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भारत
राजनीति
पत्रकार आशुतोष से चर्चा: क्या मुसलमानों को शांत रहना चाहिए?
यहां इस बात की जांच की जा रही है कि हिंदुत्व का मुकाबला करने के लिए विपक्ष को हिंदू कार्ड खेलना चाहिए।
एजाज़ अशरफ़
25 Nov 2020
Translated by महेश कुमार
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मैंने हाल ही में असदुद्दीन ओवैसी: एक चेतावनी, नमक लेख लिखा था जिसके माध्यम से उनके बढ़ते चुनावी ग्राफ और उनकी पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन को समझने की कोशिश की गई थी। मेरी राय के मुताबिक एआईएमआईएम के बेहतर चुनावी प्रदर्शन की वजह भारतीय जनता पार्टी का विरोध करने वाले राजनीतिक दलों द्वारा मुसलमानों से संबंधित मुद्दों पर न बोलने का परिणाम है, फिर इस बात को तो छोड़ ही दीजिए कि जब उन पर हिंसक हमले या उनके समान नागरिकता के अधिकार पर हमला होता है तो भी उनकी रक्षा में विपक्षी पार्टियां नहीं आती हैं। इन पार्टियों ने ओवैसी की थीसिस को सही ठहराया है, जिसका वर्णन यहाँ पढ़ा जा सकता है।

लेख के प्रकाशित होते ही मुझे कुछ फोन कॉल आए। कॉल करने वालों में प्रसिद्ध पत्रकार आशुतोष भी शामिल थे, जिन्होंने आम आदमी पार्टी में शामिल होने के लिए पत्रकारिता का पेशा छोड़ दिया था और बाद में संभवतः निराश होकर पार्टी छोड़ वापस पेशे में आ गए थे। आशुतोष ने कहा, "मुसलमानों को खुद के हित में और हिंदुत्व को हराने के लिए शांत रहना चाहिए।" आशुतोष भी उतने ही धर्मनिरपेक्ष है जितना कि कोई भी भारतीय हो सकता है; उनके लेखन और सार्वजनिक बहसों के माध्यम से उनकी हिंदुत्व के खिलाफ वैचारिक विरोधी होने की छवि बनी हैं। यह मानते हुए कि आशुतोष कोई बेहूदा टिप्पणी नहीं करेंगे, मैंने उन्हें बहस में उलझा दिया, हम दोनों में से किसी ने भी कोई गोलमोल बात नहीं की।  

ओवैसी की तरह आशुतोष का भी एक थीसिस है। वे काफी आश्वस्त है कि भाजपा की लोकप्रियता गिरावट पर है, और इसलिए वह राज्यों के चुनाव जीतने के लिए संघर्ष कर रही है। उनके मुताबिक भाजपा 2018 में राजस्थान और मध्य प्रदेश में चुनाव हार गई थी- और छत्तीसगढ़ में तो उसका सफाया ही हो गया था। 2019 के राष्ट्रीय चुनाव के कुछ महीनों के बाद भाजपा ने महाराष्ट्र में उम्मीद से कम प्रदर्शन किया। हरियाणा में त्रिशंकु विधानसभा आई। झारखंड में भाजपा पिट गई। बिहार में, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन, जिसमें भाजपा अब एक बड़ी पार्टी है और जीत के पद पर आसीन है। आशुतोष के मुताबिक, "एक 31 वर्षीय युवा [तेजस्वी यादव] ने

भाजपा, मोदी और जनता दल (यूनाइटेड) की संयुक्त ताक़त को करीब-करीब हरा दिया था।"
आशुतोष को लगता है कि भाजपा खुद के नीचे गिरते ग्राफ को उलट नहीं सकती है, क्योंकि यह आर्थिक मोर्चे पर पूरी तरह से नाकामयाब है। मोदी सरकार अपने प्रदर्शन का सही आकलन करने से लोगों का ध्यान हटाने के लिए हिंदुत्व के मुद्दे का इस्तेमाल करती है। ये हरकते मुसलमानों को उकसाने के लिए की जाती है। उन्होंने कहा, 'अगर मुस्लिम किसी भी किस्म की प्रतिक्रिया देते हैं या उनमें से एक वर्ग विपक्षी दलों का समर्थन देने के बजाय ओवैसी को समर्थन दे देता है, तो इससे भाजपा बढ़ेगी और उसकी ताक़त में ही इजाफा होगा। आशुतोष ने आगे कहा कि बीजेपी से हिंदुत्व का एजेंडा छिन लो तो पार्टी विफल हो जाएगी।'' 

