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पुतिन रूस को संक्रमण काल में लेकर जा रहे हैं
यह पुतिन पर विश्वास का एक लेख है, कि रूस को अपने लिए एक मज़बूत राष्ट्रपति की दरकार बनी रहेगी। लेकिन रूस एक नए राजनीतिक युग में प्रवेश कर रहा है। और जब 2024 में उनका कार्यकाल समाप्त हो जायेगा, उस समय पुतिन राष्ट्रपति नहीं होंगे।
एम. के. भद्रकुमार
05 Feb 2020
पुतिन

निरंकुश शासकों के बारे में आम तौर पर यह मिथ्या धारणा बनी हुई है कि वे हमेशा से जनता की राय को अनसुना करते रहे हैं। लेकिन इसके ठीक विपरीत हम पाते हैं कि वो चाहे रूस के व्लादिमीर पुतिन हों, या तुर्की के रिसेप एर्दोगन, ये दोनों ही लोकतांत्रिक तौर पर चुने गए उन ‘लौह व्यक्तित्व’ वाली छवि वाले लोग जिनकी लोकप्रियता का स्तर इनके देशों में काफी ऊँचा बना हुआ है। लेकिन इस सबके बावजूद वे जनता की राय के प्रति बेहद सचेत रहते हैं। यह एक अजीब संयोग है कि जितना ही अधिक ये नेता अपना ‘अधिनायकवादी’ स्वरूप अख्तियार कर रहे हैं, सार्वजनिक तौर पर अपनी स्वीकृति को लेकर इनकी इच्छा उतनी ही बलवती होती जा रही है।

इसी की एक बानगी पिछले गुरुवार को पुतिन के एक असाधारण बयान में देखने को मिली, जब उन्होंने घोषणा की कि उनके द्वारा प्रस्तावित संवैधानिक संशोधनों पर अंतिम मुहर लगाने का काम उन्होंने रूस के मतदाताओं पर छोड़ दिया है, जिसकी उद्घोषणा उन्होंने 15 जनवरी के मास्को के अपने संघीय सभा के वार्षिक राष्ट्रपतिय अभिभाषण में की थी। अपने वक्तव्य में पुतिन ने कहा है कि "यह नितांत आवश्यक है कि लोग मतदान केंद्रों पर आयें और खुलकर अपनी बात की तस्दीक करें, कि उन्हें ये बदलाव चाहिए या नहीं। इस बारे में जनता की राय के बाद ही मैं यह तय करूँगा कि इस [कानून] पर हस्ताक्षर करूँ या न करूँ।

इसमें सबसे दिलचस्प बात यह है कि पुतिन ने उक्त टिप्पणी तब की है, जब ओपिनियन पोल के मामले में जानी- मानी लेवाडा सेंटर पोलर एक चौंकाने वाले खुलासे के साथ सामने आया है, जिसमें दर्शाया गया है कि मात्र 27 प्रतिशत रूसी चाहते हैं कि पुतिन 2024 से आगे भी राष्ट्रपति के पद पर बने रहें। जबकि 25% लोगों का कहना है कि वे चाहते हैं कि पुतिन अपनी निजी जिन्दगी में वापस लौट जाएँ या कहें कि उन्हें सार्वजनिक जीवन से अवकाश ले लेना चाहिए। प्रतिक्रिया देने वालों में 7% लोग तो ऐसे भी थे, जिनका कहना था कि वे किसी भी सूरत में उन्हें सार्वजनिक जीवन में देखना पसंद नहीं करते हैं! 

