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क्या पेगासस जासूसी सॉफ्टवेयर के लिए भारत की संप्रभुता को गिरवी रख दिया गया है?
न्यूयॉर्क टाइम्स का खुलासा कि मोदी सरकार ने पेगासस जासूसी सॉफ्टवेयर इजराइल से खरीदा है। यह खुलासा मोदी सरकार के इस इंकार को झूठा साबित करता है कि पेगासस से मोदी सरकार का कोई लेना-देना नहीं।
अजय कुमार
30 Jan 2022
pegasus

पेगासस जासूसी कांड को याद कीजिए। नहीं याद कर पा रहे हैं तो हम आपको याद दिलवाते हैं। साल 2018 में कनाडा की सिटीजन लैब ने एक डिटेल रिपोर्ट सौंपी कि इजराइल की टेक्नोलॉजी फार्म एनएसओ समूह के पेगासस सॉफ्टवेयर के जरिए दुनियाभर के 45 देशों के कई नागरिकों के डिजिटल डिवाइस की जासूसी की जा रही है। इसमें भारत के तरफ से भी कई दिग्गजों के डिजिटल डिवाइस पर जासूसी करने का आरोप शामिल है। 

इसी पेगासस जासूसी कांड में अमेरिका के न्यूयॉर्क टाइम्स अखबार ने एक बड़ा खुलासा किया है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रोनन बर्गमैन और मार्क मजेटी की रिपोर्ट दुनिया भर में निजता के अधिकार के उल्लंघन को लेकर चिंतित लोगों के बीच खौफ पैदा कर रही है।

इस रिपोर्ट से इस आशय की जानकारी मिलती है या यह आरोप पुख्ता होता है कि भारत सरकार ने संसद में झूठ बोला है। भारत सरकार ने जितनी बार भी यह कहकर इंकार किया कि वह पेगासस के बारे में कुछ भी नहीं जानती है। वह सब झूठ है। इस रिपोर्ट के मुताबिक यह खुलासा हुआ है कि भारत सरकार ने साल 2019 में इजरायल के साथ कई आधुनिक हथियार की खरीद पर समझौता किया जिसमें पेगासस की डील भी शामिल थी।

इसे भी पढ़ें : पेगासस मामले में नया खुलासा, सीधे प्रधानमंत्री कठघरे में, कांग्रेस हुई हमलावर

न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक NSO एक इजरायली कंपनी है। पिछले 10 सालों से पूरी दुनिया के कई मुल्कों की सरकारों और इंटेलिजेंस एजेंसी को पेगासस बेच रही है। पेगासस एक ऐसा सॉफ्टवेयर है जो सर्विलांस यानी निगरानी का काम करता है। आईफोन और एंड्रॉयड फोन के प्राइवेट इंक्रिप्टेड संदेशों को बिना इजाजत के पढ़ सकता है।

जैसे व्हाट्सएप के जिन संदेशों को हम चाहते हैं कि जिसे भेजा जा रहा है उसके अलावा कोई भी ना पढ़े। उसे पेगासस सॉफ्टवेयर बिना इजाजत के भी पढ़ लेता है।

पेगासस जीरो क्लिक हैकिंग सॉफ्टवेयर है। यानी पेगासस सॉफ्टवेयर के जरिए किसी मोबाइल का डाटा चुराने के लिए मोबाइल में किसी कॉल को उठाना ज़रूरी नहीं है। मिस कॉल से भी काम हो जाता है। मोबाइल चलाने वाले को किसी लिंक पर क्लिक करना जरूरी नहीं। बल्कि बिना ऐसे तरीकों के भी पेगासस सॉफ्टवेयर किसी मोबाइल में उपलब्ध हर तरह के डाटा तक पहुंच सकता है। कांटेक्ट नंबर से लेकर के हर तरह की फोटो और फाइल तक पेगासस सॉफ्टवेयर अपनी पहुंच बना लेता है। यहां तक की मोबाइल में मौजूद कैमरा और माइक्रोफोन कंट्रोल करने की क्षमता भी रखता है। यानी मोबाइल चलाने वाले को इस बात का पता नहीं चलता कि उसका मोबाइल हैक कर लिया गया है। उसके मोबाइल के कैमरे और माइक्रोफोन का इस्तेमाल कोई दूसरा व्यक्ति कर रहा है।

