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राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
'सख़्त आर्थिक प्रतिबंधों' के साथ तालमेल बिठाता रूस  
व्लादिमीर पुतिन की पहली प्राथमिकता यही है कि वह ख़ुद को अपने लोगों के प्रति जवाबदेह बनाये रखें।
एम. के. भद्रकुमार
13 Mar 2022
russia
पश्चिमी प्रतिबंधों के तहत रूस का सेंट्रल बैंक 

गुरुवार को सरकार के मंत्रियों के साथ हुई बैठक में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की ओर से की गयी टिप्पणी पश्चिम के लगाये "सख़्त प्रतिबंधों" को लेकर उनकी पहली टिप्पणी थी। उनकी ये टिप्पणियां तक़रीबन पूरी तरह "रूसी अर्थव्यवस्था और अपने देश के लोगों पर लगाये गये इन प्रतिबंधों के असर को कम से कम करने के उपायों के एक समूह" पर केंद्रित थीं।

पुतिन की पहली प्राथमिकता ख़ुद को अपने लोगों के प्रति जवाबदेह बनाये रखना है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के विपरीत लोगों के बीच पुतिन की स्वीकार्यता 70% से भी ऊपर है,ऐसे में उन्हें दिखावा करने की कोई ज़रूरत भी नहीं है।

विरोधाभास यही है कि जहां प्रतिबंध लगाने वाले पश्चिमी देश खीझ, परेशानी और एंग्ज़ाइटी सिंड्रोम से गुज़र रहे हैं, वहीं "पीड़ित" रूस इन प्रतिबंधों से बेपरहवाह दिखायी देता है  और शांति के साथ "नयी स्थिति में सामान्य" होने की कोशिश कर रहा है। दोनों के बीच का यह फ़र्क छलावा नहीं हो सकता।

बेशक, क्रेमलिन ने इन पश्चिमी प्रतिबंधों को लेकर पूरी तरह से तैयारी की थी। प्रधान मंत्री मिखाइल मिशुस्तीन ने पुतिन को बताया कि क्षेत्रीय स्तर सहित सभी विभागों की गतिविधियों के बीच तालमेल बिठाने के लिहाज़ से एक "विशेष मुख्यालय" हरक़त में आ गया है। उन्होंने कहा, “सबसे संकटग्रस्त क्षेत्रों की सुरक्षा को लेकर क्षेत्र-दर- क्षेत्र के ज़रिये काम किया जा रहा है।” इसके "मुख्य लक्ष्य" हैं:

• "घरेलू बाज़ार की रक्षा";

• रसद और उत्पादन श्रृंखलाओं में आने वाली बाधाओं को दूर करते हुए उद्यमों के निर्बाध कामकाज को सुनिश्चित करना;

• लोगों और कारोबारों को बदलते हालात के मुताबिक़ शीघ्रता के साथ ढल जाने में मदद करना; और

• रोज़गार को बनाये रखना।

20 से ज़्यादा अहम क़ानून बनाये जाने की प्रक्रिया में हैं। इन क़ानूनों में वित्तीय बाज़ारों को स्थिर करने को लेकर विशिष्ट प्रस्ताव, ख़ासकर निजी क्षेत्र के उद्योगों का समर्थन करने के साथ-साथ "पूंजी की बहाली" के लिए विशिष्ट प्रस्ताव शामिल हैं।

इनमें से एक मसौदा क़ानून का मक़सद "बाहरी प्रबंधन" के ज़रिये विदेशी मालिकों को कारखानों को बंद करने से रोकना है।अगर हालात क़ाबू से बाहर जाते हैं,तो यह राष्ट्रीयकरण का एक अस्पष्ट संकेत भी है। दिलचस्प बात यह है कि ज़्यादतर पश्चिमी मालिक कर्मचारियों को वेतन का भुगतान करते हुए "कामकाज के अस्थायी रूप से रोके जाने" का ऐलान कर रहे हैं।

उस कृषि क्षेत्र के साथ-साथ आईटी क्षेत्र, निर्माण उद्योग, परिवहन कंपनियों और यात्रा और पर्यटन क्षेत्र पर ख़ास तौर पर ग़ौर किया जायेगा,जो न सिर्फ़ नौकरियों, बल्कि खाद्य सुरक्षा के लिहाज़ से भी अहम है। इसके लिए नियामक उपायों, ऋण चुकौती कार्यक्रमों, नौकरशाही प्रक्रिया आदि में पूरी तरह छूट दे दी गयी है।