यहाँ पर बात कुछ पल्ले नहीं पड़ती, क्या ऐसा नहीं लगता? आखिरकार, इस बार जो संवैधानिक परिवर्तन पुतिन द्वारा प्रस्तावित किये गए हैं वे वास्तव में जोड़-तोड़ की राजनीति की ओर ले जाने वाले कत्तई नहीं हैं। बल्कि ये प्रस्ताव वास्तव में देश में बदलाव की हवा के संकेत देते हैं, जहाँ पर जनता की मनोदशा थकान वाली हो चुकी थी और वह "बदलाव" के प्रति उत्सुक है।

मजेदार तथ्य यह है कि पुतिन ने खुद इस बात को स्वीकार किया है: “हमारा समाज साफ़ तौर पर बदलाव का आह्वान कर रहा है। लोगों को विकास चाहिए......। परिवर्तन की गति में हर साल तेजी आनी चाहिए और योग्य जीवन स्तर प्राप्त करने लायक परिणाम दिखने में आना चाहिए, जिसे लोग साफ़ साफ़ महसूस कर सकें। और मैं एक बार फिर से अपनी बात को दोहराता हूँ कि इस सारी प्रक्रिया में उनकी सक्रिय भागेदारी आवश्यक तौर पर होनी ही चाहिए।“ 

रूसी राजनीति पर लम्बे समय से यदि कोई पर्यवेक्षक निगाह बनाए हुए हो तो उसने ध्यान दिया होगा कि पुतिन ने जिस ओर ध्यानाकर्षण की कोशिश की है, उसने पहले से ही रूस के सार्वजनिक जीवन में चल रही इस मनोदशा को भांप लिया होगा। (इस संबंध में मेरे ब्लॉग पर देखें Putin’s Russia twenty years on- बीस साल में पुतिन का रूस) लेकिन पश्चिमी देशों में पुतिन के इस प्रस्तावित रूसी संवैधानिक सुधार को लेकर संदेह के बादल छाए हुए हैं, उन्हें समझ नहीं आ रहा कि रुसी नेता का इसके पीछे क्या उद्येश्य हो सकता है।

आज के दिन भी रूसी समाज में सरकार के ऊपर ही इस बात का भरोसा बना हुआ है कि वही मुख्य तौर पर सामाजिक-आर्थिक बदलावों की मुख्य चालक शक्ति है। लेकिन लोग चाहते हैं कि सरकार अपना काम-धाम कहीं बेहतर दक्षता से करे। रुसी समाज की उम्मीदें सरकार की सीमाओं को लाँघ रही हैं, इस बात को पुतिन समझ रहे हैं। 

15 जनवरी दिए गए पुतिन के संबोधन भाषण में पूरा जोर आर्थिक क्षेत्र में नीतियों को एक बार फिर से दुरुस्त करने को लेकर था। यह इस बात की सूचक है कि इसने “रुसी किलेबंदी” से किनारा कर अर्थव्यवस्था, विकास और सामाजिक मुद्दों की ओर कदम बढ़ाने का मन बना लिया है।

भूमंडलीय-राजनीति से ध्यान हटाकर रूस के अंदर ध्यान दे पाना आज जो संभव हो पाया है, उसके पीछे मुख्य वजह यह है कि समग्रता में रूस की हैसियत में इजाफ़ा हुआ है और पश्चिमी अतिक्रमण को पीछे धकेलने की उसकी क्षमता को इसका श्रेय देना होगा। आज के दिन ऐसी कई वजहें हैं जो रूस के पक्ष में काम आ रही हैं, जैसे कि राष्ट्रपति ट्रम्प की अगुआई में ट्रांस-अटलांटिक गठबंधन का कमजोर होते जाना, यूरोपीय संघ की हैसियत में गिरावट और यूरोपीय देशों में रूस के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने की बढ़ती इच्छा, सापेक्ष तौर पर अमेरिका का पराभव,  रूसी सशस्त्र सेना का सफलतापूर्वक आधुनिकीकरण को अंजाम देने का कार्य, चीन-रूसी देशों का अर्ध-गठबंधन के तौर पर उभरना आदि शामिल हैं। और इन सबमें जो सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है वह यह कि तेजी से बढ़ रहे विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति जो 500 बिलियन डॉलर से भी अधिक पहुँच चुकी है, और जो पश्चिमी प्रतिबंधों के लिए इस “रुसी किलेबंदी” को भेद पाना असंभव बना देता है।

