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भारत
राजनीति
प्रधानमंत्री ने गलत समझा : गांधी पर बनी किसी बायोपिक से ज़्यादा शानदार है उनका जीवन 
महात्मा गांधी का यश उन पर फिल्म बनाने का विचार करने से बहुत पहले ही दुनिया भर में फैल गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उन लोगों के साथ सुर में सुर नहीं मिलाना चाहिए जो गांधी को बदनाम करते हैं।
एस एन साहू 
21 Mar 2022
gandhi
फोटो सौजन्य: दि इंडियन एक्सप्रेस 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पार्टी की एक हालिया संपन्न संसदीय बैठक को संबोधित करते हुए इस बात को लेकर खेद व्यक्त किया कि फिल्म “कश्मीर फाइल्स” को उसकी अच्छाइयों की जांच किए बिना ही बदनाम किया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि "...दुनिया को महात्मा गांधी नामक एक शख्सियत के बारे में तभी पता चला, जब एक अंग्रेजी फिल्म निर्माता (रिचर्ड एटिनबरो) ने उन पर “गांधी” फिल्म बनाई और इस फिल्म ने कई पुरस्कार जीते थे।” 

मोदी ने कहा कि इसी वजह से दुनिया मार्टिन लूथर किंग जूनियर और नेल्सन मंडेला पर बात करती है लेकिन गांधी पर नहीं। उन्होंने कहा, "अगर कोई गांधी के जीवन का फिल्मांकन करता, तो शायद हम उसका संदेश प्रसारित करने में सक्षम होते।”

प्रधानमंत्री का नैरेटिव यह है कि एक फिल्म गांधी और उनके संदेश को दुनिया भर में अधिक स्वीकार्य बनाती। दुर्भाग्यवश यह महात्मा के जीवन और कार्य के बारे में उनकी समझ के उथलेपन को ही उजागर करता है। गांधी ने अपने योगदान के माध्यम से दुनिया भर में एक गहरा प्रभाव डाला, जो सत्य और अहिंसा के आदर्शों पर आधारित था। यह बात गांधी के आलोचक भी स्वीकार करते हैं। उनकी भूमिका की यह व्यापक स्वीकृति गांधी को राष्ट्र का एक आइकन बनाती है और उन्हें अपने समय से पहले और बाद में अन्य महान नेताओं से उन्हें अलग करती है। 

चार्ली चैपलिन पर गांधी का प्रभाव

प्रसिद्ध लोग और मामूली लोग भी महात्मा गांधी के व्यावहारिक कार्यों और नवोन्मेषी विचारों से गहरे प्रभावित थे। किसी फिल्म ने उनकी यह समझ नहीं बनाई है। प्रसिद्ध ब्रिटिश फिल्म अभिनेता चार्ली चैपलिन ने 1931 में गोलमेज सम्मेलन के लिए लंदन की अपनी यात्रा के दौरान गांधी से मिलने की इच्छा जताई थी। गांधी ने चैपलिन के बारे में कभी नहीं सुना था, लेकिन चैपलिन को उनके अहिंसक संघर्ष और आधुनिक सभ्यता की आलोचना की भलीभांति जानकारी थी। इस बैठक में चैपलिन महात्मा गांधी से इतने प्रभावित हुए कि बाद में उन्होंने “मॉडर्न टाइम्स” नाम से एक फिल्म बनाई जिसमें समकालीन संस्कृति से गांधी के सवालों को शामिल किया। चैपलिन ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि आधुनिक सभ्यता के मशीनीकरण के अमानवीय प्रभावों को दर्शाने के लिए उनकी फिल्म गांधी के विचारों का बहुत ऋणी है। इसलिए वास्तविकता वैसी नहीं है, जैसी कि प्रधानमंत्री कहते हैं, बल्कि इसके उलट प्रख्यात फिल्म निर्माताओं ने गांधी के जीवन पर इसलिए फिल्म बनाई क्योंकि वे अपने जीवनकाल में इतिहास बना रहे थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस तथ्य से अवगत होना चाहिए!

गांधी पर आइंस्टीन के विचार

जब गांधी 70 वर्ष के हो गए, तो अल्बर्ट आइंस्टीन ने उन पर एक त्वरित टिप्पणी की थी, जिसका अंत में कहा गया था,"आने वाली पीढ़ियां,यह शायद ही कभी विश्वास कर सकें कि इस तरह के हाड़-मांस का एक व्यक्ति कभी भी इस धरती पर हुआ था।” गांधी पर ऐसे अमर शब्द किसी फिल्म के बनने के पहले ही लिखे गए थे। 

