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भारत
राजनीति
‘आत्मानिर्भरता’ के नाम पर सार्वजनिक उपक्रमों का हो रहा है निजीकरण
महामारी से हो रही तबाही को रोकने के बजाय, जिस महामारी से निपटने के लिए पूरे देश और जनता को कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है, मोदी सरकार ने इस समय को देश की सार्वजनिक संपत्ति को बेचने के लिए चुना है। नरेंद्र मोदी ख़ुद ही आत्मनिर्भरता की देशज नीति की कमर तोड़ रहे हैं।
डॉ सोमू
03 Aug 2020
Translated by महेश कुमार
आत्मानिर्भरता

12 मई को, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित किया था और भारतीय अर्थव्यवस्था में आत्मनिर्भरता की जरूरत पर ज़ोर दिया था। मिस्टर मोदी ने गुणवत्ता और घरेलू आपूर्ति श्रृंखलाओ को आगे बढ़ाने के लिए लोगों से "स्थानीय" वस्तुओं/उत्पाद को समर्थन करने का आग्रह किया था।

शायद मिस्टर मोदी के आत्मनिर्भरता के विचार को गलत नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि लगता तो ऐसा है जैसे कि वे स्वदेशी को अपनाने की बात कर रहे थे, वैश्वीकरण के खिलाफ बोल रहे थे, या फिर वे पंडित नेहरू द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र में लगाए के भारी उद्योग की "ऊंचाइयों को छूने वाले" दृष्टिकोण का समर्थन कर रहे थे। लेकिन वे ऐसा न करके इस अवसर का इस्तेमाल घरेलू और विशेष रूप से वैश्विक पूंजी के हितों की सेवा करने के लिए कर रहे थे।

अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध के मद्देनज़र मोदी की आत्मनिर्भरता की धारणा में एक बड़ी समस्या है क्योंकि उनका का उद्देश्य एमएनसी समर्थित अमेरिकी वैश्विक पूंजी की सहायता करना है जो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओ को चलाते हैं और चाहते हैं वे चीन [आर निर्भर न रहे। साहब के पास न तो घरेलू सार्वजनिक क्षेत्र में विनिर्माण और आर्थिक आधार को मजबूत करने का कोई समाधान है, और न ही देश में लाखों बेरोजगारों के लिए नौकरियों के निर्माण का ही कोई रास्ता है।

दो सौ साल के औपनिवेशिक शासन के बाद, अंग्रेज़ी हुकूमत ने भारतीय उद्योग को पूरी तरह से कुचल दिया था- जिसमें जूट, कपास और रेलवे केवल ऐसे स्थापित उद्योग थे जिनका यहां नाम लेना काफी होगा। भारत के औद्योगिक क्षेत्र ने राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 11.8 प्रतिशत का योगदान दिया था; लेकिन उनका उत्पादन और उत्पादकता बहुत कम थी। हम तकनीकी रूप से भी पिछड़े हुए थे। यह समझ बनी कि आर्थिक स्वतंत्रता के बिना महज राजनीतिक स्वतंत्रता बहुत काम नहीं कर पाएगी। इसलिए आज़ादी के बाद नेहरूवादी आत्मनिर्भरता के मॉडल को कमोबेश सात पंचवर्षीय योजनाओं तक जारी रखा गया था।

महालनोबिस मॉडल दूसरी पंचवर्षीय योजना में लागू हुआ था। जिसका ध्यान भारी उद्योगों पर था, विशेष रूप से वे जो पूंजीगत वस्तुओं (अन्य वस्तुओं के उत्पादन में उपयोग किए जाने वाले उपकरण या सामान) का उत्पादन करते थे। इस्पात, तेल, ऊर्जा, फार्मास्युटिकल, हाइडल पावर, सिंचाई और उर्वरक के लिए प्रमुख संयंत्र सार्वजनिक क्षेत्र में यूएसएसआर की मदद से लगाए गए थे। भारी उद्योग में तकनीकी सहायता प्रदान करने के लिए देश भर में कई राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान स्थापित किए गए।

