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भारत
राजनीति
आरक्षण की बहस पर पुनर्विचार
भारत में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अनुसूचित जाति(ST) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षण को लेकर अभूतपूर्व हमले हो रहे हैं। मुख्य आरक्षण विरोधी हमला यही है कि आरक्षण योग्यता को ख़त्म कर देता है।
प्रोफ़ेसर जी मोहन गोपाल
17 Aug 2021
आरक्षण की बहस पर पुनर्विचार

जी. मोहन गोपाल अपने इस लेख में बताते हैं कि संविधान योग्यता के ब्राह्मणवादी विचार की जगह योग्यता के आधुनिक, लोकतांत्रिक, तर्कसंगत, वैज्ञानिक और संवैधानिक विचार को किस तरह प्रतिस्थापित कर देता है।

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भारत में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अनुसूचित जाति(ST) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षण को लेकर अभूतपूर्व हमले हो रहे हैं। मुख्य आरक्षण विरोधी हमला यही है कि आरक्षण योग्यता को ख़त्म कर देता है।

आरक्षण विरोधी सही हैं। आरक्षण सही में योग्यता,यानी योग्यता के ब्राह्मणवादी विचार को ख़त्म कर दे रहा है। यही वह चीज़ है,जिसे किया जाना है। संविधान योग्यता के ब्राह्मणवादी विचार की जगह योग्यता के आधुनिक, लोकतांत्रिक, तर्कसंगत, वैज्ञानिक और संवैधानिक विचार को किस तरह प्रतिस्थापित करता है

योग्यता का ब्राह्मणवादी विचार

"योग्यता" का शाब्दिक अर्थ है "सुयोग्य होने की अवस्था।" योग्यता का कोई मानक मूल तत्व तो होता नहीं है। इसके मानदंड-"कौन किस चीज़ का हकदार है" और यह समाज के प्रमुख मूल्यों से निर्धारित होता है। मेरिट में कोई स्थिर मूल तत्व नहीं होता है।

ब्राह्मणवादी विचार यही है कि योग्यता ईश्वर की ओर से मिली चीज़ है, यह विरासत में मिलती है और जन्म से ख़ास तौर पर अर्जित की गयी होती है। जिनके पास ये सब नहीं हैं, वे इसे कभी हासिल नहीं कर सकते- जैसे कि महिलायें, अवर्ण और  निम्न जातियां।

"गुण" का विचार ही योग्यता के ब्राह्मणवादी विचार की बुनियाद है।

जाने-माने मोनियर-मोनियर संस्कृत डिक्शनरी ने इस लिहाज़ से "गुण" को "सत्व (अच्छाई या सदाचार), रजस (लालसा या अंधकार) और तमस (दुष्टता और अज्ञानता) के मिश्रण से युक्त सभी मौजूदा प्राणियों के मुख्य गुण के रूप में परिभाषित किया है।

भगवद् गीता इस बात का ऐलान करता है कि भगवान मनुष्यों को पिछले जन्मों में प्राप्त (असत्यापित) उनकी योग्यता,यानी  "गुण" और "कर्म" के आधार पर चार "वर्णों" (जातियों) में विभाजित करते हैं और प्रत्येक मनुष्य को हर जन्म में उपयुक्त वर्ण में स्थान देते हैं।  

हैसियत,सत्ता,संपत्ति और अवसर की प्रचूरता के अवरोही क्रम में चार वर्णों,ख़ास तौर पर पहले तीन वर्णों के लिए आरक्षित हैं।

व्यक्तिगत योग्यता,जिसका कि हर व्यक्ति हक़दार है,लेकिन वह उसके जन्म के वर्ण से निर्धारित होता है। बिना किसी योग्यता वाले (90% लोग) इस वर्ण व्यवस्था के दायरे से बाहर हैं और उन्हें मानव जाति के निचले क्रम वाला प्राणी माना जाता है या फिर मनुष्य ही नहीं माना जाता है। उनका काम सवर्णों के लिए उस हैसियत से काम करना है, जिसके लिए उन्हें कहा गया है। वे ग़ुलाम हैं। वे बिना किसी योग्यता वाले पतित आत्मा हैं,यानी मनुष्य होने से हीनतर हैं, बहिष्कृत हैं और दरिद्रता के अलावा वे किसी भी चीज़ के योग्य नहीं हैं। वर्ण व्यवस्था को मानना ही उनके उद्धार का एकमात्र मार्ग है।

अपने काल्पनिक अंधविश्वासों से दूर योग्यता की यह ब्राह्मणवादी व्यवस्था सिर्फ़ विरासत में मिली योग्यता की एक सामंती व्यवस्था है,यह सामंती अभिजात वर्ग के बच्चों के लिए अवसरों, संपत्ति और सत्ता के आरक्षण वाली एक ऐसी सामंती व्यवस्था है, जिसका मक़सद एक ऐसे स्थिर समाज का निर्माण करना है, जो अभिजात्यवादी जातियों के आधिपत्य को बनाये रखे।  

