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राजनीति
प्रमोशन में आरक्षण : कोर्ट के फैसले ने जवाब से ज़्यादा खड़े किए सवाल
क्रीमी लेयर निर्धारण की शर्त और प्रशासनिक कार्यकुशलता की शर्त ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले से निकले जवाब को बहुत अधिक जटिल बना दिया है।
अजय कुमार
05 Oct 2018
सांकेतिक तस्वीर

कुछ सवालों के जवाब जटिल स्थिति भी पैदा कर देते हैं। ऐसा ही सवाल था एससी-एसटी के लिए प्रमोशन में आरक्षण। जवाब तो मिला लेकिन जटिल स्थिति भी पैदा हो गयी। 26 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने लक्ष्मी नारायण गुप्ता बनाम अन्य केस में इस सवाल पर फैसला किया। एससी-एसटी के लिए प्रमोशन में आरक्षण के लिए साल 2006 के नागराज फैसले से निकली 4 शर्तों में एक शर्त को खत्म कर दिया। यह एक शर्त थी कि एससी-एसटी को अपना पिछड़ापन साबित करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस एक शर्त को खारिज करते हुए यह साफ़ कर दिया कि यह माना जाएगा कि एससी-एसटी पिछड़े हैं यानी एससी-एसटी को अपना पिछड़ापन साबित करने की जरूरत नहीं है। इसके बाद भी प्रमोशन में आरक्षण पाने के लिए एससी-एसटी को नागराज मामलें से निकली तीन शर्तों को पूरा करना जरूरी है। पहली शर्त है यह सत्यापित करना कि अमुक सरकारी पद पर एससी-एसटी का प्रतिनिधित्व कम है। दूसरी शर्त है कि सरकारी नौकरी में प्रमोशन में आरक्षण के लिए क्रीमी लेयर का निर्धारण किया जाए। और तीसरी शर्त है कि प्रमोशन में आरक्षण देते समय प्रशासनिक कार्यकुशलता से समझौता न किया जाए।

इन तीनों मौजूद शर्तों में क्रीमी लेयर निर्धारण की शर्त और प्रशासनिक कार्यकुशलता की शर्त ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले से निकले जवाब को बहुत अधिक जटिल बना दिया है। इसकी जटिलता ऐसे समझी जा सकती है:- क्या क्रीमी लेयर का निर्धारण कर उन्हें प्रमोशन में आरक्षण से रोक दिया जाएगा जिन्हें सुप्रीम कोर्ट मान चुकी है कि वह पूरी तरह से पिछड़ें हैं!

कहने का मतलब यह है कि एक तरफ सुप्रीम कोर्ट मान रहा है कि अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग पिछड़ें हैं और दूसरी तरफ यह भी कह रहा है कि इस जाति के लोगों को प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए क्रीमी लेयर बनाकर वर्गीकरण किया जाएगा। चूँकि एससी-एसटी का पिछड़ापन आर्थिक न होकर सामाजिक है, इसलिए यह कैसे सम्भव है कि किसी व्यक्ति का सामाजिक-पिछड़ापन एक पीढ़ी में ही मिट जाए। यानी कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस  फैसले में विरोधाभास हैं।

सरकारी नौकरियों में एससी-एसटी को साल 1954 से आबादी के अनुपात में सीधी भर्तियों और प्रमोशन में आरक्षण देने का नियम लागू हुआ था। यह आरक्षण संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत देने का नियम है। जिसके तहत यह नियम है कि अगर किसी समुदाय की सरकारी नौकरी में उचित हिस्सेदारी नहीं है तो उन्हें आरक्षण दिया जा सकता है। इस नियम का फायदा एससी-एसटी समुदाय को मिला। साल 2011 की जनगणना के तहत देश के तकरीबन 25.2 फीसदी लोग एससी-एसटी समुदाय से आते हैं। यानी देश का हर चौथा नागरिक एससी-एसटी से जुड़ा है। लेकिन एससी-एसटी को प्रमोशन में आरक्षण देने में कुछ परेशानियां आ रही थी। यानी आरक्षण सही तरह से मिल नहीं रहा था। प्रमोशन में आरक्षण से जुड़े कई मामलें सुप्रीम कोर्ट में लंबित होनें लगे। इसलिए साल 2006 में नागराज का फैसला आया, फिर भी हालात में बदलाव नहीं आया। तब जाकर इस मुद्दे पर तकरीबन एक दशक के बाद सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला लिया जिसके तहत नागराज की 4 शर्तों में पिछड़ेपन की शर्त को ख़ारिज कर 3 शर्तों को प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए जारी रखा गया। लेकिन इस फैसले में क्रीमी लेयर के निर्धारण की वजह से बहुत सारे विशेषज्ञ ऐसा अंदेशा जता रहे हैं कि प्रमोशन के मसले पर लिटिगेशन की हवा बहाने वाली है।

