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भारत
राजनीति
बंगाल में गिरफ्तारियां क्यों नैतिक, राजनीतिक और कानूनी रूप से अन्यायपूर्ण हैं?
भाजपा कुछ ऐसे व्यवहार कर रही है जैसे देश में कोई महामारी नहीं है, कोई तंगी नहीं है, केवल चुनाव जीते या हारे हैं। महामारी को संभालने में बुरी तरह नाकामयाब होने के बाद वह अपने पार्टी कैडर को संभालने की कोशिश कर रही है।
उज्ज्वल के चौधरी
19 May 2021
Translated by महेश कुमार
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केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह "पिंजरे में क़ैद तोता" है, जैसा कि न्यायपालिका के एक प्रतिष्ठित सदस्य ने इसे खास विशेषण से नवाज़ा था। ठीक दो हफ्ते पहले, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने बंगाल विधानसभा चुनाव में तीसरी विशाल जीत हासिल की थी। राज्य में तीन दिन पहले ही लॉकडाउन लगाया गया था, जहां दैनिक तौर पर 20,000 संक्रमण और 200 मौतें हो रही हैं। 

इस तरह की विकट स्थिति के बावजूद, सीबीआई केंद्रीय बलों की पलटन को साथ लेकर, दो कैबिनेट मंत्रियों (फिरहाद हकीम और सुब्रत मुखर्जी) और एक मौजूदा विधायक (मदन मित्रा) को गिरफ्तार करने बेतरतीब उनके घर पहुँच गई, जो सभी टीएमसी से संबंधित हैं। इसने शोभन चटर्जी (जोकि पूर्व में टीएमसी मंत्री थे, बाद में भाजपा में शामिल हुए और फिर भाजपा से भी नाता तोड़ दिया था) को भी गिरफ्तार किया है। छह साल पहले नारदा स्टिंग ऑपरेशन में हुए खुलासे के बल पर और रिश्वत लेने के जुर्म में ये गिरफ्तारियां हुई हैं।

आइए पहले इस मुद्दे की नैतिकता को समझते हैं। इसमें कोई शक़ नहीं कि सार्वजनिक कार्यालयों में भ्रष्टाचार का डटकर विरोध किया जाना चाहिए। किसी भी उद्यमी को व्यवसाय शुरू करने में मदद करने के एवज़ में रिश्वत मांगना या स्वीकार करना (प्रति व्यक्ति लगभग 4-6 लाख रुपये नकद लेने का आरोप है) भी कानूनी रूप से गलत है। लेकिन इस तरह के कृत्य को माफ़ करने का कोई मतलब नहीं है।

लेकिन भारत सदी की सबसे खराब महामारी का सामना कर रहा है। इस महामारी का दूसरा विनाशकारी हमला 45 दिनों से चल रहा है। चुनाव अभियान से एक दिन पहले बंगाल में कोविड के 600 मामले दर्ज़ किए गए थे, जो 29 अप्रैल को चुनाव समाप्त होने के बाद लगभग 16,000 हो गए थे। अब, लगभग दो सप्ताह बाद, कोविड के मामले एक दैनिक रफ़्तार 20,000 पहुँच गई है। यह दुर्भाग्यपूर्ण लॉकडाउन कम से कम मई के अंत तक तो जारी रहेगा। इसका अर्थ है कि राज्य की लगभग आधी आबादी को अत्यधिक कठिनाइयों का सामना करना होगा: विशेषकर असंगठित क्षेत्र में कार्यरत या बेरोजगार लोगों को काफी तंगी झेलनी होगी। 

जबकि टीकाकरण अब तक 10 वयस्कों में से एक को भी नहीं छु पाया है, तो इस पृष्ठभूमि में  साल पुराना मामला केंद्र सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता कैसे बन गया?

साथ ही इस स्टिंग ऑपरेशन पर दर्ज़ एफआईआर में भाजपा दल के प्रतिपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी और उसके राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व विधायक मुकुल रॉय का नाम भी है। अभी तक दोनों को गिरफ्तार नहीं किया गया है। यहां तक कि स्टिंग ऑपरेशन करने वाले मैथ्यू सैमुअल ने भी इस तरह की गिरफ्तारी के बारे में आश्चर्य जताया है, जो एफआईआर ने तीन चुनावी चक्रों को पार किया है, और फिर भी भाजपा के दो नेताओं को गिरफ्तार नहीं किया जा रहा है।

