NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
विभाजक राजनीति और विकास के भ्रम की हार
न्यूज़क्लिक प्रोडक्शन
20 Sep 2014

हाल ही में घोषित हुए उपचुआव के नतीजों और भाजपा की करारी हार पर न्यूज़क्लिक ने अली जावेद से चर्चा की। जावेद के अनुसार जनता ध्रुवीकरण की राजनीति के हमेशा खिलाफ रही है। अब वह ये भी समझ गई है कि वर्तमान सरकार उन्ही जनविरोधी नीतियों को और बढ़ावा दे रही है जिन्हें कांग्रेस पोषित कर रही थी और जिसे जनता ने इन लोकसभा चुनावो में सिरे से नकार दिया था। अली जावेद यह समझते हैं कि वर्तमान सरकार का यह सोचना गलत है कि वे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कर फायदा उठा सकेंगे। क्योंकि इस देश की जनता ने इस तरह की किसी भी कोशिश का मुहतोड़ जवाब दिया है। साथ ही अब जनता समझ गई है कि सारे विकास के वादे भ्रमित करने वाले थे और ये सरकार सिर्फ पूंजीपतियों के जेब भरने का काम कर रही है। जावेद के अनुसार उत्तर प्रदेश में समजवादी पार्टी की जीत, उनकी नीतियों की जीत नहीं बल्कि विकल्प की कमी होने का नतीजा है। मायावती का चुनाव लड़ना और दलितों का भाजपा के बहकावे में न आना इस नतीजे की वजह रहा है।

महेश कुमार: नमस्कार न्यूज़क्लिक में आपका स्वागत है। हाल ही में उपचुनाव के अन्दर भाजपा को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है। यह करारी शिकस्त क्यों हुई इस पर चर्चा करने के लिए हमारे साथ प्रोफेसर अली जावेद मौजूद है। उनसे हम इन मुदो पर चर्चा करेंगे।  जावेद साहब ये बताइये की मोदी सरकार जो पिछले सौ दिन से सत्ता के अन्दर है,  और वो विकास के मुद्दे पर सरकार में आई थी। हलाकि चुनाव में उनको करारी हार का सामना क्यों करना पड़ा? क्या इस की वजय सांप्रदायिक की ध्रुवीकरण की राजनीति का हारना है,या उनकी विकास का मुद्दा जो उन्होंने उठाया था? क्या इन मुद्दों पर जनता को सबक मिल गया है, कि ये सरकार भी वही नीतियाँ लागू कर रही है, जो यूपीए सरकार लागू कर रही है। 

अली जावेद -देखिये अगर हम पीछे जा कर गौर करे थोड़ा सा तो जो पिछले लोक सभा के चुनाव हुए थे, उसमे पिछली सरकार से जनता इतनी त्रस्त हो गई थी कि ये वोट जो मोदी सरकार को मिले और इतने अच्छे से बहुमत में आये वो थोड़ा चौकाने वाले थे। लेकिन उनमे ज्यादा बड़ा जो था,उसकी ये वजय थी कि देश की जनता इतनी ज्यादा तंग आ चुकी थी और उसके साथ साथ जनता के पास और अलटर्नेटिव नही था। बीजेपी  की तरफ से जब नरेंद्र मोदी का चेहरा आता है, वो अपना पिछला चेहरा ले कर नही आये थे जिसमे घृणा की राजनीति थी साम्प्रदायिकता थी। वो चेहरा ले कर नही आये थे। मोदी विकास के मुदे पर जनता से रूबरू  हुए थे । और उन्होंने अपने पूरे चुनाव प्रचार में कही  भी ऐसे भड़काऊ भाषण नही दिए जिसे से सम्प्रद्यिक माहौल खराब हो और इसीलिए जनता ने ये सोचा की अब ये बदले हुए मोदी है । विकास की बात कर रहे है। और कांग्रेस से यूपीए से तंग आई जनता ने ये सोचा जब डेवलपमेंट की बात कर रहे है, जनता को बहुत  ज्यादा नही मालूम था। फैक्ट एण्ड फिगर्स जिस तरह से काउन्टर पोस्ट किये  थे। गुजरात से उन्हें ये नही मालूम था की गुजरात की हकीकत क्या है। आम लोगो ने समझा की 15 साल में मोदी की लीडरशीप में गुजरात में बड़ा विकास हुआ है। और उसके आधार पर इतना बड़ा मैंडेट जनता ने दिया है। चुनाव जीतने और सत्ता में आने के बाद जब मोदी सरकार बनी उसके बाद भाजपा को ये गलतफैमी हो गई कि सारा चुनाव अमित शाह की बुनियाद पर जीता है। और अमित शाह ने जिस तरह प्रचार’ चलाया था, जिसमे उन्होंने कही-कही  सांप्रदायिक विवाद पैदा करने की कौशिश की थी, खास कर उत्तर प्रदेश में तो बीजेपी  को ये गलतफैमी हो गई थी। इस तरह के सांप्रदायिक उन्माद पैदा करके ध्रुवीकरण किया जा सकता है। और जनता का वोट हासिल किया जा सकता है। जब की ये  उनकी बहुत बड़ी भूल थी। ये भूल गए की जनता ने  विकास के मुदे पर और मनमोहन सिहँ की नाकामी और नकारापन उनको ध्यान में रखते हुये गुस्सा दिखाया था। जिस के तहत उन्होंने मोदी सरकार को वोट दिया था। 