मिशुस्टिन का कहना था, "देश में आर्थिक गतिविधियों को ज़्यादा से ज़्यादा आज़ादी, न्यूनतम विनियमन और नियंत्रण और निश्चित ही रूप से श्रम बाज़ार की मदद हमारी आर्थिक प्रतिक्रिया का आधार रहेगा। सरकार आयात की जगह आत्मनिर्भर होने की गुंज़ाइश का विस्तार करेगी और आपूर्ति श्रृंखला में विदेशी उत्पादों की जगह देश में ही उसके उत्पादन के लिए घरेलू उत्पादकों को मदद करेगी।

इस घटनाक्रम का एक मुख्य आकर्षण वित्त मंत्री एंटोन सिलुआनोव की ओर से घरेलू वित्तीय बाज़ार को स्थिर करने के उपायों पर की गयी प्रस्तुति थी, जिसमें यह रेखांकित किया गया कि क्रेमलिन ने रूस को अलग-थलग कर देने वाले पश्चिमी एजेंडे का कितना सटीक अनुमान लगा लिया था।

सिलुआनोव का कहना था, "पश्चिमी देशों ने रूस को लेकर अपनी वित्तीय देनदारियों पर हुई किसी चूक को रूस के सोने और मुद्रा भंडार पर फ़्रीज के साथ जोड़कर बुनियादी तौर पर एक वित्तीय और आर्थिक युद्ध शुरू कर दिया है।" उन्होंने कहा, "वे विदेशी व्यापार और निर्यात को रोकने को लेकर हर संभव कोशिश कर रहे हैं। आयात किये जाने वाले रोजमर्रे की ज़रूरी चीज़ों की कमी पैदा करने की कोशिश की जा रही हैं...(और) विदेशी पूंजी वाले कामायाब व्यवसायों को बंद होने के लिए मजबूर कर रहे हैं।"

इन परिस्थितियों में सरकार की "प्राथमिकता वित्तीय प्रणाली की इस स्थिति को स्थिर करना और इन्हें बिना रोक-टोक के संचालित किये जाने को सुनिश्चित करना है।" सिलुआनोव ने कहा कि इस दिशा में किये जा रहे उपायों में "विदेश में पूंजी के बाहर निकाले जाने को नियंत्रित करने वाली सावधानियां" और राष्ट्रीय ऋण सहित बाहरी ऋण की सेवा के लिहाज़ से चलायी जा रही एक विशेष प्रक्रिया शामिल है, जिसके तहत रूस रूबल में ही अपनी बाहरी देनदारियों का भुगतान करेगा और "अपने सोने और मुद्रा भंडार को डी-फ्रीज करते हुए विनिमय को अंजाम देगा।"

अन्य उपायों में कंपनियों की ओर से विदेशी मुद्रा आय का अनिवार्य से रूप से सौंपा जाना, उच्च रूबल ब्याज़ दरें, दो साल के लिए ब्याज़ से होने वाली निजी आय पर लगने वाले करों का हटाया जाना, सोने की ख़रीद पर वैट का हटाया जाना और "पूंजी माफ़ी पर एक बड़ी परियोजना" शामिल हैं।

केंद्रीय बैंक वित्तीय संस्थानों की तरलता,यानी नक़दी और निर्बाध रूप से किये जाने वाले संचालन की पूरी गारंटी देगा। सिलुआनोव का कहना था, "इन उपायों ने पहले ही नतीजे दे दिए हैं। जमा किये गये धन के बाहर ले जाये जाने की स्थिति को स्थिर किया जा रहा है और नक़द निकासी की राशि को लगभग रोक दिया गया है… भुगतान संतुलन में भी सुधार हो रहा है। चालू खाता प्राप्तियां पूंजी प्रवाह को संतुलित कर रही हैं।

इसे सुनिश्चित करने के लिए तेल और गैस राजस्व में हुई बड़ी बढ़ोत्तरी अन्य क्षेत्रों के राजस्व में होने वाली किसी भी तरह की गिरावट की भरपाई करेगी, जिससे उधार और सार्वजनिक ऋण कम हो जायेगा, और प्राथमिकता के हिसाब से ख़र्च किये जाने के लिए धन उपलब्ध कराया जायेगा।

सिलुआनोव ने इस बात पर ज़ोर देकर कहा कि सबसे अहम है कि सरकार सामाजिक प्रतिबद्धताओं को "शीर्ष बजट प्राथमिकता" मानती है। उन्होंने कहा, “हम पेंशन, लाभ, वेतन और अन्य भुगतानों का समय पर और पूर्ण भुगतान को सुनिश्चित करेंगे। पहले ही की तरह दवायें उपलब्ध करायी जायेंगी,जिसके दायरे में जटिल बीमारियों से ग्रस्त बच्चे भी शामिल होंगे।

