NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
क़ानूनों की वापसी से मृत लोग वापस नहीं आएंगे- लखीमपुर हिंसा के पीड़ित परिवार
बीजेपी को क़ानूनों की वापसी से राजनीतिक फ़ायदे का अनुमान है, जबकि मूल बात यह है कि राज्य मंत्री अजय मिश्रा अब भी खुलेआम घूम रहे हैं, जो आने वाले दिनों में सरकार और किसानों के बीच टकराव की वजह बन सकता है।
अब्दुल अलीम जाफ़री
22 Nov 2021
farmers
फाइल फोटो

लखनऊ: एक ऐसे वक्त में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तीन विवादित कृषि क़ानूनों को वापस लिए जाने के चलते, खुशी की लहर ने पूरी दिल्ली को अपनी जकड़ में ले लिया है, तब 3 अक्टूबर को लखीमपुर खीरी में हुई हिंसा में जान गंवाने वाले चार किसानों के परिवार और रिश्तेदार उनका मातम मनाने जुटे हुए हैं। 

मृत लोगों के परिवार वालों का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा तीन विवादित फ़ैसलों को वापस लेने का फ़ैसला पहले लिया जा सकता था और उससे ना सिर्फ़ लखीमपुर खीरी की घटना के शिकार चार किसान, बल्कि 700 से ज़्यादा किसानों की जान बचाई जा सकती थी। उनका कहना है कि अभी लड़ाई खत्म नहीं हुई है।

बता दें पिछले महीने लखीमपुर खीरी के तिकुनिया में प्रदर्शन के दौरान चार किसानों पर गाड़ी चढ़ा दी गई थी। इनमें से दो, मोहरनिया गांव में नबी नगर के 22 साल के गुरविंदर और बंजारा तांडा गांव के दलजीत सिंह, बहराइच के रहने वाले थे। जबकि 60 साल के नाचात्तर सिंह और 20 साल के लोवप्रीत सिंह लखीमपुर खीरी के रहने वाले थे। 

दलजीत सिंह की पत्नी परमजीत कौर का कहना है कि अगर सरकार ने पहले फ़ैसला लिया होता, तो मेरे पति अब भी मेरे साथ होते। यह फ़ैसला हमारे दुख-दर्द को कम नहीं कर सकता। 

कौर रुंधी हुई आवाज़ में कहती हैं, "हालांकि प्रधानमंत्री ने तीनों क़ानूनों को वापस लेने का ऐलान किया है, लेकिन उन्होंने ना तो लखीमपुर खीरी की घटना पर दुख जताया और ना ही केंद्रीय राज्य मंत्री अजय सिंह टेनी का इस्तीफा लिया। हमारी लड़ाई सिर्फ़ क़ानून वापस लेने के बाद खत्म नहीं होने वाली है, जब तक अजय मिश्रा इस्तीफा नहीं देगा या गिरफ्तार नहीं होगा, हमें न्याय नहीं मिलेगा।"

इसी तरह का विचार रखते हुए गुरविंदर के चाचा कहते हैं कि किसान एक साल से तीनों कृषि क़ानूनों की वापसी के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। "जब मैंने मोदी की घोषणा के बारे में सुना, तो मुझे समझ नहीं आया कि मुझे कैसा व्यवहार करना चाहिए, क्या मैं रोऊं या जश्न मनाऊं। मेरा भतीजा भी इसी के लिए कोशिश कर रहा था, लेकिन जब यह फ़ैसला आया है, तब वह हमारे बीच में मौजूद नहीं है।"

अपने बेटे लवप्रीत सिंह की खीरी हिंसा में जान गंवाने वाले सतनाम सिंह कहते हैं कि कृषि क़ानूनों को वापस लेने से उनका दर्द कम नहीं हो जाएगा और इसके लिए जश्न मनाने जैसा कुछ नहीं है।

उन्होंने न्यूज़क्लिक से कहा, "मैंने कृषि क़ानूनों का विरोध करते हुए अपना एकलौता बेटा खो दिया, जो मंत्री के बेटे की एसयूवी के नीचे आ गया था। अगर सरकार को क़ानून वापस लेने हैं, तो किसानों के ऊपर गाड़ी चढ़ाने की कोशिश करने वाले के मंत्री पिता के खिलाफ़ कुछ क्यों नहीं बोला। जब तक अजय मिश्रा गिरफ़्तार नहीं हो जाता, हमारा संघर्ष जारी रहेगा।"

वह आगे कहते हैं, "कोई जश्न कैसे मना सकता है, जब हमें पता है कि घटना के जिम्मेदार खुलेआम घूम रहे हैं और उन्हीं प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के साथ मंच साझा कर रहे हैं। क्या यह दोमुंहापन नहीं है?"

