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बाल विवाह विधेयक: ग़ैर-बराबरी जब एक आदर्श बन जाती है, क़ानून तब निरर्थक हो जाते हैं!
बाल विवाह के ख़िलाफ़ क़ानूनों की व्यर्थता पर भारतीय ग्रामीण महिलाओं का एक लेखा-जोखा।
सेजल पटेल, स्नेहा रिछारिया
08 Jan 2022
rasoi
रसोई में रोज़मर्रे का काम कर रहीं सीमा इवने। फ़ोटो: सेजल पटेल

माथे पर सिंदूर की मोटी लकीर और लाल साड़ी पहनी नवविवाहित 16 साल की एक लड़की इस सवाल से एकदम चौंक जाती है कि उसकी शादी कब हुई थी। इस सवाल का जवाब देते हुए वह इतना ही कह पाती हैं कि तब "मैं 10 साल की थी" और यह कहते हुए दूर भाग जाती है कि इन सवालों का बेहतर जवाब उसकी बहन दे सकती हैं। उसने अपना नाम बताने से इनकार करते हुए आगे कहा, "वह एक घंटे में वापस आ जायेगी; आप उससे पूछ सकते हैं।" यह मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ ज़िले की वह आदिवासी बस्ती (जिसे अंगरहा भी कहा जाता है) है, जहां हर दूसरे या तीसरे परिवार ने अपनी लड़कियों की शादी जल्दी कर दी है।

नीति आयोग के टास्क फ़ोर्स की सिफारिशों के आधार पर 16 दिसंबर, 2020 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने महिलाओं के लिए शादी की क़ानूनी उम्र 18 से बढ़ाकर 21 करने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी थी। 20 दिसंबर को बाल विवाह निषेध (संशोधन) विधेयक , 2021 को लोकसभा में पेश कर दिया गया था, जिसके बाद इसे एक स्थायी समिति के पास भेज दिया गया। इस विधेयक में कहा गया है कि बाल विवाह निषेध अधिनियम (PCMA), 2006 के होने के बावजूद "बाल विवाह की बेहद नुक़सानदेह प्रथा" जारी है। इसलिए, "इस सामाजिक समस्या से निपटने और सुधार लाने की तत्काल ज़रूरत है।" इसके अलावा, इस विधेयक में कहा गया है कि विवाह की उम्र से जुड़े तमाम  निजी धार्मिक क़ानून पुरुषों और महिलाओं के लिए विवाह की एक समान उम्र की बात नहीं करते हैं और महिलाओं को "शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा, मनोवैज्ञानिक सुरक्षा और कौशल को पाने के सिलसिले में एक नुक़सानदेह स्थिति में रखा गया है।"

हालांकि, इस बात की कल्पना कर पाना मुश्किल है कि यह फ़ैसला बाल विवाह को हतोत्साहित करने, महिलाओं की शिक्षा,ख़ासकर उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने, या आम तौर पर महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए किया गया था। यह एक जायज़ चिंता का विषय है कि विवाह की उम्र बढ़ा देने से बाल विवाह का प्रतिशत कम इसलिए नहीं होगा, क्योंकि कम उम्र में विवाह उन अहम सामाजिक-आर्थिक चिंताओं से कहीं ज़्यादा प्रेरित होते हैं, जिसमें कुछ सांस्कृतिक कारक भी शामिल होते हैं।

हालिया राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) की रिपोर्ट के मुताबिक़, 18 साल से कम उम्र में शादी करने वाली महिलाओं के अनुपात में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बड़ा अंतर है। बाल विवाह से निम्न मातृ और बाल स्वास्थ्य और महिलाओं की ख़राब सामाजिक स्थिति तय होती है। तक़रीबन 41% ऐसी महिलाओं वाले बिहार और पश्चिम बंगाल में कम उम्र में विवाह का प्रचलन सबसे ज़्यादा है। जहां ज़्यादा व्यापक रूप से सस्ती और उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा और बेहतर आर्थिक स्तर तक पहुंच में सुधार हुआ है, वहां महिलाओं की शादी की औसत आयु 18 से ज़्यादा है।

