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पुलिसिया क्रूरता, उत्पीड़न ने कश्मीर में कोरोनावायरस के खिलाफ जंग को हतोत्साहित करने का काम किया है
अब चूँकि मामले रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं, ऐसे में कई लोगों का मत है कि लॉकडाउन में ढील दी जानी चाहिये। इस बात को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं कि इसे लागू कराने के लिए किये जा रहे बल प्रयोग का प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
अनीस ज़रगर
27 May 2020
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प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार: द कारवां

श्रीनगर: श्रीनगर निवासी अर्शी कुरैशी और उनके भाई पिछले शनिवार को अपनी कार से जा रहे थे जब पुलिस कर्मियों ने उन्हें श्रीनगर के लाल बाजार इलाके में एक चेकपॉइंट पर रोक दिया था और आगे जाने की अनुमति नहीं दी थी। जब अर्शी के भाई ने पुलिस से इसकी वजह जानने की कोशिश की तो उसके साथ बुरी तरह से मार-पीट की गई।

न्यूज़क्लिक से बात करते हुए अर्शी ने बताया कि "सिर्फ उसके भाई को ही नहीं बल्कि एक बुजुर्ग इंसान जिनके पास अस्पताल का परचा और कैंसर सोसाइटी का कार्ड तक था, उनके साथ भी मार-पीट की गई थी। अंत में उन दोनों के बचाव के लिए मुझे बाहर निकल कर आना पड़ा।"

जब अर्शी इसे अपने ट्विटर अकाउंट पर पोस्ट कर रही थीं तो करीब उसी समय के आस-पास पूर्व स्टार फुटबॉलर, मेहराजुद्दीन वड्डू ने भी अपने खुद के साथ गुजरे कड़वे अनुभव को पोस्ट के माध्यम से साझा किया। यह घटना उनके साथ तब घटी थी, जब वे अपनी माँ का हालचाल लेने के लिए बाहर निकले थे, जिनकी स्थिति चिंताजनक बनी हुई थी। पुलिस ने मेहराज को बदशाह कदल के पास रोका था और कई घंटों तक हिरासत में रखा।

वड्डू ने लिखा है कि "थाना प्रभारी से बात की, लेकिन उनकी और से जो प्रयास किये गए और कहा गया उसे सुनना मेरे लिए स्तब्धकारी था"  उनका कहना था कि अगर तुम्हारी माँ मर रही है तो उसे मरने दो। "ये शब्द थे उस इलाके का कार्यभार देख रहे अधिकारी के। हाँ, 100 प्रतिशत सही है, तुम्हें परवाह क्यों हो?" बाद में वड्डू ने अपने इस ट्वीट को डिलीट कर दिया था और इस बाबत जिला मजिस्ट्रेट की ओर से पहुंचाई गई मदद के लिए धन्यवाद भी ज्ञापित कर दिया है, लेकिन हकीकत तो ये है कि हर कोई तो स्टार फुटबालर की तरह भाग्यशाली नहीं हो सकता।

अर्शी और मेहराज जैसे न जाने कितने स्थानीय आमजन हैं जिन्हें आये दिन राह चलते इस प्रकार की ज्यादतियों से दो-चार होना पड़ता है। ये वे लोग नहीं हैं जो किसी सैर-सपाटे या मौज-मस्ती के लिए अपने घरों से बाहर निकलते हैं, उल्टा इनमें से कई लोग तो अपनी ड्यूटी पर जाने वाले स्वास्थ्य कर्मी हैं।

25 मई को गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) श्रीनगर के रेजिडेंट डॉक्टर एसोसिएशन (आरडीए) की ओर से जारी बयान में पुलिसिया "उत्पीड़न" की आलोचना की गई है।

जीएमसी श्रीनगर की प्रिंसिपल सामिया रशीद ने अपने ट्वीट में लिखा है कि ''पुलिस का आचरण इस कदर शोचनीय है कि इसके बारे जितना भी कहा जाए, कम होगा- यहाँ हम एक कार्यकर्ता के तौर पर लड़ाई के अग्रिम मोर्चे पर किसी तरह दिन-रात जुटे हुए हैं, खुद के और अपने परिवारों के जीवन को सिर्फ इसलिए जोखिम में डाल रहे हैं कि हमें इस तरह से हैरान-परेशान होना पड़े? हमने प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर इस मुद्दे को संबंधित अधिकारियों के समक्ष रखा है और हमें इस बारे में त्वरित कार्रवाई की उम्मीद है।”

कोरोनोवायरस महामारी के व्यापक प्रसार को रोकने के लिए अचानक से देशव्यापी लॉकडाउन को लागू हुए अब दो महीने हो चुके हैं, लेकिन कश्मीर में इसके मामलों में बढ़ोत्तरी का क्रम अभी भी बना हुआ है।

