NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
फिल्में
भारत
राजनीति
पद्मावत की अजीब दास्तान
संघ की परियोजना का ही बिछुड़ा अंग है यह फिल्मI
राजेंद्र शर्मा
05 Feb 2018
padmavat

संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावत’ (पहले पद्मावती) पर उठे विवाद के पूरे प्रकरण के संकेत अगर इतने डरावने नहीं होते, तो यह सोचकर तसल्ली भी पायी जा सकती थी कि अंत भला सो सब भला। आखिरकार, करणी सेनाओं का सारा हिंसक विरोध, संघ परिवार के प्रत्यक्ष और भाजपाई सरकारों के परोक्ष समर्थन के बावजूद, फिल्म पद्मावत को बाक्स ऑफिस पर जबर्दस्त सफलता हासिल करने से नहीं रोक पाया है। यह इसका सबूत है कि आम हिंदुस्तानी ने और इसमें भारत में रहने वाले ही नहीं दूसरे देशों में रहने वाले हिंदुस्तानी मूल के लोग भी शामिल हैं, इस फिल्म के बहाने से छेड़ी गयी प्रतिक्रियावादी, जनतंत्रविरोधी मुहिम को उस हिकारत के साथ ठुकरा दिया है, जिसकी यह मुहिम हकदार थी। लोगों ने सिर्फ सांप्रदायिक-जातिवादी श्रेष्ठता की इस उन्मादी मुहिम से खुद को अलग ही नहीं रखा है बल्कि अपनी जेब से टिकट पर पैसा खर्च कर के, सक्रिय रूप से इस मुहिम के खिलाफ आवाज भी उठायी है। इस लिहाज से देश में और विदेश में भी खरीदी की गयी फिल्म की हरेक टिकट, इन ताकतों के खिलाफ और जनतंत्र के पक्ष में एक आवाज है।

यह वाकई उल्लेखनीय है कि फिल्म बिजनस के जानकारों के अनुसार, रिलीज होने के पहले चार-पांच दिन में ही भंसाली की फिल्म, भारतीय और विदेशी बाजार को मिलाकर, ढाई सौ करोड़ रु0 से ऊपर की कमाई कर चुकी थी। उन्हीं सूत्रों के अनुसार यह रकम, इस भव्य और इसलिए बेहद खर्चीली फिल्म की कुल लागत से ठीक-ठाक  ज्यादा है। इसके आगे मुनाफा ही मुनाफा है। दूसरे शब्दों में जनता ने अपने समर्थन से इतना तो फिल्म के रिलीज होने के पहले सप्ताह के पूरे होने से भी पहले ही सुनिश्चित कर दिया है कि सारे विरोध के बावजूद निर्माता को, आर्थिक रूप से नुकसान हर्गिज नहीं होने जा रहा है। यह तब है जबकि सुप्रीम कोर्ट के खासतौर पर भाजपा-शासित राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा तथा गुजरात को सेंसर बोर्ड द्वारा सार्टिफिकेट दिए जाने के बाद, फिल्म के प्रदर्शन में कोई बाधा नहीं आने देने का निर्देश देने के बावजूद और फिल्म के प्रदर्शन से कानून व व्यवस्था की समस्या आने के उनके बेशर्म बहाने के शीर्ष अदालत द्वारा हिकारत से यह कहकर ठुकराए जाने के बावजूद कि कानून व व्यवस्था सुनिश्चित करना सरकार का काम ही है, खासतौर पर गुजरात, राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में राज्य सरकारों की मिलीभगत से, सिनेमा हॉल मालिकों को इसके लिए बिना किसी सरकारी आदेश के ही मजबूर किया गया है कि, इस फिल्म का प्रदर्शन नहीं करें।

भाजपाई सरकारों के इस तरह के आचरण से सुप्रीम कोर्ट के उक्त दो-टूक आदेश की अवहेलना हुई है या नहीं, इस पर सुप्रीम कोर्ट विचार करेगा। संबंधित भाजपाई सरकारों से लेकर करणी सेना तक पर अदालत के आदेश की अवहेलना करने के आरोप लगाने वाली दो याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट के सामने विचाराधीन हैं।

बहरहाल, अदालती फैसला कुछ भी हो, इतना तय है कि सुप्रीम कोर्ट के उक्त फैसले के बावजूद, भाजपाई राज्य सरकारों समेत संघ परिवार, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, कथित रूप से ‘राजपूती शान’ की रक्षा की इस मुहिम में शामिल रहा है।

वास्तव में इस फिल्म के विरोध के नाम पर करणी सेना जैसे संगठनों ने राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में तथा अन्यत्र जो हिंसा व तोड़-फोड़ की है, वह भाजपाई सरकारों के दबे-छिपे समर्थन का ही नतीजा है। यह भी कोई संयोग ही नहीं है कि अपवादस्वरूप, गुडग़ांव में स्कूली बच्चों पर हमले जैसी एकाध घटना को छोडक़र, उपद्रव के इन मामलों में भाजपा की सरकारों ने कहीं भी कोई कार्रवाई नहीं की है।

