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छद्म धर्मनिर्पेक्षता और धर्मनिर्पेक्ष संप्रदायवाद : कैसे उदारवादी और प्रगतिशील धारणा ने दक्षिणपंथ को बढ़ाया है
सशक्तिकरण, न्याय और समानता के उदारवादी-धर्मनिर्पेक्ष और वाम-प्रगतिशील विचार ने दक्षिणपंथ की तरक़्क़ी में योगदान दिया है।
अजय गुदावर्ती
23 Apr 2021
Translated by महेश कुमार
छद्म धर्मनिर्पेक्षता और धर्मनिर्पेक्ष संप्रदायवाद : कैसे उदारवादी और प्रगतिशील धारणा ने दक्षिणपंथ को बढ़ाया है

उदारवादियों और अन्य प्रगतिशील ताकतों पर अक्सर ‘छद्म धर्मनिर्पेक्षता’ का आरोप लगाया जाता रहा है, जिसका अर्थ है कि अल्पसंख्यकों का ‘तुष्टिकरण’ और बहुसंख्यकों का उत्पीड़न जबकि कानून के मुताबिक सबके साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए। हालाँकि, यह तथ्य अब जगजाहिर है कि धार्मिक अल्पसंख्यक, खासकर मुस्लिम समुदाय सामाजिक-आर्थिक पायदान काफी नीचे हैं और उनका किसी भी किस्म का तुष्टिकरण नहीं हुआ है और न ही किया गया है। इस बात को भी सुनिश्चित किया जा सकता है कि सोशल डेमोक्रेट्स और उदारवादियों ने कभी भी मुस्लिम समुदाय का उस तरह से ‘तुष्टिकरण’ नहीं किया है, जिसका कि पर उन पर आरोप है, लेकिन उन्होंने जो किया वह धर्मनिर्पेक्ष संप्रदायवाद था जिसने आम जन की लोकप्रिय चेतना में ‘छद्म धर्मनिर्पेक्षता’ की अपील को फलने-फूलने की जगह दे दी। 

जिस तरह से सशक्तीकरण, न्याय और समानता के  मुद्दों पर प्रमुख उदारवादी-धर्मनिर्पेक्ष और वाम-प्रगतिशील समझ को समय के साथ समझा गया, उसने दक्षिणपंथ की तरक्की में मदद करने का काम किया है। धर्मनिर्पेक्ष राजनीति की विसंगतियों और उसके छिछलेपन ने मुझे धर्मनिर्पेक्ष संप्रदायवाद के तर्क को पेश करने के लिए प्रेरित किया है। धर्मनिर्पेक्ष संप्रदायवाद ने बदले में, तुष्टिकरण के विचार को बढ़ाने में योगदान देता है। धर्मनिर्पेक्ष संप्रदायवाद के बारे में तर्क देने वाले और उसे अपनाने वाले इन समूहों में उदारवादी बुद्धिजीवी, संविधानवादी, वैश्विक औपनिवेशिक काल के बाद के स्कॉलर और नारीवादी, मुस्लिम और दलित-बहुजन और उनके विचार शामिल थे। इन सभी ने विभिन्न तरीकों से धर्मनिर्पेक्ष संप्रदायवाद को बढ़ाने और उसे मजबूत बनाने लंबे समय तक योगदान दिया, जो एक ऐसा विचार था सामाजिक समूहों को विभाजित करता था और उस विचार और प्रथाओं को बढ़ावा देता था जिन्हें अंततः दक्षिणपंथ ने आगे बढ़ाया या प्रचारित किया। 

अन्य हस्तक्षेपों के अलावा, औपनिवेशिक काल के बाद के हस्तक्षेप में ‘सबाल्टर्न स्टडीज’ ने ‘सबाल्टर्न के पंथ’ को बढ़ाने में योगदान दिया, जिसकी जांच ’बाहर’ से नहीं की जा सकती थी, जिसे काफी बेहतर तरीके संरक्षण मिला और सबसे खराब बात जो हुई कि इसे औपनिवेशवाद से भी खराब माना गया। जबकि सबाल्टर्न समुदायों के हर काम और विकल्प को 'सबाल्टर्न समुदायों की अभिव्यक्ति' को बढ़ाने, सबाल्टर्न जीवन और दुनिया के संदर्भ में उसे प्रतिष्ठित किया जाना था। यहां तक ​​कि सबआल्टर्निटी यानि मातहत समुदायों को भी प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए था और इसे केवल पीड़ित या भेद्यता के रूप में नहीं सोचा जाना था, ताकि सबाल्टर्न समुदाय सबसे प्रतिकूल स्थिति में भी विरोध कर सके, जबकि इसके उलट सबसे सहज दिखने वाले कार्यों में भी विनाश की राजनीति की गई थी। इस स्थिति ने जो योगदान दिया वह यह कि मातहत समुदायों के जीवन की गरिमा का विचार मजबूत हो गया, भले ही वास्तविकता जीवन में उनकी स्थिति बदतर हो या फिर तरक्की के ठोस अवसर सिकुड़ते जा रहे हो। वास्तव में, एक समय के बाद स्थिति ये हो गई कि ‘सबाल्टर्न पर चर्चा’ सबाल्टर्न मुक्ति की क्षतिपूर्ति बन गई थी। इसने ऐसे एक ऐसे हालात को गढ़ने में योगदान दिया, जहां मौखिक अभिकथन ज़मीनी हक़ीक़त से अलग हो गया था यानि इन समुदायों के बारे में कहा गया वह उनकी जमीनी हक़ीक़त से भिन्न था।