महेश कुमार - जावेद साहब अगर हम मीडिया की रिपोर्ट को देखे और मंत्रालय के कार्यभार को देखे  तो विकास के नाम पे तो उन्होंने बड़े बड़े फसले लिए जिसमे एफडी ई  को उन्होंने रक्षा मत्रालय में लाने की बात कही  है। 

अली जावेद -जनता को ये अन्दाजा नही था। वो तो एक मामूली चाय वाले की हसीयत से सामने आये थे। उन्हें ये नही मालूम था की आंडानी  और अम्बानी उनकी ही सत्ता कायम रहेगी जो यूपीए की सरकार में कायम थी। वही लोग है उनको ही विकास के नाम पर फयदे पहुँचए  जाएंगे। तो पहले से जनता को नही मालूम था। ये तो सरकार ने बाद में इस तरह के फसले लिए और यहाँ से लोगो का मोहभंग  होना शुरू हुआ। ये आम लोगो की सरकार है ही नही ,ये चाय वाले की सरकार है ही नही और इसलिए ये मोह भंग हुआ।  इस तरह की बाते लव जिहाद की ये क्या बकवास है। हम जो एक सांप्रदायिक भाव का माहौल होना चाहिए, उस माहौल में हजारो साल से जिस तरह रहते रहे है उससे थोड़ी राहत मिली थी। हमे जो लगता था की अब ये वो मोदी नही रहे अब जो मोदी प्राइममिनिस्टर बन कर आये है। उनकी सरकार में इस तरह का सांप्रदायिक उन्माद नही होगा। आपने पूरे  यूपी की कमांड किस के हाथ में सौपी? जिसने सिर्फ उन्माद फ़ैलाने का काम किया । भाजपा को अगर ये गलतफैमी है कि 31 % उनको वोट मिले है। वो 31 के 31  हिन्दू इसका मतलब सांप्रदायिक हो गए हैं, ऐसा नही है। उनमे से एक छोटा सा  मामूली से तबके की सांप्रदायिक सोच हो सकती है। वो हिन्दुओ में नही मुस्लमानो में भी हो सकती है। बहुत सारे मुस्लमान कठमुल्ले  मिल जाएंगे। सांप्रदायिक है उधर भी है इधर भी है। लेकिन उनका पर्सटेज बहुत कम है। 

महेश कुमार -जावेद साहब लेकिन आप उत्तर प्रदेश के बारे में देखे लोक सभा  चुनाव से पहले सांप्रदायिक ध्रुवीकरण काफी व्वस्थित ढंग से चलाया है। और उसमे वो कामयाब हुए तो वो ध्रुवीकरण करके उन्होंने जीत हासिल की थी। 71 सीटें जीती तो वो औंधे मुँह क्यों गिरे? 