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता रिंकी तिवारी (35) कहती हैं, "एक बार जब एक लड़की सयानी (परिपक्व) हो जाती है, तो शादी से पहले संभावित गर्भधारण का जोखिम परिवारों को अपनी बेटियों की शादी जल्दी कर देने के लिए मजबूर कर देता है। ग़रीब मज़दूर ग्रामीणों में भाग जाने का डर भी लगातार बना रहता है।

मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार सहित मध्य भारत के कई हिस्सों में बाल विवाह की प्रथा प्रचलित है। बाल विवाह से जुड़े कुछ कारकों में शिक्षा की कमी, जातिगत भेदभाव, ग़रीबी और निम्न परिवार नियोजन शामिल हैं।

"बाल विवाह समाप्ति और किशोर सशक्तिकरण"(Ending child marriage and adolescent empowerment) शीर्षक वाली  2011 की यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक़, शिक्षा, रोज़गार, लैंगिकता, यौन व्यवहार, और दूसरे क्षेत्रों के सिलसिले में होने वाले फ़ैसलों से लड़कियों के साथ होने वाला भेदभाव बाल विवाह की ओर ले जाने वाली स्थितियों को पैदा करता है और उन स्थितियों को बनाये रखता है।   

तिवारी आगे बताती हैं, "अगर उनकी लड़कियां किसी के साथ भाग जायें, तो क्या होगा ? बच्चे स्कूल में कुछ नहीं सीखते हैं और उन्हें सिर्फ आगे की कक्षा में प्रमोट किया जाता रहता है। वे उसके बाद घर पर बैठ जाते हैं, और माता-पिता उन्हें पढ़ने के लिए बाहर भेजने का जोखिम नहीं उठा सकते।" वह आगे बताते हुए कहती हैं कि किस तरह गांव के लोग अक्सर अपनी छोटी उम्र की बेटियों की शादी बड़ी उम्र के पुरुषों के साथ कर देते हैं। दूल्हे का परिवार दुल्हन के लिए एक राशि (अक्सर लाख में) का भुगतान करता है, जिससे उन्हें परिवार के बाक़ी लोगों को खिलाने के लिए पैसे मिल जाते हैं। तिवारी कहती हैं, ''उन्हें दहेज के लिए पैसे देने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि दहेज की जगह उन्हें ही पैसे मिलते हैं।''

मीना उइके 16 साल की उम्र में रामकृष्ण उइके के साथ भाग गयी थीं। मीना उइके कहती हैं, "अगर मैं भागी नहीं होती, तो कोई अधेड़ उम्र का आदमी कुछ पैसे के बदले मुझसे शादी कर लेता।" यहां के लोगों ने यह भी कहा कि उच्च जाति के जिन पुरुषों की शादी में मुश्किलें पेश आती हैं, वे इस आदिवासी इलाक़े से नौजवान लड़कियों को ख़रीदकर शादियां कर लेते हैं। जबरन विवाह का यही डर मीना उइके जैसी महिलाओं को कम उम्र में भाग जाने के लिए प्रोत्साहित करता है।16 साल की उम्र में अपने माता-पिता के घर से भागी मीना उइके। फ़ोटो: सेजल पटेल

मध्यप्रदेश के सुखरास के बाहरी इलाक़े में स्थित एक दूसरी आदिवासी बस्ती (फोकटपुरा कहा जाता है) में सीमा इवने अपनी दो बेटियों सहित सात सदस्यों वाले अपने परिवार के साथ रहती हैं। वह 18 साल की हैं और उसकी शादी चार साल पहले दिहाड़ी मज़दूर राकेश इवने (25) से हुई थी। उनके माता-पिता टिमरनी तहसील के पास स्थित एक गांव लिमाचा में रहते हैं। अपने चूल्हे के पास बैठी और परिवार के लिए रात का खाना तैयार करते हुए यह नौजवान मां कहती हैं, "महंगाई के ज़माने में परिवार का भरण-पोषण कर पाना मुश्किल हो गया है; अगर हम लड़कियों की शादी कर देते हैं, तो पेट भरने के लिए एक मुंह तो कम हो जाता है।"

सीमा इवने के घर के पिछले हिस्से की फ़ोटो: सेजल पटेल

परिवार की मासिक आय तक़रीबन 1,500 रुपये है, क्योंकि राकेश इवने अब अकेले कमाने वाले सदस्य हैं। सीमा इवने को अपने पति को आर्थिक रूप से सहारा देने के लिए अपनी शुरुआती गर्भावस्था के दौरान काम करना पड़ा था और इसलिए दो गर्भपात का सामना भी करना पड़ा था।