जाहिर है कि यह सब इन उपद्रवियों के लिए उस प्रकट समर्थन से ऊपर से है, जो राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश आदि की भाजपा सरकारें, रिलीज से पहले ही अपने राज्य में फिल्म का प्रदर्शन ही नहीं होने देने की सार्वजनिक घोषणाओं के जरिए, इस ‘विरोध’ को दे चुकी थीं। यहां तक कि भाजपा की केंद्र सरकार भी न सिर्फ इस मुहिम को अपना मूक समर्थन दे चुकी थी बल्कि वी के सिंह जैसे मंत्रियों के बयानों के जरिए, यह बता चुकी थी कि वह इस विवाद में कम से कम फिल्मकार की स्वतंत्रता के साथ नहीं है। जाहिर है कि केंद्र सरकार के दबाव में ही फिल्म सर्टिफिकेशन बोर्ड को, जिसे सेंसर बोर्ड के नाम से ही ज्यादा जाना जाता है, फिल्म के रिलीज की प्रस्तावित तरीख ही नहीं टलवानी पड़ी थी बल्कि एक बहुत ही खराब परंपरा कायम करते हुए, फिल्म देखने के लिए ‘विरोधियों’ द्वारा सुझाए गए नामों समेत, जानकारों का एक विशेष पैनल भी गठित करना पड़ा था। याद रहे कि इस पैनल की सिफारिश के बाद ही, नाम में बदलाव तथा फिल्म मलिक मोहम्मद जायसी के काव्य, पद्मावत पर आधारित काल्पनिक कथा भर होने के डिस्क्लेमर समेत, कई छोटे-बड़े बदलावों के साथ, इस फिल्म को प्रदर्शन की अनुमति दी गयी थी।

बहरहाल, आज के हालात में भले ही एक फिल्मकार के नाते भंसाली की अपने सर्जनात्मक विवेक से फिल्म बनाने और लोगों के बीच प्रदर्शित करने की स्वतंत्रता का सवाल सबसे प्रमुख हो, एक सिने अनुभव के रूप में भी उनकी ‘पद्मावत’ पर कुछ न कुछ चर्चा तो बनती ही है। बेशक, जो लोग फिल्म को देखे बिना ही उसकी आलोचना नहीं बल्कि विरोध करने पर बजिद हैं, जाहिर है कि उनके ऐसा करने के कारणों का इस फिल्म से कुछ लेना-देना नहीं है। वर्ना सचाई यह है कि उनकी भावनाओं को आहत होने का यह फिल्म दूर-दूर तक कोई मौका नहीं देती है, यहां तक कि पूरे घूमर नृत्य में दीपिका पादुकोन की सुंदर कमर पल भर को उघडऩे नहीं देती है। उल्टे राजपूती आन-बान-शान और न सिर्फ राजपूती वीरता तथा बलिदान की भावना बल्कि राजपूती नैतिकता तथा सिद्धांतप्रियता का जैसा बखान इस फिल्म में लगातार किया गया है, इससे पहले किसी हिंदी फिल्म में किया गया हो, कम से कम हमें तो याद नहीं पड़ता है। उल्टे इस अति-भव्य और अपनी दृश्य रचना तथा संगीत रचना में असाधारण फिल्म की असली सीमा ही यह है कि यह काले और सफेद, दो ही रंगों से बनी है। यह इसमें चित्रित जीवन को ऐतिहासिक यथार्थ के बजाए, उसका एक कैरीकेचर बना देता है।

इसमें आंखें चौंधियाने वाली सफेदी में चित्रित राव रतनसिंह तथा पद्मावती हैं, दो दूसरे सिरे पर ऐसे ही चौंकाने वाले गहरे काले रंगों में चित्रित अलाउद्दीन खिलजी है, जो हर चीज में उनका ठीक उल्टा है। रतनसिंह पद्मावती के प्रेम करते हैं, तो खिलजी शरीर का भूखा है, जो हर सुंदर चीज पर कब्जा करना चाहता है, पद्मावती पर भी। रतनसिंह शुरू से ही राजा हैं, तो खिलजी अपने चाचा का खून बहाकर तख्त पर कब्जा करता है। रतनसिंह, अशक्त व निहत्थे शत्रु पर हथियार नहीं उठा सकते हैं, शत्रु से भी असत्य नहीं बोल सकते हैं, तो खिलजी युद्ध में जीत को ही सब कुछ मानता है। अंतिम द्वंद्व युद्ध में भी रतनसिंह को खिलजी युद्ध नीति तोडक़र, मलिक काफूर के तीरों से हराता है, जबकि राजपूत दूर खड़े द्वंद्व युद्ध के नतीजे का इंतजार करते रहते हैं। दूसरे शब्दों में एक ओर आदर्श नायक है और दूसरी ओर, शुद्ध खलनायक हैं। इन दो शुद्ध रंगों के बीच में और कोई रंग ही नहीं है। कमाल की बात यह है कि चित्तौड़ में सिर्फ राजपूत ही राजपूत हैं (एक राघव चेतन को छोडक़र) और खिलजियों के राज में सिर्फ खिलजी ही हैं। भंसाली को शायद इसका अंदाजा ही नहीं है कि मध्यकाल में ऐसा कोई राज्य संभव ही नहीं था, जिसमें सिर्फ आबादी में ही बल्कि राजदरबार तथा सेना तक में, अलग-अलग समुदायों के लोग नहीं हों। राजपूतों की सेनाओं में भी कम से कम कुछ विभागों में मुसलमानों की मौजूदगी आम थी। भंसाली वास्तव में इस तरह इतिहास में, आज के एक्सक्लूजन का ही प्रक्षेपण कर रहे हैं।

