NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
बढती साम्प्रदायिकता और वर्तमान राजनीति
न्यूज़क्लिक प्रोडक्शन
17 Nov 2014

नई सरकार के सत्ता में आने के बाद सांप्रदायिक हिंसा का एक दौर सा चल पड़ा है. केवल उत्तर प्रदेश में 600 से अधिक दंगे हुए हैं। सरकार पर संघ का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश हर छोटे से छोटे वारदातों में की जा रही है। प्रधानमंत्री ने इन सभी वारदातों पर चुप्पी साध रखी है। यहाँ तक की उन्होंने जिन वादों के दम पर सरकार बनाई थी, उन्हें पूरा करने की तरफ पहला कदम भी नहीं लिया है। सिर्फ दिखावा और एक शोर चारो तरफ व्याप्त है जिसमे प्रधानमंत्री के चरित्र निर्माण की कोशिश की जा रही है। इन्ही मुद्दों को ध्यान में रखते हुए न्यूज़क्लिक ने सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ से बात की।

                                                                                                                

प्रांजल- नमस्कार, न्यूज़क्लिक में आपका स्वागत है। आज हमारे बीच सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ जी हैं, जिनके साथ हम सांप्रदायिकता के बढ़ते चरम पर और नई सरकार के चरित्र पर बात करेंगे। हैलो तीस्ता, आपने देखा है कि जबसे ये नई सरकार सत्ता में आई है, सांप्रदायिक दंगों की एक बाढ़ सी देखने को मिली है। 600 से अधिक दंगे उत्तर प्रदेश में देखने को मिले हैं और कई जगह छोटी छोटी हिंसक घटनाएँ देखने को मिली हैं। प्रधानमंत्री ने इन सभी चीज़ों पे चुप्पी साध रखी है, तो क्या यह कहना सही होगा की जब से नई सरकार सत्ता में आई है, तब से सांप्रदायिक ताकतों को एक खुली छूट मिल गयी है?

तीस्ता सीतलवाड़- न सिर्फ खुली छूट मिली है मगर एक आधार उनका बन गया है कि सरकार के ज़रिये जो बहुमत से बनी गई सरकार है, आपकी लोक सभा में बहुमत की उनकी संख्या है, इस से आपको कोई टिप्पणी नहीं मिलेगी। देखिये सबसे बड़ी बात है की हमारी जो भारत की जंभूरियत है, जो लोक शाही है, उसकी सबसे बड़ी चुनौती ये है कि जो सांप्रदायिक हिंसा और इलेक्शंस को लेकर जो संबंध बनाये गए हैं, जब भी कोई हमारे राज्य में या हमारे देश में कोई जनरल इलेक्शन या राज्य के इलेक्शन आते हैं तब आप देखेंगे की साम्प्रदायिकता बढ़ जाती है। इनका आधार ये है की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जो भारतीय जनता पार्टी का फाउंडेशन है, और जो एक फिरका परस्त सोच का एक संगठन है, वो चाहता है की सांप्रदायिक दंगे के ज़रिये आवाम में एक पोलराइज़ेशन हो, फिजिकल भी और मेन्टल भी ताकि जिस वक़्त वो इंसान वोट डालने जाये, वो अपने आप को हिन्दू मान कर वोट डाले। 

प्रांजल- तो जैसा की हमने देखा कि लगातार प्रोसेस चला रहा है, शिक्षा के भगवाकरण की भी तैयारी चल रही है, प्रधान मंत्री शिक्षक दिवस के दिन बच्चों से सीधी बात कर रहे हैं, स्वच्छता अभियान को इतने बड़े तरीके से लागू किया जा रहा है, तो हम ये कहें की बीच का जो एक स्तर हुआ करता था डेमोक्रेसी का, वो हमारे पास रह नहीं गया है, जो भी डिसिशन लिया जा रहा है वो सिर्फ प्रधान मंत्री ले रहे हैं, और उसे सीधे नीचे इम्प्लीमेंट किया जा रहा है, बिना किसी लोक तांत्रिक चर्चा के, बिना किसी लोक तांत्रिक ढर्रे को फ़ॉलो करते हुए। तो क्या यह कहना सही होगा कि इस देश ने एक नेता नही एक तानाशाह चुन लिया है?