आइए अब इसके कानूनी पहलुओं पर नजर डालते हैं। किसी भी चुने हुए विधायक के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले विधानसभा अध्यक्ष को सूचित किया जाना चाहिए। विधानसभा अध्यक्ष  बिमान बंदोपाध्याय ने इस बात की जानकारी से इनकार किया है कि उनकी मंजूरी ली गई थी। मंत्रियों पर मुकदमा चलाने की अनुमति राज्य के राज्यपाल से मिलनी चाहिए, जो मुख्यमंत्री को विश्वास में लेते हैं और कार्यवाही की प्रक्रिया की अनुमति देते हैं। राज्यपाल जगदीश धनकड़, जो जानेमाने भाजपा समर्थक हैं और अपने संवैधानिक पद का दुरुपयोग करने के लिए जाने जाते हैं, ने विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद इसकी अनुमति चुपचाप दी है। (यह दर्शाता है कि इन लोगों की गिरफ्तारी के पीछे एक स्पष्ट राजनीतिक मक़सद काम कर रहा था)। गिरफ्तारी होने तक मुख्यमंत्री खुद अंधेरे में रखा गया। इसके अलावा, स्टिंग वीडियो में गिरफ्तार व्यक्तियों को रिश्वत की मांग करते नहीं दिखाया गया है। उनको स्टिंग ऑपरेटर से राजनीतिक खर्च के लिए नकद लेते हुए दिखाया गया है। दूसरे शब्दों में कहें तो कथित अपराधों को अभी भी अदालत में साबित करने की जरूरत है।

सीबीआई के विशेष न्यायाधीश ने गिरफ्तारी की तारीख पर गिरफ्तार लोगों को अंतरिम जमानत दे दी थी। फिर भी, सीबीआई एक घंटे के भीतर मामले को उच्च न्यायालय ले गई। जहां कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति अरिजीत बनर्जी की पीठ ने 16 मई को उनकी जमानत पर रोक लगा दी और उनकी अगली सुनवाई 18 मई तय करते हुए उन्हे प्रेसीडेंसी जेल भेज दिया। यह पूरी प्रक्रिया उस देश में कुछ घंटों में हो गई जहां लाखों लंबित मामलों की सुनवाई कभी नहीं होती है। इस तरह की जल्दबाजी मामले को पूर्वाग्रह और प्रतिशोध का कारण भी बनाती है। कानून में जमानत का नियम है, लेकिन जेल अपवाद है। उच्च न्यायालय ने कोलकाता के निजाम पैलेस में सीबीआई कार्यालय के सामने मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों द्वारा लगाए गए धरने पर भी नाराजगी जताई है, जहां लगभग 2,000 प्रदर्शनकारियों ने हंगामा किया था।

राजनीति 

बंगाल दो महीने से अधिक लंबे समय तक चले एक कड़वे चुनाव अभियान से गुजरा है। वह भी आठ चरणों का मतदान, जो दो महीने से अधिक समय तक चला। इस दौरान, देश के अधिकांश हिस्सों में कोविड-19 मामलों की दूसरी लहर उछाल मार रही थी। बंगाल का चुनाव भाजपा की हार और टीएमसी के बेहतर प्रदर्शन के साथ समाप्त हुआ। जबकि टीएमसी 294 सीटों में से 213 सीटें जीतीं (जबकि दो निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव उम्मीदवारों की मृत्यु के कारण चुनाव रद्द कर दिए गए थे)। प्रधानमंत्री ने 21, और गृह मंत्री ने 52 जनसभाएं कीं, इसके अलावा भाजपा के मुख्यमंत्रियों और केंद्रीय मंत्रियों ने भी प्रचार में जमकर हिस्सा लिया। 

सभी विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि चुनावों को प्रभावित करने के लिए भाजपा ने केंद्रीय बलों का व्यापक दुरुपयोग किया है। उन्होंने चुनाव आयोग को सत्ताधारी पार्टी का भी ग़ुलाम बताया है. चुनाव पर भारी वित्तीय संसाधन खर्च करने के बाद, भाजपा को अपनी हार स्वीकार करने में मुश्किल हो रही है। इस प्रकार, परिणामों ने भाजपा और टीएमसी के बीच और भी अधिक कड़वे राजनीतिक संघर्ष को जन्म दिया है। अब, बंगाल में हर बड़े चुनाव के बाद संघर्ष या लड़ाई आम बात हो गई है। पुलिस के अनुसार, कथित तौर पर भाजपा के दस और टीएमसी के सात कार्यकर्ताओं सहित लगभग 17 लोग मारे गए हैं। दोनों संगठनों से जुड़े लोगों के 50 से अधिक कार्यालय और घर लूट लिए गए या जला दिए गए हैं। परिणाम आने के बाद पहले कुछ दिनों में ऐसा हुआ है, इस दौरान बनर्जी राज्य में एक कार्यवाहक सरकार का नेतृत्व कर रही थी, और केंद्रीय बल अभी भी बंगाल में मौजूद थे।