यहां सबसे अधिक गौर करने वाली बात यह है कि पेगासस सॉफ्टवेयर को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि वह अमेरिका के मोबाइल नंबरों की हैकिंग ना कर पाए। मतलब यह कि अमेरिका पेगासस का इस्तेमाल करके सिवाय अमेरिकी लोगों के पूरी दुनिया के किसी भी मोबाइल की हैकिंग कर सकता है और पेगासस का इस्तेमाल करने वाली दुनिया की कोई भी सरकार अमेरिका को छोड़कर किसी भी मुल्क के नंबर की हैकिंग कर सकती है। 

मेक्सिको की लॉ एनफोर्समेंट एजेंसी ने इसका इस्तेमाल गैंगस्टर को पकड़ने में किया। इसके साथ मेक्सिको ने पेगासस के जरिए उन पत्रकारों को भी प्रताड़ित करने का काम किया जो मेक्सिकन सरकार से कड़े सवाल पूछ रहे थे। यूरोपियन यूनियन ने इसका इस्तेमाल आतंकवादियों को पकड़ने के लिए किया। संगठित अपराध से जुड़े गिरोह को पकड़ने के लिए किया। तकरीबन 40 देशों में फैले चाइल्ड एब्यूजर के ग्लोबल लिंक का भंडाफोड़ करने के लिए भी यूरोपियन यूनियन ने इसका इस्तेमाल किया। 

यूनाइटेड अरब अमीरात में इसका इस्तेमाल मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ किया। सऊदी अरब ने इसका इस्तेमाल औरतों के अधिकारों पर बात करने वाले कार्यकर्ताओं के खिलाफ किया। लेकिन पिछले 10 सालों का इतिहास यही बताता है कि पेगासस का सबसे ज्यादा इस्तेमाल सरकारों ने अपने फायदे के लिए किया। अपने विपक्षियों को दबाने के लिए किया। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को डराने के लिए किया। पत्रकारों को चुप कराने के लिए किया। वैसे तमाम कामों को ठप करने के लिए किया जो सत्ता के खिलाफ किसी भी तरह की आंच पैदा करने की संभावना रखते हैं।

न्यूयार्क टाइम्स ने पेगासस को लेकर तकरीबन साल भर छानबीन की। दर्जनों सरकारी अधिकारियों से बातचीत की। कई साइबर एक्सपर्ट से बातचीत की। कारोबारियों, लॉ एनफोर्समेंट एजेंसी और इंटेलिजेंस एजेंसियों से बातचीत की। इन सब से बातचीत करके यह पता लगाने कि NSO फर्म किस आधार पर पेगासस सॉफ्टवेयर बेचता है? छानबीन करने पर यह निकलकर सामने आया कि किसी देश के डिप्लोमेटिक यानी कूटनीतिक फैसले भी पेगासस सॉफ्टवेयर मुहैया कराने में एक अहम भूमिका निभाते हैं। मेक्सिको और पनामा जैसे देशों ने पेगासस सॉफ्टवेयर का सब्सक्रिप्शन मिलने के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ में अपने महत्वपूर्ण वोटों को इजराइल के पक्ष में डाला।

अरब राष्ट्रों की ईरान के खिलाफ इजराइल के पक्ष में लामबंदी करने में भी पेगासस ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भले इजरायल यह कहता रहे कि पेगासस उन देशों को नहीं बेचा जाएगा जिनका मानव अधिकार के मामले में साफ सुथरा रिकॉर्ड नहीं है लेकिन फिर भी पेगासस को उन देशों में बेचा गया।

