NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
आधुनिक काल के संत फादर स्टेन स्वामी
फादर स्टेन की संस्थागत हत्या (Father Stan's Institutional Murder) हमें याद दिलाती है कि कैसे इस देश में हमेशा से संतों को सत्ताधारियों के हाथों प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा है. इससे हमारे देश और हमारी संस्कृति का कद छोटा ही होता है.
राम पुनियानी
22 Jul 2021
फादर स्टेन स्वामी

गत 5 जुलाई 2021 को भारतीय मानवाधिकार आंदोलन ने अपना एक प्रतिबद्ध, सिद्धांतवादी और अथक योद्धा खो दिया.

फॉदर स्टेनीलॉस लोरडूस्वामी, जो स्टेन स्वामी के नाम से लोकप्रिय थे, ने मुंबई के होली स्पिरिट अस्पताल में अंतिम सांस ली. जिस समय वे अपनी मृत्युशैया पर थे उस समय उनकी जमानत की याचिका पर अदालत में सुनवाई हो रही थी. वे भीमा-कोरेगांव मामले में तालोजा जेल में कैद थे. एनआईए ने उन पर आतंकवादी होने का आरोप लगाया था. वे अत्यंत सख्त गैर-कानूनी गतिविधियां (निरोधक) कानून (यूएपीए) के अंतर्गत आरोपी बनाए गए सबसे बुजुर्ग व्यक्ति थे. इस कानून के अंतर्गत प्रकरण की सुनवाई के लिए कोई समयसीमा निर्धारित नहीं है और अभियोजन के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह किसी निश्चित अवधि के भीतर आरोपी के विरूद्ध सबूत प्रस्तुत करे. बिना समुचित कारण के आरोपियों को लंबे समय तक जेल में रखा जा सकता है.

फादर स्टेन स्वामी को लगभग 8 माह पहले गिरफ्तार किया गया था.

भीमा-कोरेगांव में हुई जिस घटना के सिलसिले में फादर स्टेन स्वामी को आरोपी बनाया गया था वह 1 जुलाई 2018 को हुई थी. उस दिन सन् 1818 में पेशवा की सेना के साथ हुए युद्ध में मारे गए दलित योद्धाओं को श्रद्धांजलि देकर लौट रहे हजारों दलितों पर हमले हुए थे. भीमा-कोरेगांव युद्ध, पेशवा बाजीराव की सेना जिसके अधिकांश सैनिक उच्च जातियों के थे, और ईस्ट इंडिया कंपनी की महार-बहुसंख्यक सेना के बीच हुआ था. इस युद्ध में पेशवा की हार को दलितों ने जातिवादी ताकतों की पराजय के रूप में देखा और उसका उत्सव मनाया. युद्धस्थल पर एक विजय स्तंभ का निर्माण किया गया और हर साल 1 जुलाई को हजारों की संख्या मे दलित, ब्राह्मणवादी ताकतों की पराजय का उत्सव मनाने वहां पहुंचने लगे. बाबासाहेब अंबेडकर ने भी सन् 1928 में भीमा-कोरेगांव पहुंचकर दलित सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित की थी. भीमा-कोरेगांव का विजय स्तंभ, दलितों के लिए एक प्रतीक था. वहां जाकर वे अपने आपको सशक्त महसूस करते थे.

सन् 2018 में इस युद्ध के दो सौ साल पूरे होने पर लाखों दलितों ने वहां पहुंचकर दलितों के उत्थान और ब्राह्मणवादी शक्तियों के पतन के संघर्ष के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की थी. दलितों पर हमले के तुरंत बाद, दो हिन्दुत्ववादी नेताओं, संभाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे, के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी. जस्टिस पी. बी. सावंत और जस्टिस कोलसे पाटिल ने भीमा-कोरेगांव में एलगार परिषद का आयोजन किया था.

बाद में इस प्रकरण की जांच राज्य सरकार से लेकर एनआईए को सौंप दी गई.

एनआईए ने कहा कि हिंसा की योजना माओवादियों ने बनाई थी और एक के बाद एक कई लोगों को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया. इनमें शामिल थे सुरेन्द्र गार्डलिंग, वरनान गौंसालवेस, अरूण फरेरा, सुधा भारद्वाज और शोमा सेन. आरोप यह लगाया गया कि ये लोग सरकार का तख्ता पलट करना चाहते थे और प्रधानमंत्री मोदी की हत्या की योजना बना रहे थे. गिरफ्तार लोगों को 'शहरी नक्सल' बताया गया, अर्थात ऐसे लोग जो शहरों में रहकर नक्सली गतिविधियों को प्रोत्साहित करते हैं.