दरअस्ल आरक्षण विरोधी आंदोलन का असली उद्देश्य योग्यता और चतुर्वर्ण आरक्षण के इसी ब्राह्मणवादी विचार को बहाल करना है। उनका उद्देश्य अभिजात्यवाद की रक्षा करना और उसे जैसे-तैसे बचाना है। 

आरक्षण का ब्राह्मणवादी विचार

ब्राह्मणवाद ने सदियों से विश्व इतिहास में सबसे लंबे समय तक चलने वाली और सबसे व्यापक आरक्षण प्रणाली का निर्माण और संचालन किया है।

जाति व्यवस्था और कुछ नहीं, बल्कि आरक्षण की एक विशाल व्यवस्था है।

इस व्यवस्था में हर एक कारोबार, नौकरी और पेशे को विशिष्ट सामाजिक समूहों के लिए सूचीबद्ध और आरक्षित किया गया था।  योग्यता विरासत में मिलती थी। विशेषाधिकार विरासत में मिलते थे। योग्य लोगों की पहचान के लिए किसी चयन प्रणाली की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। भगवान ने इसका पूरा ख्याल रखा था। जन्म के वर्ण और जाति से योग्यता स्पष्ट थी।

प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक समूह को वही कार्य या उससे मिलते जुलते कार्य करने के लिए मजबूर किया जाता था,जो उसके लिए निर्धारित थे। इस व्यवस्था ने हर तरह की गतिशीलता और नये ज्ञान और कौशल हासिल करने की क्षमता को नष्ट कर दिया। दासता,गिरमिटिया मज़दूरी और जबरन मज़दूरी (आरक्षण की एक और ब्राह्मणवादी योजना) ख़ूब फली-फूली। उत्पादकों द्वारा सृजित अधिशेष मूल्य पर कब्ज़ा कर लिया गया। सभी तरह के मूल्य,मुनाफ़े, फ़ायदे और संपत्ति ब्राह्मणवादी जातियों के हाथों में थे। शिक्षा और विद्या को होशियारी के साथ नियंत्रित कर लिया गया था। इस व्यवस्था को मज़बूती देने के लिए ईश्वर और धर्म का खुलकर इस्तेमाल किया गया। यह आरक्षण की एक ऐसी क्रूर और फ़ासीवादी व्यवस्था थी, जिसने बेहिसाब मानवीय क़ीमत वसूली।

योग्यता का यह ब्राह्मणवादी विचार और आरक्षण की यह ब्राह्मणवादी व्यवस्था आज की दुनिया में असामाजिक, अलोकतांत्रिक, फ़ासीवादी, अस्वीकार्य और लागू करने लायक़ नहीं हैं।

इस योग्यता का संवैधानिक विचार समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व, गरिमा, सामाजिक न्याय, समानता, उचित हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व के साथ-साथ लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद की संवैधानिक विचारधाराओं जैसे संवैधानिक मूल्यों से प्राप्त होता है।

यह संवैधानिक विश्वव्यापी दृष्टिकोण ब्राह्मणवाद से मौलिक रूप से अलग है। 

यह संवैधानिक विश्वव्यापी दृष्टिकोण हमारे स्वतंत्रता आंदोलन और हमारी स्वदेशी दलित संस्कृतियों से निकला हुआ है। यह प्रत्येक संवेदनशील प्राणी,चाहे वह मनुष्य हो या ग़ैर-मनुष्य,सबमें प्रतिभा और बुद्धिमत्ता की एक असीम विविधता (जो स्पष्ट नहीं है, उसे भी देखने की क्षमता) को मान्यता देता है और सभी गुणों और क्षमताओं को बराबर की अहमियत देता है। इसमें किसी तरह की कोई श्रेणीबद्धता नहीं है।

योग्यता का यह संवैधानिक विचार लोगों के बीच योग्यता, प्रतिभा और बुद्धिमत्ता की असमानताओं के विचार को खारिज करता है। यह संवैधानिक विश्वव्यापी दृष्टिकोण इस विचार को खारिज करता है कि गुणों, दृष्टिकोण, कौशल या ज्ञान (QASK) वाले किसी विशेष समूह का अधिकार किसी इंसान को सभी इरादों और हर लिहाज़ से दूसरे से पूरी तरह श्रेष्ठ बनाता है। इसके बजाय, यह दृष्टिकोण विशिष्ट कार्यों और भूमिकाओं के लिहाज़ से QASK के औचित्य पर केंद्रित है। यह प्राणियों की उत्कृष्टता के बजाय उनके कार्यों की उत्कृष्टता पर केंद्रित है।

संवैधानिक विचार तो यही है कि योग्यता मानव निर्मित है, जिसे ज़िदगी के तजुर्बों और कोशिश के दम पर अर्जित की जाती है।  कर्म और प्रयास से योग्यता का जन्म होता है। मानवता और जीवन का अस्तित्व ही  हर एक मनुष्य के लिए उनकी योग्यता गढ़ते हैं। किसी में योग्यता की कमी नहीं होती है। योग्यता विरासत में भी नहीं मिलती है। यह किसी के सामाजिक समूह के सदस्य हो जाने मात्र से अर्जित नहीं होती या उसमें इस वजह से कोई कमी नहीं होती। चूंकि हम अपने लिए उपलब्ध कर्म और प्रयास के अवसरों को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं, इसलिए सभी तरह के कर्म और प्रयास समान मान्यता, मूल्य और समान लाभ के योग्य होते हैं। हर एक मनुष्य के पास योग्यता निर्माण का अवसर है।