भाजपा ने बंगाल में हो रहे हिंदू-मुस्लिम संघर्ष की तस्वीर को पेश करने की पूरी कोशिश की है। इसकी आईटी ट्रोल मशीनरी ने इस तरह के संदेश भेजने के लिए पिछली घटनाओं और यहां तक कि अन्य देशों (बांग्लादेश) के नकली वीडियो को सोश्ल मीडिया पर चलाया है। भाजपा के कलह के बीज बोने के अपने मिशन में विफल होने के बाद, आखिर ममता सरकार ने सत्ता संभाली, और राज्यपाल धनकड़ कूचबिहार और नंदीग्राम की यात्रा पर गए, जहाँ हाल ही में हिंसा हुई थी। हालांकि, उन्होंने केवल मारे गए या लूटे गए भाजपा कार्यकर्ताओं के घरों का दौरा किया। सत्ता संभालने के दो से पांच दिनों के भीतर ही ममता प्रशासन को ठिकाने लगाने की स्पष्ट कोशिश की गई थी. राज्यपाल को हर जगह टीएमसी कार्यकर्ताओं ने काले झंडों दिखाए। 

अब तीसरी रणनीति आती है- नारदा मामले में नामित नेताओं की गिरफ्तारी (भाजपा में शामिल होने वाले दो लोगों को छोड़कर) की गई। उच्च न्यायालय द्वारा उनकी जमानत पर रोक लगाने से इस मुद्दे पर अनिश्चित काल के लिए बड़ा उबाल आने की संभावना है। बंगाल, जोकि हिंसक राजनीतिक गतिविधियों और संघर्ष के लिए जाना जाता हैं, परिणामस्वरूप अब कई जिलों में भाजपा-टीएमसी संघर्षों को देखा जा सकता हैं। इससे अधिक सामाजिक अराजकता बढ़ सकती है - और कोविड-19 संक्रमण, जो पहले के मुक़ाबले बढ़ रहा है, आगे अधिक छलांग लगा सकता है।

क्या यह संयोग की बात है कि भाजपा हार के बाद से ही राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग कर रही है? इससे निश्चित रूप से केंद्र में बैठे शासकों का लक्ष्य राज्य में जीवन और कानून व्यवस्था को बाधित करना लगता है। हालाँकि, यदि अनुच्छेद 356 को लागू किया जाता है, तो यह बनर्जी के कार्यकर्ताओं को को लड़ाई के लिए प्रेरित कर सकता है। वह तेजी से आगे बढ़ सकती है और उन 12 विपक्षी दलों को एक साथ ला सकती है जिनके साथ वह निकट संपर्क में हैं। पिछले महीने हुए चुनावों के बीच दिल्ली में बैठी सरकार द्वारा लोकतंत्र को खत्म करने के केंद्र के मंसूबों के खिलाफ बनर्जी ने उन्हें पत्र लिखा था। उस समय कुछ पार्टियों के नेताओं ने उन्हें समर्थन देने का वादा किया था। ध्यान रहे कि त्रिपुरा में भाजपा के कुछ 36 राज्य और जिला नेता पहले से ही टीएमसी में शामिल हो चुके हैं, और ममता जून की शुरुआत में अगरतला जाने की योजना बना रही हैं।

इसलिए, राजनीतिक रूप से, टीएमसी नेताओं की गिरफ्तारी एक अनुचित कदम है। नेताओं को किसी भी समय उच्च न्यायालय से जमानत मिलने की उम्मीद है। इसलिए, हो सकता है कि भाजपा को इस मामले से अपेक्षित लाभ न मिले। यह हिंसक है, क्योंकि यह राज्य के मतदाताओं के हाथों एक कड़वी हार को स्वीकार करने से इनकार कर रही है, और अपने हारे सिपाहियों/कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने के तरीके के बारे में सोच रही है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भाजपा गंगा में बह रही लाशों से देश का ध्यान हटाना चाहती है, वह आबादी का टीकाकरण करने में बुरी तरह विफल हो गई है और इसलिए महामारी को न रोक पाने से संबंधित पक्षाघात से भी ध्यान हटाने की कोशिश कर रही है।

(लेखक, अकादमिक और स्तंभकार हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।)

इस लेख का अंग्रेजी संस्करण आप इस लिंक के जरिए पढ़ सकते हैं:-

https://www.newsclick.in/Why-Arrests-Bengal-Morally-Politically-Legally…

West Bengal
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CPI(M)
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