आज़ादी की बेला पर अधिकांश निजी उद्यमियों के पास न तो दृष्टि थी और न ही लंबे समय तक मुख्य क्षेत्र के उद्योगों में भारी निवेश करने की क्षमता थी। 1945 की बॉम्बे योजना - जहाँ आठ प्रमुख उद्योगपतियों ने सार्वजनिक क्षेत्र में भारी उद्योग लगाने के लिए भारी सरकारी निवेश की माँग की थी- उन्होने नेहरूवादी आत्मनिर्भरता के मॉडल का सक्रिय समर्थन किया था। भारतीय पूँजीपतियों को एक संभावित राष्ट्रीय पूंजीपति बनने में मदद करने के लिए औद्योगिक नीति तैयार की गई थी, जो बाद के समय में भारी और पूँजीगत माल उद्योग में प्रवेश के लिए पर्याप्त रूप से मजबूत हो गई थी।

स्वतंत्रता के बाद के दशकों तक भारत रणनीतिक सार्वजनिक क्षेत्रों में लगाए गए भारी उद्योग की वजह से अधिकांश विकासशील देशों से आगे था। हालांकि, 1970 और 1980 के दशक तक, हम इन उद्योगों को तकनीकी रूप से आधुनिक बनाने में असफल रहे; जिसमें घरेलू भारी उद्योग की तकनीकी जरूरतों को पूरा करने और स्थानीय स्वास्थ्य और अन्य दबाव वाले सामाजिक मुद्दों को संबोधित करने के लिए अनुसंधान करने के लिए कोई स्पष्ट एजेंडा नहीं था। हमारे अधिकांश प्रसिद्ध राष्ट्रीय संस्थानों और आईआईटी ने प्रमुख पश्चिमी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जरूरतों के हिसाब से अनुसंधान किया। इन विश्वविद्यालय ने हजारों ऊंचे स्तर के योग्य इंजीनियरों और वैज्ञानिकों को पैदा किया जो अंतत अपने अंतिम गंतव्य स्थान अमेरिका जाकर बस गए।

निजी क्षेत्र ने भी घरेलू अनुसंधान, विकास और प्रौद्योगिकी पर बहुत कम ध्यान दिया है। कम उत्पादकता और उत्पादन में एकाधिकारवादी नियंत्रण के कारण, हम उपभोक्ता वस्तुओं में भी, उत्पादकता के मामले में दुनिया से काफी पीछे रह गए हैं। भिलाई या बोकारो या कोल इंडिया में बड़ी मात्रा में स्टील उत्पादन की सुविधाओं के बावजूद देश में बिजली, इलेक्ट्रॉनिक और अन्य सामानों, स्टील, ऊर्जा, उर्वरक की गंभीर कमी है।

नतीजतन, हम तीसरी तकनीकी क्रांति करने से चूक गए – जिसमें इलेक्ट्रॉनिक्स, माइक्रोप्रोसेसर, पर्सनल कंप्यूटर, और इस प्रकार की प्रमुख आपूर्ति श्रृंखला से अलग हो गए। सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग कम उत्पादकता, अधिक नौकरशाही, वित्तीय कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार के लिए बदनाम हो गए।

भारत के निजी क्षेत्र ने इस्पात और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सार्वजनिक क्षेत्र के भारी उद्योग को हिला कर रख दिया। 80 के दशक के मध्य तक, यह ताकतवर से ताकतवर होता गया और बड़ा क्षेत्र बन गया। इसने बड़ी रॉयल्टी अदा करके माल के निर्माण के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों से नवीनतम तकनीक हासिल करने के लिए सहयोग करना शुरू कर दिया था। 70 के दशक के मध्य में, पश्चिमी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने बुनियादी विज्ञान में आर एंड डी पर भारी निवेश करना शुरू कर दिया था और विनिर्माण क्षेत्र में वे अत्याधुनिक तकनीकों को विकसित करने में सफल रहे।