इस मामले में एनआईए ने अब तक अपने आरोपों के समर्थन में कोई सबूत प्रस्तुत नहीं किया है. हां, ऐसे सबूत अवश्य सामने आए हैं जो आरोपों का खोखलापन दर्शाते हैं.

अमरीकी कंपनी आर्सनेल कंसलटिंग के अनुसार रोना विल्सन और सुरेन्द्र गार्डलिंग के लैपटाप में कथित पत्र एक षड़यंत्र के तहत बाद में डाले गए थे. अदालत ने इस तथ्य का संज्ञान नहीं लिया है. इस मामले में केवल क्रांतिकारी कवि वरवरा राव को स्वास्थ्य कारणों से 6 माह की जमानत दी गई है.

स्टेन स्वामी को जमानत नहीं मिल सकी. वे पार्किन्संस डिजीज से पीड़ित थे. उन्हें पानी और चाय पीने लिए सिपर तक उपलब्ध नहीं कराया गया. स्टेन स्वामी ने जेल से एक पत्र लिखा, जिसका शीर्षक था "पिंजरे के पंछी भी गा सकते हैं".

उन्होंने लिखा कि जेल में बंद अन्य कैदी हर तरह से उनकी मदद कर रहे हैं परंतु उनके शरीर की स्थिति खराब होती जा रही है. इसके काफी दिनों बाद अदालत ने एक सामुदायिक अस्पताल में उनका इलाज करवाने की इजाजत दी. उन्हें जमानत फिर भी नहीं दी गई. इस बीच उन्हें कोरोना भी हो गया जिससे वे और कमजोर हो गए. उनकी मृत्यु पर भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर के अनेक मानवाधिकार संगठनों ने शोक व्यक्त किया है. संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार उच्चायोग के कार्यालय और यूरोपीय यूनियन के मानवाधिकार प्रतिनिधि ने उनकी मृत्यु पर गहरा दुःख और चिंता व्यक्त की है.

फादर झारखंड के आदिवासियों के बीच काम करते थे. भाजपा सरकार इस राज्य की अमूल्य प्राकृतिक संपदा को आदिवासियों से छीनकर उद्योग जगत के कुबेरपतियों के हवाले कर रही थी. इसका विरोध करने वाले हजारों आदिवासियों को जेल की सलाखों के पीछे धकेल दिया गया था. फादर स्टेन स्वामी, आदिवासियों के साथ मजबूती से खड़े थे. उन्होंने लिखा था "अगर आप इस तरह के विकास का विरोध करते हैं तो आप विकास विरोधी हैं; जो विकास विरोधी है, वो सरकार विरोधी है और जो सरकार विरोधी है वह राष्ट्र विरोधी है. यह बहुत स्पष्ट समीकरण है. यही कारण है कि सरकार मुझे माओवादी कहती है यद्यपि मैं माओवादियों के तरीकों का विरोधी हूं और मेरा उनसे कोई लेना-देना नही है."

फादर स्टेन स्वामी उस दल के सदस्य थे जिसने सन् 2016 में झारखंड में आदिवासियों की स्थिति पर एक रपट तैयार की थी. इस रपट का शीर्षक था, "प्राकृतिक संसाधनों पर अपने अधिकारों से वंचित आदिवासियों को मिल रहा है जेल". उनका जीवन अत्यंत सादा था. वे आदिवासियों के बीच रहते थे और उनके अधिकारों के लिए लड़ते थे.

हमने एक महान मानवाधिकार कार्यकर्ता को खो दिया है जो कभी शोहरत के पीछे नहीं भागा और जिसने हमेशा गरीब आदिवासियों के हकों की लड़ाई लड़ी.

स्टेन स्वामी के साथ जो कुछ हुआ वह हमारी न्यायपालिका की असंवेदनशीलता को भी दर्शाता है. उन पर प्रधानमंत्री की हत्या का षड़यंत्र रचने का अत्यंत अविश्वसनीय आरोप था! दरअसल स्टेन स्वामी की गिरफ्तारी प्रतिरोध की आवाजों को कुचलने का प्रयास थी. उन लोगों की आवाज को जो महात्मा गांधी के शब्दों में आखिरी पंक्ति के अंतिम छोर पर खड़े हैं. आज की सरकारों की कृपादृष्टि पहली पंक्ति में सबसे आगे खड़े लोगों पर है.

हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब एक ओर वनवासी कल्याण आश्रम जैसे संघ से जुड़े संगठन आदिवासियों को हिन्दू धर्म के झंडे तले लाने में जुटे हुए हैं तो दूसरी ओर आदिवासियों के हकों के लिए लड़ने वाले स्टेन स्वामी जैसे लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ रही है.