"मुसलमान भी इसे समझते हैं," मैंने जवाब दिया। सबूत के तौर पर, मैंने उन्हे बताया कि जब मैं दिल्ली के शाहीन बाग गया जहां मुसलमान दिसंबर से नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ 24X7 धरने पर बैठे थे तो मैंने पाया कि ‘आप’ (AAP) नेता अरविंद केजरीवाल के धरना स्थल पर दौरे से इनकार करने पर लोग आंदोलित नहीं थे और न ही नाराज़ थे। उन्होंने यानि प्रदर्शनकारियों ने कहा कि शाहीन बाग में केजरीवाल की उपस्थिति भाजपा को दिल्ली विधानसभा चुनाव को जो फरवरी में होने वाले थे को सांप्रदायिक रूप से ध्रुवीकृत करने का अवसर प्रदान कर देगी। और जैसा कि सबने कहा कि शाहीन बाग में केजरीवाल के लिए भारी समर्थन था।
मैंने आशुतोष से कहा, जब उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक टकराव हुआ तो मुसलमानों को बदले में विश्वासघात मिला। वे निश्चित रूप से हिंदुओं से कहीं अधिक पीड़ित थे और मस्जिदों को तोड़ दिया गया था। फिर भी केजरीवाल ने अपनी बयानबाजी में मुसलमानों और हिंदुओं की पीड़ा के बीच समानता स्थापित करने की कोशिश की। पीड़ित, कम से कम ये तमन्ना रखते थे कि उनके घावों को समझा जाएगा। यद्यपि दिल्ली विधानसभा ने राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर को लागू करने के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया था, लेकिन ’आप’ ने नरम हिंदुत्व का कार्ड खेला।

आशुतोष ने कहा “क्या में आपको एक कड़वा सच बताऊँ? अगर ‘आप’ ने चुनाव के दौरान हनुमान कार्ड नहीं खेला होता, और उसने सीएए के विरोध में भाजपा का विरोध किया होता, तो केजरीवाल को 40 या 45 सीटें मिलती।” (‘आप’ ने दिल्ली विधानसभा में 70 में से 63 सीटें जीतीं हैं।) हनुमान कार्ड से ‘आप’ का संदर्भ चुनाव अभियान के लिए भगवान हनुमान का इस्तेमाल करना था, ताकि भाजपा को भगवान राम के लोकप्रिय नाम का फायदा उठाने से नाकाम किया जा सके। 

हां, मैंने मान लिया। मैंने कहा कि मुझे पता है कि ‘आप’ के आंतरिक सर्वेक्षण जिन्हे चुनाव अभियान के दौरान लगातार किया गया दिखा रहे थे कि हर गुजरते दिन में भाजपा के वोट बढ़ते जा रहे थे। अंततः भाजपा को दिल्ली में डाले गए वोटों का लगभग 39 प्रतिशत वोट मिला। जो 2015 के चुनाव की तुलना में 6.2 प्रतिशत अधिक था और सीटों को तीन से बढ़ाकर आठ कर लिया था।

आशुतोष ने कहा, "अफसोस की बात है कि आज की वास्तविकता यह है कि जो कोई भी मुसलमानों के पक्ष में बोलता है वह वोट खो देता है।" क्योंकि हिंदू कार्ड खेला जाता है।" उन्होंने कहा कि 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी भी मंदिर जाने की होड़ करने लगे थे और उन्होने 2012 के मुक़ाबले 2017 में अपनी सीटों की संख्या को 61 से 77 कर लिया था- और भाजपा 115 से 110 पर आ गई थी। मध्य प्रदेश में कांग्रेस के घोषणापत्र में हिंदुत्ववादी अतिरेक था। आशुतोष ने कहा, 'कांग्रेस ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ को जीता।' (तीनों राज्यों में उस साल एक ही समय पर चुनाव हुए थे।)

मैंने बताया कि "लेकिन छत्तीसगढ़ को छोडकर कांग्रेस राजस्थान और मध्य प्रदेश में आरामदायक बहुमत नहीं ला पाई, और नतीजतन एमपी में उसने अपनी सरकार खो दी,"। इसलिए, यह कहना कठिन है कि कांग्रेस अपने हिंदू कार्ड के कारण संकीर्ण रूप से जीती है या नहीं। बहुत संभव है कि लोगों ने भाजपा सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी भावना को नजरअंदाज कर दिया और उसकी कार्बन कॉपी की तुलना में अधिक "प्रामाणिक" या आक्रामक हिंदू पार्टी को चुना। क्या इसने भाजपा को अपने और कांग्रेस के बीच की खाई को पाटने में सक्षम नहीं किया है?