तीस्ता सीतलवाड़- फ़िलहाल तो मैं यह नहीं कहूँगी क्योंकि अभी भी मानती हूँ की हमारे जो लोकशाही में जो इंस्टीट्यूशन्ज़ हेड हैं लोकशाही के, चाहे वो आपकी जुडिशरी हो या दूसरे चेक्स एंड बैलन्सेस हों, अभी उनके सामने एक चुनौती है। कोशिशें ज़रूर की जा रही हैं कि एक तानाशाह को, एक राजा को अपनी प्रजा के साथ बात करने की हमे एक पूरी शक्ल देख रहे हैं, कि वो राजा और प्रजा जब मन की बात कहे स्वच्छता अभियान के बारे में, तो वो जो मेटाफोर यूज़ करते हैं, तो वो सिर्फ सड़क, अस्पताल और मंदिर, वो धर्म स्थल नहीं कहेंगे वो मंदिर कहेंगे। तो इस तरह का बहुसंख्यकवाद, एक सरकारी भाषा में आ गया है, वो जो मैं मानती हूँ की डॉक्टर बाबासाहेब अम्बेडकर का दिया हुआ संविधान के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। जब यही मतलब देश के प्रधानमंत्री जो लोकतांत्रिक रूप से चुने हुए हैं, वो जब नेपाल जाते हैं, तो वहां के मंदिर में रुद्राभिषेक करते हैं, जो रुद्राभिषेक का खर्चा है, 250 किलो ग्राम संदल और असली घी का खर्चा 4 करोड़ 90 लाख 60 हज़ार, तो वो कहाँ से दिया? किसने दिया? या की वो प्रधान मंत्री के एकाउंट से गया है, या कोई दुसरे एकाउंट से गया है, ये सवाल लोकशाही में पूछना और सदन में पूछना आज बहुत ज़रूरी हो गया है। 

प्रांजल- आपने बाबा साहब अम्बेडकर की बात है, तो हमने देखा है की जब जब यह सांप्रदायिक हिंसा होती आई है, तो जो एक निचला तबका है समाज का, जातिगत ढाँचे में, उसको अक्सर ये ताकतें इस्तेमाल करती रही हैं, इनके बेहाफ पे एक जंग लड़ने के लिए। हमने त्रिलोकपुरी में भी अभी देखा है कि जहां ये दंगे हुए बेसिकली ये दलित बाहुल्य इलाका था, तो आप इसको, इन सांप्रदायिक ताकतों की तरफ से ये जो तरीका अपनाया जा रहा है ये किस तरफ जा रहा है?

तीस्ता सीतलवाड़- 17-18 साल पहले जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जब यह पाया कि सिर्फ ब्राह्मण ताकत बनके वो इस देश पे राज नहीं कर सकते तब उन्होंने डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर को अपने संतों की लिस्ट में डाल दिया। और उसी वक़्त वो बाबा साहब अम्बेडकर जिन्होंने हिंदुत्व के ख़िलाफ़ लिखा है, जिन्होंने हिन्दू राष्ट्र के ख़िलाफ़ लिखा है, जिनकी रिडल्स इन हिंदूइस्म अगर आप पढ़ें तो आज भी जो ऊपरी तबका हिन्दू है, उसका ख़ून खौल सकता है। क्योंकि उसके अंदर उन्होंने रामायण का जो ज़िक्र किया है, राम और सीता का जो ज़िक्र किया है, रिडल्स इन हिंदूइस्म, कोशिश की थी शिव सेना ने 1998 में उस किताब को बैन करवाने की, मगर दलितों ने उनका विरोध किया। आज वही दलित हिंदुत्व के लिए खड़ा हो जाता है मगर चुनौती दोनों के लिए है, दलित समाज की लीडरशिप के लिए भी है और माइनॉरिटी समाज की लीडरशिप के लिए भी है। क्योंकि जातिवाद जो है, वो हमारी माइनॉरिटीज में भी है, तो जब तक ये बहुजन जो है, अपनी संख्या जो है हम मानते हैं, मेजोरिटी जो देश में है, बहु संख्यक है, वो प्रोग्रेसिव वैल्यूज़ को देखकर नहीं बढ़ेगी, चाहे एक तरफ़ वो दलित हो या माइनॉरिटीज़ एक तरफ़ हो, क्योंकि आज हमारी माइनॉरिटी कम्युनिटी में भी जातिवाद बहुत है और हमारे दलित भाई बहन भी हिंदुत्व वादी की तरफ़ खिंचे जा रहे हैं, तो दोनों तबकों में प्रोग्रेसिव वैल्यूज़ बढ़ाने की ज़रुरत महसूस कर रहे है। 

प्रांजल- अच्छा, इन सब मुद्दों से अलग हटते हुए, क्योंकि आपने गुजरात में बहुत सारा काम किया है, गुजरात दंगों के बाद काम किया है । अभी हमने देखा जो गुजरात दंगों के मुख्य आरोपी थे, जैसे बाबू बजरंगी हो गए, माया कोडनानी, इन सबको ज़मानत मिल गई है। तो एक तरीके से आपको क्या लगता है कि इस नई सरकार के आने के बाद, हमें कुछ न्याय की उम्मीद करनी चाहिए कि ये न्याय अब शायद  दूभर ही हो गया है हमारे लिए?

