ स्थल से की जा सकती है,जिसका इतिहास तक़रीबन 7000 ईसा पूर्व तक जाता है। शुरुआती हड़प्पा काल की विशेषता प्रारंभिक शहरी केंद्रों की स्थापना के तौर पर चिह्नित की जाती है और यह ऐतिहासिक घटना 2800 ईसा पूर्व के आसपास हुई थी। यह सभ्यता 2600 ईसा पूर्व के आस-पास अपने चरम पर पहुंच गयी थी और 1900 ईसा पूर्व के आसपास इसका पतन हो गया था।
जिस समय यह सभ्यता अपने चरम पर थी, उस दौरान हड़प्पा प्राचीन मिस्र या मेसोपोटामिया के मुक़ाबले कहीं बड़े भू-भाग क्षेत्र में फैली हुई थी, इसमें आज के पाकिस्तान, उत्तर-पश्चिम और पश्चिमी भारत के ज़्यादातर क्षेत्र और नई दिल्ली के आस-पास के पूर्वी इलाक़े भी शामिल थे। हालांकि परिपक्व हड़प्पा सभ्यता तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के बीच में एक सुनिश्चित भौगोलिक क्षेत्र में पनपी थी, लेकिन इस क्षेत्र के पूर्व और दक्षिण में समकालीन कृषि-ग्रामीण संस्कृतियां थीं।
हड़प्पा के लोग अपने पश्चिम इलाक़ों के साथ आर्थिक तौर पर लंबे समय तक संचार और व्यापारिक संपर्क के ज़रिये बलूचिस्तान और ईरानी पठार से जुड़े हुए थे। परिपक्व हड़प्पा काल की शुरुआत में भी तक़रीबन 2400 ईसा पूर्व में हड़प्पा के लोग सुमेरियों और अक्कादियों के साथ व्यापार करने के लिए मेसोपोटामिया तक का सफ़र तय किया करते थे।
इस संस्कृति के दो सबसे मशहूर खुदाई वाले शहर हैं- हड़प्पा और मोहनजोदड़ो, ऐसा माना जाता है कि इन शहरों की आबादी कभी 40,000-50,000 रही होगी। पश्चिमी भारत और पाकिस्तान में बाद के सर्वेक्षणों और खुदाई में 1,500 से ज़्यादा अतिरिक्त बस्तियां सामने आयीं हैं। भारत में ही 900 से ज़्यादा स्थल ऐसे मिले हैं,जो राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पंजाब और महाराष्ट्र जैसे विभिन्न राज्यों में फैले हुए हैं।
डॉ. सूर्यनारायण और उनके सहयोगियों ने चीनी मिट्टी से बने इन बर्तनों को इकट्ठा करने के लिए राखीगढ़ी, फ़रमाना, मसूदपुर, लोहारी राघो, खानक और आलमगीरपुर जैसे स्थलों का चुनाव किया। ये सभी स्थल आज के हरियाणा और उत्तर प्रदेश में स्थित हैं। परिपक्व हड़प्पा काल (2600 ईसा पूर्व -1900 ईसा पूर्व) के चीनी मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल बर्तनों की दीवारों में संरक्षित अदृश्य कार्बनिक अवशेषों को इकट्ठा करने के लिए किया गया था।
लिपिड अवशेषों में क्षरण की संभावना कम होती है और दुनिया भर से जुटाये गये पुरातात्विक साक्ष्यों में मिली मिट्टी के बर्तनों में इसे खोजा गया है। मिट्टी के टूटे हुए बर्तनों को आम तौर पर रेडियोकार्बन की तारीख के सिलसिले में चुना जाता था। परिपक्व हड़प्पा काल के दौरान, राखीगढ़ी एक बड़ा शहर था और फ़रमाना एक शहर था। बाक़ी स्थल गांव थे। इन स्थलों की विस्तृत श्रृंखला प्राचीन दक्षिण एशियाई शहरी और ग्रामीण आबादी के भोजन की आदतों के बारे में जानकारी देती है।

प्राचीन मेसोपोटामियन सभ्यता के साथ हड़प्पावासियों के व्यापारिक रिश्ते थे, मेसोपोटामिया के लोगों के आहार फल और सब्जियों के साथ-साथ नदियों और जलाशयों से मिलने वाली मछलियां और उनके पशु-बाड़ों में पलने वाले पशुधन के मांस थे। पशुधन में बकरी, सूअर और भेड़ शामिल थे। उन्होंने हिरण, बारहसिंघे और पक्षियों जैसे शिकार किये जाने के खेल के ज़रिये इस आहार में इज़ाफ़ा किया होगा। मेसोपोटामिया में मुख्य अनाज की फ़सल जौ थी।
