NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
अंतरराष्ट्रीय
अर्थव्यवस्था
कच्चे तेल की क़ीमतों में बढ़ोतरी से कहां तक गिरेगा रुपया ?
जब डॉलर रुपए से अधिक मज़बूत होता है तब 1 डॉलर के लिए पहले से ज़्यादा रुपये देना पड़ता है तो इसका असर उन पर भी पड़ता है जिन्होंने अपनी ज़िंदगी में कभी डॉलर में लेन-देन नहीं किया होता है।
अजय कुमार
09 Mar 2022
crude

पैसे के दम पर लड़ा गया पांच राज्यों का चुनाव ख़त्म हो चुका है। पैसे का हाल यह है कि पैसा अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुका है। खबर लिखने तक एक डॉलर के मुकाबले भारत का रुपया गिरकर 76.97 रुपए तक पहुंच चुका है। जानकारों का कहना है कि जब तक रूस और यूक्रेन लड़ाई चलती रहेगी और डॉलर के मुकाबले रुपया वैसे ही गिरता रहेगा। जब लड़ाई खत्म हो जाएगी उसके बाद भी रुपया लंबे समय तक गिरेगा। यह तब तक गिरता रहेगा जब तक दुनिया की टूटी हुई माल सप्लाई फिर से मुकम्मल नहीं हो जाती। रही बात रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया की तो वह रुपया का गिरना नहीं रोक पाएगी क्योंकि आरबीआई को पता है कि आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतों के साथ स्टील सहित कई सामानों की कीमत बढ़ने वाली है। कीमतों में होने वाली इस बढ़ोतरी को ध्यान में रखकर बाजार के लोग सामान इकट्ठा करने की कोशिश में लगे होंगे। और अगर आरबीआई डॉलर के मुकाबले रुपया का विनिमय दर नियंत्रित करती है तो विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बाहर निकलेगा। विदेशी मुद्रा भंडार में बहुत अधिक कमी के हालात से आरबीआई बचना चाहती है।

अब रुपए के गिरावट का सारा तार रुस और यूक्रेन की लड़ाई की वजह से टूट रहे माल सप्लाई से जुड़ा है। इसमें सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की बढ़ती हुई कीमत है। आकार के लिहाज से रूस दुनिया का सबसे बड़ा देश है। भारत के आकार से पांच गुना बड़ा है। अमेरिका और चीन से दो गुना बड़ा है। इंग्लैंड से 70 गुना बड़ा है। लेकिन रूस की आबादी पाकिस्तान की आबादी के आसपास महज 14 करोड़ है। इतनी कम आबादी और इतना बड़ा आकर वाला रूस दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक और तीसरा सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस उत्पादक देश है। यह बताता है कि रूस तेल और प्राकृतिक गैस का बहुत कम घरेलू इस्तेमाल और बहुत अधिक निर्यात करता है। रूस से हर रोज तकरीबन 50 लाख बैरल तेल का निर्यात होता है। इसमें से 48% खरीद यूरोप की होती है। तो तकरीबन 42% खरीद एशिया की होती है। रूस और यूक्रेन की लड़ाई का असर यह हुआ है कि जब से लड़ाई शुरू हुई है तब से कच्चे तेल की कीमत में 40 फीसदी का इजाफा हुआ है। कच्चे तेल की कीमत बढ़कर 140 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गयी है। भारत अपने जरूरतों का तकरीबन 84 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है।

कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा की वजह से डॉलर की मांग बढ़ेगी। यानी सरकार को एक बैरल कच्चे तेल के लिए पहले के मुक़ाबले ज्यादा पैसा देना पड़ेगा। डॉलर लेने के लिए रुपया की मारमारी बढ़ेगी। आर्थिक जानकार भी यही बात कहते हैं कि रुपया डॉलर के मुकाबले गिरता क्यों है? इसके कई कारण है? लेकिन एक कारण जो साफ-साफ सामने दिखता है, वह यह है कि जब रुपया रखने वालों के पास डॉलर खरीदने के लिए मारामारी बढ़ जाती है, तो डॉलर की रुपए के मुकाबले कीमत बढ़ जाती है। सामान्य अर्थशास्त्र की भाषा में कहें तो जब डॉलर की सप्लाई कम और डिमांड ज्यादा होती है, तो डॉलर की कीमत बढ़ जाती है। रूस से आयात पर प्रतिबंध लगने के बाद तो कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की सप्लाई कम हो जाएगी लेकिन डिमांड जस की तस बनी रहेगी। यानी प्रति बैरल कीमतों में इजाफा लंबे समय तक चलता रहेगा। भारत की पहले से बर्बाद अर्थव्यवस्था से बन रहे रुपए की कीमत आगे और भी कमजोर होती रहेगी।

जब देश के बाहर से तेल महंगा आएगा तब तेल की कीमतें बढ़ेंगी। चुनाव खत्म हो चुका है। तो आज नहीं तो कल तेल की कीमतें बढ़ेंगी ही बढ़ेंगी। पहले से ही भारत में महंगाई बढ़ने का कारण पेट्रोल और डीजल है। अब इनकी कीमतें और अधिक बढ़ेंगी। पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने की वजह से मशीन से लेकर यातायात और परिवहन सब कुछ महंगा होगा। यह सब महंगा होने का मतलब है की रोजमर्रा के कई सामान और सेवाएं महंगी होंगी। यानी कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमत रुपया की कमजोरी से लेकर आम आदमी के लिए महंगाई का कहर बनकर आ रही है।

भारत की अर्थव्यवस्था चालू खाता घाटे वाली व्यवस्था है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था से कमजोर अर्थव्यवस्था है। भारत में आयात, निर्यात से अधिक होता है। यानी भारत से कॉफी, मसाले जैसे सामान और तकनीकी सेवाओं का जितना निर्यात होता है, उससे कई गुना अधिक आयात होता है। भारत में विदेशी व्यापार हमेशा नकारात्मक रहता है। कच्चे तेल की कीमत बढ़ने वजह से यह और अधिक नकरात्मक होगा। एक डॉलर के मुकाबले रुपया और अधिक गिरेगा।

रुपया कमजोर होने की वजह से कम मुनाफे की उम्मीद कर विदेशी निवेशक लगातार भारतीय बजार से अपना निवेश किया हुआ पैसा बाहर निकाल रहे हैं। केवल मार्च में फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट स्टॉक मार्केट से अब तक तकरीबन 14721 करोड़ रुपया बाहर निकाल चुके हैं। आगे और भी विदेशी निवेश की बिकवाली होगी। इसलिए डॉलर और रुपए का अंतर और अधिक बढ़ेगा।

खाने के तेल का भी बड़ा हिस्सा विदेशों से मंगवाया जाता है। फर्टिलाइजर में इस्तेमाल होने वाले रसायन भी विदेशों से आते हैं। इसलिए डॉलर के मुकाबले रुपए में गिरावट की मार उन किसानों पर भी पड़ेगी जिन किसानों के लिए डॉलर किसी सपने के सरीखे है। यही हाल इलेक्ट्रॉनिक सामानों के साथ भी होने वाला है। कोरोना और ओमिक्रॉन की वजह से पहले से ही दुनिया में सामानों का उत्पादन कम हो रहा है। सप्लाई साइड की कमी दुनिया के बाजार को महंगा करेगी। ऐसे में भारत की सरकार और व्यापारियों को विदेशी बाजार से सामान और सेवा लेने के लिए ज्यादा पैसा देना पड़ेगा।

कुल मिलाकर बात यह है कि जब डॉलर रुपए से अधिक मजबूत होता है तब 1 डॉलर के लिए पहले से ज्यादा रुपये देना पड़ता है तो इसका असर उन पर भी पड़ता है जिन्होंने अपनी जिंदगी में कभी डॉलर में लेन-देन नहीं किया होता है। अपने ही देश में वह सारे सामान और सेवा उपलब्ध नहीं हो पाते जिनकी जरूरत जिंदगी को चलाने के लिए जरूरी है। इसके लिए दूसरे देशों पर भी आश्रित होना पड़ता है। दूसरे देश डॉलर में व्यापार करते हैं। डॉलर का महंगा होने का मतलब है फैक्ट्रियों में उत्पादन का महंगा होना। कामकाज की लागत का बढ़ना। लागत के बढ़ने का मतलब महंगाई का होना। लोगों की आमदनी का कम होना और रोजगार की स्थिति पैदा ना होना।

