NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
पुलिस की बर्बरता: कहानी इतनी आसान नहीं
संकेत ठाकुर, सौजन्य: संघर्ष संवाद
22 Jul 2015

सर्वोच्च न्यायालय के मुताबिक़ पुलिस की बर्बरता के लिए सिपाहियों की भर्ती प्रक्रिया में धांधली ज़िम्मेदार है। गुज़री 9 मई को न्यायालय ने यह टिप्पणी अलीगढ़ में हुए बलात्कार का विरोध कर रहीं बुज़ुर्ग महिलाओं की पुलिस द्वारा की गयी बेरहम पिटाई पर गहरी नाराज़गी जताते हुए दर्ज़ की। इससे ठीक दो दिन पहले, 7 मई को, उत्तर प्रदेश सरकार ने पुलिस भर्ती पर लगी रोक हटाने और 30 हज़ार सिपाहियों की भर्ती किये जाने का फ़ैसला लिया था। बताते चलें कि 2004 में मुलायम सिंह यादव की सरकार ने साढ़े 22 हज़ार सिपाहियों की भर्ती की थी। लेकिन मायावती की अगली सरकार ने पिछली सरकार के तमाम फ़ैसले रोक दिये जिसमें सिपाहियों की भर्ती भी शामिल थी। इसे बड़ा घोटाला बताते हुए उस पर जांच बिठा दी गयी। आख़िरकार, 2011 में 18 हज़ार से अधिक सिपाहियों को पुलिस विभाग से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। बर्ख़ास्त सिपाहियों ने इसके ख़िलाफ़ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में गोहार लगायी जहां मायावती सरकार का फ़ैसला उलट गया। इसके ख़िलाफ़ मायावती सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया। इस बीच निजाम बदला तो अखिलेश यादव ने नये सिरे से भर्ती प्रकिया शुरू किये जाने का फ़ैसला कर लिया। पिता की अधूरी रह गयी पहल को अब बेटे को पूरा करना है।

                                                                                                                           

बेशक़, पुलिस भर्ती की पूरी प्रक्रिया भ्रष्टाचार के हवाले है और यह घुन देश के अधिकतर राज्यों के पुलिस महकमे को लग चुका है। इतना कि मौजूदा व्यवस्था में उससे पार पाना इतना आसान नहीं। लेकिन यह सवाल ज़्यादा अहम है कि क्या सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी पूरा सच है? क्या वाक़ई पुलिस की बर्बरता के लिए केवल भर्ती में हुई धांधली को कटघरे में खड़ा किया जा सकता है?क्या ईमानदार भर्ती प्रकिया से पुलिस का बर्बर चेहरा बदला जा सकता है, उसे मानवीय बनाया जा सकता है?

इससे पहले कोयला आबंटन में हुए फ़र्ज़ीवाड़े के सिलसिले में सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई की तुलना पिंजरे में क़ैद उस तोते से की थी जिसके कई मालिक हैं। इस तीखी टिप्पणी ने विपक्षी दलों को सरकार पर हमला बोलने का पैना हथियार थमा दिया- कि सीबीआई का बेजा इस्तेमाल हुआ, उसकी निष्पक्षता छीनी गयी, उसे सरकार के बचाव की ढाल बनाया गया। लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हुआ। यह तोहमत लगती रही है कि सरकारों ने, चाहे वह जिस पार्टी की रही हो, अपने नफ़ा-नुक़सान के हिसाब से सीबीआई को नचाने का काम किया। तो इसमें अचरज कैसा? जिसकी स्वायत्तता ही नहीं और है तो बस दिखावटी, उससे कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह सच को तरजीह देगी, अपने आक़ाओं को नहीं?

पुलिस हो, पीएसी हो या कि सीआरपीएफ़, वह तो सरकार की लाठी है। इस बेरहम लाठी को क्यों कोसें? उसे तो बनाया ही इसलिए गया है कि जब और जहां ज़रूरत पड़े, भांजा जा सके। लाठी सोचने-विचारने का काम नहीं करती। यह काम उसे थामनेवाले का होता है। नहीं भूला जाना चाहिए कि पुलिस का गठन गोरी हुक़ूमत ने किया था और इसका मक़सद लोगों के जान-माल की हिफ़ाज़त करना नहीं था। 1857 की सशस्त्र क्रांति के बाद विलायती महारानी के हुक़ुम पर बने शाही जांच आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर उसे खड़ा किया गया था ताकि ऐसे किसी अगले जन उभार को समय रहते कुचला जा सके। इसके लिए पुलिस को खुली छूट मिली और वह ख़ौफ़ और दहशत का दूसरा नाम बन गयी। उसकी ज़्यादतियों पर इस क़दर हाय-तौबा मची कि एक और बग़ावत जैसे आसार बनने लगे और 20वीं सदी की शुरूआत में शाही पुलिस आयोग का गठन करना पड़ा। इस आयोग ने पुलिस ढांचे की ओवरहालिंग करने की सिफ़ारिश पेश की। लेकिन अपने पैर पर कुल्हाड़ी भला कौन चलाता है? तो शाही आयोग की सिफ़ारिशें ज़मीन पर नहीं उतर सकीं।