90 के दशक की शुरुआत में, भारत आईएमएफ और विश्व बैंक के गहन दबाव में नवउदारवादी धडे में शामिल हो गया, जो सक्रिय रूप से उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण पर आधारित था। वैश्विक वित्तीय संस्थानों की धमकियों को माना जाने लगा जिसके परिणामस्वरूप, आत्मनिर्भरता की अवधारणा को कडा रगड़ा लगा और यह समझा जाने लगा कि विनिर्माण का स्वदेशी रूप हानिकारक है, जबकि नई और उन्नत प्रौद्योगिकियों को कम लागत में कहीं से भी खरीदा जा सकता था। 80 के दशक की शुरुआत में, प्रमुख बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास आधुनिक तकनीक थी, और उन्होने दुनिया भर में माल के उत्पादन को नियंत्रित करना शुरू कर दिया था।

सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को लगातार कमज़ोर करना:

1991 में, नव-उदारवादी आर्थिक एजेंडे के तौर पर विनिवेश और निजीकरण का रास्ता चुना गया था, जिसके चलते सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के प्रति केंद्र सरकार की नीति में एक बड़ा बदलाव आया। इन सरकारी इज़ारों के उद्यमों ने अपने उस एकाधिकार को खो दिया, जिसके बारे में इन्हे अपने पर गुरूर था। सार्वजनिक क्षेत्र की तरक्की की आसमान छूती ऊंचाइयों ने बाजार अर्थव्यवस्था के लिए वातावरण तैयार किया। 21 वीं सदी की शुरुआत में इस क्षेत्र के प्रति राष्ट्र की सुरक्षा और बजट समर्थन कम होता गया, जिससे सार्वजनिक उद्यमों को अब प्रतिस्पर्धा और बाजार की शक्तियों के वर्चस्व का सामना करना पड़ा।

लाभ अर्जित करने की क्षमताओं (जिनका औसत वार्षिक कारोबार 25,000 करोड़ रुपये से अधिक का है, और पिछले तीन वर्षों में 5,000 करोड़ रुपये का लाभ कमाया है) सरकार ने ऐसे नौ केंद्रीय सार्वजनिक उद्यमों (बीएचईएल, बीपीसीएल, गेल, एचपीसीएल, आईओसी, एमटीएनएल, एनटीपीसी, ओएनजीसी, सेल) की पहचान की, 'नवरत्ना', और 45 'मिनीरत्ना' को स्वायत्तता प्रदान की है, और उन्हें संयुक्त उद्यमों में प्रवेश करने और अंतरराष्ट्रीय और घरेलू बाजारों से पूंजी जुटाने की अनुमति दे दी। नव-उदारवादी आर्थिक एजेंडे को लागू करने के मक़सद से औद्योगिक और वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड (बीआईएफआर) को बीमार उद्योगों की पहचान करने विनिवेश, बेचने या बंद करने के लिए बनाया गया था। 

निजीकरण या विनिवेश की प्रक्रिया पूर्व राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार के तहत एक फास्ट-ट्रैक पर थी जिसके सरदार वाजपेयी थे – उन्होने अरुण शौरी की अध्यक्षता में एक अलग विनिवेश मंत्रालय को भी स्थापित किया था। विनिवेश मंत्रालय - ने 1994 और 2005 के बीच – विदेश संस्कार निगम लिमिटेड, हिंदुस्तान जिंक, बाल्को, आईपीसीएल, कई आईटीडीसी होटलों का निजीकरण किया और मारुति ऑटोमोबाइल की बिक्री शुरू की थी। उस दौरान रणनीतिक बिक्री ने सरकार को केवल 6,344 करोड़ रुपए का सहारा दिया था।