अली जावेद -मुझे लगता है की एक तो जो आप बात कहे रहे है, बिलकुल सही है। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी ने भी कम नही किया है। इन लोगो की कोशिश ये थी की वोट जो ध्रुवीकरण के आधार पर बीजेपी  और समाजवादी पार्टी में बट जाये। ऐसा नही हुआ। और मुझे आज भी लगता है, की ध्रुवीकरण जरूर हुआ  है। लेकिन वो सीमित रहा है मुज्जफरनगर और सहारनपुर के इलाके तक जहाँ सांप्रदायिक दगे करवाके इतनी ज्यादा नफरत पैदा की लोगो का एक दूसरे के सामने आ कर  खड़े हो गए है। उसमे में भी आज भी इस  तरह के लोग बहुत है जो ये चाहते है कि इस तरह का माहौल खत्म होना चाहिए और एक सदभाव का माहौल बनना चाहिए। मुलायम सिहँ को 11 में से 8 सीट जरूर मिली है, लेकिन मै इसको मुलायम और समाजवादी पार्टी की जीत नही मानता। इसमे सबसे बड़ी बात ये है कि बीएसपी  मैदान में नही थी। और बीजे पी ये सोच रही थी कि बीएसपी  मैदान में नही है,जिसके दलित वोट जिसको हिन्दू बनाने की कोशिश की गई, सांप्रदायिक उन्माद  के आधार पर उन्हें मिल जायेगा पर ये दलित वोट उधर बहके नही गया। आम लोगो में तो दलित भी आता है। दबा कुचला  तो दलित भी है। एक आम मिडल क्लास के लिए तो जिस तरह सब्जी खरीदना मुश्किल हो रहा है,  राशन खरीदना जिस तरह से मुश्किल हो रहा है। रोजमर्रा  चीजे उसके लिए मुश्किल से मुश्किल होते  जा रहे है। अच्छे दिन तो नेताओं के आ गए लेकिन आम लोगों के तो बड़े बुरे दिन आ गए हैं, तो दलित भी पिस रहा है और दलित तो ज़्यादा पिस रहा है। तो आप यह क्यों महसूस करते हैं कि इसके ऊपर, इतना ज़्यादा आर्थिक आधार पर जो परेशान होगा वह हिंदू होने के नाम पर जा कर के आपको वोट दे देगा तो इसलिए नंबर वन तो यह, कि आम लोगों का गुस्सा बीजेपी के ख़िलाफ़ हो रहा है और क्योंकि कोई ऑलटरनेटिव नहीं था, सिर्फ़ समाजवादी पार्टी मुक़ाबले में थी, इस आधार पर समाजवादी पार्टी को वोट मिले हैं जो मैं पॉज़िटिव वोट नहीं मानता। 18-19 % वोट जो मायावती का है और ग़ैर दलित वोट जो ऑलटरनेटिव न होने की वजह से समाजवादी पार्टी की तरफ़ गया है वो आने वाले दिनों में जब इलैक्शन होंगे, आम चुनाव यूपी के जब होंगे तब उस में ज़रूरी नहीं है कि वे समाजवादी पार्टी को चले जाएँ। दूसरे यह कि कांग्रेस को इस से सबक लेना चाहिए कि कांग्रेस जो है उसको यह मान लेना चाहिए कि अब वह एक राष्ट्रीय पार्टी नहीं रह गई है। अगर राष्ट्रीय पार्टी की अपनी छवि बनानी है तो उन्हें यह सबक लेना चाहिये दो जगहों पर ज़रूर उन्हें बहुत फ़ायदा हुआ है और उसके लिए जो है वे काम करें तो अभी भी इस बात की बहुत गुंजाइश है कि गुजरात और राजस्थान में जो उनको कामयाबी मिली है उसके लिए वे अगर अपने संगठन को मज़बूत करते हैं तो उस से उनको फायदा होगा। 
महेश कुमार- जावेद साहब यह बताइये कि आने वाले जो चुनाव हैं अभी हरियाणा में ऍसॅम्ब्ली के चुनाव हैं, महाराष्ट्र में ऍसॅम्ब्ली के चुनाव हैं क्या इन चुनाव में यह फ़ेनोमेना जारी रहेगा?
अली जावेद- मुझे लगता है इन्हें जो खुश फ़हमी हो गई भाजपा को और हरियाणा में जो इन्होंने पहले जिस तरह से यह गठबंधन बना रहे थे, वे सारे गठबंधन तोड़े हैं और जनता ने केंद्रीय स्तर पर जिस तरह से देखा है, कि भई यह तो वही काम कर रहे हैं जो इस से पहले यूपीए सरकार कर रही थी और हरियाणा में मुझे लगता है, कि जो ज़मीन खोई थी कांग्रेस ने, वह ज़मीन जो है फिर से उन्होंने हासिल की है, नंबर वन। नंबर दो यह कि जो है ओम प्रकाश चौटाला को इतना कमज़ोर नहीं समझना चाहिए और हरियाणा में जिस तरह से वोटों का डिविज़न होगा, जिस तरह से आप पार्टी का थोड़ा-बहुत तो वहाँ है, चाहे सीट न मिली हो पर असर है वहाँ आप पार्टी का है तो वे वोट कहाँ जाएँगे? वे वोट जो हैं भाजपा को नहीं जाएँगे और हो सकता है कांग्रेस को भी न जाएँ तो वे वोट तो दोनों में से किसी को नहीं मिलने वाले हैं। इसका फ़ायदा भी कांग्रेस को होगा, नेगेटिव फ़ायदा, कि कांग्रेस को नहीं मिल रहा है तो बीजेपी को भी नहीं मिल रहा है। और बिश्नोई जो हैं इन को जो समझ रहे हैं भाजपा वाले कि उनका बड़ा लिमिटिड इन्फ़्लुऍन्स है लेकिन जो है वहाँ व्यापारी कम्युनिटी जो है वह एक बहुत बड़ा सपोर्ट बेस जो है उनका है वहाँ जो कहीं न कहीं और एक दो पर्सेन्ट के स्विंग के बेसिस पर भी इलेक्श्न के रिज़ल्ट बदल सकते हैं, वो है। दूसरे यह कि महाराष्ट्र का जो आपने ज़िक्र किया है,महाराष्ट्र की जनता भी देख रही है कि महाराष्ट्र के विकास के जो मुद्दे हैं उस में राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा जो कुछ भी रही है,उस में क्या करेगी महाराष्ट्र के लिए? तो इसलिए जो है मुझे लगता है कि शिव सेना को तो फ़ायदा हो सकता है लेकिन भाजपा को फ़ायदा नहीं होने वाला है। मुझे उम्मीद यह है कि जो छोटी मोटी-लोकल रीजनल पार्टियाँ हैं महाराष्ट्र की, थोड़ा बहुत फ़ायदा उन्हें होना चाहिये। कांग्रेस ने वहाँ भी कोई बहुत ज़्यादा विकास का काम नहीं किया है तो मुझे बहुत ज़्यादा उम्मीद नहीं है कि एक स्थाई सरकार जो है वहाँ बन पाएगी वहाँ कन्फ़्यूज़न की स्थिति अभी भी है आने वाले दिनों में इधर एक-आध हफ़्ते में यह तस्वीर और ज़्यादा साफ़ हो कर सामने आएगी लेकिन आज की स्थिति ऐसी है कि महाराष्ट्र की सूरत-ऍ-हाल बहुत साफ़ नहीं है। 