"जब मुझे भर्ती कराया गया था, तो इन शुरुआती घंटों के दौरान अस्पताल के कर्मचारियों में से कोई भी मुझे देखने नहीं आया था।"

सीमा इवने की तीन ननदों में से एक उनकी 14 साल की ननद निशा इवने कभी स्कूल नहीं गयीं। तीनों,यानी निशा इवने, बानो इवने और आरती इवने जानती हैं कि सीमा इवने की शादी 14 साल की उम्र में हो गयी थी; कुछ ही समय में उनकी भी शादी हो सकती है।बानू इवनी कहती हैं, "हम सारा दिन घर पर बैठे रहते हैं। अब जब हम सयानी हो गयी हैं, तो हम काम पर नहीं जा सकतीं।" । सीमा इवने जुलाई 2021 में अपने पड़ोस में एक जघन्य अपराध को याद करती है, जहां खंडवा में एक निर्माण श्रमिक युवती का अपहरण करके उसे बेच दिया गया था। पुलिस की जांच में पता चला कि बच्ची के साथ दुष्कर्म किया गया और उसके शरीर को क्षत-विक्षत कर दिया गया था।

अपनी सहेली ख़ुशी के साथ निशा इवने (17)। फ़ोटो: सेजल पटेल

इस इलाक़े में काम करने वाले एक स्थानीय रिपोर्टर संजय दुबे कहते हैं, ''वो मामला भी पैसे लेके राफ़ा-दफ़ा हो गया। सलीता की उम्र इस समय 56 साल की है,लेकिन उनकी भी शादी 13 साल की उम्र में हो गयी थी और वह इस समय अपने पति विश्राम उइके के साथ रहती हैं।सलीता कहती हैं, "हमें हमेशा बाल विवाह के क़ानूनी नतीजों के बारे में बताया जाता है, लेकिन जब हमारी बेटियों का अपहरण हो जाता है, तब तो कोई नहीं आता है।"

मध्य प्रदेश में नाबालिग़ों के साथ बलात्कार के सबसे ज़्यादा मामले सामने आते रहे हैं,साल 2020 में भी 3,259 घटनाओं के साथ यह सिलसिला जारी रहा। न सिर्फ़ नाबालिग़ों के बलात्कार के मामले में आगे रहा, बल्कि एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक़ मध्य प्रदेश में नाबालिग़ों के ख़िलाफ़ अपराध की 17,008 घटनायें भी दर्ज की गयीं,जो कि इस अवधि के दौरान देश में सबसे ज़्यादा दर्ज घटनायें हैं। 17 साल की उम्र में सबसे ज़्यादा भ्रूणहत्या के मामले भी मध्यप्रदेश से ही दर्ज किये गये और राज्य में आदिवासी महिलाओं के सबसे ज़्यादा बलात्कार के मामले,यानी 339 मामले दर्ज किये गये।

43 साल से फोकटपुरा में रह रहीं सलिता उइके। फ़ोटो: सेजल पटेल

तिवारी के मुताबिक़, ग्रामीण इलाक़ों के लोग ऐसी जगह पर चले जाते हैं, जहां उन्हें फ़सल के दौरान काम मिल जाता है। वे एक या दो महीने के लिए मज़दूर के रूप में काम करने के लिए दिल्ली जैसे शहरों में भी चले जाते हैं। फिर वे साल के बाक़ी दिनों में छोटे-मोटे काम करते हैं। दिहाड़ी मज़दूरी करने वाली उषा आदिवासी पूछती हैं, "गर्भधारण करने में सक्षम हो जाने के बाद हम अपनी लड़कियों की हिफ़ाज़त कैसे करें ?" वह शादी को याद करते हुए कहती हैं कि उस समय "5 किलो गेहूं के आटे पर तक़रीबन 50 रुपये ख़र्च होते थे।"

वह भोपाल की रहने वाली हैं और उन्हें अपने जन्म की तारीख़ तक याद नहीं है। आंगनवाड़ी केंद्र में उमड़ी भीड़ से दूर जाने की कोशिश करते हुए उषा आदिवासी धीरे से कहती हैं, "जब हमारी शादी हुई थी, हम एमसी (महावारी) से नहीं होते थे।"