लॉकडाउन का सख्ती से पालन जिसमें कड़े प्रतिबंधों को थोपना और क्वारंटीन के नियमों का पालन करना शामिल है, जिसका मकसद लोगों की मदद करना था, के बावजूद पहले से कहीं अधिक मामले सामने आ रहे हैं। इस बारे में हेल्थकेयर विशेषज्ञों का कहना है कि लॉकडाउन से होने वाले फायदे धीरे-धीरे धूमिल पड़ते जा रहे हैं। इसके साथ ही लॉकडाउन को अमल में लाने के लिए पुलिस की ओर से बेजा बल प्रयोग, प्रशासनिक कुप्रबंधन, जैसे कि क्वारंटीन वाली जगहों में और भविष्य के प्रति लोगों में अनिश्चितता के भाव ने इस महामारी के खिलाफ लोगों की लड़ाकू प्रवत्ति को हतोत्साहित किया है।

चिकित्सकीय मामलों के विशेषज्ञ भी इसको लेकर चिंतित हैं कि यदि हिंसक तरीकों का इस्तेमाल कर और सभी आर्थिक कार्यकलापों के स्थगन को एक बार फिर से विस्तारित करने से आख़िरकार लॉकडाउन से ऊबन और थकान उपजनी स्वाभाविक है, जिससे लोगों में संक्रमित होने का भय ही बढ़ता जा रहा है।

श्रीनगर के जवाहर लाल नेहरू मेमोरियल (JLNM) अस्पताल के न्यूरोसाइक्रिस्ट्री कंसलटेंट शेख शोएब कहते हैं  "यदि लॉकडाउन को लंबे समय तक खींचते हैं तो यह कई समस्याओं को जन्म देने वाला साबित हो सकता है ... यदि इससे लोगों के अस्तित्व को खतरा उत्पन्न होने लगेगा तो यह कुल मिलाकर फायदे की जगह नुकसानदेह साबित होने जा रहा है।"

डॉक्टर एसोसिएशन कश्मीर के अध्यक्ष सुहैल नाइक के अनुसार इस बीमारी के खिलाफ टीकाकरण की जगह अनिश्चितकालीन लॉकडाउन थोप देने से समस्या का हल नहीं निकलने जा रहा है। डॉ. नाइक के हिसाब से यह बीमारी अब कश्मीर में तीसरे चरण में प्रवेश कर चुकी है और सामुदायिक संचरण शुरू हो चुका है। वे कहते हैं “यह अशुभ संकेत है, क्योंकि हम एक के बाद एक करके लगातार तीसरे लॉकडाउन के समापन पर खड़े हैं, लेकिन हमारे मामले में कुछ अन्य कारक हैं जो इस बात के संकेत दे रहे हैं कि हम अन्य से काफी बेहतर काम कर रहे हैं।”

इस क्षेत्र में रिकवरी की दर, डॉ. नाइक के अनुसार 30 से 35% के बीच रही है और मृत्यु दर 2% से भी कम पर बनी हुई है और तकरीबन 90% लोग स्पर्शोन्मुख हालत में ही हैं, जो कि अच्छे संकेत हैं।

"लॉकडाउन को इसलिए थोपा गया था ताकि इस संकट से निपटने के लिए इस दौरान हम अपनी स्वास्थ्य सेवाओं को चाक-चौबंद कर सकें और स्वास्थ्य सेवाओं पर अचानक से भार न पड़े। अब हमने कोविड-19 और गैर-कोविड अस्पतालों को नामित करने का काम पूरा कर लिया है और कोरोना वायरस के मरीजों, केंद्रों और क्वारंटीन केंद्रों की देखभाल के लिए कर्मचारियों के निर्धारण का काम पूरा कर लिया है।" पहले इस इलाके में हमारे पास कोई प्रयोगशाला नहीं थी, जोकि अब स्थापित हो चुकी है और अब स्थानीय स्तर पर इसकी टेस्टिंग हो सकती है। स्वास्थ्य आपदा से निपटने के लिए लॉकडाउन लागू करने से समय मिल जाता है, जिसका हमने उपयोग किया है ... अब हमारे पास इसके लिए प्रतिक्रिया तंत्र तैयार है " वे कहते हैं।

डॉ. नाइक का मानना है कि इस महामारी से उबरने में दुनिया को छह महीने से एक साल तक का वक्त लग सकता है। इस बारे में वे कहते हैं  ''हम जिन्दगी को पूरी तरह से रोक कर नहीं रख सकते। भविष्य के लिए हमें अपने जीवन को प्रोटोकॉल, दिशानिर्देशों और स्वास्थ्य सलाहों के आधार पर तैयार करने की आवश्यकता है।''