“कम आय वाले जिन परिवारों में बच्चे हैं,उन्हें मई से नये भुगतान मिलने शुरू हो जायेंगे। हम इन उद्देश्यों के लिए बजट प्रणाली में अतिरिक्त ख़र्च तय करेंगे। सरकार ने संकट-विरोधी उपायों को लागू करना शुरू कर दिया है। हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता रोज़गार और नौकरियों को बनाये रखना है, और उन लोगों की मदद करना है, जिन्हें मौजूदा परिस्थितियों में मदद की दरकार है।”

कुल मिलाकर, यहां जो पूर्वानुमान लगाया गया है,वह "तबाही को लेकर" पश्चिमी भविष्यवाणियों को खारिज कर देता है। रूस के तेल निर्यात पर लगने वाले प्रतिबंधों को लेकर वाशिंगटन के प्रस्ताव को यूरोपीय संघ की ओर नामंज़ूर किया जाना वस्तुतः इस बात को सुनिश्चित कर देता है कि मास्को की आय में कोई कमी नहीं होने वाली है। 2021 में क्रेमलिन ने अपने बजट को तेल की क़ीमत से इस उम्मीद के साथ संतुलित किया था कि यह 45 डॉलर प्रति बैरल हो जायेगी। ये क़ीमतें इस समय 130 डॉलर प्रति बैरल से ज़्यादा हैं !

सरकार का यह परंपरागत राजकोषीय तरीक़ा पश्चिमी आर्थिक प्रतिबंधों के असर से अर्थव्यवस्था को काफ़ी हद तक बचा ले जाता है। विडंबना यही है कि दबाव उन यूरोपीय नेताओं पर होगा, जो रूस से प्रमुख ऊर्जा आपूर्ति व्यवधानों को लेकर चिंतित हैं और जहां उन्हें अपनी अर्थव्यवस्थाओं को ईंधन की आपूर्ति करनी है,वहीं रूस को दंडित भी करना है !

इसके उलट, पुतिन अगर गैस में कटौती करते हुए अपनी प्रतिक्रिया देते हैं, तो इससे ऊर्जा की क़ीमतें और बढ़ सकती हैं, मुद्रास्फीति बढ़ सकती है, और यूरोप की आर्थिक सुधार भी कमज़ोर पड़ सकता है। सीधे-सीधे शब्दों में कहा जाये,तो रूस अपने निकटवर्ती संयुक्त राज्य अमेरिका के मुक़ाबले बहुत बड़ा है, और एक शिक्षित आबादी वाला देश है और रूस की हर चीज़ों से नफ़रत करने वाले पश्चिमी देशों की उम्मीद से कहीं ज़्यादा यहां प्राकृतिक संपदा है !

स्विफ़्ट(SWIFT-Society for Worldwide Interbank Financial Telecommunications) से रूस के बाहर किये जाने के मामले को ही लें। सचाई यह है कि जहां सात रूसी बैंकों को स्वीफ़्ट से हटा दिया गया था, वहीं निशाने पर लिये गये इन बैंकों में  Sberbank या Gazprombank शामिल नहीं थे, जो कि संपत्ति के लिहाज़ से ये दोनों रूस के सबसे बड़े बैंक हैं। ऐसे में सवाल है कि ऐसा क्यों किया गया ? ऐसा ख़ास तौर पर ऊर्जा को लेकर रूस पर यूरोप की लगातार निर्भरता के कारण किया गया है ! 

मुद्दा यह है कि रूस वैश्विक अर्थव्यवस्था से जटिल रूप से जुड़ा हुआ है, इसके पास बड़ी मात्रा में अहम संसाधन है, और 2014 से ही रणनीतिक रूप से प्रतिबंधों के दीर्घकालिक प्रभावों से निपटने और स्विफ्ट से हटाये जाने की तैयारी कर रहा है।

इसके अलावा, इस बात को भी समझने की ज़रूरत है कि कई रूसी बैंक अब स्विफ्ट से अलग हो गये हैं, लेकिन वे अब भी अन्य बैंकों के साथ अंतरराष्ट्रीय लेनदेन को अंजाम दे सकते हैं - सिवाय इसके कि उन्हें पुराने टेलेक्स टेलीग्राम नेटवर्क या फ़ोन कॉल और ईमेल जैसे इंटरबैंक संचार के धीमे और कम सुरक्षित तरीकों का इस्तेमाल करना होता है।

वैसे तो रूस ने अपनी अंदरूनी वित्तीय लेनदेन के लिए अपनी संदेश प्रणाली विकसित कर ली है। वित्तीय संदेशों के हस्तांतरण का यह एक ऐसा सिस्टम है, जो काम के लिहाज़ से स्विफ्ट के विकल्प के रूप में चुटकी में काम कर सकता है।