तर्कसंगत और वैज्ञानिक तरीक़े से उस योग्यता को चिह्नित करना और प्रतिफल देना समाज की ज़िम्मेदारी है। योग्यता के इस मानदंड को किसी अभिजात वर्ग की तरफ़ से नहीं,बल्कि लोकतांत्रिक तरीके से निर्धारित किये जाने की ज़रूरत है। 

चयन की एक संवैधानिक प्रणाली में योग्यता संवैधानिक मूल्यों के आधार पर निर्धारित मानक पर केंद्रित होगी,जैसे कि :  (i) सामाजिक समूहों के प्रतिनिधित्व को आगे बढ़ाने के लिए उम्मीदवार की क्षमता और हाशिए के सामाजिक समूहों और उनके लोगों की उन्नति; (ii) सामाजिक रूप से थोपी गयी पीड़ा, भेदभाव और उत्पीड़न का सामना करने और उस पर क़ाबू पाने के दौरान हुए जीवन का अनुभव; (iii) स्वतंत्रता, समानता, गरिमा और बंधुत्व के संघर्षों और देश के सामाजिक परिवर्तन में योगदान; (iv) जिनके पास कोई सत्ता नहीं है,उनके साथ सहानुभूति और करुणा; (v) उस मानवीय स्थिति और उसके समाधानों का ज्ञान, जो आम लोगों को उनके सामने आने वाली समस्याओं का समाधान करने में मदद करे; (vi) संवैधानिक मूल्यों,ख़ास तौर पर लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता को लेकर प्रतिबद्धता; और (vii) जिस अवसर की आकांक्षा की गयी है, उसमें रुचि और उसे लेकर प्रतिबद्धता। क्षेत्र विशेष की विशेषज्ञता और संचार जैसे काम या अध्ययन से जुड़े ज्ञान और कौशल ऐसे कौशल हैं,जिन्हें "सीखा जाता है",उन्हें हमेशा ज़रूरत के मुताबिक़ हासिल किया जा सकता है।

आरक्षण का संवैधानिक विचार

संवैधानिक आरक्षण योग्यता के संवैधानिक विचार पर आधारित है,यानी "कौन हक़दार है",इसे संवैधानिक मूल्यों के लिहाज़ से तय किया जाता है। 

बंटवारे के रक्त स्नान के बीच पैदा हुए हमारे संविधान का पहला उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारतीयों को एक-दूसरे का कभी भी क़त्लेआम नहीं करना चाहिए, जैसा कि उन्होंने 1947 में किया था।

संविधान हमारे इतिहास के इस सबक पर आधारित है कि सत्ता जब अभिजात वर्ग के हाथों में होती है, तो गृहयुद्ध और हमले अपरिहार्य हो जाते हैं।

इस लिहाज़ से संविधान का एक मौलिक लक्ष्य राज्य के मामलों में लोगों के सभी वर्गों के स्वरों का समावेश करना और उन्हें प्रतिनिधित्व देना है, और उन पांच अहम क्षेत्रों- विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और शिक्षा का उन्हें हिस्सा बनाना है, जिसके दायरे से इन आम लोगों को सदियों से बाहर रखा गया है। यह शांति, सद्भाव, सामाजिक स्थिरता और गणतंत्र के अस्तित्व के लिए ज़रूरी है।

आरक्षण की इस संवैधानिक परियोजना में पिछड़े वर्गों को उनके आबादी के हिस्से के आधार पर उनके उचित हिस्सेदारी की बहाली की मांग की गयी है, जो कि जातिगत भेदभाव के कारण उनसे चुरा लिया गया था। यह शासन और समाज के लोकतंत्रीकरण की भी मांग करता है। आरक्षण के लिए उत्पीड़क जातियों के जमा किये गये ग़ैर-मुनासिब हिस्से का निकाला जाना भी ज़रूरी है।

27 अगस्त 1957 को संविधान सभा के एक दलित सदस्य श्री एस. नागप्पा ने इसके जवाब में अपनी भावनाओं को संविधान सभा में कुछ इस तरह रखा था, 

 “मुझे मेरा दिया जाने योग्य हिस्सा चाहिए; हालांकि मैं अबोध, अज्ञानी गूंगा हूं, फिर भी मैं चाहता हूं कि आप मेरे इस दावे को मान्यता दें। मेरे गूंगा होने का फ़ायदा मत उठाइये। मेरे मासूम होने का फ़ायदा मत उठाइये। मुझे महज़ अपना मुनासिब हिस्सा चाहिए और मुझे  कुछ और नहीं चाहिए। मैं दूसरों की तरह अहमियत या एक अलग देश नहीं चाहता । अलग देश के लिए हमसे बेहतर दावा किसी के पास नहीं है। हम तो इस देश के 'आदिवासी' हैं।”

