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रिलायंस जियो में विदेशी निवेश: एक सुरक्षा चिंता ?
अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों के बीच रिलायंस जियो में हिस्सेदारी की बिक्री में तेज़ी आयी है। इन विदेशी निवेशों की अनुमति देते समय सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं का हल किया है या नहीं, इससे संबंधित प्रश्न अनुत्तरित हैं। यह भारत के सबसे बड़े निजी कॉर्पोरेट समूह पर लेखों की श्रृंखला की चौथी कड़ी है।
अबीर दासगुप्ता, परंजॉय गुहा ठाकुरता
19 Jun 2020
JIO

मुंबई/नई दिल्ली: दो महीने पहले, 18 अप्रैल को भारत सरकार ने चीनी निवेशकों द्वारा भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के आने पर प्रतिबंध लगा दिया।

जनवरी से मार्च के बीच 3,000 करोड़ रुपये के 1.75 करोड़ शेयरों (एचडीएफ़सी की कुल इक्विटी पूंजी का 1% पिपल्स बैंक ऑफ चाइना (चीन का केंद्रीय बैंक) का प्रतिनिधित्व करता है) की हिस्सेदारी की बिक्री को लेकर चिंता जतायी गयी थी। इसके लिए सरकार ने उन देशों में स्थित कंपनियों की आवश्यकता के लेकर "स्वचालित रूट" के ज़रिये प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को नियंत्रित करने वाले नियमों को संशोधित कर दिया है, जिनकी भू-सीमायें भारत के साथ लगती हैं, ताकि उनके निवेश के लिए सरकार की पूर्व मंजूरी को सुरक्षित किया जा सके। यह निर्णय COVID-19 महामारी के कारण पैदा हुए मौजूदा आर्थिक संकट के दौरान भारतीय कंपनियों के "अवसरवादी अधिग्रहण / कब्ज़ा किये जाने" पर अंकुश लगाने के लिए किया गया था। चीन का नाम लिए बिना, की गयी इस पहल के पीछे के सरकारी इरादे स्पष्ट थे। दरअस्ल यह क़दम चीन को ध्यान में रखकर ही उठाया गया है।

 ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि क्या सरकार दुनिया के अन्य हिस्सों से आ रहे निवेश, ख़ास तौर पर दूरसंचार में हो रहे उन निवेशों पर पर इसी तरह की नज़र रख रही है, जिसका राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं पर असर पड़ सकता है ?

पिछले तीन महीनों में देश के सबसे बड़े दूरसंचार नेटवर्क और इंटरनेट डेटा सेवा प्रदाता, रिलायंस जियो, ने विदेशी निवेशकों के लिए अपनी पांचवीं हिस्सेदारी बेची है, जिन निवेशकों में अमेरिका की निजी कंपनियों से लेकर अबू धाबी और सऊदी अरब की संप्रभु धन निधि तक शामिल हैं। हालांकि इन निवेशों के संभावित सुरक्षा निहितार्थों को लेकर चिंतायें तो पैदा होती हैं, मगर भारत सरकार ने इसे लेकर किसी तरह का कोई क़दम नहीं उठाया है।

रिलायंस जियो देश की सबसे बड़ी निजी कॉर्पोरेट इकाई,रिलायंस इंडस्ट्रिज़ लिमिटेड (RIL) का ही एक हिस्सा है। घोषणा की गयी है कि रिलायंस जियो को संयुक्त राज्य अमेरिका और पश्चिम एशिया स्थित कंपनियों से 11 बड़े निवेश प्राप्त होंगे।

पिछले तीन महीनों में लगभग 1.1 लाख करोड़ रुपये या भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 0.5% से अधिक के निवेश के इरादे घोषित किये गये हैं, जबकि इन्हीं तीन महीनों में देश कोविड-19 महामारी के चलते लॉकडाउन के विभिन्न चरणों में रहा है। सबसे बड़ा निवेश अमेरिका स्थित सोशल मीडिया और डिजिटल एकाधिकार वाली कंपनी फ़ेसबुक की तरफ़ से किया गया है,जो दुनिया के सबसे बड़े निगमों में से एक है।