 

International crude oil prices
Reserve Bank of India
indian economy
Rupee downfall
Rupee vs Dollar

Related Stories

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

गतिरोध से जूझ रही अर्थव्यवस्था: आपूर्ति में सुधार और मांग को बनाये रखने की ज़रूरत

जब 'ज्ञानवापी' पर हो चर्चा, तब महंगाई की किसको परवाह?

मज़बूत नेता के राज में डॉलर के मुक़ाबले रुपया अब तक के इतिहास में सबसे कमज़ोर

क्या भारत महामारी के बाद के रोज़गार संकट का सामना कर रहा है?

क्या एफटीए की मौजूदा होड़ दर्शाती है कि भारतीय अर्थव्यवस्था परिपक्व हो चली है?

महंगाई के कुचक्र में पिसती आम जनता

RBI, वित्तीय नीतियों ने अनियंत्रित मुद्रास्फीति से असमानता को बढ़ाया


बाकी खबरें

  • sex ratio
    श्रुति एमडी
    तमिलनाडु: चिंताजनक स्थिति पेश कर रहे हैं लैंगिक अनुपात और घरेलू हिंसा पर NFHS के आंकड़े
    04 Dec 2021
    जन्म के दौरान लड़के-लड़कियों के अनुपात में पिछले पांच सालों में बहुत गिरावट आई है. अब 1000 लड़कों पर सिर्फ़ 878 महिलाएं हैं। जबकि 2015-16 में 1000 लड़कों पर 954 लड़कियों की संख्या मौजूद थी।
  • NEET-PG 2021 counseling
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    नीट-पीजी 2021 की काउंसलिंग की मांग को लेकर रेजीडेंट डॉक्टरों ने नियमित सेवाओं का किया बहिष्कार
    04 Dec 2021
    ‘‘ओपीडी सेवाएं निलंबित करने से प्राधिकारियों से कोई ठोस जवाब नहीं मिला तो हमें दुख के साथ यह सूचित करना पड़ रहा है कि हम फोरडा द्वारा बुलाए देशव्यापी प्रदर्शन के समर्थन में तीन दिसंबर से अपनी सभी…
  • Pilibhit
    तारिक अनवर
    भाजपा का हिंदुत्व वाला एजेंडा पीलीभीत में बांग्लादेशी प्रवासी मतदाताओं से तारतम्य बिठा पाने में विफल साबित हो रहा है
    04 Dec 2021
    नागरिकता और वैध राजस्व पट्टे की उम्मीदें टूट जाने के साथ शरणार्थियों को अब पिछले चुनावों में भाजपा का समर्थन करने पर पछतावा हो रहा है।
  • Gambia
    क्रिसपिन एंवाकीदेऊ
    गाम्बिया के निर्णायक चुनाव लोकतंत्र की अहम परीक्षा हैं
    04 Dec 2021
    गाम्बिया में राष्ट्रपति पद का चुनाव हो रहा है। पर्यवेक्षकों का मानना है ये चुनाव गाम्बिया के लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण अग्निपरीक्षा हैं। 
  • prashant kishor
    अनिल सिन्हा
    नज़रिया: प्रशांत किशोर; कांग्रेस और लोकतंत्र के सफ़ाए की रणनीति!
    04 Dec 2021
    ग़ौर से देखेंगे तो किशोर भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ तोड़ने में लगे हैं। वह देश को कारपोरेट लोकतंत्र में बदलना चाहते हैं और संसदीय लोकतंत्र की जगह टेक्नोक्रेट संचालित लोकतंत्र स्थापित करना चाहते हैं…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License