आरक्षण की संवैधानिक प्रणाली इस स्पष्ट मान्यता पर आधारित होगी कि आरक्षण एक ऐसा मौलिक अधिकार है, जो भेदभाव और ग़ैर-प्रतिनिधित्व से पैदा हुए सामूहिक पिछड़ेपन से उत्पन्न है।

आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था कृत्रिम रूप से न्यायपालिका की ओर से थोपी गई सीमाओं,यानी 50% की सीमा, क्रीमी लेयर का अलगाव और पदोन्नति पर लागू नहीं (ओबीसी के लिए) होने जैसी सीमाओं से सीमित नहीं होगी। आरक्षण,जिसमें सामाजिक समूहों की जनसंख्या की हिस्सेदारी का निर्धारण शामिल है और समुदाय/जाति जनगणना से हासिल आंकड़ों पर आधारित होगा।

संवैधानिक चयन और आरक्षण प्रणाली को समाज के सभी वर्गों के लिए खुला होना चाहिए और किसी भी समूह के ज्ञान या संस्कृति के पक्ष में नहीं होना चाहिए। जैसा कि ज़िक़्र किया गया है, इस आरक्षण प्रणाली को संवैधानिक मूल्यों के इस्तेमाल की मानकता का निर्माण उस आधार के रूप में करना चाहिए, जो योग्यता को परिभाषित करे।

सामाजिक विचारों को इस चयन प्रक्रिया में पूरी तरह से इसलिए शामिल किया जायेगा, क्योंकि वे योग्यता का विस्तार करते हैं और उसे ज़्यादा गाढ़ा बनाते हैं। ये “बिना योग्यता” वाले मानदंड नहीं हैं और उन्हें इस रूप में ग़लत समझा भी नहीं जाना चाहिए।

मानकीकृत परीक्षण के ज़रिये "श्रेष्ठ" और "निम्न" जैसी कोई उप-प्रजाति नहीं होगी। लेकिन,मानक बनाये गये परीक्षण के बजाय, संवैधानिक आरक्षण विकेंद्रीकृत और भर्ती/प्रवेश संस्थान की ज़रूरतों के अनुरूप चयन की विकेन्द्रीकृत और अनुकूलित बहुस्तरीय और बहुरूपीय प्रणाली होगी।

संवैधानिक आरक्षण सही मायनों में अध्ययन और कार्य के उन विशिष्ट क्षेत्रों को चिह्नित करेगा, जिसके लिए प्रवेश और भर्ती की जानी है और उस प्रत्येक क्षेत्र में उनकी उत्कृष्टता बढ़ाने के लिए संस्थानों की ओर से ज़रूरी विशिष्ट गुण, दृष्टिकोण, कौशल और ज्ञान (क्यूएएसके) को चिह्नित किया जायेगा। इसके बाद प्रतिनिधित्व के उद्देश्य को बनाये रखते हुए उम्मीदवारों के क्यूएएसके से इसका मिलान किया जाएगा।

आरक्षण से अभिजात्य वर्ग का सफ़ाया

संविधान निर्माताओं ने योग्यता के इस संवैधानिक विचार और आरक्षण के इस संवैधानिक दृष्टिकोण को लागू करने के लिए किये जाने वाले इन "विशेष उपायों" को तैयार करने का कार्य राजनीतिक कार्यकारिणी पर छोड़ने का फ़ैसला किया था।  दुर्भाग्य से यह फ़ैसला एक बड़ी भूल साबित हुई है। 

योग्यता के संवैधानिक विचार और आरक्षण की संवैधानिक दृष्टि के अनुरूप चयन की एक नयी, लोकतांत्रिक, तर्कसंगत प्रणाली बनाने के बजाय, नौकरशाही और न्यायपालिका ने परीक्षाओं और साक्षात्कारों के आधार पर मानकीकृत परीक्षण के ज़रिये चयन की औपनिवेशिक युग की उसी अभिजात्य प्रणाली को बनाये रखा और व्यापक रूप से उसका विस्तारित किया।

मानकीकृत परीक्षण समानता को बेअसर करने और असमानता को वैध बनाने के अवैध उद्देश्य के साथ चयन की एक विधि है। इसकी असली प्रकृति को समझने के लिए इस परीक्षण की कहानी के एक संक्षिप्त सफ़र पर चलने की ज़रूरत है।

फ्रांस और संयुक्त राज्य अमेरिका (1750-1940) में योग्यता को लेकर मूल प्रश्न का तुलनात्मक अध्ययय करने हुए अपनी किताब "द मेजर ऑफ़ मेरिट" (2007) में प्रोफ़ेसर जॉन कार्सन ने फ़्रांस और संयुक्त राज्य अमेरिका के सामने एक ऐसी दुविधा का वर्णन किया है, जिसे संयोग से भारत ने योग्यता का संवैधानिक विचार और आरक्षण की दृष्टि से बचने की कोशिश हुई है।

प्रोफ़ेसर कार्सन लिखते हैं, "प्राकृतिक अधिकारों और लोगों की संप्रभुता के नाम पर कुलीन रूप से संगठित समाजों को हटाने के बाद जो जगह ख़ाली होगी, उसकी जगह पर कौन आयेगा ? समानता के साथ-साथ मानवीय और सार्वभौमिक अधिकारों का जश्न मनाने वाली राजनीतिक विचारधारा के भीतर नये अभिजात वर्ग को कैसे चुना जा ससता है और उसे किस तरह उचित ठहराया जा सकता है ? दूसरे शब्दों में असमानता को कैसे वैध ठहराया जा सकता है ?” 