उषा आदिवासी और उनकी जैसी दूसरी महिलाओं की चिंतायें वाजिब हैं। क़ानून बनाने वालों को शादी की उम्र के बढ़ाये जाने के उस प्रतीकवाद से परे जाने की ज़रूरत है, जिसके बारे में उनका मानना है कि इससे युवतियों का और उत्पीड़न रुकेगा और उन्हें सुरक्षा मिलेगी।

मिट्टी या ईंट का चूल्हा,जिसका इस्तेमाल उषा आदिवासी रसोई गैस की बढ़ती क़ीमतों के चलते खाना पकाने के लिए करती हैं।

उषा आदिवासी ने कम उम्र में ही स्कूल जाना इसलिए छोड़ दिया था, क्योंकि शिक्षक ने उन्हें बुरी तरह पीटा था और वह याद करते हुए कहती हैं कि फिर कभी स्कूल जाने की उनकी हिम्मत ही नहीं हुई। इसलिए, उन्होंने हमेशा घर का काम किया और जल्दी शादी कर ली। वह आजीविका के लिए मूंगफली, आलू और रोड़े चुनती हैं। वह और उनके पति, मणि राम आदिवासी (32) मिलकर 7,000 रुपये से लेकर 8000 रुपये तक जुटा लेते हैं।

मणिराम आदिवासी कहते हैं, ''हम अपने बच्चों को खाना खिलाते हैं और इस आमदनी से हमें घर का बुनियादी सामान मिल जाता है।'' उनके दो बच्चे (आठ साल की एक लड़की और 10 साल का एक लड़का) हैं,  जो गांव के स्कूल में 5वीं कक्षा तक पढ़े थे, लेकिन शहर में आगे की पढ़ाई करने लायक़ नहीं रह गये थे। उषा आदिवासी कहती हैं, ''उन्हें अंक गिनना भी नहीं आता, फिर भी उन्हें 5वीं कक्षा तक पहुंचा दिया गया है।''

बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 में 18 साल से कम उम्र की लड़कियों और 21 वर्ष से कम उम्र के लड़कों के विवाह पर प्रतिबंध का प्रावधान है। इस तरह के विवाह को बढ़ावा देने या इजाज़त देने की सज़ा दो साल तक की क़ैद और 1 लाख रुपये तक का जुर्माना है। अनुमान है कि भारत में हर साल 18 साल से कम उम्र की कम से कम 15 लाख लड़कियों की शादी हो जाती है, जिससे भारत विश्व स्तर पर सबसे कम उम्र की दुल्हनों वाला देश बन गया है, जो कि वैश्विक स्तर पर होने वाली इस तरह की कुल शादियों का एक तिहाई है। 2011 की यूनिसेफ़ की रिपोर्ट के मुताबिक़, इस समय 15 से 19 साल की उम्र की तक़रीबन 16% किशोरियों की शादियां हो चुकी हैं।

टीकमगढ़ ज़िले के अंगराहा गांव में अपनी झोपड़ी के बाहर उषा आदिवासी। फ़ोटो: स्नेहा रिछारिया

हालांकि, गांव की एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता का कहना है कि यह सज़ा न तो व्यावहारिक है और न ही मुमकिन है, क्योंकि सामाजिक मानदंड स्वीकार्य व्यवहार के अलिखित नियम होते हैं। गांव की सीमांत आबादी क़ानूनों से अच्छी तरह वाकिफ़ नहीं है। इसके अलावा, बाल विवाह पर मौजूदा क़ानून उस तर्क और कानूनों की अनदेखी करता है,जिनका कि इन मानदंडों के साथ संघर्ष है और ऐसे में इसके लागू होने की संभावना भी नहीं होती है।

सेजल पटेल और स्नेहा रिछारिया जामिया मिलिया इस्लामिया में कन्वर्जेंट जर्नलिज़्म की छात्रा हैं। उनकी दिलचस्पी का क्षेत्र विकास आधारित ग्रामीण मुद्दे हैं। इनके व्यक्त विचार निजी हैं।

 अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

https://www.newsclick.in/prohibition-child-marriage-amendment-bill-2021-laws-futile%20When-disparity-norm

child marriage
prohibition of child marriage act
tribal village
Madhya Pradesh

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