देश आज़ाद हो गया लेकिन ग़ुलामी को बरक़रार रखने की ग़रज़ से बनायी गयी पुलिस वही की वही बनी रही। पुलिस आयोग बने, पुलिस ढांचे और उसकी कार्य पद्धति में सुधार करने की सिफ़ारिशें हुईं लेकिन बात इससे आगे नहीं बढ़ सकी। इसे विरोधाभास कहें कि लोकतांत्रिक देश में पुलिस के निचले कर्मचारियों को जो आम जनता से सीधे दोचार होता है लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित रखने की परंपरा जारी रही। यह मांग पुरानी है कि पुलिस कर्मचारियों को यूनियन बनाने का अधिकार मिले, कि आख़िर वे भी आज़ाद देश के नागरिक हैं, कि उन्हें भी अपनी मांग उठाने या अपनी राय ज़ाहिर करने का पूरा अधिकार है। सरकारी कर्मचारियों को संगठन बनाने और आंदोलन में उतरने का अधिकार है तो पुलिस कर्मचारियों को क्यों नहीं?

कोई दो बरस पहले इलाहाबाद में पुलिसकर्मियों के स्वास्थ्य का परीक्षण हुआ। पता चला कि 90 फ़ीसदी से अधिक पुलिसवाले तनावग्रस्त रहते हैं। इसके दसियों कारण हैं। उनकी ड्यूटी अनिश्चित होती है, काम के घंटे तय नहीं होते, सोने-खाने का भी समय तय नहीं होता, अतिरिक्त काम का ओवरटाइम नहीं मिलता, पूरा आराम नहीं मिलता, परिवार के साथ रहने के मौक़े कम मिलते हैं। उनके लिए तबादले और तरक़्क़ी का कोई मानक निश्चित नहीं होता। इसके अलावा आये-दिन उन्हें अपने अफ़सरों के हाथों ज़िल्लत झेलनी होती है, उनकी जी हुज़ूरी करनी होती है, रसूखदारों के इशारों पर भी नाचना होता है- कठपुतली की तरह, कोई उफ़ किये बग़ैर। जनता के बीच उनका रौब-दाब रहता है लेकिन अफ़सरों, नेताओं और दबंगों के सामने उनकी हैसियत भीगी बिल्ली की रहती है। यह कुंठा ज़ाहिर है कि अमूमन समाज के कमज़ोर तबक़ों पर बरसती है या फ़िर मौक़ा पड़ने पर लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण आंदोलनों पर। इसे मनोवैज्ञानिक नज़रिये से देखे जाने की ज़रूरत है।

इन्हीं विपरीत परिस्थितियों ने उत्तर प्रदेश में 1972 में पीएसी विद्रोह को पैदा किया था जिसमें बड़ी संख्या में पुलिसवाले भी शामिल हुए और राज्य कर्मचारियों का कुछ हिस्सा भी। लेकिन छटपटाहट की उस उग्र अभिव्यक्ति का बर्बर दमन हुआ। इसी तरह दिल्ली, बिहार आदि राज्यों में पुलिस यूनियन गठित किये जाने की मांग ने ज़ोर पकड़ा। औद्योगिक सुरक्षा बल में भी विद्रोह की चिंगारी फूटी और जिसे शोला बनने से पहले बुझा दिया गया। लेकिन उसकी राख अंदर ही अंदर सुलगती रही। कई सालों की लगातार कोशिशों के बाद 1986 में दोबारा पुलिस ढांचे में बुनियादी बदलाव की मांग उठी और पुलिस-जन संघर्ष समिति का गठन हुआ। यह जन आंदोलनों और प्रतिबंधित पुलिस परिषद के बीच एकता की शुरूआत थी- शासकों के लिए बड़े ख़तरे की घंटी। आंदोलन अभी गति पकड़ता कि उसके चार नेताओं को रासुका में जेल रवाना कर दिया गया। सबसे पहले सीबी सिंह को दबोचा गया जो इस प्रक्रिया के सूत्रधार थे। वे छात्र राजनीति की उपज रहे हैं और उत्तर प्रदेश में बदलाव की ग़ैर संसदीय राजनीति के प्रमुख हिस्सेदारों में गिने जाते हैं। उनके बाद रामाशीष राय (उत्तर प्रदेश पुलिस के बर्ख़ास्त कर्मचारी), मदनलाल संगरिया (नयी दिल्ली पुलिस के बर्ख़ास्त कर्मचारी) और प्रफुल्ल चंद्र (बिहार में औद्योगिक सुरक्षा बल के बर्ख़ास्त कर्मचारी) को भी जेल में ठूंस दिया गया। सूबे में तब वीर बहादुर सिंह की कांग्रेसी सरकार का शासन था।     