प्रोफ़ेसर कार्सन की दलील है, " ऐसा लगता है कि समानता के कुछ संशोधन को लेकर समर्पित इन दो नये लोकतांत्रिक गणराज्यों ने असमानता को एक नये और कहीं ज़्यादा "तर्कसंगत" स्तर पर पुनर्स्थापित करने के लिए मानव प्रकृति की समझ में बदलाव किया।”

प्रोफ़ेसर कार्सन का कहना है कि फ़्रांस और संयुक्त राज्य अमेरिका दोनों ने "असमानता,ख़ास तौर पर प्राकृतिक असमानता" के इस मुद्दे का सामना किया और "दोनों एक तरह से या किसी अन्य तरह से आख़िरकार योग्यता स्थापित करने के तरीके के रूप में परीक्षण किये जाने की ओर रुख़ किया, और दोनों ही तरीक़े को लेकर जो प्रतिक्रिया थी,उसमें उसी हद तक चिंता को स्वीकार किया गया था। कुछ इस बात को लेकर चिंतित थे कि ये परीक्षण ग़लत, यानी त्रुटिपूर्ण, बेकार, और ग़लत मानदंडों के आधार पर ग़लत लोगों को चुनने के लिहाज़ से व्यर्थ न चला जाये।हालांकि, इसके विपरीत दूसरे लोग यह सोचकर परेशान थे कि ये परीक्षण कहीं शायद सही न साबित हों और इस तरह कुछ लोग सही मायने में दूसरों के मुक़ाबले स्वाभाविक रूप से बेहतर हों। क्या होगा अगर असमानता ख़राब परिवेश या व्यक्तिगत विकल्पों का उत्पाद नहीं,बल्कि आनुवंशिक लाभ वाला सौभाग्य हो, और क्या होगा अगर जानकारों को यह असमानता "दिख" जाये ?

यह परीक्षण फ़्रांस और संयुक्त राज्य अमेरिका के इस वैचारिक विश्व दृष्टिकोण में बड़े करीने से फिट बैठ जाता है। वे संवैधानिक रूप से समान क़ानूनी संरक्षण और क़ानून के सामने बराबरी को लेकर प्रतिबद्ध हैं। वे अवसर की समानता को लेकर भी प्रतिबद्ध हैं।  हालांकि, वे संवैधानिक या राजनीतिक रूप से नतीजों की समानता को लेकर प्रतिबद्ध नहीं हैं, क्योंकि वे बाज़ार से जुड़ी ऐसी अर्थव्यवस्थायें हैं, जो पैसे बनाने के प्रोत्साहन के रूप में नतीजों की ग़ैर-बराबरी पर भरोसा करते हैं,लेकिन फ़्रांस, संयुक्त राज्य अमेरिका के मुक़ाबले एक कल्याणकारी राज्य बनाये रखने के ज़रिये अवसर की समानता को लेकर अपेक्षाकृत ज़्यादा प्रतिबद्ध होने का दावा करता है। 

फ़्रांस और संयुक्त राज्य अमेरिका ने वंशानुगत अभिजात वर्ग से बना एक अभिजात वर्ग को ख़ारिज कर दिया। लेकिन,उन्होंने अभिजात्यवाद के विचार को ख़ारिज नहीं किया। वे "सर्वश्रेष्ठ और प्रतिभाशालियों" द्वारा संचालित बुद्धिमानों की सत्ता के विचार को स्वीकार करते हैं।

इस तरह, फ़्रांस और संयुक्त राज्य अमेरिका में परीक्षण के आधार पर चयन की एक ऐसी प्रणाली है, जो विशेषाधिकार प्राप्त गुणों (योग्यता) से ज़्यादा बंदोबस्ती वाले लोगों को चिह्नित करेगी और उन्हें एक ऐसे नये अभिजात वर्ग के रूप में गठित करेगी, जो बुद्धिमानों की सत्ता प्रणाली के रूप में शासन करेगा।

हालांकि,लोकतंत्र के तौर पर फ़्रांस और संयुक्त राज्य अमेरिका ने न सिर्फ़ उच्च "जाति", बल्कि समाज के सभी वर्गों से लिये गये एक नये अभिजात वर्ग को बनाने के लिहाज़ से "सकारात्मक कार्रवाई" के इस्तेमाल की कोशिश ज़रूर की है। उन्होंने उस क्षेत्र विशेष का सार्वभौमिकरण किया, जिससे अभिजात वर्ग में शामिल होने के लिए बेहतर प्रतिभा और बुद्धिमत्ता को चिह्नित किया जायेगा।  प्रोफ़ेसर कार्सन आर्थिक रूप से निराश आस-पास में चयनित उच्च विद्यालयों के स्नातकों के लिए अपने कार्यक्रम साइंस पो के औचित्य का हवाला देते हुए कहते हैं कि "पारंपरिक चयन प्रणाली ... अच्छी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आने वाले उन लोगों को विशेषाधिकार दिया जाता था, जो अपने पूरे जीवन किताबों और सीखने में लगा दिये", जबकि "पूरक सकारात्मक कार्रवाई प्रक्रिया उन "बुद्धिमानों को तलशा करने की कोशिश है, जहां ज्ञान पाना कहीं ज़्यादा दुर्लभ था।"