पद्मावत फिल्म में प्रदर्शित इस राजपूती आन-बान-शान की एक बुनियादी समस्या और है, जिसे सड़कों पर पद्मावत के विरोध में उतरी ताकतें भी प्रतिबिंबित करती हैं। जानी-मानी सिने अभिनेत्री, स्वरा भास्कर ने भंसाली के नाम अपने खुले पत्र में इस समस्या पर बलपूर्वक उंगली रख दी है। समस्या यह है कि यह फिल्म पद्मावती समेत सभी ‘आदर्श’ औरतों को इस आन-बान-शान का बोझ ढोने वाली पुतलियां बनाकर छोड़ देती है।

फिल्म न सिर्फ जौहर और सती का महिमा मंडन करती है, जिसे जौहर के लंबे दृश्य की चाक्षुष भव्यता और भी मारक बना देती है बल्कि यह जौहर ही एक तरह से फिल्म के केंद्र में नजर आता है। पद्मावती भी जौहर में कथा के चरमोत्कर्ष के अर्थ में ही कथा के केंद्र में है, अन्यथा रतनसिंह कथा के केंद्र में हैं। जाहिर है कि यह जायसी के पद्मावत की पद्मिनी किसी भी अर्थ में नहीं है। पद्मावती जौहर के लिए भी रतनसेन से अग्रिम अनुमति लेती है क्योंकि उनकी अनुमति के बिना तो वह मर भी नहीं सकती है! रस्मी डिस्क्लेमर के बावजूद फिल्म बलपूर्वक जौहर और सती को राजपूती गौरव के शिखर के रूप में स्थापित करती है। यह संघ की परियोजना का ही फिलहाल बिछुड़ा नजर आता अंग है।

Courtesy: हस्तक्षेप
पद्मावत
पद्मावती
आरएसएस
संघ परिवार

Related Stories

एफटीआईआई: वैचारिक संघर्ष बनाम राजनीति


बाकी खबरें

  • wildlife
    सीमा शर्मा
    भारतीय वन्यजीव संस्थान ने मध्य प्रदेश में चीता आबादी बढ़ाने के लिए एक्शन प्लान तैयार किया
    11 Jan 2022
    इस एक्शन प्लान के तहत, क़रीब 12-14 चीतों(8-10 नर और 4-6 मादा) को भारत में चीतों की नई आबादी पैदा करने के लिए चुना जाएगा।
  • workers
    सतीश भारतीय
    गुरुग्राम में बेरोजगारी, कम कमाई और बढ़ती महंगाई के बीच पिसते मजदूरों का बयान
    11 Jan 2022
    मजदूर वर्ग सरकार की योजनाओं का नाम तक नहीं बता पा रहा है, योजनाओं का लाभ मिलना तो दूर की बात है।
  • Swami Prasad Maurya
    रवि शंकर दुबे
    चुनावों से ठीक पहले यूपी में बीजेपी को बड़ा झटका, श्रम मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य के बाद तीन और विधायकों के इस्तीफे
    11 Jan 2022
    यूपी में चुनावी तारीखों का एलान हो चुका है, ऐसे वक्त में बीजेपी को बहुत बड़ा झटका लगा है, दरअसल यूपी सरकार में श्रम मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने बीजेपी छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए हैं।
  • Schemes workers
    कुमुदिनी पति
    उत्तर प्रदेश में स्कीम वर्कर्स की बिगड़ती स्थिति और बेपरवाह सरकार
    11 Jan 2022
    “आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएँ लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर आंदोलन चला रही हैं। पर तमाम वार्ताओं के बाद भी उनकी एक भी मांग पूरी नहीं की गई। उनकी सबसे प्रमुख मांग है सरकारी कर्मचारी का दर्जा।”
  • AKHILESH AND YOGI
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    80/20 : हिंदू बनाम हिंदू की लड़ाई है यूपी चुनाव
    11 Jan 2022
    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ठीक ही कहते हैं कि यह 80 प्रतिशत बनाम 20 प्रतिशत की लड़ाई है। बस वे इसकी व्याख्या ग़लत तरीके से करते हैं। पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी का विचार-विश्लेषण
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License