हम पहले किये गये अनुसंधान से जानते हैं कि शहरी काल में हड़प्पावासियों के मुख्य आहार गेहूं, जौ, बाजरे के साथ-साथ मवेशियों, भेड़ और बकरी के मांस से बने तरह-तरह के आहार थे। हड़प्पा सभ्यता के कई स्थलों पर सौ से ज़्यादा वर्षों से चल रहे खुदाई से इस बात के संकेत मिलते हैं कि वे अनाज, मसूर और अन्य दालें (मटर,छोटी मटर, मूंग, और काले चने), तिलहन और फल उगाया करते थे। उनके मुख्य उत्पाद गेहूं और जौ थे,जिनका इस्तेमाल शायद रोटी बनाने में किया जाता रहा होगा और शायद उन्हें पानी के साथ दलिया या लपसी के तौर पर पकाया जाता रहा होगा। कुछ जगहों पर वे देशी बाजरे की कई क़िस्मों की खेती किया करते थे। वे नदियों से पकड़कर मछली और घोंघे भी खाया करते थे और इसकी पुष्टि समुद्री मछलियों की उन हड्डियों से होती है,जो हड़प्पा स्थलों की खुदायी में मिली हैं।
कंकाल के अवशेषों के विश्लेषण के आधार पर हुए कई पिछले अध्ययनों से पता चलता है कि मवेशी और जंगली भैंस उनके आहार में शामिल मांस और दुग्ध उत्पादों के स्रोत के तौर पर काम में आते थे, जबकि इन पशुओं की खालें अलग-अलग तरह के दूसरे प्रयोजनों में इस्तेमाल किये जाते थे। हड़प्पावासी भेड़ और बकरियां भी पालते थे और हिरण, मृग और जंगली सूअर जैसे जंगली जानवरों का शिकार भी किया करते थे।
एक पूर्व अध्ययन में पाया गया था कि “औसतन, अलग-अलग सिंधु स्थलों से जुटाये गये पशुओं के अवशेष से मालूम होता है कि तक़रीबन 80% पशु का सम्बन्ध घरेलू पशुओं की प्रजातियों से था। इन घरेलू जानवरों की जो हड्डियां पायी गयी हैं, उनमें सबसे ज़्यादा यानी 50 से 60% के बीच मवेशी / भैंस की हड्डियां हैं, 10% भेड़ / बकरियों की हड्डियां हैं।” उस अध्ययन में आगे कहा गया था,“मवेशियों की हड्डियों के उच्च अनुपात के पाये जाने से ऐसा लगता है कि शायद बकरे / भेड़ के मांस के पूरक के रूप में सिंधु घाटी के लोगों में गोमांस के उपभोग की संस्कृति रही होगी।”
हड़प्पा स्थलों से बरामद चीनी मिट्टी के बर्तन के अंदर बचे अवशेषों के अध्ययन से इस धारणा की पुष्टि होती है कि गोमांस, बकरी, भेड़ और सुअर की खपत व्यापक रूप से थी। सूर्यनारायण के हवाले से द इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा था,“यह अध्ययन इस मायने में अनूठा है कि इसमें इन बर्तनों में मौजूद सामग्री को देखे जाने की गुंज़ाइश थी। आम तौर पर बीज या पौधे के अवशेष तक पहुंच होती है। लेकिन, लिपिड अवशेषों के विश्लेषण के ज़रिये हम पूरे भरोसे के साथ यह बात कह सकते हैं कि जानवरों के मांस, बकरी, भेड़ और सुअर,और ख़ास तौर पर गोमांस की खपत व्यापक थी।’’
इन उत्पादों में व्यापक समानता ग्रामीण और शहरी, दोनों ही स्थलों पर देखी जाती है, संभवतः इससे खाने को लेकर क्षेत्रीय एकरूपता के स्तर का संकेत मिलता है। हालांकि, उत्तर पश्चिम भारत के ग्रामीण और शहरी सिंधु स्थलों में रहने वाले लोग विभिन्न प्रकार की सामग्री और मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल करते थे, फिर भी ऐसा लगता है कि उनके खाना पकाने और खाद्य पदार्थों को तैयार करने के तौर-तरीक़े कमोवेश एक ही रहे होंगे।