प्रोफ़ेसर कार्सन दोनों देशों में "बुद्धि की अवधारणा के इस ग़ैर-मामूली नियम" पर भी टिप्पणी करते हैं।

उनका कहना है कि "अमेरिकी मामले में बुद्धिमत्ता ख़ास तौर पर मानक बनाये गये परीक्षण के परिणामों के रूप में आरक्षण के फ़रियादियों का एक हथियार था, यह दिखाने की कोशिश करने के साधनों में से एक साधन था...कि प्रवेश प्रक्रिया अधिक योग्य उम्मीदवारों पर कम सक्षम उम्मीदवारों का चयन कर रही है।

हालांकि, फ़्रांस के मामले में यह बात एकदम उलटी थी। वहां सकारात्मक कार्रवाई के समर्थकों ने बुद्धि की उस भाषा को अपना लिया, इस भाषा का इस्तमाल यह बताने के लिए किया गया कि योग्यता की एक कसौटी को  कठिन प्रवेश परीक्षाओं में पूरी तरह नहीं अपनाया गया और इससे 'ग्रैंड इकोले' में प्रवेश का सामान्य मार्ग प्रशस्त हो गया। यहां इस बात का ज़िक़्र करना ज़रूरी है कि ग्रैंड इकोले उच्च शिक्षा का एक फ़्रांसीसी संस्थान है, जो फ़्रांसीसी सरकारी विश्वविद्यालय प्रणाली के मुख्य ढांचे से अलग,लेकिन उसके समानांतर है।

भारत में भी इस बुद्धि का इस्तेमाल जनता के विरुद्ध एक हथियार के रूप में किया जाता रहा है। यह वही परिस्थिति थी,जिसे लेकर  27 अगस्त 1947 को संविधान सभा में श्री एस. नागप्पा को चिंता हुई थी।

प्रो. माइकल जे. सैंडेल अपनी किताब, "द टायरनी ऑफ़ मेरिट" में अभिजात्यवाद, योग्यता और मानकीकृत परीक्षण के ख़िलाफ़ एक मज़बूत दलील देते हैं।

सैंडल कहते हैं, "आर्थिक फ़ायदे से योग्यता के साधनों को अलग कर पाना मुश्किल है। SAT जैसे मानकीकृत परीक्षण का उद्देश्य योग्यता को ख़ुद मापना है, ताकि मामूली पृष्ठभूमि के छात्र बौद्धिक क्षमता को प्रदर्शित कर सकें। हालांकि व्यवहार में SAT के स्कोर पारिवारिक आय को बारीकी से चिह्नित कर लेते हैं। जिस छात्र का परिवार जितना अमीर होगा, उसे उतना ही अधिक अंक मिलने की संभावना है...एक ग़ैर-बराबरी वाले समाज में जो शीर्ष पर होते हैं, वे इस विश्वास को बनाये रखना चाहते हैं कि उनकी कामयाबी नैतिक रूप से उचित है। एक योग्यतावादी समाज में इसका मतलब यही है कि विजेताओं को यह यक़ीन करना चाहिए कि उन्होंने अपनी प्रतिभा और कड़ी मेहनत के बल पर अपनी कामयाबी हासिल की है… उच्च शिक्षित होने के मतलब योग्यतवादी होना नहीं है, जिसका कि वह दावा करता है ... हमें यह पूछने की ज़रूरत है कि क्या हमारी भ्रष्ट राजनीति का समाधान योग्यता के सिद्धांत से ज़्यादा ईमानदारी से जीना है, या फिर श्रेणीबद्ध करने और किसी तरह की कोशिश से परे एक सामान्य अच्छाई की तलाश करना है। ”

प्रोफ़ेसर सैंडल "कामयाबी को लेकर सोचने का एक वैकल्पिक तरीक़ा देते हैं और वह तरीक़ा है - मानवीय मामलों में भाग्य की भूमिका को लेकर ज़्यादा चौकसी, नम्रता और एकजुटता की नैतिकता के लिए ज़्यादा अनुकूलता, और काम की गरिमा के प्रति ज़्यादा सकारात्मकता।"  दुनिया के शीर्ष विश्वविद्यालयों में से एक येल विश्वविद्यालय में अंडरग्रेजुएट एडमिशन के डीन जेफ़ ब्रेनज़ेल कहते हैं, "[प्रवेश] परीक्षा सही मायने में दाखिले में कम अहम तत्वों में से एक है...आपके आवेदन का सबसे अहम हिस्सा आपका हाई स्कूल ट्रांसक्रिप्ट है,बाक़ी कोई बाधा नहीं, कोई सवाल नहीं, कोई कॉलेज भी नहीं। शायद अगली सबसे अहम तत्व आपके शिक्षक की सिफ़ारिशें हैं, ख़ासकर अगर आप किसी भी तरह के चुनिंदा कॉलेज या विश्वविद्यालय में आवेदन कर रहे हैं।

