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प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना: सरकार ने चुनौतियों को किया दरकिनार जिससे किसान बेहाल
पीएम-किसान सम्मान योजना चुनाव को ध्यान में रख कर बिना किसी तैयारी के धरातल पर उतारी जा रही है| जिसमे इस साल के लिए जरूरी राशि से 5000 करोड़ रूपये कम दिए जा रहे हैं| इस योजना की कमी यह है कि इस योजना को सही से लागू करने के लिए जरूरी जानकारी सरकार के पास नहीं है जैसे कि लैंड रिकॉर्ड डिजिटल नहीं है, एक ही जमीन के एक से अधिक मालिक हैं, लैंड रिकॉर्ड बैंक खातों से लिंक नहीं हैं और बड़ी संख्या में किराये पर जमीन लेकर खेती करने वाले किसान है | इन सभी से जुडी जानकारियां सरकार के पास नहीं हैं | इसलिए कहा जा सकता है कि चुनाव को ध्यान में रखते हुए हड़बड़ी में मोदी सरकार ने किसानों को प्रतिमाह 500 रूपये देने के लिए प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना की शुरुआत की हैं |
पीयूष शर्मा
16 Feb 2019
किसान सम्मान योजना

पीएम-किसान योजना चुनाव को ध्यान में रख कर बिना किसी तैयारी के धरातल पर उतारी जा रही है| जिसमे इस साल के लिए जरूरी राशि से 5000 करोड़ रूपये कम दिए जा रहे हैं|  इस योजना की कमी यह है कि इस योजना को सही से लागू करने के लिए जरूरी जानकारी सरकार के पास नहीं है जैसे कि लैंड रिकॉर्ड डिजिटल नहीं है, एक ही जमीन के एक से अधिक मालिक हैं,  लैंड रिकॉर्ड बैंक खातों से लिंक नहीं हैं और बड़ी संख्या में किराये पर जमीन लेकर खेती करने वाले किसान है | इन सभी से जुडी  जानकारियां सरकार के पास नहीं हैं | इसलिए कहा जा सकता है कि चुनाव को ध्यान में रखते हुए हड़बड़ी में मोदी सरकार ने किसानों को प्रतिमाह 500 रूपये देने के लिए प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि(PM-KISAN) योजना की शुरुआत की हैं | 500 रूपये प्रतिमाह किसानों को किस तरह राहत पंहुचा पायेगा, ये अपने आप में चर्चा का अलग विषय है पर ये जरुर तय है कि 500 रूपये प्रतिमाह हासिल करने के लिए किसानों के सामने 500 प्रकार की समस्याएँ जरुर हैं |

इस बजट में यह बात जरुर अच्छी हुई है कि मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में यह जरुर माना है कि किसान और उसकी किसानी बदहाली में है, पर बदहाली को दूर करने के लिए बजट आवंटन काफी कम हैं| मोदी सरकार ने  वित्त वर्ष 2018-19 की पूरी राशि यानी एक साल के लिए 6000 रूपये किसानों के लिए तय किये हैं| अगर मोदी सरकार की मंशा इस योजना से ही किसानों को राहत पहुंचाने की होती तो  सरकार ऐसा प्रावधान करती जिसकी वजह से किसानों को पूरे साल का 6000 रूपये एक मुश्त मिलता ना कि 2000 रुपये देने का प्रावधान बनाया जाता|

किसान सम्मान योजना में आवंटित राशि जरूरत से काफी कम

अंतरिम बजट में अपने भाषण में वित्त मंत्री पियूष गोयल ने वर्तमान वित्त वर्ष 2018-19 के लिए पात्र परिवारों 12.50 करोड़ के लिए 2000 रूपये प्रति परिवार की एक क़िस्त के लिए 20000 करोड़ रूपये आवंटित किये है, यह राशि नाकाफी है| जबकि किसान सम्मान निधि की वेबसाइट पर 12.50 करोड़ पात्र परिवारों का अनुमान दिया है जिनके लिए 25000 करोड़ रूपये आवंटित होने चाहिए थे| पर मोदी सरकार ने इस योजना के लिए 5000 करोड़ रूपये कम आवंटित किये है जबकि वेबसाइट पर जारी दस्तावेज में माना है कि 4 माह की एक क़िस्त के लिए 25000 करोड़ की वित्तीय आवयश्कता होगी| इसके बावजूद  किस गणना के आधार पर वर्तमान वित्त वर्ष के लिए 5000 करोड़ कम आवंटित कर दिए इसका जबाब तो खुद मोदी जी ही दे सकते है| मोदी सरकार ने बड़ी चालाकी के साथ अगले वित्तीय वर्ष जिसमें यह भी नही पता कि उनकी सरकार आएगी भी की नही उसके लिए 6000 रूपये एक साल के हिसाब से पर्याप्त आवंटित किये और अब जब उनकी सरकार है तो इस वित्तीय वर्ष के लिए मात्र 2000 और उसमे भी कम बजट दिया है| उनकी इस चालाकी भरे क्रियाकलाप से साफ़ नजर आता है की यह बस एक चुनावी पासा फेंका गया है जिसका वास्तविकता से कोई लेना देना नही हैं|