पीड़ित परिवारों ने साफ़ कहा कि चाहे कृषि क़ानून वापस हो जाएं या उन्हें मुआवज़ा मिल जाए, लेकिन उनके अपने वापस नहीं आने वाले हैं। नछत्तर सिंह के बेटे ने न्यूज़क्लिक से बातचीत में कहा, "आज मैं जो कुछ भी हूं, उसे बनाने वाले पिता की यादें की भरपाई पैसे या क़ानूनों को वापस लेने से नहीं हो जाएगी। मंत्री चार किसानों की मौत के लिए जिम्मेदार है और अब भी अपने पद पर बना हुआ है। जब उसे हटा दिया जाएगा और सलाखों के पीछे भेज दिया जाएगा, तभी न्याय मिलेगा।"

शुक्रवार को प्रधानमंत्री मोदी ने तीनों कृषि क़ानूनों की वापसी की घोषणा कर दी, जिनके खिलाफ़ किसान एक साल से प्रदर्शन कर रहे थे। प्रधानमंत्री ने अपने वक्तव्य में किसानों के एक हिस्से को क़ानून के फायदों के बारे में "सहमत" ना करवा पाने पर माफ़ी भी मांगी। 

 लेकिन उत्तर प्रदेश के किसान संगठनों को सत्ताधारी बीजेपी की मंशा पर शक है, उनका कहना है कि केंद्र का यू-टर्न "चुनावी स्वहितों और बाध्यताओं" के चलते हुआ है। किसान संगठनों की मांग है कि पिछले एक साल में प्रदर्शन के दौरान जान गंवाने वाले किसानों को मुआवज़ा दिया जाए और अजय मिश्रा को तुरंत गिरफ़्तार किया जाए। 

सम्युक्त किसान मोर्चा की उत्तर प्रदेश ईकाई ने सवाल पूछते हुए कहा, "सरकार के हठ के चलते इतने सारे लोगों को जान गंवानी पड़ी और इतना ज़्यादा दर्ज उठाना पड़ा। क्या कोई इसके लिए जिम्मेदार है या नहीं? हम कैसे भूलेंगे कि बीजेपी नेता हर दिन हमारे लिए खालिस्तानी, आतंकवादी, पैसा देकर मंगाए गए किसान और पता नहीं क्या-क्या शब्दों का इस्तेमाल कर रहे थे।"

इस बीच निघासन में अजय मिश्रा के इस्तीफ़े के लिए विरोध प्रदर्शन करने की योजना बनाने के लिए एक बैठक बुलाई गई है।

एक अहम आयोजक ने न्यूज़क्लिक को बताया, "अब सरकार ने शर्मनाक तरीके से कृषि क़ानूनों को वापस ले लिया है। इसके ऊपर सरकार एक साल तक पैर रखकर बैठी रही। अब वक़्त आ गया है कि हम उन्हें आगे आने वाले चुनावों में सबक सिखाएं, खासकर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में।"

उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में खीरी और आसपास के जिलों से किसान 22 नवंबर को लखनऊ पहुंचेंगे, ताकि वे वहां होने वाली महापंचायत में हिस्सा ले सकें और सरकार पर मिश्रा के इस्तीफ़े और गिरफ्तारी के लिए दबाव बना सकें।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Repeal Cannot Bring Back the Dead, Say Family Members of Lakhimpur Kheri Victims

Lakhimpur Kheri Massacre
Anil Mishra
Lakhimpur Farmers
Ajay Mishra
repeal of farm laws
Martyr Farmers
PM MODI

Related Stories

कानपुर हिंसा: दोषियों पर गैंगस्टर के तहत मुकदमे का आदेश... नूपुर शर्मा पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं!

सिख इतिहास की जटिलताओं को नज़रअंदाज़ करता प्रधानमंत्री का भाषण 

100 राजनयिकों की अपील: "खामोशी से बात नहीं बनेगी मोदी जी!"