पश्चिमी बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी बेहतर तकनीक पर इतराती थी और इसलिए उन्होने विकासशील देशों से रॉयल्टी और पेटेंट वित्त के रूप में बड़ा धन पैदा किया। उदाहरण के तौर पर, वोडाफोन-आइडिया और एयरटेल को उपग्रह 3जी सेवाओं का इस्तेमाल करने के एवज़ में दूरसंचार विभाग को क्रमशः 51,400  और 25,980 करोड़ रुपये शेष वार्षिक विकास राजस्व का भुगतान करना था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद, इन कंपनियों ने इस मोटी राशि का भुगतान करने से इनकार कर दिया, इस प्रकार हिंदुस्तान दूरसंचार और बीएसएनएल को दिवालिया घोषित कर दिया गया।

पिछले 14 से 15 वर्षों में, वर्तमान और पूर्व शासन के तहत, हमें लगभग 345 बिलियन डॉलर (लगभग 23 लाख करोड़ रुपये) का एफडीआई निवेश मिला है। इसी अवधि के दौरान बहुराष्ट्रीय कंपनियों को देश से बाहर जाने वाली विदेशी मुद्रा की मात्रा लगभग 287 बिलियन डॉलर (लगभग 19 लाख करोड़ रुपये) थी। और किसे ने नहीं बल्कि आरएसएस से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच के संयोजक डॉ॰ अश्वनी महाजन ने इसका खुलासा किया था। 

महारत्ना और नवरत्ना कंपनियों की वित्तीय स्थिति:

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, महारत्ना कंपनियों का संचालन और उत्पादकता का अनुपात सम्मानजनक रहा है, जो उनकी उच्च दक्षता की तरफ इशारा करता है – इनमें कोल इंडिया (0.51) का सबसे अधिक मूल्य है और इसके बाद ओएनजीसी  (0.23), गेल (0.13), भेल (0.12) और एनटीपीसी (0.11) है।

सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के बेहतर वित्तीय प्रदर्शन के बावजूद, वर्तमान एनडीए सरकार सक्रिय रूप से लाभकारी सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण करके अपने नवउदारवादी सुधारों को आगे बढ़ा रही है, जैसा कि उपरोक्त आंकड़ों अंदाज़ा लगाया जा सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान सरकार (जैसा कि पहले के शासन थे), सभी सार्वजनिक संपत्तियों के निजीकरण और उन्हें निजी कॉर्पोरेट घरानों को सौंपने पर आमादा है।

महामारी से निपटने के बजाय, तब जब देश की जनता इससे निपटने के लिए संघर्ष कर रही है, एनडीए सरकार ने सभी सार्वजनिक परिसंपत्तियों का बड़ी तेज़ी से विनिवेश करने का सबसे अच्छा समय चुना है। मोदी ‘आत्मानिर्भरता का जप करते हुए आत्मनिर्भरता की स्वदेशी नीति की ही कमर तोड़ रहे हैं और सक्रिय रूप से भारतीय पूंजीपतियों और वैश्विक साम्राज्यवाद के हितों की सेवा कर रहे हैं। वर्तमान नवउदारवादी सुधार एजेंडा रेलवे, कोयला और तेल जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों में विनिवेश से नहीं रुका है, बल्कि यह रेलवे, स्वास्थ्य, शिक्षा और अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों तक फैल चुका है।

मिस्टर मोदी की राजनीति वास्तव में लोगों को गुमराह करने की है, इसलिए वे समय-समय पर नए-नए मुद्दों का निर्माण करते है – जिसमें सांप्रदायिक तनाव पैदा करना, नागरिकता के हक़ पर विवाद खड़ा करना और राम मंदिर निर्माण कुछ ऐसे ही मुद्दे हैं। राष्ट्र की आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था को नष्ट करके, पीएम मोदी के नेतृत्व में तथाकथित राष्ट्रवादी भाजपा शासन के तहत साम्राज्यवादी लूट इसी तरह जारी है और जारी रहेगी।

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