NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
प्राइवेट टेलीकॉम कंपनियां 1.47 लाख करोड़ नहीं चुकाएंगी तो बोझ आम आदमी पर पड़ेगा
ख़तरा यही है कि हो सकता है कि आइडिया-वोडाफोन डूब जाए, ऐसे में टेलीकॉम के बाजार में केवल दो कपंनियां बचेंगी। जियो और एयरटेल। इसमें जियो की हैसियत इतनी बड़ी है कि यह कम्पनी डाटा और वॉइस सर्विस की दुनिया में जमकर मनमानी करेगी।
अजय कुमार
18 Feb 2020
Telecom
Image courtesy: Social Media

14 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश जारी करते हुए डिपार्टमेंट ऑफ़ टेलीकम्युनिकेशन को फटकार लगाई। फटकारने की वजह यह थी कि डिपार्टमेंट ऑफ़ टेलीकम्युनिकेशन ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ जाकर प्राइवेट टेलीकॉम के पक्ष में नोटिफिकेशन जारी किया था।

अक्टूबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि 23 जनवरी से पहले टेलीकॉम कंपनियां सरकार को अपना बकाया 1. 47 लाख करोड़ की राशि भुगतान कर दें। इस फैसले के खिलाफ डिपार्टमेंट ऑफ़ टेलीकम्युनिकेशन के अफसरों ने यह नोटिफिकेशन जारी किया कि अगर प्राइवेट टेलीकॉम कंपनियां अपना बकाया न चुका पाएं तो उन्हें परेशान न किया जाए।

शीर्ष अदालत ने शुक्रवार को वोडाफोन आइडिया, भारती एयरटेल और टाटा टेलीसर्विसेज के शीर्ष अधिकारियों को चेतावनी दी कि 1.47 लाख करोड़ रुपए के एजीआर की अदायगी के न्यायिक आदेश पर अमल नहीं करने पर उनके खिलाफ अवमाना की कार्यवाही की जायेगी। साथ ही न्यायालय ने तल्ख टिप्पणी करते हुये सवाल किया था कि‘‘ क्या इस देश में कोई कानून नहीं बचा है।’’ अदालत ने कहा कि जब हम पहले ही टेलीकॉम कंपनियों को भुगतान का आदेश दे चुके हैं, तब कोई डेस्क ऑफिसर ऐसा आदेश कैसे जारी कर सकता है? हमें नहीं पता कि कौन माहौल बिगाड़ रहा है? क्या देश में कोई कानून ही नहीं बचा है? 

कोई अधिकारी कोर्ट के आदेश के खिलाफ जुर्रत कर सकता है तो सुप्रीम कोर्ट को बंद कर देना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी थी कि अगर इस अफसर ने एक घंटे के अंदर आदेश वापस नहीं लिया तो उसे जेल भेजा जा सकता है। कंपनियों ने एक पैसा भी नहीं चुकाया और आप सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर रोक चाहते हैं?

कोर्ट की अगली सुनवाई यानी 17 मार्च तक अगर बकाया वापस नहीं हुआ तो टेलीकॉम कंपनियों के सीईओ और मैनेजिंग डायरेक्टर को कोर्ट में पेश होना होगा।

इस बात को तकनीकी भाषा में कहा जाए तो सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि प्राइवेट टेलीकॉम कंपनियां अपने एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (एजीआर) से सरकार को उसकी हिस्सेदारी जल्दी से भुगतान कर दे। एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू में लाइसेंस फी और स्पेक्ट्रम चार्ज के तौर पर यह सरकारी हिस्सेदारी तकरीबन 1.47 लाख करोड़ रुपये बैठती है।

कोर्ट की फटकार के बाद ही सरकार ने अपना नोटिफिकेशन वापस ले लिया। नया नोटिफिकेशन जारी करते हुए सरकार ने टेलीकॉम कंपनियों के प्रति सख्त रुख अपनाते हुए तुरंत बकाया रकम का भुगतान करने के निर्देश दिया। इस आदेश के बाद एयरटेल ने सोमवार को बताया कि उसने दूरसंचार विभाग को 10 हजार करोड़ रुपये की राशि चुका दी है। कंपनी ने कहा कि वह स्व:आकलन (सेल्फ असेसमेंट) के बाद शेष राशि का 17 मार्च तक भुगतान कर देगी। हालांकि वोडाफोन को राहत नहीं मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने 2500 करोड़ रुपये सोमवार को और शुक्रवार तक 1,000 करोड़ रुपये जमा करने का वोडाफोन का प्रस्ताव ठुकरा दिया। कोर्ट ने कंपनी के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं किए जाने से उसे राहत भी नहीं दी।

क्या है एजीआर ?