तीस्ता सीतलवाड़- नहीं, देखिये, हम ने और हमारे संगठन ने जो गुजरात में, मैं दंगे तो नहीं कहूँगी मैं जन संहार कहूँगी उसको, उसके बाद जो काम किया, उसकी वजह से 122 लोगों को उम्र कैद की सजा मिली। जो भी हमें मिला 12 साल में वो हमे कोर्ट कचेहरी से मिला है । हमें आज भी शिकायत है हमारे राजनैतिक दलों से जो अपने आप को सेक्युलर कहते हैं, की जिन दम से और जिस जत्तोजेहद से उनको सांप्रदायिकता के खिलाफ और मोदी के ख़िलाफ़ सड़कों पे लड़ना था, उतना नहीं लड़ा, जितना कोर्ट कचेहरी ने और हमें जजमेंट मिला। तो आज भी हमे जुडिशरी से उम्मीद है, क्योंकि माया कोडनानी को बेल जुलाई में गुजरात हाई कोर्ट ने ज़रूर दी, वो हमने सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज की है, अगले हफ्ते आएगा केस, मगर बजरंगी को वो बेल रिफ्यूज़ हुई है हाई कोर्ट में। तो मैं मानती हूँ, चुनौती लोकशाही इंस्टिट्यूशंस के लिए है, सबसे बड़ी चुनौती इलेक्शन कमीशन और यह देश के न्यायधीश,  जुडिशरी के लिए है, जैसे एमर्जेन्सी में हुआ था।  

प्रांजल- अभी जैसे की हम देख रहे हैं धर्म निर्पेक्षता का जो सिद्धांत है, वो बहुत खतरे में है और ऐसा एक शासक हमारे ऊपर बैठा हुआ है । तो आगे का जो रास्ता है, वो हम किस तरीके से तय करेंगे, ताकि हम इस तानाशाही के खिलाफ जो शायद आ सकती है कभी, एक आवाज़ बुलंद खड़ी कर सके ?

तीस्ता सीतलवाड़- हम अलग अलग स्तर पे जो तालीम शिक्षण को लेकर, क़ानून कार्यवाही को लेकर, संगठन बांधने को लेकर जो काम हो रहे हैं, उसको हम बहुत ही डट कर करते रहे, ये तो पहली बात है, कि हम जो करते हुए  काम हैं, उनको न छोड़ें। दूसरी बात जहां हो सके वहां पर हम गठबंधन बांधे, क्योंकि मैं मानती हूँ सबसे बड़ी चुनौती इस दौर की एक्सट्रीम राइट विंग जो इकनोमिक पॉलिसीस हैं, उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना, निओ लिबरल पॉलिसीस के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना, निजीकरण, प्राइवेटाइजेशन के खिलाफ, और साम्प्रदायिकता के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना । आजतक ये दोनों लड़ाई पैरेलल में चलती रही हैं, मैं मानती हूँ की इन दोनों लड़ाइयों को साथ में  बैठकर एक अल्टेरनेट वर्ल्ड व्यू ढूंढना पड़ेगा, और ये हो सकता है, बिलकुल हो भी रहा है, लोग इस तरह सोच भी रहे हैं कि रिसोर्सेज के खिलाफ जिस तरह आप ये सरकार, साम्प्रदायिकता की बात आप छोड़ दें, लैंड एक्वीजीशन एक्ट और फारेस्ट राइट्स एक्ट जो यह बदलने वाली है, वो चाहती है की जनता और आवाम से वो ताकत निकाल दे कि वो सरकार का विरोध करें, तो इसके ऊपर भी हमे आवाज़ उठाना ज़रूरी है । लेबर राइट्स जो जा रहे हैं, 150 साल से जो लेबर मूवमेंट में जो लड़ लड़ के अपने आप को जो थोड़ी सिक्यूरिटी दी वो आपने एक स्ट्रोक में राजस्थान सरकार ने निकाल दी और भारतीय सरकार निकलने की कोशिश में है। तो आज भी जो हमारा लेबर फ़ोर्स है, सिर्फ 7% ऑर्गनाइस्ड है और 93% अन ऑर्गनाइस्ड है मगर क्या हम उसके लिए आवाज़ उठाएंगे या नहीं। हम जो साम्प्रदायिकता के खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं, उनको वहां पे भी वो उठाना चाहिए, गठबंधन बनाना चाहिए, मुझे लगता है कि रेजिस्टेंस इस देश में ज़रूर पैदा होगी।  