सारे भारत में इसके 1.3 लाख से अधिक मामले हैं, जिनमें से 1,621 मामले जम्मू कश्मीर वाले केंद्र शासित प्रदेश में देखने को मिले हैं। इनमें से 800 से अधिक लोग ठीक हो चुके हैं जबकि इसके 21 पीड़ितों की अब तक मौत हो चुकी है, और उनमें से ज्यादातर लोग सह-रुग्णता से पीड़ित चल रहे थे।

हेल्थकेयर विशेषज्ञों ने इस बात का भी दावा किया है कि मात्र टेस्टिंग की संख्या में पहले से बढ़ोत्तरी कर देने से इसके पॉजिटिव मामलों में तेजी देखने को नहीं मिल रही है। उनका मानना है कि जैसे-जैसे प्रतिबंधों में ढील दी जायेगी, इसकी संख्या में इजाफा देखने को मिलेगा, लेकिन उसे लेकर हमें घबराने की जरूरत नहीं, क्योंकि इसकी जवाबी प्रणाली हम पहले से ही तैयार कर चुके हैं।

उपायुक्त शाहिद चौधरी ने न्यूज़क्लिक को बताया कि लॉकडाउन से बाहर निकलने वाली नीति को "क्रम वार और धीमी" प्रक्रिया में करना होगा।

चौधरी ने बताया "अभी फिलहाल 31 मई तक लॉकडाउन जारी है, लेकिन इसके साथ-साथ हम लोग आर्थिक गतिविधियों को फिर से शुरू करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। वास्तव में देखें तो हमने उद्योगों के साथ इसकी शुरुआत भी कर दी है और हथकरघा जैसी अन्य गतिविधियों को शुरू करने की योजना पर काम कर रहे हैं।"

वहीं कश्मीर प्रशासन सामाजिक-जिम्मेदारी या आमजन के संक्रमण के डर पर यकीन करके नहीं चल रहा है, लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े विशेषज्ञों की राय में पुलिसिया क्रूरता, प्रशासनिक कुशासन, आर्थिक अस्थिरता और पीड़ितों को अपमानित करने के अभियान के चलते, समाधान की जगह कहीं और ज्यादा समस्याएं खड़ी हो सकती हैं।

ऐसे कई लोग हैं जिन्हें क्वारंटीन सुविधाओं में समय बिताना पड़ा है, का आरोप है कि वहां पर प्रशासनिक बद-इन्तजामी, पीड़ित व्यक्ति पर दोषारोपण करने और अपमानित करने की घटनाओं के चलते थकान और घिसाव के साथ अनिश्चितता का माहौल बढ़ता जा रहा है। कोरोनावायरस के खिलाफ जारी जंग में यह एक बड़ी निरुत्साहित करने वाली बाधा के रूप में है।

उदाहरण के तौर पर कई लोग जिन्होंने दक्षिणी कश्मीर के पुलवामा में सार्वजनिक क्वारंटीन सुविधाओं में समय काटा है, के अनुसार इन्हें “बदतर” स्थिति में चलाया जा रहा था।

एक मेडिकल के छात्र ने न्यूज़क्लिक से इसका खुलासा करते हुए बताया "कमरे और वाशरूम गंदे हैं। मुझे 20 से अधिक लोगों के साथ बाथरूम को साझा करना पड़ा था, जिनके टेस्ट के नतीजे पॉजिटिव हैं या नेगेटिव इसकी पुष्टि होनी बाकी थी। यह किसी दु:स्वप्न से कम नहीं था। लेकिन प्रशासन जिस प्रकार से आपके साथ किसी अपराधी की तरह बर्ताव करता है, यह सब देखना सबसे बुरा है।”

यह अपनेआप में कोई अकेला मामला नहीं है। पुलवामा के ही एक अन्य स्थानीय ने जिसे किसी अन्य क्वारंटीन सुविधा में रखा गया था, का भी कुछ इसी तरह का अनुभव था। इस व्यक्ति ने खुद को अज्ञात रखे जाने की शर्त पर अपने अनुभवों को साझा करना स्वीकार किया, क्योंकि उसे बदले में प्रतिशोध का डर बना हुआ है, ने बताया कि उसने 10 दिनों तक क्वारंटीन में गुजारे थे। इस पुलवामा निवासी के अनुसार "पहले पहल मेरा सैंपल जम्मू में लिया गया था और इसके बाद मुझे पुलवामा में बने क्वारंटीन सुविधा में स्थानांतरित करा दिया गया था, क्योंकि टेस्टिंग के परिणाम में समय लगना था। दूसरी बार एक बार फिर से मेरा सैंपल लिया गया था, लेकिन इस बीच नौ दिनों के बाद जम्मू में दिए गए सैंपल का परिणाम आ गया था, जिसके बाद मुझे छुट्टी दे दी गई थी।"