लेकिन पुलिस सुधार की मांग विभिन्न रूपों में उठती रही। उच्चतम न्यायालय के आदेश से जनवरी 2007 में उत्तर प्रदेश पुलिस सुधार आयोग का गठन भी हुआ ताकि वेतन विसंगतियों समेत उनकी तमाम जायज़ मांगों पर कोई फ़ैसला लिया जा सके। कोई तीन करोड़ रूपये फुंक गये लेकिन गाड़ी आगे नहीं खिसक सकी। ऐसे में 2013 में भी मुट्ठी भर लोग विधानसभा के सामने 10 दिन के धरने पर भी बैठे जो मज़दूर दिवस के मौक़े पर गुज़री 1 मई को समाप्त हुआ। लेकिन इस आवाज़ से व्यापक सरोकार सिरे से ग़ायब दिखे। पुलिस यूनियन के गठन का यानी पुलिसवालों के लोकतांत्रिक अधिकारों का सवाल बहुत पीछे छूट गया। लेकिन ख़ैर, सर्वोच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणी के बहाने यह सवाल बहुत अहम है कि क्या पुलिस भर्ती के पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष हो जाने भर से पुलिस बल का बर्बर चेहरा बदल जायेगा? 

सौजन्य: संघर्ष संवाद

डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख में वक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारों को नहीं दर्शाते ।

 

पुलिस
बर्बरता
छत्तीसगढ़
नक्सल
ग्रीन हंट
पुलिस सुधार

Related Stories

छत्तीसगढ़ के एचएनएलयू के वीसी के खिलाफ छात्र विरोध में क्यों हैं

सुकुमा “मुठभेड़ कांड”: ये किसका लहू है, कौन मरा?

छत्तीसगढ़ में नर्सों की हड़ताल को जबरन ख़तम कराया गया

क्या ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच महानदी विवाद का राजनीतिकरण किया जा रहा है ?

सरकार के खिलाफ कार्टून शेयर करने पर बस्तर के पत्रकार पर राजद्रोह का मुक़दमा

न नक्सल, न पुलिस, हम जनता के साथ हैं: सोनी सोरी

दमन सरकार का एक और कारनामा : हिंडाल्को ने चलाए आदिवासियों के घर पर बुलडोजर

सलवा जुडूम-2: लूट और कत्लेआम की तैयारी?


बाकी खबरें

  • govt employee
    अनिल जैन
    निजीकरण की आंच में झुलस रहे सरकारी कर्मचारियों के लिए भी सबक़ है यह किसान आंदोलन
    28 Nov 2021
    किसानों की यह जीत रेलवे, दूरसंचार, बैंक, बीमा आदि तमाम सार्वजनिक और संगठित क्षेत्र के उन कामगार संगठनों के लिए एक शानदार नज़ीर और सबक़ है, जो प्रतिरोध की भाषा तो खूब बोलते हैं लेकिन कॉरपोरेट से लड़ने…
  • poverty
    अजय कुमार
    ग़रीबी के आंकड़ों में उत्तर भारतीय राज्यों का हाल बेहाल, केरल बना मॉडल प्रदेश
    28 Nov 2021
    मल्टीडाइमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स के मुताबिक केरल के अलावा भारत का और कोई दूसरा राज्य नहीं है, जहां की बहुआयामी गरीबी 1% से कम हो। 
  • kisan andolan
    शंभूनाथ शुक्ल
    हड़ताल-आंदोलन की धार कुंद नहीं पड़ी
    28 Nov 2021
    एक ज़माने में मज़दूर-किसान यदि धरने पर बैठ जाते थे तो सत्ता झुकती थी। पर पिछले चार दशकों से लोग यह सब भूल चुके थे।
  • Hafte Ki Baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    संवैधानिक मानववाद या कारपोरेट-हिन्दुत्ववाद और यूपी में 'अपराध-राज'!
    27 Nov 2021
    संविधान दिवस के मौके पर भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोपों-प्रत्यारोपो की खूब बौछार हुई. क्या सच है-संविधानवाद और परिवारवाद का? क्या भारत की सरकारें सचमुच संविधान के विचार और संदेश के हिसाब से…
  • crypto
    न्यूज़क्लिक टीम
    क्या Crypto पर अंकुश ज़रूरी है?
    27 Nov 2021
    मोदी सरकार क्रिप्टोकरेंसी पर अंकुश लगा रही हैI लेकिन आखिर यह क्रिप्टोकरेंसी है क्या? क्या यह देश में मुद्रा की जगह ले सकती है?
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License