कूटनीतिक दांव पेच को अंजाम देने के लिए हथियारों की खरीद बिक्री को आधार बनाने का इतिहास बहुत पुराना है। यह कोई नई बात नहीं है। जो देश हथियार बनाने में दूसरों से ज्यादा कुशल रहे है, उसने अपनी रणनीतिक दांव पेच में भी हथियारों की खरीद बिक्री इस्तेमाल किया है। अमेरिका के बारे में कहावत है कि अमेरिका के विदेश सेवा के अफसर दूसरे देशों में हथियार मुहैया करवाने और ना करवाने के आधार पर कूटनीति का खेल खेलते हैं। 

लेकिन पेगासस जैसी साइबर हथियार के पास इस पूरी प्रवृत्ति को बहुत गहरे तरीके से बदलने की क्षमता है। परमाणु हथियारों के बाद पेगासस जैसे साइबर वेपन डिप्लोमेसी के पूरे चरित्र को बदलने में ज्यादा कारगर साबित होने की संभावना रखते हैं। परंपरागत हथियार तो दृश्य जगत का हिस्सा होते हैं। जैसे राफेल भले सरकारी खातों में ना दर्ज हो लेकिन भौतिक तौर पर तो मौजूद रहता ही है। लेकिन साइबर वेपन के साथ ऐसा नहीं है। वह अदृश्य है। बहुत महंगा होने के बावजूद हथियारों से सस्ता है। सरकार जैसे संस्थान के लिए बहुत अधिक आकर्षक है।

लेकिन बहुत बड़ी संभावना है कि सरकार ऐसी साइबर हथियारों का इस्तेमाल करते हुए अपनी संप्रभुता भी गिरवी रख दे। एक बार खुद सोच कर देखिए कि अगर इसराइल के पास पेगासस के जरिए नरेंद्र मोदी या भारत के किसी मंत्री की ऐसी निजी जानकारी उपलब्ध हो जिसे वह सार्वजनिक ना करना चाहते हो तो इजराइल भारत पर कितना बड़ा दबाव बना सकता है?

इजराइल का इतिहास कहता है कि इजराइल ने हथियारों के दम पर शुरू से लेकर अब तक का राष्ट्रीय संघर्ष का सफर तय किया है। साल 1980 में इजराइल जैसा छोटा देश दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा निर्यातक देश बन गया। इजराइल की आर्थिक ताकत का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हथियारों का कारोबार रहा है। अरब देशों को नियंत्रित करने से लेकर अमेरिका के सहयोग की सबसे बड़ी वजह इजराइल की हथियार नीति रही है।

लेकिन साइबर वेपन के तौर पर NSO जैसे कंपनी की मौजूदगी ने उसे और अधिक ताकतवर बना दिया। एनएसओ में इजराइल के सबसे कुशल इंजीनियर और तकनीकी विशेषज्ञ काम करते हैं। जिनमें से अधिकतर वे हैं, जिन्होंने कभी ना कभी इजराइल सरकार के लिए काम किया है। एनएसओ को अपने सॉफ्टवेयर के निर्यात के लिए इजरायल के रक्षा मंत्रालय से अनुमति लेने की जरूरत है। मतलब यह है कि एनएसओ यह नहीं कह सकता कि उसके ऊपर इजरायली सरकार का नियंत्रण नहीं है। 

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में भारत को लेकर के जो बात कही गई है वह कुछ इस तरीके से है: जुलाई 2017 में हिंदुत्व के सहारे नरेंद्र मोदी दूसरी बार प्रधानमंत्री के तौर पर चुने गए। इजराइल जाने वाले भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने। दशकों तक भारत ने फिलीस्तीन के पक्ष में खड़े रहने की नीति अपनाई थी। भारत और इजरायल के बीच रिश्ते ठंडे थे। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इजराइल की यात्रा को इस तरह से मंचित किया गया कि पूरी दुनिया में यह संदेश जाए कि भारत और इजराइल के रिश्ते सौहार्द पूर्ण हो चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इजरायल के प्रधानमंत्री नेत्यानहू के बीच काफी गर्मजोशी की भावना को दिखाया गया। इसी दौरान 2 बिलियन डॉलर तकरीबन 15 हजार करोड़ रुपए की हथियारों के पैकेज की बिक्री की सहमति बनी। इस पैकेज में परिष्कृत और खुफिया हथियारों के साथ पेगासस भी शामिल था।