आइंस्टीन का यह अवलोकन अहिंसा, औपनिवेशिक अधीनता और युद्धों, आक्रामकता और उत्पीड़न के अन्य रूपों से बड़े पैमाने पर पीड़ित-संत्रस्त युग के प्रति गांधी की समझ के आधार पर था। आइंस्टीन दुनिया भर में स्वतंत्रता और मुक्ति को लेकर गांधी के दृष्टिकोण से इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने उन्हें बीसवीं शताब्दी की सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक प्रतिभा बताया था। 

इस तरह के चमकदार प्रतिक्रियाएं 30 जनवरी 1948 को गांधी की हत्या से बहुत पहले, उनके विश्वव्यापी प्रभाव को स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं। गांधी की प्रसिद्धि में उनके शुरुआती दिनों 1906 में किए गए पहला सत्याग्रह का बहुत बड़ा योगदान है, जब उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्त्व किया और अंत तक इस दायित्व को निबाहा। 

मोदी का यह कहना कि गांधी एटनबरो की फिल्म गांधी के कारण प्रसिद्ध हुए, कई ऐतिहासिक रिकॉर्ड इसके विपरीत हैं। गांधी के दर्शन और सक्रियता का वैश्विक बोलबाला किसी भी सिनेमाई काम पर निर्भर नहीं करते। यह एक सत्य है कि फिल्में प्रभावशाली कार्यों और आंकड़ों पर बनाई गई हैं। यह कहना कि गांधी एक ऐसे फेनोमिना थे जिनको जीवित रखने या प्रासंगिक बनाए रखने के लिए-मृत्यु के काफी लंबे समय बाद-किसी फिल्म की मोहताज बताना उनके अपने जीवनकाल के दौरान अर्जित उपलब्धियों को नकारा है।

क्रॉस-सेक्शनल अपील

एक पादरी, लेखक और संयुक्त राज्य अमेरिका में शांति, नस्लीय समानता और नागरिक स्वतंत्रता आंदोलनों के नेता डॉ हेन्स होम्स भी गांधी के शुरुआती प्रशंसकों और उत्साही समर्थकों में से एक थे। उन्होंने 20 अप्रैल 1921 को अपने एक प्रवचन में, गांधी को "दुनिया का सबसे महान व्यक्ति" कहा। होम्स का कहना था, "जब भी मैं गांधी के बारे में सोचता हूं, मैं जीसस क्राइस्ट (Jesus Christ) के बारे में सोचता हूं।” ये श्रद्धापूरित शब्द हैं, लेकिन यह एक तथ्य है कि होम्स ने गांधी और स्वतंत्रता के लिए भारतीय संघर्ष के विषय पर कई प्रवचन दिए थे। अपनी आत्मकथा में, होम्स ने लिखा: "...यह महान भारतीय संत और मनीषी मानव इतिहास में सर्वोच्च आध्यात्मिक प्रतिभाओं में से एक था।”

ऐसी अभिव्यक्तियां गांधी के उनके जीवनकाल में मिले अंतरराष्ट्रीय महत्त्व के बारे में बखान करती हैं। ये बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक की बात है,जब सिनेमा शायद ही विकसित हुआ था और अभी तक इसका ठोस प्रभाव नहीं पड़ा था।

गांधी 1930 में ही मैन ऑफ दि ईयर घोषित 

1930 में, टाइम पत्रिका ने गांधी को उनके ऐतिहासिक दांडी मार्च के बाद ही 'मैन ऑफ द ईयर' घोषित कर दिया था। दांडी मार्च 12 मार्च 1930 को औपनिवेशिक शासन के नमक कानून को तोड़ने के लिए आयोजित किया गया था। इसमें गांधी को गिरफ्तार कर लिया गया था और वे जेल में थे। फिर भी टाइम ने न केवल उन्हें अपने कवर पर रखा बल्कि उन्हें "भूरे रंग वाला अर्ध-नग्न व्यक्ति बताया जिसका विश्व इतिहास पर प्रभाव निस्संदेह सभी का सबसे बड़ा होगा"। 

प्रधानमंत्री मोदी से सवाल है कि क्या विश्व इतिहास में गांधी के महत्त्व के बारे में लिखने से पहले टाइम के संपादकों ने कोई फिल्म देखी थी? नहीं, गांधी ने नमक बनाने के लिए भारतीयों पर लगाए प्रतिबंध को तोड़ दिया था, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिल गई थी। इससे गांधी के और भारत की आजादी के लिए जारी संघर्ष को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक सराहना हई थी। 

मार्टिन लूथर किंग पर प्रभाव 

जब मार्टिन लूथर किंग को 11 दिसंबर 1964 को शांति के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया, तो नोबेल समिति ने स्वीकार किया कि मार्टिन ने गांधी के अहिंसा दर्शन का पालन किया है। गांधी के जीवन की वास्तविकता, और मानवता के लिए स्वतंत्रता और स्वतंत्रता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने संयुक्त राज्य अमेरिका में नस्लीय समानता के लिए संघर्ष करने वालों को भी प्रेरित किया था।