मैंने बात को जारी रखते हुए कहा कि, हिंदुत्व भारत का सामान्य ज्ञान बनता जा रहा है। दिल्ली और बिहार में अपनी रणनीति के चलते विपक्ष हिंदुत्व के मुद्दों पर चुप रहना पसंद कर सकता है, लेकिन भाजपा हमेशा इस बात को सामने लाएगी, यह सुनिश्चित करने के लिए कि मतदाता अपना मत हिंदु मतदाता के रूप में ही डाले, न कि नागरिक या किसी विशिष्ट वर्ग, जाति और भाषाई समूह के सदस्य होने के रूप में। उन्होंने कहा, 'हिंदुत्व को स्वीकार करने की सीमा इतनी नीचे तक चली गई है कि भाजपा को केवल हिंदुत्व के एजेंडे के बारे में मतदाताओं को वोट देने के लिए याद दिलाना है। मेरे मुताबिक, शायद यह भाजपा-जद(यू) द्वारा बिहार में एक संकीर्ण जीत को छीनने की बेहतर व्याख्या करता है,”। इसकी भी संभावना है कि हिन्दू दक्षिपंथ हिंदुत्व पर अपना दांव बढ़ा सकता है। तो फिर क्या विपक्ष, उदाहरण के लिए, गाय के नाम पर भीड़ हत्या की नकल करेगा? या वोट बटोरने के लिए हिंसा भड़काएगा?

सच है, आशुतोष सहमत हुए कि यह नहीं हो सकता। “लेकिन यह भी सच है कि विपक्ष को लोगों को यह भी दिखाना होगा कि वह हिंदू विरोधी नहीं है। मुसलमानों के सामने यह विकल्प है कि वे हिंदू उदारवादियों के साथ रहे या सत्ता में हिंदू सांप्रदायिक ताक़त के साथ, ”आशुतोष ने अपने रूढ़िवादी जुनून के साथ कहा। उन्होंने कहा, "हिंदू उदारवादियों के साथ रहकर मुस्लिम समुदाय को थोडे वक़्त के लिए राजनीतिक तौर पर अदृश्य रहना स्वीकार करना होगा।" एक बार भाजपा को सत्ता से बेदखल कर दिया जाता है, आशा की जाती है कि एक नई हिंदू उदारवादी व्यवस्था लागू होगी। आशुतोष ने कहा, "अगर मौजूदा स्थिति बनी रहती है, तो आप 10 साल बाद नरसंहार देख रहे होंगे।"

उसी प्रवाह में, आशुतोष ने कहा कि ओवैसी के साथ उनकी समस्या यह है कि वे मुसलमानों के सामने खतरे की प्रकृति को छिपाते हैं। उन्होंने कहा,'' मौजूदा मतदान प्रणाली में, जब भाजपा-विरोधी वोट विभाजित होते हैं, तो इसका मतलब केवल हिंदुत्व को मजबूत करना है। ओवैसी ने जानबूझकर मुस्लिम वोटों को विभाजित किया, ”आशुतोष ने कहा। उन्होंने बताया कि ओवैसी "संविधानवाद की भाषा" बोलते हैं, जिसे मैंने मुसलमानों में उनकी बढ़ती लोकप्रियता के कारक के रूप में उद्धृत किया है।

"संवैधानिकता की भाषा, भाड़ में जाए," आशुतोष ने ज़ोर देकर कहा।, "वे केवल पहचान की राजनीति में उलझा रहे है और इसके परिणामों से बेखबर है।"