 जियो प्लेटफ़ॉर्म में अंतर्राष्ट्रीय निवेश

अप्रैल के बाद रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड की एक सहायक कंपनी, जियो प्लेटफ़ॉर्म्स लिमिटेड अपनी हिस्सेदारी की बिक्री के ज़रिये फ़ंड जुटाने की होड़ में लगी हुई है। अब तक घोषित किये गये 11 निवेश सौदों में कंपनी ने अपनी स्वामित्व की हिस्सेदारी का पांचवां हिस्सा बेचकर लगभग 1.1 लाख करोड़ रुपये जुटाये हैं।

 जियो प्लेटफ़ॉर्म्स, रिलायंस जियो इनफ़ोकॉम लिमिटेड सहित रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड की विभिन्न डिजिटल और दूरसंचार कंपनियों की मूल कंपनी है। रिलायंस जियो की इंटरनेट, मोबाइल, डेटा और टेलीविज़न सेवाओं और जियो सावन,जियो सिनेमा और हैप्टिक सहित अन्य कंपनियों के पीछे की ताक़त यही जियो प्लेटफ़ॉर्म है।

नीचे दी गयी तालिका में जियो प्लेटफ़ॉर्म्स के उन निवेशों की सूची दी गयी है,जो पिछले कुछ हफ़्तों में घोषित किये गये हैं। फ़ेसबुक इंक, अमेरिकी सोशल मीडिया दिग्गज कंपनियों के अलावा, बाक़ी अमेरिकी निवेशक प्रौद्योगिकी-केंद्रित निजी इक्विटी फ़ंडों का एक समूह रहे हैं, जो आम तौर पर सॉफ़्टवेयर और तकनीकी स्टार्ट-अप्स में निवेश करती हैं, जबकि तीन अन्य निवेशक कंपनियां, जो उच्च गुणवत्ता और ग़ैर-मामूली क्षमता वाली कंपनियां हैं, वे अबू धाबी और सऊदी अरब से बाहर से संचालित होने वाली संप्रभु नियंत्रित निवेश कोष कंपनियां हैं।

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पिछले लेख में हमने कंपनी की वित्तीय शक्ति के आधार पर जियो प्लेटफ़ॉर्म के मूल्यांकन को लेकर उठाये गये सवालों का पता लगाया था। इस लेख के लेखकों से बात करते हुए नाम नहीं छापने की शर्त पर एक बाजार विश्लेषक, जो रिलायंस समूह का पूर्व कर्मचारी रह चुका है,उसने बताया: “ऐसा लगता है, जैसे कि वे (समूह) इक्विटी के ज़रिये अपने खर्चों को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं, और अपने ऋणों को बनाये रखने के लिए राजस्व जुटाने में असमर्थ हैं।” एक अन्य विश्लेषक ने रिलायंस जियो के ग्राहक आधार की ताक़त और प्रति उपयोगकर्ता आधार पर उनके लाभ मार्जिन पर सवाल उठाये थे।

 राष्ट्रीय सुरक्षा लिंक

कई विदेशी निवेशकों द्वारा किये गये इन निवेशों के मद्देनजर,राष्ट्रीय सुरक्षा के निहितार्थ और भारत के सबसे बड़े बैंक, भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के ग्राहकों की सुरक्षा को लेकर चिंतायें व्यक्त की जा रही हैं, जिसके साथ रिलायंस समूह का 30:70 अनुपात का संयुक्त उद्यम, जियो पेमेंट बैंक है।

अनुभवी बैंकर और अखिल भारतीय बैंक अधिकारी परिसंघ के पूर्व अखिल भारतीय महासचिव, थॉमस फ़्रैंको ने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए कहा:

“अगर आप रिलायंस के कुल एक्सपोज़र, समूह में उनकी संयुक्त बैलेंस शीट और उस पर कितना कर्ज है और कितनी सर्विसिंग हैं, जैसी बातों पर नज़र डालें, तो आप पायेंगे कि यह वित्तीय संस्थानों और बैंकों का कितना ऋणी है। कुल मिलाकर, इसका ऋण सेवा रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं है...अब ज़रा इस बात पर विचार करें कि रिलायंस ने हाल ही में विदेशी निवेशकों द्वारा रिलायंस जियो में किये गये निवेश सौदों के ज़रिये कितनी पूंजी जुटाई है।"

 फ़्रैंको कहते हैं, “टेलीकॉम कंपनी में हिस्सेदारी की बिक्री भारत सरकार के लिए जोखिम वाला क्षेत्र है। इस स्थिति में जियो पेमेंट्स बैंक, जो SBI के प्लेटफ़ॉर्म पर चलेगा, उसके अलावा... SBI YONO ऐप पर, रिलायंस SBI के डेटाबेस और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर पहुंच प्राप्त कर सकता है। यानी इसका मतलब यह होगा कि सार्वजनिक क्षेत्र में भारत के सबसे बड़े बैंक का पूरा डेटाबेस अब संभवत: रिलायंस के साथ अपने सहयोग से फ़ेसबुक और व्हाट्सएप पर उपलब्ध होगा। ऐसे समय में जब महामारी का दौर चल रहा हो और संसद का सत्र भी नहीं चल रहा है, तो सवाल है कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर इन विदेशी निवेश सौदों के निहितार्थ को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार से सवाल कौन कर सकता है।”

रिलायंस इंडस्ट्रीज़ की एक सहायक कंपनी, JIL पेमेंट्स बैंक लिमिटेड, जो डिजिटल लेनदेन को सुविधाजनक बनाने के लिए एक भुगतान बैंक के रूप में कार्य करती है, इसे 2018 में SBI के साथ एक संयुक्त उद्यम के रूप में स्थापित किया गया था, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र का यह बैंक इस कंपनी में 30% हिस्सेदारी रखता है। (इन्हीं लेखकों द्वारा जियो पेमेंट्स बैंक पर एक विस्तृत लेख लिखा जा रहा है।)

 चीन विरोधी भावनायें

सीमा पर चल रहे तनाव के बीच राष्ट्रवादी सरगर्मी सही मायने में भारत सरकार में नीति प्रतिष्ठान के एक बड़े हिस्से में चीन के प्रति दीर्घकालीन अविश्वास की झलक है। इन आरोपों के आधार पर कि दो चीनी कंपनियां इलेक्ट्रॉनिक घटकों को "चोर दरवाज़े" से बनाती हैं औऱ बीजिंग के इशारे पर दुनिया भर में इनकी आपूर्ति की जाती है, अमेरिका के दबाव के कारण इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों के इन चीनी निर्माताओं, ख़ास तौर पर हुआवेई और जेडटीई पर प्रतिबंध लगाये जाने का दबाव बढ़ गया है।

हालांकि भारत सरकार को इस मामले पर एक मज़बूत आधिकारिक रुख अपनाना अभी बाक़ी है। सरकर ने इन दोनों कंपनियों को 5जी (पांचवीं पीढ़ी) के टेलीकॉम स्पेक्ट्रम के लिए आगामी नीलामी में भाग लेने से रोकने के अपने किसी इरादे की कोई घोषणा अभी तक नहीं की है।

जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मार्च की शुरुआत में भारत का दौरा किया था, उस दौरान उन्होंने बड़ी भारतीय कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के साथ एक चर्चा की थी,चर्चा के दौरान ही आरआईएल के अध्यक्ष, मुकेश अंबानी ने कथित तौर पर उन्हें बताया था कि रिलायंस जियो उन्हीं उपकरणों का इस्तेमाल कर रहा है, जिनमें कोई भी घटक चीन निर्मित नहीं है।

व्हाइट हाउस द्वारा जारी इस वार्ता की एक नक़ल के मुताबिक़, ट्रंप ने अंबानी से पूछा था, "आप तो 4जी कर रहे हैं। क्या आप 5जी भी करने जा रहे हैं ? ”