इसी तरह, रूस के ख़िलाफ़ पश्चिमी प्रतिबंध से वैश्विक बाज़ारों पर लगातार असर का पड़ना तय हैं, जिसमें आपूर्ति श्रृंखला में पैदा होने वाली रुकावट के साथ-साथ ऊर्जा और कृषिगत वस्तुओं की ऊंची क़ीमतें शामिल हैं। रूस तेल और गैस का एक प्रमुख निर्यातक होने के अलावा दुनिया का सबसे बड़ा पैलेडियम उत्पादक और दुनिया का दूसरा बड़ा प्लेटिनम उत्पादक है।इन दोनों का इस्तेमाल सेमीकंडक्टर के निर्माण में होता है। रूस अन्य महत्वपूर्ण खनिजों, खनन वस्तुओं और कृषि वस्तुओं का एक प्रमुख निर्यातक भी है।

साफ़ है कि रूस के पास एशिया, अफ़्रीका और पश्चिम एशिया में इच्छुक व्यापार भागीदारों की कोई कमी इसलिए नहीं है, क्योंकि यह निकट भविष्य में व्यापार बाज़ारों को लेकर मुख्य रूप से ग़ैर-पश्चिमी-गठबंधन राष्ट्रों पर निर्भर रहने के लिए मजबूर है।

इसके बड़े निहितार्थ हैं। ये पश्चिमी प्रतिबंध संभावित रूप से पश्चिम और रूसी-गठबंधन वाले अर्थव्यवस्थाओं के बीच एक ऐसे वैश्विक आर्थिक विभाजन को तेज़ कर सकते हैं, जो कि मौजूदा यूएस-प्रभुत्व वाली वित्तीय प्रणाली से अलग होने के लिए आज़ाद हैं, जिससे नये सिरे से बनने वाली एक व्यापक वैश्विक आर्थिक रचना को रफ़्तार मिल सकती है।

इसमे कोई शक नहीं कि ये प्रतिबंध रूस को अमेरिका और यूरोपीय संघ के बाज़ारों से अलग कर देंगे, लेकिन इसके पास मौजूद प्राकृतिक संसाधनों का बड़ा भंडार और चीन के साथ इसके मज़बूत रिश्ते इस संभावना को कम कर देते हैं कि रूस आर्थिक रूप से अलग-थलग हो जाये।

इसके उलट, अगर पश्चिमी प्रतिबंध जारी रहते हैं, तो रूस के साथ आर्थिक रिश्ते वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक ग़ैर-पश्चिमी ब्लॉक के विकास में तेज़ी लाने में मदद कर सकते हैं, जिसका बतौर विश्व मुद्रा अमेरिकी डॉलर की स्थिति पर नुक़सानदेह असर पड़ेगा।

एकदम साफ़ है कि पहले से ही ऐसे शुरुआती संकेत मिल रहे हैं कि यूरोप, ख़ासकर फ़्रांस और जर्मनी में विचारशील लोगों के दिमाग़ में बेचैनी है और रूस के साथ फिर से जुड़ने की ज़रूरत को लेकर सचेत हैं। वे इससे किस तरह बाहर निकलते हैं, यह देखा जाना अभी बाक़ी है।

संभावना यही है कि जैसे ही रूस अपनी सुरक्षा गारंटी के सिलसिले में अपना रास्ता निकाल लेता है,वैसे ही प्रमुख यूरोपीय देशों और रूस के बीच के तालमेल की प्रक्रिया शुरू हो जायेगी। दरअसल, गुरुवार की बैठक में पुतिन ने इस बात का भरोसा जताया था कि वह अमेरिका के रवैये में उसी तरह के बदलाव आने की उम्मीद करते हैं, जिस तरह बाइडेन प्रशासन के रवैये में हाल ही में वेनेजुएला और ईरान के साथ बदलाव आया है।

रूस पर आक्रामक रूख़ अख़्तियार करने के लिए जाने जाते यूरोपीय संघ के विदेश नीति प्रमुख-जोसेप बोरेल ने गुरुवार को अपनी हताशा जताते हुए कहा कि यूरोपीय संघ ने रूस के ख़िलाफ़ सभी संभावित प्रतिबंधात्मक उपायों का इस्तेमाल कर लिया है।उनका कहना था, "बेशक, आगे बढ़ा जा सकता है, लेकिन हमारे पास जो कुछ भी करने की सीमा थी,उस सीमा तक हम पहले ही पहुंच चुके हैं। हमने वह सब कुछ कर लिया है, जो हम कर सकते थे।" बेशक, पुतिन अपनी पसंद और चुने हुए समय पर पश्चिमी प्रतिबंधों के ख़िलाफ़ जवाबी कार्रवाई करने का विकल्प सुरक्षित रखे हुए हैं। लेकिन,इस समय उनकी नज़र इन "सख़्त प्रतिबंधों" से रूसी अर्थव्यवस्था को बाहर ले आने पर है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Russia Adjusts to ‘Sanctions from Hell’

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