“हर नेता भारत में पहचान की राजनीति पर ज़िंदा है। फिर उन्हें ही इसका दोष क्यों देते हैं, "मैंने कहा," वैसे भी, मुसलमानों का एक छोटा सा वर्ग है जो एआईएमआईएम को वोट देता हैं, हालांकि पार्टी का मतदान प्रतिशत ओवैसी की लोकप्रियता का माप नहीं हो सकता है।"

आशुतोष ने कहा, "यह मेरा विचार है।" उन्होंने कहा, 'हर जीत से उनकी लोकप्रियता बढ़ेगी और बीजेपी विरोधी वोटों का बंटवारा होगा। मुस्लिम बुद्धिजीवियों को मुस्लिम समुदाय को ओवैसी के जाल में फँसने से रोकने की चेतावनी देनी चाहिए, जो भाजपा की मदद कर रहा है और उनके अस्तित्व को नुकसान पहुंचाता है। आपको भी यह लिखना चाहिए।”

मैंने एक लेख से एक वाक्य निकाला, जिसे शिक्षाविद अली खान महमूदाबाद, जो कि समाजवादी पार्टी के सदस्य हैं, ने अगस्त में लिखा था। उसमें, खान ने चार राज्यों, गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में 35 की उम्र से कम युवाओं के मतदान पैटर्न पर सेंटर फॉर डेवलपमेंट एंड प्रैक्टिस सर्वे का हवाला दिया था। 2019 के राष्ट्रीय चुनाव से लगभग तीन महीने पहले किए गए सर्वेक्षण में दिखाया गया है कि गैर-भाजपा और भाजपा दोनों मतदाताओं का विश्व-दृष्टिकोण कमोबेश मेल खाता है। उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय चुनाव में भाजपा को वोट देने का इरादा रखने वाले 84.7 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्होंने यूनिफॉर्म सिविल कोड का समर्थन किया, जबकि भाजपा को वोट न देने वाले 74.29 प्रतिशत लोगों ने भी यूनिफॉर्म सिविल कोड का समर्थन किया। जब सुबह ओवैसी पर मेरा लेख प्रकाशित हुआ, तो अली खान ने एक संदेश के साथ अपने लेख का लिंक मुझे भेजा और कहा कि, "समस्या सिर्फ राजनीतिक नहीं है, बल्कि सामाजिक भी है।"

खान के संदेश की याद दिलाते हुए, मैंने आशुतोष से कहा कि हिंदुत्व के खिलाफ लड़ाई को चुनावी राजनीति से अलग करना होगा, कि चुनाव के कुछ सप्ताह पहले चुनावी रैलियों को आयोजित करके हिंदुओं का दिल और दिमाग नहीं जीता जा सकता है, और विपक्षी नेताओं को जिले से लेकर गाँव और गाँव से लेकर लोगों तक दौर कर बातचीत कर उन्हें समझाना होगा कि हिंदुत्व हिंदू धर्म क्यों नहीं है। “राहुल गांधी से लेकर अरविंद केजरीवाल तक, क्या आपको लगता है कि उनमें हिंदुओं को यह बताने की हिम्मत है कि एक अच्छा हिंदू होने का क्या मतलब है? क्या आपको लगता है कि वे प्राचीन ग्रंथों की व्याख्या कर सकते हैं कि भाजपा का हिंदू धर्म का ब्रांड उथला या त्रुटिपूर्ण क्यों है? जब तक ऐसा नहीं किया जाता, विपक्ष हिंदुत्व के खिलाफ लड़ाई नहीं जीत सकता है।”

थोड़ा सोच-समझ कर आशुतोष ने कहा, "हां, मैं इस बात से सहमत हूं।" उन्होंने आह भर कर कहा कि, "समस्या यह है कि भारत में कोई भी नेता ऐसा नहीं है जिसकी ऐसी दृष्टि हो।" वास्तव में, भाजपा की दृष्टि का केवल चुनावी राजनीति के माध्यम से जवाब नहीं दिया जा सकता है, भले ही विपक्ष यहां-वहां जीत दर्ज़ कर ले। हिंदुत्व को केवल हिंदू धर्म की वैकल्पिक दृष्टि के माध्यम से ही हराया जा सकता है। तभी बीजेपी गायब हो सकती है।

लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

मूल तौर पर यह लेख अंग्रेजी में छपा है इस लेख को अंग्रेजी में इस लिंक पर पढ़ सकते हैं 
 

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