इसी तरह, उदार संस्थागत संस्थानों में दलित-बहुजन राजनीति जैसे कि विश्वविद्यालय, में उन्होने उदार संस्थानों खिलाफ मुखर होकर विरोध किया गया क्योंकि उन्हें ऐसा इसलिए करना पड़ा जैसे कि वे दिखाना चाहते हों कि वे भी समान हैं, जबकि वास्तविकता में सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्तर पर ये समुदाय बहुत कमजोर थे। स्थानीय विद्यालयों में पढ़े दलित-बहुजन समुदाय के उम्मीदवारों को न केवल उच्च शिक्षा प्राप्त उम्मीदवारों से प्रतिस्पर्धा करनी  पड़ती, बल्कि उन्हें ऐसे जताना पड़ता था, जैसे कि 'वे सभी मामलों में पहले से ही उनके समान थे। इस तरह के दावों ने शैक्षणिक क्षमता में विद्यमान असमानताओं की भरपाई में ठोस संस्थागत तंत्र का निर्माण नहीं किया बल्कि उनकी गरिमा को बहाल करने के लिए इस तरह के अंतर के अस्तित्व को ही नकार दिया गया।

इस तरह के विचार को नारीवादी विमर्श में भी देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए, वेश्यावृत्ति के मामले में, इसकी समाप्ति की मांग से चर्चा शुरू हुई थी, क्योंकि इसका मतलब महिलाओं के प्रति यौन हिंसा और उनका शोषण था, जिन्हे इस तरह के शोषित पेशे में आने के लिए गरीबी और अभाव की मौजूदा संरचनात्मक परिस्थितियों के कारण मजबूर होना पड़ा था, लेकिन यहां से इस मांग को बदल दिया गया और उन्हे सेक्स वर्कर के रूप में मान्यता देने, पेशे को कानूनी इजाज़त देने और इसे अपराधयुक्त बनाने की मांग की जाने लगी ताकि वे नियमित उत्पीड़न से बच सकें। यह शोषण के मुक़ाबले पसंद का मसला अधिक बन गया, जो विचार हिंसा से अधिक जायज कौशल और आदर का मामला बन गया था। वास्तव में, अप्रामाणिक तौर पर ही सही इसे हिंसा मानना मतलब इसका संरक्षण और पुरुष की टकटकी के रूप में देखा जाने लगा।    

अंत में, 'अभिव्यक्ति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' का उदार विचार इस विचार पर आधारित था कि कोई सत्य अंतिम सत्य नहीं है और उसका अर्थ केवल संदर्भात्मक है। इसने सापेक्षतावाद और मिथ्याकरण को जन्म दिया। नैतिक चिंताओं ने इस विचार के विश्लेषण का रास्ता साफ किया।

विभिन्न तरीकों से कोई भी ऐसे हस्तक्षेपों के मौजूदा तर्क से दक्षिणपंथ के उदय को जोड़ सकता है। दक्षिणपंथ भी आज काफी मुखरता से बोलता है और किसी भी इनकार को गरिमा के सवाल से जोड़ देता है। एक गौरवशाली प्राचीन अतीत और ’इंडिया फर्स्ट’ और ‘मेरा भारत महान’ के नारे की गरिमा के मामले में दक्षिणपंथ काफी मुखर हैं, जबकि समाज में मौजूद ठोस विसंगतियों और असमानताओं की ओर इशारा करना राष्ट्रीय गौरव पर हमले के रूप में देखा जाता है। आज जाति-आधारित व्यवसायों में मौजूद शोषण को व्यावसायिक शिक्षा और परंपरा के नाम पर उसका महिमामंडन किया जा रहा है। इस सब को नई शिक्षा नीति में वैध और आधुनिक बनाया जा रहा है। अंत में, सापेक्षतावाद और मिथ्याकरण के विचारों के सत्य और 'वैकल्पिक तथ्यों' में योगदान दिया जा रहा है। आज नैतिक लेंस के माध्यम से नकली समाचार को मनोरंजन के रूप में अधिक देखा जाता है। जब सबाल्टर्न समुदायों ने दक्षिणपंथ की तरफ रुख किया और सांप्रदायिकता से नाता जोड़ा तो हमारे पास गंभीर रूप से हस्तक्षेप करने के लिए राजनीतिक रूप से कोई वैध भाषा नहीं थी। इसने समुदायों की धारणा और प्रतिनिधित्व को अधिक तवज्जो दी जिसने तुष्टीकरण और छद्म धर्मनिर्पेक्षता के विचार को पुख्ता किया। अब हमें धर्मनिर्पेक्ष संप्रदायवाद को तिलांजली देने की जरूरत है और एक ऐसे तर्क और विचार को लाने की जरूरत है जिसे दक्षिणपंथ इतनी आसानी से हजम न कर सके। 

(अजय गुदावर्ती दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में राजनीतिक अध्ययन केंद्र के एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं। व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं।)

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Psuedo-Secularism and Secular Sectarianism: How Liberals and Progressives Contribute to Rise of the Right

Left Liberals
liberalism
Secularism
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Dalit Politics

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