और यही वजह है कि यूक्रेन के मामले में रुसी नीति बेहद आरामदायक स्थिति में दिखाई दे रही है, जैसा कि यह पहले से ही पश्चिम के साथ चल रहे भू-राजनीतिक तनावों में पुतिन के समग्र मध्यस्तता के केंद्र के रूप में परिलक्षित हो रहा है। खासकर यूक्रेन से वार्ता के लिए अबतक नियुक्त किये गए रुसी विशेष प्रतिनिधि व्लादिस्लाव सुर्खोव की विदाई कर दी गई है, और उनकी जगह पर डील पक्की कराने के रूप में विख्यात दिमित्री कोज़ाक की नियुक्ति इस बात को दर्शाती है कि समझौते के लिए कितनी उत्सकता रूस में है।

आइए एक बार फिर से पुतिन के उन 3 प्रमुख सुधार के प्रस्तावों पर विचार करते हैं: राष्ट्रपति के कार्यकाल को अधिकतम दो बार तक के लिए सीमित करने का,  प्रधानमंत्री और कैबिनेट की नियुक्ति को लेकर राष्ट्रपति के विशेषाधिकार का हस्तांतरण ड्यूमा (संसद) के हाथ में देना; और दोहरी नागरिकता रखने वाले रुसी नागरिकों को सार्वजनिक पदों पर काबिज होने से रोकने का प्रस्ताव। मूल रूप में ये सभी प्रस्ताव राज्य शक्ति में पुनर्संतुलन लाने वाले साबित हो सकते हैं, जिसमें राष्ट्रपति की शक्तियों पर अंकुश लगाने और संसद को पहले से कहीं अधिक सशक्त बनाने, और क्रेमलिन में अमेरिकी समर्थित किसी छद्म व्यक्ति को बिठा देने की संभावना को पूरी तरह से खत्म कर देने से जुड़ी हैं। 

पुतिन को उम्मीद है कि रुसी शासन प्रणाली में इस प्रकार के चेक और बैलेंस को स्थापित करने के ज़रिये, जो महान काम उन्होंने रूस को नए सिरे से निर्मित करने में झोंका है उसे अक्षुण रखा जा सकेगा। इन क़दमों से जो संदेश आ रहे हैं, वो ये हैं कि बिना किसी शक के पुतिन सत्ता छोड़ना चाहते हैं, या कम से कम इस बारे में विचार-मंथन कर रहे हैं।

15 जनवरी के भाषण ने संविधान में आर्थिक सुधारों को, संघीय सरकार की शक्तियों को विकेंद्रीकृत करने के काम को, और स्वतंत्र न्यायपालिका के लिए कानूनी तौर पर एक सुरक्षित आग का घेरा निर्मित करने आदि, जैसे कामों को सुनिश्चित करने का काम किया है। ये वे क़ानूनी अवरोधक और सुरक्षा उपाय हैं, जिससे कि यह सुनिश्चित किया जा सके कि रूस फिर कभी एक विफल राज्य की तरफ खिसक कर न पहुँच जाए, जैसा कि बोरिस येल्तसिन के शासनकाल में देखने को मिल चुका है। 

इसके साथ ही पुतिन ने रूस के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवा, सभी स्कूली बच्चों के लिए मुफ्त (गर्मागर्म) भोजन की व्यवस्था, देश के सभी नागरिकों के लिए इंटरनेट तक पहुँच की सुविधा सहित ढेर सारे उपायों का विजन पेश किया है। ऐसा लग रहा है जैसे पुतिन अपनी विरासत को हर प्रकार से सहेज कर रखना चाहते हों।