प्रधानमंत्री जी... पक्का ये भाषण राजनीतिक नहीं था?

यूपी चुनाव : बीजेपी का पतन क्यों हो रहा है?

यूपी की सियासत: मतदान से ठीक पहले पोस्टरों से गायब हुए योगी!, अकेले मुस्कुरा रहे हैं मोदी!!

मोदी की पहली रैली cancel! विपक्ष का करारा हमला!

नया बजट जनता के हितों से दग़ाबाज़ी : सीपीआई-एम

त्रिपुरा : पूर्व सीएम माणिक सरकार ने मोदी-शाह पर लगाया राज्य के इतिहास से 'छेड़छाड़' का आरोप

एसकेएम की केंद्र को चेतावनी : 31 जनवरी तक वादें पूरे नहीं हुए तो 1 फरवरी से ‘मिशन उत्तर प्रदेश’


बाकी खबरें

  • ऑपरेशन Pegasus : पत्रकारों की जासूसी किसने करवाई?
    न्यूज़क्लिक टीम
    ऑपरेशन Pegasus : पत्रकारों की जासूसी किसने करवाई?
    19 Jul 2021
    दुनिया के 16 मीडिया संस्थानों की पड़ताल से तहलका मच गया है। इस पड़ताल से पता चला है के इसरायली कंपनी NSO के एक सॉफ्टवेयर पेगासस के ज़रिए पत्रकारों, नेताओं, जजों और उद्योगपतियों के फोन को हैक किया गया…
  • इस हफ़्ते तमिलनाडु : 'राज्य कर रहा है नीट को रद्द करने की मांग, नए बीजेपी प्रमुख चाहते हैं मीडिया पर नियंत्रण'
    श्रुति एमडी
    इस हफ़्ते तमिलनाडु : 'राज्य कर रहा है नीट को रद्द करने की मांग, नए बीजेपी प्रमुख चाहते हैं मीडिया पर नियंत्रण'
    19 Jul 2021
    तमिलनाडु सरकार ने 16 जुलाई को कोरोना लॉकडाउन 31 जुलाई तक के लिए बढ़ा दिया। हालांकि इस दौरान सरकार ने कई नई छूटें भी दी हैं।
  • थाईलैंड : बेहतर कोविड राहत की मांग करने वाले प्रदर्शनकारियों पर दमनात्मक कार्रवाई
    पीपल्स डिस्पैच
    थाईलैंड : बेहतर कोविड राहत की मांग करने वाले प्रदर्शनकारियों पर दमनात्मक कार्रवाई
    19 Jul 2021
    थाईलैंड में लोकतंत्र के लिए जोर देने वाले संगठन और समूह हाल ही में बेहतर कोविड-19 राहत उपायों और अधिक टीकों की मांग करते रहे हैं।
  • इज़रायली सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल भारत सहित दुनिया भर की सरकारों द्वारा एक्टिविस्टों, नेताओं, पत्रकारों की जासूसी के लिए किया गया : रिपोर्ट
    पीपल्स डिस्पैच
    इज़रायली सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल भारत सहित दुनिया भर की सरकारों द्वारा एक्टिविस्टों, नेताओं, पत्रकारों की जासूसी के लिए किया गया : रिपोर्ट
    19 Jul 2021
    एमनेस्टी इंटरनेशनल और पेरिस स्थित फॉरबिडन स्टोरीज़ के निष्कर्षों के आधार पर रविवार को कई मीडिया संगठनों द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इज़रायली स्पाइवेयर का इस्तेमाल लोगों के फ़ोन हैक…
  • नवउदारवाद और धुर-दक्षिणपंथ की अजीबोगरीब सांठ-गांठ
    प्रभात पटनायक
    नवउदारवाद और धुर-दक्षिणपंथ की अजीबोगरीब सांठ-गांठ
    19 Jul 2021
    पिछले कुछ अर्से में दुनिया भर में धुर-दक्षिणपंथी, फासीवादी, अद्र्घ-फासिस्ट या नव-फासीवादी पार्टियों का उभार देखने को मिला है, जो 1930 के दशक की याद दिलाता है। फासीवादी सरकारें निरपवाद रूप से आम तौर
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License