मतलब न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट यह बात खुलकर कह रही है कि भारत की सरकार ने इजरायली सरकार से पेगासस खरीदा है। न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट में किसी भी तरह का किंतु परंतु नहीं है।

इससे आगे जाते हुए न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट यह कहती है कि कुछ महीने बाद ही इजरायली प्रधानमंत्री ने भारत की यात्रा की। इसके बाद जून 2019 में भारत ने संयुक्त राष्ट् आर्थिक और सामाजिक परिषद में इजराइल के समर्थन में वोट दिया। फिलिस्तीनी मानवाधिकार संगठन को पर्यवेक्षक का दर्जा देने से इनकार करने के लिए मतदान किया। भारत की तरफ से औपचारिक तौर पर पहली बार फिलिस्तीन का पक्ष नहीं लिया गया।

यह पूरी रिपोर्ट एक विदेशी अखबार में छपी है। इस रिपोर्ट पर कई तरह के सवाल भी खड़े किए जा सकते हैं। लेकिन फिर भी पेगासस जासूसी कांड की छानबीन के सिलसिले में यह रिपोर्ट बहुत महत्वपूर्ण हस्तक्षेप करती है। पेगासस जासूसी कांड का मामला सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंचा था। 27 अक्टूबर साल 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए रिटायर्ड जस्टिस आरवी रवींद्रन की अध्यक्षता में कमेटी भी बनाई है। 

इसे भी पढ़ें: https://hindi.newsclick.in/Supreme-Court-stand-on-Pegasus-espionage-scandal-Squeeze-of-46-page-order

सुप्रीम कोर्ट ने इस कमेटी को यह काम सौंपा है कि वह पता लगाए कि क्या भारतीय नागरिकों के डिजिटल डिवाइस के डेटा में पेगासस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया गया था? क्या उनकी डिजिटल डिवाइस की सूचनाओं के साथ छेड़छाड़ किया गया था? इस तरह की जासूसी से भारत में कितने लोग प्रभावित हुए हैं? उन लोगों की पूरी डिटेल सुप्रीम कोर्ट को सौंपी जाए? साल 2019 में पेगासस के जरिए व्हाट्सएप हैक की खबरें आने पर भारत की सरकार ने इनकी छानबीन करने के लिए किस तरह के कदम उठाए? क्या भारत की केंद्र सरकार या राज्य सरकार या किसी भी सरकारी संस्था के जरिए पेगासस को खरीदा गया? क्या इसका इस्तेमाल इन सभी ने अपने ही नागरिकों के खिलाफ किया? अगर भारत की किसी भी सरकार या किसी भी सरकारी संस्था ने पेगासस का इस्तेमाल अपने नागरिकों पर किया तो किस तरह की कानूनी प्रक्रियाओं, नियम और प्रोटोकॉल का पालन करते हुए उन्होंने ऐसा किया? अगर भारतीय सरकार के अलावा किसी व्यक्ति ने पेगासस का इस्तेमाल भारत के किसी नागरिक पर किया तो उसे किसने यह अधिकार दिया था? इसके अलावा वह सारे काम यह कमेटी करेगी जो निजता के अधिकार के उल्लंघन और पेगासस से जुड़े हो। 

अब आगे देखने वाली यह बात होगी कि सुप्रीम कोर्ट की कमेटी इस रिपोर्ट को किस नजर से देखती है? क्योंकि सरकार तो अब भी इस सबसे इंकार कर रही है।

 इसे भी देखें-- पेगासस का पेंच, रेलवे नौकरी के परीक्षार्थियों की पीड़ा और चुनावी ख़बरें

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