अब यह सवाल उठता है कि प्राइवेट टेलीकॉम कंपनियां इस भुगतान करने से कतरा क्यों रही हैं। ये समायोजित या समेकित सकल आय यानी एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (एजीआर) क्या होता है? कौन सी प्राइवेट टेलीकॉम कंपनियां इसका भुगतान कर पाएंगी और किसे इसका भुगतान करने में पसीने छूट जाएंगे? आगे की राह क्या होगी ?

जैसा कि नाम से पता चलता है कि कम्पनी की पूरी कमाई ग्रॉस रेवेन्यू कहलाती है। कंपनियों को टैक्स के अलावा ग्रॉस रेवेन्यू का एक हिस्सा लाइसेंस फी और स्पेक्ट्रम चार्ज के तौर पर सरकार को चुकाना पड़ता है। इसलिए कंपनियां सरकार को कितना भुगतान करेंगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि कंपनी की कमाई के तौर क्या शामिल किया जा रहा है? इस विवाद से जुड़ा सारा खेल यहीं पर शुरू होता है।  

कम्पनियां खाताबही में चालाकी करती हैं। ऐसा हथकंडे अपनाती है कि कम्पनी की कुल कमाई कम से कम दिखे। लेकिन सरकार ने भी इस चालाकी को भांप लिया और एडजेस्टड ग्रॉस रेवेन्यू की ऐसी परिभाषा बनाई, जिसमें अधिक से अधिक मदें शामिल हो पाए। जब यह हुआ तो कंपनियां टेलीकॉम ट्रिब्यूनल के पास गयी। ट्रिब्यूनल ने टेलीकॉम कपंनियों द्वारा दी गई परिभाषा को माना। लेकिन जब मामला सुप्रीम कोर्ट के पास पहुंचा तो सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि एजीआर को उसी परिभषा के तहत तय किया जाएगा, जिसे सरकार ने तय किया है। इसी फॉर्मूले आधार पर टेलीकॉम कंपनियों को पैसे देने होंगे। एजीआर तय करने का फार्मूला सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच अनुबंध की तरह है। प्राइवेट कंपनियां इस अनुबंध को तोड़ नहीं सकती हैं। उन्हें सरकार को बकाया 1.47 लाख करोड़ का भुगतान करना होगा।

टेलीकॉम क्षेत्र पर सालों से अपनी कलम चला रहे प्रबीर पुरकायस्थ इस मुद्दे पर कहते हैं कि टेलीकॉम कंपनियों ने अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मारी है। यह मामला 1998 से चलता आ रहा है। उस समय टेलीकॉम कंपनियों को अच्छी खासी कमाई हुआ करती थी। लेकिन तब भी टेलीकॉम कंपनियां अपने फायदों को अपने खातों में कम करके दिखाती थी। अगर इन्होंने सही तरीके से अपने फायदों को दिखाया होता तो आज इन पर इतना अधिक बोझ नहीं पड़ता। इन्होने बहुत अधिक हेर-फेर की है, इन्हें आज इसी का खामियाज़ा भुगतना पड़ रहा है।

जबकि जियो के आ जाने से अब स्थितियां भी पूरी तरह बदल चुकी हैं। अब जियो का बाजार बड़ा है, इसकी कमाई अधिक है लेकिन नई कम्पनी की होने की वजह से इसे केवल 195 करोड़ का भुगतान करना था। इस कंपनी ने इसका भुगतान कर भी दिया है। लेकिन भारती एयरटेल को 35,586 करोड़ और वोडाफोन-आइडिया पर 53,038 करोड़ का भुगतान करना है। एयरटेल ने 10,000 करोड़ का भुगतान कर दिया है। अब उसके ऊपर 25,586 करोड़ बकाया है। लेकिन वोडाफोन-आइडिया अब भी सरकार से राहत का इंतज़ार कर रही है।