क्रीमी लेयर का मूलतः मतलब है पिछड़े लोगों में उस परत का निर्धारण करना जिसके बाहर के लोग पिछड़ेपन से बाहर निकल चुके हैं। कहने वाले कहते हैं कि ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि आरक्षण आरक्षित समुदाय के उन लोगों तक पहुँच पाए जहां आरक्षण नहीं पहुंच पा रहा है। इस तर्क के आधार पर अब तक केवल अन्य पिछड़ा वर्ग में क्रीमी लेयर का निर्धारण किया जाता रहा है। ऐसा सही भी है क्योंकि पिछड़ों का एक वर्ग बनाया जाए तो उसमें सबसे पहले अन्य पिछड़ा वर्ग आएगा फिर अनुसूचित जाति के लोग आयेंगे और तब जाकर अनुसूचित जनजाति के लोगों की बारी आएगी। इस लिहाज से पिछड़ेपन में क्रीमी लेयर बनाने का तर्क केवल अन्य पिछड़े वर्ग पर लागू हो सकता है। फिर भी अनुसूचित जाति और जनजाति पर इसे तभी लागू किया जा सकता है जब अन्य पिछड़ा वर्ग का ही अंत कर दिया जाए। लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हुआ है, इसलिए बहुत से लोगों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला वाजिब नहीं है। और इस फैसले से क्रीमी लेयर की शर्त निकालने के लिए समता आन्दोलन समिति नामक संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका भी दायर कर दिया है। इस जनहित याचिका की अर्थवत्ता पर सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच सुनवाई भी कर रही है।

अन्य पिछड़ा वर्ग में आय के आधार पर क्रीमी लेयर तय किया जाता है। यानी एक निर्धारित राशि से जिसकी आय कम है उसे आरक्षण का फायदा मिलता है और जिसकी आय अधिक है उसे नहीं मिलता है। लेकिन एससी-एसटी के लिए ऐसा नहीं है। यहाँ क्रीमी लेयर निर्धारित करने के लिए कोई पैमाना ही नहीं तय किया गया है। चूँकि सुप्रीम कोर्ट ने यह तय कर दिया है कि एससी-एसटी समुदाय के लोग पिछड़े हुए हैं, इनके पिछड़ेपन पर कोई बहस नहीं होगी, इसलिए क्रीमी लेयर का पैमाना केवल ‘आय’ भी नहीं बन सकता है। पैमाना बनाने का काम सुप्रीम कोर्ट और संसद दोनों कर सकते हैं। आय के अलावा जैसे ही कोई और निर्धारक क्रीमी लेयर के पैमाने में जुड़ेगा प्रमोशन में आरक्षण की जटिलताएं सामने आएँगी, जिसका अंतिम परिणाम यह होगा कि इधर किसी को प्रमोशन में आरक्षण दिया जाएगा उधर कोर्ट में कोई वादी जाकर यह कहेगा कि यह गलत है।  