ट्रंप के उस सवाल पर अंबानी का जवाब था,“हम 5जी करने जा रहे हैं। हम दुनिया का एकमात्र ऐसा नेटवर्क हैं, जिसके पास एक भी चीनी पुर्जा नहीं है।"

एफ़डीआई दिशानिर्देश और सुरक्षा मंज़ूरी

भारत के विदेशी निवेश सुविधा पोर्टल द्वारा जून 2017 में जारी एफडीआई दिशानिर्देशों के मुताबिक़, "दूरसंचार" उन क्षेत्रों में से एक है, जिसमें संचार मंत्रालय के दूरसंचार विभाग द्वारा दी जाने वाली मंज़ूरी के अलावे, विदेश मंत्रालय और वित्त मंत्रालय द्वारा एक समीक्षा के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) की तरफ़ से सुरक्षा मंज़ूरी दी जाती है। दूरसंचार को विदेशी निवेश प्राप्त करने वाली कंपनियों से सुरक्षित किया जाना ज़रूरी है।

 हालांकि, रिलायंस जियो के मामले में हमारे पास इस बात की जानकारी नहीं है कि 14 बिलियन डॉलर से अधिक के 11 विदेशी निवेशों को भारत सरकार में सम्बन्धित मंत्रालयों और विभागों से सुरक्षा मंज़ूरी मिली है या नहीं।

16 जून को दोपहर देर बाद इससे मिलती जुलती प्रश्नावली निम्नलिखित लोगों को ईमेल किये गये थे: अमित शाह, केंद्रीय गृह मंत्री; गृह सचिव अजय कुमार भल्ला; वसुधा गुप्ता, महानिदेशक (मीडिया और संचार); गृह मंत्रालय; रविशंकर प्रसाद, कानून एवं न्याय, इलेक्ट्रॉनिक्स, सूचना प्रौद्योगिकी एवं संचार मंत्री, और दूरसंचार विभाग के सचिव, अंशु प्रकाश।

जो दो सवाल पूछे गये थे,वे हैं:

1.     तालिका में सूचीबद्ध उपरोक्त एफ़डीआई प्रस्तावों में से किसी को भी केंद्रीय गृह मंत्रालय से सुरक्षा मंज़री मिली है ?

 2.    रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड, जो जियो प्लेटफ़ॉर्म्स लिमिटेड की मूल कंपनी है, उसके पास सहायक कंपनी के रूप में जियो पेमेंट बैंक लिमिटेड भी है। भारतीय स्टेट बैंक के साथ एक समझौते के ज़रिये इस जियो पेमेंट्स बैंक लिमिटेड की एसबीआई के खाता डेटाबेस और प्लेटफॉर्म तक पहुंच है। क्या इस तरह की पहुंच रखने वाले ऐसे कॉर्पोरेट समूह में विदेशी निवेश का होना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा नहीं है?

 जिन लोगों का ऊपर ज़िक़्र किया गया है, इस लेख के प्रकाशन के समय तक उन लोगों में से किसी की तरफ़ से कोई जवाब नहीं मिल पाया था। जैसे ही उनमें से किसी की तरफ़ से कोई जवाब मिलता है,तो इस लेख को उनमें से किसी तरफ़ से मिले जवाब से मिली सूचना के साथ अपडेट कर दिया जायेगा।

(आगे भी जारी है।)

यह श्रृंखला का चौथा लेख है। यहां पहले के तीन लेख के लिंक दिये गये हैं:

इन्हें पढ़ें :  फ़ेसबुक-रिलायंस समझौते के पहले अंबानी परिवार में हुआ था शेयरों का फेरबदल

इन्हें पढ़ें :  क्या रिलायंस के ‘राइट्स इश्यू’ की कीमत ज़्यादा आंकी गई? 

इन्हें पढ़ें :    क्या सरकार ने रिलायंस की 53,000 करोड़ रुपये इकट्ठा करने में मदद की?

 मूल रूप से अंग्रेज़ी में प्रकाशित इस लेख को भी आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं-
Foreign Investments in Reliance Jio: A Security Concern?
 

FDI
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National Security
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