इस सवाल के सिलसिले में कि क्या सीबीएसई बोर्ड परीक्षा आयोजित की जानी चाहिए या नहीं, मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज में स्कूल ऑफ एजुकेशन के प्रोफ़ेसर और  डीन दिशा नवानी ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में 3 जून 2021 को लिखा, “यह समझना ज़रूरी है कि इन परीक्षाओं में ध्यान केंद्रित करने के लिए तकनीकों में महारत हासिल करना है और जरूरी नहीं कि इसमें ज्ञान भी शामिल हों…परीक्षायें,ख़ास तौर पर बोर्ड परीक्षायें लगातार फलती-फूलती रहीं और सीखने को पाठ्यपुस्तक की विषय-वस्तु को याद रखने के रूप में आकार दिया गया, पाठ्यपुस्तकों को इस तरह डिज़ाइन किया गया कि इसमें जानकारियां शामिल हो, शिक्षकों को उन विषय-वस्तुओं को स्पष्ट करने के लिए निर्देशित किया जा सके और छात्रों को समझ के साथ या समझ के बिना उस विषय-वस्तु को रट लेने के लिए कहा जाये।”

राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 इस लिहाज़ से एक बहुआयामी दृष्टिकोण वाली योग्यता के आकलन में बदलाव की एक रूपरेखा को निर्धारित करती है।यह कहती है, "[प्रस्तावित] राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) हर साल कम से कम दो बार उच्च गुणवत्ता वाली सामान्य योग्यता परीक्षा के साथ-साथ विज्ञान, मानविकी, भाषा, कला और व्यावसायिक विषयों में विशेष सामान्य विषय परीक्षा की पेशकश के लिए काम करेगी। ये परीक्षायें वैचारिक समझ और ज्ञान को लागू करने की क्षमता का परीक्षण करेगी और इन परीक्षाओं के लिए कोचिंग लेने की ज़रूरत को ख़त्म करने का लक्ष्य रखेगी। छात्र परीक्षा देने वाले विषयों को चुन पाने में सक्षम होंगे, और प्रत्येक विश्वविद्यालय हर एक छात्र के व्यक्तिगत विषय पोर्टफ़ोलियो को देख पायेगा और व्यक्तिगत रुचियों और प्रतिभाओं के आधार पर छात्रों को उनके कार्यक्रमों में दाखिला देने में सक्षम होगा।”

जिस तरह की प्रवेश परीक्षाओं का हम भारत में इस्तेमाल करते हैं, उससे रटने और याद करने वाली एक बहुत ही संकीर्ण सीमा का ही परीक्षण हो पाता है। इन परीक्षाओं से हमें उम्मीदवारों से जो कुछ पूछा जाता है,उस ज्ञान के अलावा और कुछ भी नहीं पता चल पाता।  इसके बावजूद, इसी एकलौते बिंदु यानी परीक्षण की इस आदिम पद्धति के आधार पर हमारी आदिम कुलीन जातियां अपनी "योग्यता" और ओबीसी, एससी और एसटी की योग्यता की कमी पर ज़ोर देती हैं,निश्चि रूप से यह उनकी अज्ञानता के अलावा और कुछ नहीं दिखाता।

इस मानकीकृत परीक्षण को उन कौशलों और ज्ञान का फ़ायदा पहुंचाने के लिहाज़ से बनाया गया है, जो सवर्ण-प्रभुत्व वाले मध्यम वर्ग और उच्च-वर्ग संस्कृतियों में मूल्यवान माने जाते हैं,जिन्हें शिक्षा के ज़रिये तुच्छ मुद्दों पर उपलब्ध तथ्य रट लिये जाते हैं,यही उनकी रोज़ी-रोटी का ज़रिया हैं, और जो लिखित या इलेक्ट्रॉनिक रूप में उनके लिए आसानी से सुलभ हैं।

 यह मानकीकृत परीक्षण सही मायने में अभिजात्यवाद का एक हथियार है और यह योग्यता के संवैधानिक विचार और आरक्षण के संवैधानिक दृष्टिकोण को कमज़ोर करता है। इसके बावजूद, यह परीक्षा पद्धति हमारे संविधान के आठवें दशक में भी हमारे चयन का प्रमुख तरीक़ा बना हुआ है।

सामाजिक न्याय का विचार और योग्यता

भारत में ज़्यादातर सरकारी संस्थान सामाजिक विचारों को स्कोरिंग प्रणाली से अलग-थलग और बाहर रखते हैं। उन्हें उम्मीदवारों की योग्यता का अटूट हिस्सा नहीं माना जाता है। उन्हें घटती हुई योग्यता के रूप में देखा जाता है। ऐसे में उम्मीदवारों (आरक्षण के हक़दार सहित) को लगता है कि चयन योग्यता के अलावा अन्य विचारों से भी प्रेरित हैं। और उन्हें यह भी लगता है कि जिन लोगों को चुना गया है,उनमें "योग्यता की कमी" है।