श्रीनगर में भी अनेकों लोगों ने दावा किया है कि जब कभी उनकी ओर से उचित सुविधाओं या चिकित्सकीय अपडेट सम्बंधी पूछताछ की गई थी तो इससे निपटने के लिए प्रशासन ने हर बार पीड़ितों को ही दोषी ठहरा दिया था।

21 वर्षीया गफिरा कादिर फ़िलहाल श्रीनगर के ज़कुरा क्षेत्र में बने क्वारंटीन में रह रही हैं, और पिछले 17 मई से दिए गए टेस्ट के परिणाम की प्रतीक्षा में हैं। गफिरा ने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए कहा "हमारा सात लड़कियों का एक समूह है, जिन्हें एक ऐसी इमारत में रखा गया है जिसमें बड़ी संख्या में क्वारंटीन में रखे गये लड़कों को रखा गया है। यहाँ पर सबके लिए शौचालय की सुविधा अलग से नहीं थी, नतीजे के तौर पर हमें इसका उपयोग करने के लिए तीन मंजिल नीचे जाना पड़ता है, और इस्तेमाल के बाद हमें ही इसे साफ़ करना होता है। जैसा अनुभव हमें भोगने को मिला है ऐसे हालात से किसी और को भी न गुजरना पड़े। यहाँ पर मौजूद अधिकारीयों का बर्ताव बेहद रुखा है और वे हमें उनके प्रति कृतज्ञ न होने के लिए लांछित करते हैं।”

इस प्रकार की “बेरुखी” के कई मामले अस्पताल के प्रशासन और चिकित्सा कर्मियों के मामलों में पाई गई हैं। एक महिला जिसे एसएमएचएस अस्पताल से स्थानांतरित किया गया था, को श्रीनगर के सीडी अस्पताल के पैरामेडिक्स द्वारा सीढ़ियों पर पीठ के बल लिटा कर छोड़ दिया गया था। शक था कि यह महिला कोरोनावायरस पॉजिटिव है, उसकी देखभाल कर रही महिला ने किसी तरह उसे अपनी बांहों का सहारा दिया हुआ था। इस तस्वीर के ऑनलाइन साझा हो जाने पर लोगों में बेहद नाराजगी देखने को मिली है।

सीडी अस्पताल के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष नावेद शाह का इस बारे में कहना है कि उस दिन करीब 12 रोगी पॉजिटिव पाए गए थे, और उनमें से नौ को एसएमएचएस अस्पताल से सीडी अस्पताल में स्थानांतरित किया गया था। डॉ. नावेद के अनुसार "उन्हें लावारिस नहीं छोड़ दिया गया था, लेकिन उसके साथ सिर्फ एक परिचारक ही मौजूद था और एम्बुलेंस वाहन के ड्राईवर ने उन्हें अस्पताल परिसर के अंदर लाकर छोड़ दिया था। जिस अस्पताल ने इन्हें यहाँ के लिए रेफर किया था, कायदे से उन्हें इनके साथ मेडिकल स्टाफ में से किसी को सारी प्रक्रिया को संपन्न कराने के लिए भेजना चाहिए था। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, जिसके कारण ऐसे हालात बन गये।"

सीडी अस्पताल जो कि कोविड-19 अस्पताल के रूप में नामित है, उसका मेडिकल स्टाफ एक बार में सभी नौ मरीजों को यहाँ पर स्थानांतरित नहीं कर सकता। डॉ. नावेद के अनुसार यह मरीज सीडी अस्पताल की देखरेख में है। डॉ. नावेद ने न्यूज़क्लिक को बताया "उस मरीज ने क्वारंटीन में अपने सात दिन बिता लिए हैं और तब से उसकी हालत में काफी सुधार देखने को मिला है।"

अन्य की तरह ही डॉ. नावेद का भी मानना है कि लॉकडाउन का असली मकसद फौरी तौर पर कुछ समय बचाने के तौर पर इस्तेमाल के लिए था। उनके अनुसार “लॉकडाउन को लागू किये जाने से निश्चित तौर पर इसके प्रसार की संख्या को कम पर रखा जा सका है। इससे भी बेहतर किया जा सकता था, लेकिन इससे मामले रुक नहीं सकते हैं। लॉकडाउन को दीर्घकाल तक बढ़ाते जाने में इसका समाधान नहीं है। हमें अब वायरस के साथ ही जिन्दा रहने के गुर को सीखना ही होगा।”

 

अंग्रेजी में प्रकाशित इस मूल आलेख को आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं-


Police Brutality, Harassment Dampen Battle Against COVID-19 in Kashmir

 

COVID-19
J&K Quarantine .Lockdown Fatigue
Community Transmission
Kashmir harassment

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CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License