देखने वाली बात यह होगी कि क्या यह भुगतान कर पाएंगी? ख़तरा यही है कि हो सकता है कि आइडिया-वोडाफोन डूब जाए, ऐसे में टेलीकॉम के बाजार में केवल दो कपंनियां बचेंगी। जियो और एयरटेल। इसमें जियों की हैसियत इतनी बड़ी है कि यह कम्पनी डाटा और वॉइस सर्विस की दुनिया में जमकर मनमानी करेगी।

यह जगजाहिर है कि टेलीकॉम सेक्टर का बैंकों पर कर्ज तकरीबन 7 लाख करोड़ है। इसका बहुत अधिक हिस्सा एनपीए में तब्दील हो जाता अगर सरकार इन कंपनियों को कर्ज से मुक्त नहीं करती। मौजूदा समय भी यही होने वाला है। अगर टेलीकॉम कंपनियां ने अपना बकाया भुगतान नहीं किया तो उनसे वसूल करने के और भी तरीके अपनाये जायेंगे। कंपनियां बंद होने के कगार पर पहुँचेंगी। बैंकों से लिए उनके कर्ज डूबेंगे अंत में नुकसान आम नागरिक को पहुंचेगा। साथ में इनके यहां काम करने वाले अचानक से बेरोजगार हो जायेंगे। कहने का मतलब है कि हमारा सिस्टम ऐसा है कि गलतियां करे प्राइवेट कपंनियां और भुगतता है आम आदमी। 

इसे भी देखे : प्राइवेट टेलीकॉम कंपनियां 1.47 लाख करोड़ का बकाया क्यों नहीं चुका पा रही हैं?

telecom sector
AGR
Supreme Court
BJP
RSS
Jio
Airtel
Vodafone

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

आर्य समाज द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र क़ानूनी मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 


बाकी खबरें

  • modi
    अनिल जैन
    खरी-खरी: मोदी बोलते वक्त भूल जाते हैं कि वे प्रधानमंत्री भी हैं!
    22 Feb 2022
    दरअसल प्रधानमंत्री के ये निम्न स्तरीय बयान एक तरह से उनकी बौखलाहट की झलक दिखा रहे हैं। उन्हें एहसास हो गया है कि पांचों राज्यों में जनता उनकी पार्टी को बुरी तरह नकार रही है।
  • Rajasthan
    सोनिया यादव
    राजस्थान: अलग कृषि बजट किसानों के संघर्ष की जीत है या फिर चुनावी हथियार?
    22 Feb 2022
    किसानों पर कर्ज़ का बढ़ता बोझ और उसकी वसूली के लिए बैंकों का नोटिस, जमीनों की नीलामी इस वक्त राज्य में एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। ऐसे में गहलोत सरकार 2023 केे विधानसभा चुनावों को देखते हुए कोई जोखिम…
  • up elections
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव, चौथा चरण: केंद्रीय मंत्री समेत दांव पर कई नेताओं की प्रतिष्ठा
    22 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश चुनाव के चौथे चरण में 624 प्रत्याशियों का भाग्य तय होगा, साथ ही भारतीय जनता पार्टी समेत समाजवादी पार्टी की प्रतिष्ठा भी दांव पर है। एक ओर जहां भाजपा अपना पुराना प्रदर्शन दोहराना चाहेगी,…
  • uttar pradesh
    एम.ओबैद
    यूपी चुनाव : योगी काल में नहीं थमा 'इलाज के अभाव में मौत' का सिलसिला
    22 Feb 2022
    पिछले साल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि "वर्तमान में प्रदेश में चिकित्सा सुविधा बेहद नाज़ुक और कमज़ोर है। यह आम दिनों में भी जनता की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त…
  • covid
    टी ललिता
    महामारी के मद्देनजर कामगार वर्ग की ज़रूरतों के अनुरूप शहरों की योजना में बदलाव की आवश्यकता  
    22 Feb 2022
    दूसरे कोविड-19 लहर के दौरान सरकार के कुप्रबंधन ने शहरी नियोजन की खामियों को उजागर करके रख दिया है, जिसने हमेशा ही श्रमिकों की जरूरतों की अनदेखी की है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License