इस तरह, भारत का सुप्रीम कोर्ट जरनैल सिंह और अन्य बनाम लच्छमी नारायण गुप्ता और अन्य मामले में चौंकाने वाली बात कहती है,

“..जैसे-जैसे पद ऊंचा होता जाता है, यह ज़रूरी हो सकता है, भले ही समग्र रूप से जनसंख्या के अनुपातिक परीक्षण को ध्यान में रखा जाये, लेकिन जैसे-जैसे कोई ऊपर जाता है,पदोन्नति वाले पदों में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की संख्या कम होती जाती है। इसका सीधा सा कारण यह है कि हर बार पदोन्नति होने पर प्रशासन की दक्षता को देखना होता है। जैसा कि बी.पी. जीवन रेड्डी, जे. के इंद्रा साहनी (1) (सुप्रा) मामले में बताया था कि शीर्ष पर कुछ पद ऐसे हो सकते हैं, जहां आरक्षण पूरी तरह से अस्वीकार्य है।” 

यह नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रचलित उस प्रणाली के विपरीत हो सकता है, जहां सामाजिक विचारों को आवेदकों की योग्यता के मूल्यांकन के ढांचे के भीतर शामिल किया जाता है।

यह संयुक्त राज्य अमेरिका और फ़्रांस के उस नज़रिये के भी उलट हो सकता है, जहां सामाजिक विचारों को योग्यता के ढांचे के भीतर शामिल किया जाता है, न कि योग्यता से अलग लागू किया जाता है।

निष्कर्ष

ऐसे दो विकल्प हैं, जो उस अभिजात्य, सामंती और फ़ासीवादी ब्राह्मणवादी योग्यता और ब्राह्मणवादी आरक्षण के विचार की जगह लेने की होड़ में हैं, जिसे 1950 में उखाड़ फेंका गया था।

एक विकल्प तो वह है,जो इस समय इस्तेमाल में है, यह मानकीकृत परीक्षण की एक ऐसे नव-अभिजात्य प्रणाली के ज़रिये चयन करने की औपनिवेशिक परंपरा को जारी रखना है, जो योग्यता के लिए मानकता को कम गुणवत्ता वाली सामूहिक परीक्षाओं में प्राप्त अंकों तक सीमित कर देता है, जिसमें उन संस्थानों की ज़रूरतों या संवैधानिक लक्ष्यों के हिसाब से किसी तरह का कोई तर्कसंगत तालमेल ही नहीं है, जिन संस्थानों के लिए चयन किया जाता है। 

दूसरा विकल्प चयन के लिहाज़ से एक नया तर्कसंगत, ग़ैर-अभिजात्य, व्यावहारिक दृष्टिकोण विकसित करना है, जिसका उद्देश्य एक चयन प्रणाली आधारित संवैधानिक तार्किकता पर प्रतिनिधित्व, समान अवसर की बहाली और एक न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था बनाने के लिए व्यवस्था से बाहर कर दिये गये लोगों की उन्नति के संवैधानिक लक्ष्यों को प्राप्त करना है। 

यह सामाजिक आरक्षण एक अनूठा और अनोखा संवैधानिक सामाजिक न्याय का नया विचार है, जो भारत में एक ऐसी गहरी असमान सामाजिक व्यवस्था में लोकतांत्रिक सत्ता के बंटवारे के लिए एक तर्कसंगत, वैज्ञानिक और न्यायसंगत आधार पेश करता है, जिसमें सदियों से हैसियत, सत्ता, संपत्ति का आरक्षण और एक सवर्ण कुलीन वर्ग के लिए शिक्षा जैसा फ़ासीवादी आरक्षण की अपनी प्रणाली थी। 

ब्राह्मणवादी आरक्षणों की वास्तविक बहाली और अभिजात्यवाद के संरक्षण की मांग करते हुए संवैधानिक आरक्षणों के ख़िलाफ़ पुराने अभिजात वर्ग की तरफ़ से एक ज़बरदस्त प्रतिक्रिया का आना तो स्वाभाविक ही है।

इस गणतंत्र का वजूद भारत की इस क्षमता पर निर्भर करता है कि वह अपने सबसे अहम संस्थागत संस्थानों- विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और शिक्षा को एक ऐसी न्यायसंगत एकता की नींव के रूप में एकीकृत और लोकतांत्रिक बना सके,जो हमारे देश में सामाजिक रूप से थोपी गयी ग़रीबी और पीड़ा को ख़त्म करने का मौक़ा मुहैया कराये।

प्रोफ़ेसर जी.मोहन गोपाल नेशनल जुडिशियल अकैडमी के पूर्व निदेशक और बेंगलुरु स्थित नेशनल लॉ स्कूल ऑफ़ इंडिया यूनिवर्सिटी के पूर्व निदेशक(वीसी) हैं। इनके व्यक्त विचार निजी हैं।

साभार: द लीफ़लेट

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Rethinking the Debate on Reservations

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