लैंड रिकॉर्ड डिजिटल नहीं, एक बड़ी चुनौती

योजना में बोला गया है कि राज्य तथा केंद्र शासित प्रदेश पात्र लाभार्थियों के चयन के लिए उत्तरदायी होंगे, जो कि अपने आप में एक गंभीर मसला हैं| क्योंकि लाभार्थियों के चयन के लिए सबसे ज्यादा जरुरी है लैंड रिकार्ड्स का कंप्यूटरीकृत होना| पर वर्तमान में स्थिति यह है कि राज्यों के पास सही और पूरी जानकारी नही हैं| देश में 89 प्रतिशत गाँव के रिकार्ड्स डिजिटल हैं और 11 प्रतिशत यानी 19 हजार से अधिक गांवो का लैंड रिकॉर्ड डिजिटल नहीं हैं| कुल गाँवों में से  केवल 37% गावों के रिकार्ड्स डिजिटल हस्ताक्षर करके जारी किये जा रहे हैं | इसका मतलब यह है कि बड़ी संख्या में किसानों के जमीन के रिकॉर्ड डिजिटल नहीं हुए है और इतने कम समय में सभी को डिजिटल कर पाना मुमकिन नहीं है क्योंकि इसके लिए कर्मचारी कम होने से पहले ही काम का बोझ हैं और रिकॉर्ड दर्ज करने के लिए संसाधन उपलब्ध नही हैं, ग्रामीण विकास मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार तहसीलों में स्वीकृत मॉडर्न रिकॉर्ड रूम में से केवल 47 प्रतिशत ही पूरे हो पाए हैं|

न्यायलय में मुकदमों के अंदर जमीनों के मालिक योजना से बाहर

योजना के लाभ पाने का एक बड़ा मसला जमीन के मालिकाना हक को लेकर विवाद का भी है ग्रामीण विकास मंत्रालय के अधीन भूमि संसाधन विभाग के अनुसार 32 राज्यों के लैंड रिकॉर्ड न्यायलयों से लिंक नहीं है| इसके साथ ही हिंदुस्तान टाइम्स ने कानून मंत्रालय के हवाले से अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि देश में न्यायलयों के अंदर दो-तिहाई सिविल मुकदमे जमीन के स्वामित्व से जुड़े हुए यानी इनके स्वामित्व को लेकर विवाद हैं| ऐसे में जब यही नहीं पता की जमीन का असली मालिक कौन है तो उस पर मिलने वाली राशि का तो सवाल ही नहीं उठता|

उत्तराधिकारियों के नाम रिकॉर्ड में जमीन नहीं  

इसी प्रकार केवल 60 प्रतिशत गावों के पैतृक उत्तराधिकार के रिकॉर्ड कंप्यूटरिककृत हुए है यानी 40 प्रतिशत ऐसे गाँव हैं जिनमे पैतृक सम्पत्ति वर्तमान में खेती कर रहे किसानो के नाम पर नहीं है इससे होगा यह कि परिवार के किस सदस्य के पास किसान निधि की राशि जाएगी इसको लेकर विवाद होगा| क्योंकि जमीन के मालिक की मृत्यु के बाद परिवार के लोगो में आपसी सहमती से बंटवारा  हो गया है पर जमीन क़ानूनी तौर राजस्व विभाग के दस्तावेजों में दर्ज नही हुई हैं | ऐसे में किसान निधि की राशि किस तरह और किसको मिलेगी यह जानने में मुश्किलें होगी| और अगर मान लिया जाये की वो सहमती से बाँट लेंगे तो एक व्यक्ति के हिस्से में कितनी राशि आएगी? यह भी एक बड़ा सवाल है|

Computerised land records.jpg

स्रोत: एमआईएस डेटा, भूमि संसाधन विभाग, ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार

आधार करेगा योजना को निराधार

किसान सम्मान निधि पाने के लिए आधार जरूरी है हालाकिं इस साल 2018-19 के लिए आधार आवयश्क नहीं  है परन्तु अगले वित्तीय वर्ष से आधार होना जरुरी है| भूमि संसाधन विभाग के आंकड़ो के अनुसार अभी मात्र 5 फ़ीसदी गांवो में आधार रिकॉर्ड से लिंक है यानी कि 95 प्रतिशत गाँव के रिकार्ड्स आधार से जुड़े हुए नहीं है| अगले वित्तीय वर्ष तक भी इतनी बड़ी संख्या में आधार का जुड़ पाना कठिन है|

बैंक खाते जमीन के रिकार्ड्स से लिंक नही

योजना के क्रियान्वयन में सबसे अहम भूमिका रिकॉर्ड का बैंक खातों से जुड़ा होना है अगर हम खातों की स्थिति देखे तो आंकड़े बताते है कि 36 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में से 25 राज्यों के लैंड रिकार्ड्स बैंक से लिंक नही हैं| केंद्र सरकार ने बोला है की इस वित्त वर्ष के खत्म होने से पहले यानी 31 मार्च से पहले 2000 रूपये खातों में डालने है| पर ऐसे में जब खाते रिकॉर्ड से जुड़े हुए नही है तो इतनी जल्दी में कैसे सभी रिकॉर्ड जुड़ पाएंगे यह एक चिंता का विषय है क्योंकि ऐसा न हो कि बड़ी संख्या में किसान इस कारण योजना का लाभ लेने से रह जाए| बैंक खातों का रिकॉर्ड से लिंक न होना जनधन योजना में किये हवाई दावों की पोल खोलता हैं| इसमें कोई शक नहीं है कि जनधन योजना में बड़ी संख्या में खाते खुले हैं पर बस वो खुले मात्र हैं उनको लेकर आज तक कुछ नही किया गया क्योंकि 25 राज्यों में बैंक खाते जमीन के रिकॉर्ड से लिंक नहीं हैं|

नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ पब्लिक फाइनेंस(NIPFP) की एक स्टडी के मुताबिक राजस्व विभाग के दस्तावेजों में दर्ज जमीन और वास्तविक माप में अंतर है जो यह दर्शाता है कि जमीन की सही माप उपलब्ध नही हैं|

किराये  पर या कॉन्ट्रैक्ट पर लेकर खेती कर रहे किसान योजना से बाहर

देश के लगभग सभी राज्यों में गरीब जिनके पास जमीन नहीं वो जमीन किराये पर लेकर खेती करते हैं और जमीन का असली मालिक पूरी जमीन किराये पर देकर एकमुश्त राशि लेता है| किसान निधि में ऐसा कोई प्रावधान नही है कि किराये पर जमीन लेकर खेती करने वाले को कुछ नही मिलेगा| सरकार ने बड़ी संख्या में खेती कर रहे ऐसे किसानों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया हैं| कृषि जनगणना 2010-11 के अनुसार 9.73 लाख हेक्टेयर से अधिक जमीन खेती के लिए लीज पर ली हुई थी, अभी तो यह संख्या काफी बढ़ गयी होगी जिसमे लाखों की संख्या में किसान खेती कर रहे हैं, यह सब इस योजना से बाहर है जबकि वो खेती कर रहे हैं|  सरकार ने कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को लेकर काफी बाते की है परन्तु किसान सम्मान निधि जिस तरह से इनको पूरी तरह नजरअंदाज किया उससे पता चलता है कि मोदी सरकार केवल बाते करना जानती है जिसका वास्तविकता से कोई लेना देना नही हैं|

बजट तो होता है आने वाले वित्तीय वर्ष के लिए पर इस वर्ष चुनाव सामने थे तो पिछले वित्तीय वर्ष से यानी 1 दिसम्बर 2018 (बैक डेट) से योजना को बिना किसी तैयारी के लागू कर दिया| जिसके कारण होगा यह कि बड़ी संख्या में किसान योजना का लाभ नही ले सकेंगे| इस योजना को चुनावी योजना इसलिए कहा जा रहा है क्योकि मोदी सरकार के पास यह योजना लाने के लिए पुरे पांच साल थे जिस दौरान सही प्रकार से तैयारी करके योजना को धरातल पर उतरा जा सकता था| परन्तु मोदी सरकार का असली मकसद किसानों को राहत देना नही बल्कि चुनावों में मोदी विरोधी लहर का रुख मोड़ने का हैं| पर इससे कितना फायदा किसानों और बीजेपी को होगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा|

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