पुतिन के इन प्रेरणादायक प्रयासों को उनके खुद के अधिकाधिक राजनीतिक केंद्रीकरण की पृष्ठभूमि में देखे जाने की आवश्यकता है। नब्बे के दशक की शुरुआत में एक क्षणभंगुर क्षण तब देखने को मिला था, जब "सोवियत युग की समाप्ति" के समय ऐसा लगा कि रूस अपने लोकतांत्रीकरण की ओर बढ़ रहा था, जो कि 1993 की शरद ऋतु तक था। उसी दौरान संसद में अपने विरोधियों को कुचलने के लिए येल्तसिन ने टैंक उतार डाले थे, जिसने वर्तमान में जारी संविधान के मार्ग को प्रशस्त किया था, जो रूस को अधिनायकवाद के रास्ते पर ले चला।

पुतिन द्वारा प्रस्तावित सुधार, रूसी राष्ट्रपति पद की निर्बाध शक्तियों को हटाने का काम करते हैं, और एक ऐसा ढांचा तैयार करने की कोशिश करते हैं जो व्यवस्था में एक बेहतर जाँच-परख और संतुलन बनाए रखने पर ज़ोर देता है।

तो पुतिन के ठीक-ठीक इरादे क्या हैं? हाल ही में पुतिन ने किसी भी उत्तराधिकारी के ऊपर एक पर्यवेक्षक की भूमिका के विचार को ही सिरे से ख़ारिज कर दिया है। उनका कहना है कि वे सत्ता में बने रहने के इच्छुक नहीं हैं और जिस प्रकार से सिंगापुर के ली कुआन यू ने नब्बे के दशक में किया था, उस प्रकार से वे रूस के “संरक्षक” के रूप में बने रहना नहीं चाहते। 

ऐसा प्रतीत होता है कि पुतिन 2024 में अपने एक योग्य उत्तराधिकारी के मार्ग को प्रशस्त कर रहे हैं। वे इन 4 सालों की संक्रमणकालीन अवधि के दौरान पहले से ही चुने हुए उत्तराधिकारी को परीक्षण के तौर पर रख कर देखना चाहते हैं, जिससे कि यह सुनिश्चित हो सके कि जो रास्ता अख्तियार किया गया है, वह कहीं उसे बदलने का प्रयास न करे और कहीं राष्ट्रीय स्वतंत्रता, राज्य नियंत्रणवाद और रुसी रुढ़िवादी विचारधारा के मूल सिद्धांतों को उधेड़ कर न रख दे।

वास्तव में देखें तो यह एक जटिल विरासत भी है। जैसा कि एक विश्लेषक ने इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया है “किसी भी देश ने शुरुआत ऐसी नहीं की कि जिसमें उसे 23 धनाढ्य घरानों के साथ अपनी यात्रा की शुरुआत करनी पड़े, जिनके हाथ में देश की सभी विशालकाय उद्योगों की मिल्कियत हो… जबकि दूसरी ओर अधिकांश आबादी बेहद गरीबी में अपना निर्वाह कर रही हो। ऐसी परिस्थिति में, किसी तरह से एक बेहद निचले क्रम के अज्ञात केजीबी अधिकारी को यह पता लगाना था कि इस विशाल भू-भाग को एक संपन्न देश में कैसे बदल दिया जाए, जिसे दुनिया भर में सम्मान की निगाह से देखा जाए। लेकिन देखिये, इसे बीस वर्षों में संपन्न कर लिया गया है।”

और इस पूरी प्रक्रिया में पुतिन समूची रुसी राजनीतिक प्रणाली के धुरी के रूप में बने रहे हैं। यह पुतिन पर भरोसे का एक लेख है कि रूस को अपने लिए एक मजबूत राष्ट्रपति की दरकार बनी रहेगी। लेकिन रूस एक नए राजनीतिक युग में प्रवेश कर रहा है। और जब 2024 में उनका कार्यकाल समाप्त हो जायेगा, तो उस समय पुतिन राष्ट्रपति के रूप में नहीं होंगे।

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