पुरस्कार स्वीकार करने के क्रम में दिए गए भाषण में, मार्टिन ने कहा कि नस्लीय अन्याय का समाधान चर्चा, उचित समझौता और सताए जाने के एवं मरने के लिए तैयार रहने के जरिए ही पाया जा सकता है। उस संदर्भ में, उन्होंने गांधी का आह्वान करते हुए कहा, “नस्लीय अन्याय की समस्या के लिए यह दृष्टिकोण सफल उदाहरण के बिना बिल्कुल नहीं है। इसका उपयोग मोहनदास करमचंद गांधी ने ब्रिटिश साम्राज्य की ताकत को चुनौती देने और सदियों से कायम उनके राजनीतिक वर्चस्व और आर्थिक शोषण से अपने लोगों को मुक्त करने का काम शानदार ढंग से किया। उन्होंने केवल सत्य, आत्मबल, बिना नुकसान वाले और साहस के हथियारों के साथ संघर्ष किया था।”

स्वयं गांधी ने और उनके जीवन-कर्म ने ही इन शब्दों को प्रेरित किया है, इसमें किसी बायो-पिक का कोई योगदान नहीं है। 

नॉर्मन बोरलॉग ने गांधी का उदाहरण दिया

जब महान कृषि वैज्ञानिक नॉर्मन बोरलॉग को 1970 में हरित क्रांति का नेतृत्व करने, और भूख और गरीबी से लड़ने के लिए दुनिया को आशा-उम्मीद बंधाने के लिए नोबेल पुरस्कार मिला, तो उन्होंने पुरस्कार स्वीकार करने के उपरांत दिए गए भाषण में गांधी का हवाला दिया। ऐसी बात नहीं कि वे किसी फिल्म देखने के बाद गांधी पर कोई नजरिया दे रहे थे। नॉर्मन ने हरित क्रांति की उपलब्धियों पर बात करते हुए कहा, 'बुद्धिमत्ता और श्रम के बीच अलगाव अब समाप्त हो रहा है, जिसे आज से 40 साल पहले महान भारतीय नेता महात्मा गांधी ने भारत की कृषि के आधार समझा था।”

जर्मनी की ग्रीन पार्टी

गांधी के विचार-दर्शन का अनुसरण करते हुए भारत के बाहर जर्मनी में 1980 में ग्रीन पार्टी की स्थापना गई थी। यह वाकया रिचर्ड एटनबरो की अपनी फिल्म बनाने से दो साल पहले का है। ग्रीन पार्टी के संस्थापकों में से एक पेट्रा करिन केली (Petra Karin Kelly) ने लिखा है कि इसका उद्देश्य गांधी के इस विश्वास से आया है कि संसाधनों और ऊर्जा के निरंतर दोहन-विनियोजन पर निर्भर उत्पादन प्रक्रिया का अंततः परिणाम हिंसा ही होगा। केली ने कहा कि उत्पादन का पारिस्थितिक रूप से अच्छा साधन हिंसा को कम करेगा, यहाँ तक कि समाप्त भी करेगा। यह निष्कर्ष भी गांधी के अहिंसक दृष्टिकोण और उनके कार्यों की समझ से निकला है।

गांधी अब भी हमसे बात करते हैं

गांधी ने अपनी हत्या से पहले कहा था कि अगर वे वास्तव में अहिंसा के प्रति वफादार हैं, तो वे अपनी कब्र से भी बोलते रहेंगे। निश्चित रूप से, गांधी अभी भी भारत और दुनिया को सत्य और अहिंसा की याद दिलाने और शांति, सद्भाव स्थापित करने और सतत विकास का अनुसरण करने के लिए हमसे बात करते हैं। जब गांधी को बदनाम किया जाता है और उनके हत्यारे का महिमामंडन उनकी पार्टी का समर्थन करने वाले करते हैं तो प्रधानमंत्री मोदी चुप रहते हैं। अब, वे कहते हैं कि एटनबरो की फिल्म से पहले गांधी पर बनी एक फिल्म उनके संदेशों को दूर-दूर तक फैलातीं। यह दावा सच्चाई से बहुत दूर है, क्योंकि गांधी सत्य और अहिंसा के प्रति संलग्न थे और उनके लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था। वे आज अपने समय की तुलना में कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। 

भारत के वर्तमान नेतृत्व को गांधी के संदेश के अनुरूप चलना होगा, जिसके महत्त्व ने समय की सारणि को भी मात दे दिया है। 

लेखक पूर्व राष्ट्रपति केआर नारायणन के विशेष कार्य अधिकारी और प्रेस सचिव थे। 

अंग्रेजी में मूल रूप से लिखे गए लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Prime Minister Got it Wrong: No Biopic on Gandhi is a Match to his Life

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