हालांकि अध्ययन स्थलों से जुटाये गये कुल पशु-पक्षियों के समूह का लगभग 2-3% हिस्सा सूअर के हैं, तक़रीबन 60% बर्तनों के लिपिड के विश्लेषण से पता चलता है कि इसमें जुगाली नहीं करने वाले जानवरों के अवशेष भी हैं। पशु साक्ष्यों के विपरीत, इन बर्तनों में जुगाली नहीं करने वाले पशुओं की वसा का ज़्यादा मात्रा में मिलना हैरत पैदा करता है। चीनी मिट्टी के बर्तनों में पाये जाने वाले जुगाली नहीं करने वाले पशुओं के वसा के उच्च प्रतिशत का अंतर और विभिन्न स्थलों से एकत्र किये गये सूअर के कंकाल के टुकड़ों की मामूली संख्या के पीछे की वजह पुरातात्विक स्थलों से सूअरों या पक्षियों की छोटी-छोटी हड्डियों की अपूर्ण बरामदगी हो सकती है।
उत्तर पश्चिम भारत से हड़प्पा के बर्तनों में पाये जाने वाले दुग्ध प्रसंस्करण के सीमित साक्ष्य उल्लेखनीय हैं। इस अध्ययन में कहा गया है,“मुमकिन है कि दुग्ध-उत्पाद की खपत कुछ ही तबकों तक सीमित रही हो, इन सिंधु बस्तियों में व्यापक रूप से इनका प्रचलन नहीं रहा हो, या जिन बर्तनों का इस्तेमाल दुग्ध उत्पादों के लिए किया जाता था, मुख्य रूप से उन बर्तनों का विश्लेषण इस अध्ययन में किया ही नहीं गया हो, या फिर इनका इस्तेमाल उन बर्तनों में किया जाता रहा हो,जो जैविक पदार्थों से बना हो और जिसके अवशेष बचे ही नहीं हों।” इस अध्ययन में विश्लेषित बर्तनों के अपेक्षाकृत बड़े सैंपन का आकार इस बात का कुछ हद तक भरोसा दिलाते हैं कि यह निष्कर्ष हड़प्पा सभ्यता की हक़ीक़त का एक तार्किक झलक ज़रूर देते हैं।
दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय ने इस साल के शुरू में 19 से लेकर 25 फरवरी तक हड़प्पा खाद्य संस्कृति पर विशेष रूप से तैयार किये गये ‘हिस्टोरिकल गैस्ट्रोनोमिका-द इंडस डाइनिंग एक्सपीरियंस’(ऐतिहासिक पाककला -सिंधु भोजन के अनुभव) नामक टेस्टिंग मेनू की व्यवस्था की थी। इसमें खट्टी दाल, कचरीकी सब्ज़ी, गुड़ और तिल के तेल के साथ भाप में पकाये गया काला चना, रागी के लड्डू, तावे पर पकायी गयी जौ की पतली रोटी,केले और शहद के साथ मीठा चावल और एक विशेष 'सिंधु घाटी खिचड़ी' शामिल हैं।
हालांकि, आख़िरी पलों में आयोजकों ने अपने मेनू से उन मांसाहारी विकल्पों को हटा दिया था, जिनमें मांस के वसे का सूप, साल पत्ता में भुने हुए बटेर और नमक में सुरक्षित किये गये भेड़ के मांस शामिल थे। उस कार्यक्रम का आयोजन संयुक्त रूप से राष्ट्रीय संग्रहालय, संस्कृति मंत्रालय और एक निजी कंपनी द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था। अतिरिक्त महानिदेशक, सुब्रत नाथ ने एएनआई से बताया, "उनका हड़प्पा मेनू बहुत अच्छी तरह से किये गये शोध का नतीजा है, लेकिन उन्हें मांसाहार व्यंजनों का विकल्प नहीं चुनना चाहिए था।" उन्होंने आगे कहा, "किसी मामले में हमारे बीच चर्चा हुई और हम किसी तरह समय रहते उस स्थिति से बच पाये, जिसे लेकर शर्मिंदगी उठानी पड़ सकती थी। ”
लेकिन, मांस से बने व्यंजन हड़प्पावासियों के लिए शर्मिंदगी का विषय बिल्कुल नहीं थे। पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाणों के बावजूद कि हड़प्पा मांस खाने वाला समाज था, उन विचारों पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत है, जिनके चलते वे शर्मिंदा होते। वे केन्द्रीय, मध्य और दक्षिण एशिया के मध्य कांस्य युग के किसी भी अन्य लोगों की तरह, यदा-कदा मांस खाने वाले लोग थे।
(लेखक के विचार निजी हैं।)
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New Study Suggests Pork and Beef were the Gastronomical Delights of Harappan People