प्रांजल- शुक्रिया तीस्ता, हम एक पॉज़िटिव नोट पर यहां ख़त्म करना चाहेंगे की आंदोलन और गठबंधन ही आगे का रास्ता है। धन्यवाद। 

 

साम्प्रदायिकता
सांप्रदायिक ताकतें
नरेन्द्र मोदी
बाबु बजरंगी
माया कोडनानी
गुजरात दंगे
त्रिलोकपुरी
दलित
अम्बेडकर
तीस्ता सीतलवाड़
नवउदारवाद

Related Stories

पेट्रोल और डीज़ल के बढ़ते दामों 10 सितम्बर को भारत बंद

दलित चेतना- अधिकार से जुड़ा शब्द है

दलितों आदिवासियों के प्रमोशन में आरक्षण का अंतरिम फैसला

राजकोट का क़त्ल भारत में दलितों की दुर्दशा पर रोशनी डालता है

मीडिया पर खरी खरी – एपिसोड 2 भाषा सिंह के साथ

मनुष्यता के खिलाफ़ एक क्रूर साज़िश कर रही है बीजेपी: उर्मिलेश

चीन-भारत संबंधः प्रतिद्वंदी दोस्त हो सकते हैं

सीपीआई (एम) ने संयुक्त रूप से हिंदुत्व के खिलाफ लड़ाई का एलान किया

नकदी बादशाह है, लेकिन भाजपा को यह समझ नहीं आता

दिल्ली में अखंड भारत मोर्चा द्वारा सांप्रदायिक दंगे भड़काने की कोशिश


बाकी खबरें

  • एसकेएम की केंद्र को चेतावनी : 31 जनवरी तक वादें पूरे नहीं हुए तो 1 फरवरी से ‘मिशन उत्तर प्रदेश’
    मुकुंद झा
    एसकेएम की केंद्र को चेतावनी : 31 जनवरी तक वादें पूरे नहीं हुए तो 1 फरवरी से ‘मिशन उत्तर प्रदेश’
    16 Jan 2022
    संयुक्त किसान मोर्चा के फ़ैसले- 31 जनवरी को देशभर में किसान मनाएंगे "विश्वासघात दिवस"। लखीमपुर खीरी मामले में लगाया जाएगा पक्का मोर्चा। मज़दूर आंदोलन के साथ एकजुटता। 23-24 फरवरी की हड़ताल का समर्थन।
  • cm yogi dalit
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव और दलित: फिर पकाई और खाई जाने लगी सियासी खिचड़ी
    16 Jan 2022
    चुनाव आते ही दलित समुदाय राजनीतिक दलों के लिए अहम हो जाता है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। उनके साथ बैठकर खाना खाने की राजनीति भी शुरू हो गई है। अब देखना होगा कि दलित वोटर अपनी पसंद किसे बनाते हैं…
  • modi
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे : झुकती है सरकार, बस चुनाव आना चाहिए
    16 Jan 2022
    बीते एक-दो सप्ताह में हो सकता है आपसे कुछ ज़रूरी ख़बरें छूट गई हों जो आपको जाननी चाहिए और सिर्फ़ ख़बरें ही नहीं उनका आगा-पीछा भी मतलब ख़बर के भीतर की असल ख़बर। वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन आपको वही बता  …
  • Tribute to Kamal Khan
    असद रिज़वी
    कमाल ख़ान : हमीं सो गए दास्तां कहते कहते
    16 Jan 2022
    पत्रकार कमाल ख़ान का जाना पत्रकारिता के लिए एक बड़ा नुक़सान है। हालांकि वे जाते जाते भी अपनी आंखें दान कर गए हैं, ताकि कोई और उनकी तरह इस दुनिया को देख सके, समझ सके और हो सके तो सलीके से समझा सके।…
  • hafte ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    योगी गोरखपुर में, आजाद-अखिलेश अलगाव और चन्नी-सिद्धू का दुराव
    15 Jan 2022
    मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के अयोध्या से विधानसभा चुनाव लडने की बात पार्टी में पक्की हो गयी थी. लेकिन अब वह गोरखपुर से चुनाव लडेंगे. पार्टी ने राय पलट क्यों दी? दलित नेता चंद्रशेखर आजाद की पार्टी अब…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License