महेश कुमार- शुक्रिया जावेद साहब।

 

 

उपचुनाव
उत्तर प्रदेश
राजस्थान
गुजरात
भाजपा
समाजवादी पार्टी
सांप्रदायिक ध्रुवीकरण
मायावती
दलित
नरेन्द्र मोदी
लव जिहाद
सांप्रदायिक ताकतें

Related Stories

उप्र बंधक संकट: सभी बच्चों को सुरक्षित बचाया गया, आरोपी और उसकी पत्नी की मौत

नागरिकता कानून: यूपी के मऊ अब तक 19 लोग गिरफ्तार, आरएएफ और पीएसी तैनात

#श्रमिकहड़ताल : शौक नहीं मज़बूरी है..

राजस्थान : जन आंदोलनों के साथ उभरता वामपंथी विकल्प

पेट्रोल और डीज़ल के बढ़ते दामों 10 सितम्बर को भारत बंद

दलित चेतना- अधिकार से जुड़ा शब्द है

आठ साल से जारी है किसानों का बांगड़-बिरला सीमेंट प्लांट के खिलाफ संघर्ष

आपकी चुप्पी बता रहा है कि आपके लिए राष्ट्र का मतलब जमीन का टुकड़ा है

''सिलिकोसिस बीमारी की वजह से हज़ारो भारतीय मजदूर हो रहे मौत के शिकार''

अबकी बार, मॉबलिंचिग की सरकार; कितनी जाँच की दरकार!


बाकी खबरें

  • hunger crisis
    डॉ. राजू पाण्डेय
    चिंता: ग्लोबल हंगर इंडेक्स को लेकर भी असहिष्णु सरकार
    29 Oct 2021
    पिछले कुछ समय से सरकार ऐसे हर आकलन को खारिज करती रही है जो उसकी असफलताओं को उजागर करता है।
  • climate
    टिकेंदर सिंह पंवार
    जलवायु परिवर्तन का संकट बहुत वास्तविक है
    29 Oct 2021
    भविष्य में आने वाली अधिक आपदाओं का मुक़ाबला करने के लिए आपदा जोखिम को कमतर करने वाले सिद्धांतों को मज़बूत करने की ज़रूरत है।
  • Supreme Court on Pegasus
    अजय कुमार
    पेगासस जासूसी कांड पर सुप्रीम कोर्ट की खरी-खरी: 46 पन्नों के आदेश का निचोड़
    29 Oct 2021
    केवल राष्ट्रीय सुरक्षा का जिक्र कर सरकार को निजता के अधिकार के उल्लंघन से जुड़े सवालों के जवाब देने से छूट नहीं मिल सकती है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटे में 14,348 नए मामले, 805 मरीज़ों की मौत
    29 Oct 2021
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या बढ़कर 0.47 फ़ीसदी यानी 1 लाख 61 हज़ार 334 हो गयी है।
  • exxon
    इलियट नेगिन
    प्रतिबंधित होने के बावजूद एक्सॉनमोबिल का जलवायु विज्ञान को ख़ारिज करने वालों को फंड देना जारी
    29 Oct 2021
    अमेरिकी तेल और गैस की प्रमुख कंपनी एक्सॉनमोबिल ने जलवायु विज्ञान को लेकर संदेह पैदा करने के लिए 39 मिलियन डॉलर से ज़्यादा ख़र्च किए हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License