इन सबके साथ जुड़ा है क्रीमी लेयर को खारिज करने वाला सेफ्टी वाल्व का सैद्धांतिक तर्क। इस तर्क के तहत यह कहा जाता है कि क्रीमी लेयर की शर्त बनाकर सरकारें किसी समुदाय में आगे बढ़ने वाले लोगों को उस समुदाय से काट देती है, जिसका परिणाम यह होता है कि समुदाय के भीतर असंतोष होते हुए भी उस असंतोष को जाहिर करने वाले व्यक्ति नहीं बचते हैं। मतलब क्रीमी लेयर समुदाय के भीतर बन रहे असंतोष को बाहर निकालने के लिए साफ्टी वाल्व का काम करता है, जबकि इतिहास गवाह है की हर समुदाय की भलाई के लिए अगुआई उन्होंने की है जिनकी स्थिति अपने ही समुदाय के अन्य लोगों से बेहतर रही है।

इंडियन लेबर ब्यूरो के आख़िरी उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक देश में संगठित क्षेत्र में कुल 2.95  करोड़ नौकरियां थीं, जिनका लगभग 60 फ़ीसदी यानी 1.76 करोड़ नौकरियां सरकारी क्षेत्र में है। सरकारी क्षेत्र में केंद्र और राज्य सरकारों के अलावा पीएसयू और स्थानीय निकाय शामिल हैं।

केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक प्रतिनिधित्व की दिक्कत ख़ासकर उच्च पदों पर है। मिसाल के तौर पर, बीजेपी सांसद उदित राज ने ये आंकड़ा दिया है कि केंद्र सरकार में सेक्रेटरी स्तर के पदों पर इस समय एससी का सिर्फ़ एक अफ़सर है। इस तरह के आंकड़ों को प्रमोशन में आरक्षण का तर्क माना जाता रहा है।

क्या है प्रशासनिक कार्यकुशलता की शर्त का मतलब?

अब बात करते हैं कि प्रमोशन में आरक्षण के लिए प्रशासनिक कार्यकुशलता वाली शर्त की। संविधान के अनुच्छेद 335 के तहत सरकारी नौकरियों में एससी-एसटी समुदाय के लोगों की कमी होने पर उन्हें प्रतिनिधित्व का अधिकार होगा, लेकिन इस अधिकार की पूर्ति करते वक्त प्रशासनिक कार्यकुशलता से समझौता नहीं किया जाएगा, इस तरह की बात की गयी है। लेकिन इस प्रशासनिक कार्यकुशलता को मापा कैसे जाएगा, इसपर कोई बात नहीं की गयी है।

यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि अनुच्छेद 335 में प्रमोशन जैसी किसी शब्दावली का प्रयोग नहीं किया गया है यानी इस अनुच्छेद में सरकारी नौकरी में भर्ती से लेकर भर्ती के बाद आगे बढ़ने में आने वाले सारे सरकारी पद शामिल हैं। इसके लिए भर्ती के स्तर पर जो परीक्षा ली जाती है, वही अभी तक एक ऐसा पैमाना है जिसके जरिये प्रशासनिक कार्यकुशलता की समग्र जाँच की जाती है। इसके बाद सरकारी नौकरी के भीतर समय के साथ मिलने वाले अनुभव और कुछ सांगठनिक स्तर की परीक्षाओं के सहारे आगे बढ़ा जाता है। इन्हीं सब तरीकों से प्रशासनिक कार्यकुशलता की जांच की जाती है, जो किसी सरकारी नौकरी के भीतर आगे के पद हासिल करने के लिए सबके लिए एक से भी रहें तो उसमें किसी तरह की परेशानी नहीं हो सकती है, लेकिन किन्तु-परन्तु लगाकर जब प्रमोशन में आरक्षण के लिए प्रशासनिक कार्यकुशलता की शर्त गढ़ दी जाती है तो ऐसा लगता है कि एससी-एसटी समुदाय को आरक्षण तो दिया जाएगा लेकिन उन्हें अपनी प्रशासनिक कार्यकुशलता अलग से साबित करनी पड़ेगी। इससे फिर यह सम्भावना पनपती  है कि एससी-एसटी के लिए प्रमोशन में आरक्षण देते वक्त बहुत सारी परेशानियाँ आएँगी।  

कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने प्रमोशन में आरक्षण पर अगर कुछ राहत दी है तो ये ऐसे उलझाव भी जिन्हें जल्द नहीं सुलझाया गया तो फिर इस राहत का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।

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