इस महान व्यक्ति की तुलना केवल उन संतों से की जा सकती है जो न्याय और नैतिकता हिमायती थे. फादर स्टेन की संस्थागत हत्या (Father Stan's Institutional Murder) हमें याद दिलाती है कि कैसे इस देश में हमेशा से संतों को सत्ताधारियों के हाथों प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा है. इससे हमारे देश और हमारी संस्कृति का कद छोटा ही होता है.

अब समय आ गया है कि हम सब एक मंच पर आकर सभी हाशियाकृत समुदायों के अधिकारों के लिए लड़ें. फादर स्टेन स्वामी को हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएं और प्रजातांत्रिक मूल्यों के हनन का पुरजोर विरोध करें.

(अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

(लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सन्  2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)

Father Stan Swamy
Stan Swamy
UAPA

Related Stories

मोदी जी, देश का नाम रोशन करने वाले इन भारतीयों की अनदेखी क्यों, पंजाबी गायक की हत्या उठाती बड़े सवाल

विशेष: कौन लौटाएगा अब्दुल सुब्हान के आठ साल, कौन लौटाएगा वो पहली सी ज़िंदगी

दिल्ली दंगा : अदालत ने ख़ालिद की ज़मानत पर सुनवाई टाली, इमाम की याचिका पर पुलिस का रुख़ पूछा

‘मैं कोई मूक दर्शक नहीं हूँ’, फ़ादर स्टैन स्वामी लिखित पुस्तक का हुआ लोकार्पण

एनआईए स्टेन स्वामी की प्रतिष्ठा या लोगों के दिलों में उनकी जगह को धूमिल नहीं कर सकती

RTI क़ानून, हिंदू-राष्ट्र और मनरेगा पर क्या कहती हैं अरुणा रॉय? 

कश्मीर यूनिवर्सिटी के पीएचडी स्कॉलर को 2011 में लिखे लेख के लिए ग़िरफ़्तार किया गया

4 साल से जेल में बंद पत्रकार आसिफ़ सुल्तान पर ज़मानत के बाद लगाया गया पीएसए

गाँधी पर देशद्रोह का मामला चलने के सौ साल, क़ानून का ग़लत इस्तेमाल जारी

फादर स्टेन स्वामी की हिरासत में मौत 'हमेशा के लिए दाग': संयुक्त राष्ट्र समूह


बाकी खबरें

  • women in politics
    तृप्ता नारंग
    पंजाब की सियासत में महिलाएं आहिस्ता-आहिस्ता अपनी जगह बना रही हैं 
    31 Jan 2022
    जानकारों का मानना है कि अगर राजनीतिक दल महिला उम्मीदवारों को टिकट भी देते हैं, तो वे अपने परिवारों और समुदायों के समर्थन की कमी के कारण पीछे हट जाती हैं।
  • Indian Economy
    प्रभात पटनायक
    बजट की पूर्व-संध्या पर अर्थव्यवस्था की हालत
    31 Jan 2022
    इस समय ज़रूरत है, सरकार के ख़र्चे में बढ़ोतरी की। यह बढ़ोतरी मेहनतकश जनता के हाथों में सरकार की ओर से हस्तांतरण के रूप में होनी चाहिए और सार्वजनिक शिक्षा व सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए हस्तांतरणों से…
  • Collective Security
    जॉन पी. रुएहल
    यह वक्त रूसी सैन्य गठबंधन को गंभीरता से लेने का क्यों है?
    31 Jan 2022
    कज़ाकिस्तान में सामूहिक सुरक्षा संधि संगठन (CSTO) का हस्तक्षेप क्षेत्रीय और दुनिया भर में बहुराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बदलाव का प्रतीक है।
  • strike
    रौनक छाबड़ा
    समझिए: क्या है नई श्रम संहिता, जिसे लाने का विचार कर रही है सरकार, क्यों हो रहा है विरोध
    31 Jan 2022
    श्रम संहिताओं पर हालिया विमर्श यह साफ़ करता है कि केंद्र सरकार अपनी मूल स्थिति से पलायन कर चुकी है। लेकिन इस पलायन का मज़दूर संघों के लिए क्या मतलब है, आइए जानने की कोशिश करते हैं। हालांकि उन्होंने…
  • mexico
    तान्या वाधवा
    पत्रकारों की हो रही हत्याओंं को लेकर मेक्सिको में आक्रोश
    31 Jan 2022
    तीन पत्रकारों की हत्या के बाद भड़की हिंसा और अपराधियों को सज़ा देने की मांग करते हुए मेक्सिको के 65 शहरों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गये हैं। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License