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राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
सीरिया, साम्राज्यवाद रचित सर्वनाश और शरणार्थी संकट है
नीलोत्पल बसु
29 Sep 2015

क्या यह महज एक संयोग था? ठीक उस समय ब्रिटेन और शेष दुनिया भी, ब्रिटिश लेबर पार्टी के नेता के  पद पर जेरेमी कॉर्बिन के चुने जाने की हैरान करने वाली खबर को हजम करने की कोशिशों में लगी हुई थी, लंदन में और योरप भर के सभी बड़े शहरों में ‘‘शरणार्थियों का स्वागत है’’ के नारों के साथ, जनता के विशाल जुलूस निकल रहे थे।

कॉर्बिन का चुनाव

शायद यह संयोग ही नहीं था। जेरेमी कॉर्बिन वैसे तो 1983 से ही ब्रिटिश हाउस ऑफ कामन्स (प्रतिनिधि सदन) के सदस्य थे। इसके बावजूद, इससे पहले तक तो हमेशा लेबर पार्टी के नेतृत्व के संघर्ष में तो उन्हें पूरी तरह से बाहरी ही माना जाता रहा था। सच तो यह है कि इस बार भी लेबर पार्टी के शीर्ष  नेता के पद के लिए दौड़ में शामिल होने के लिए उसके लिए न्यूनतम समर्थन भी काफी मुश्किल से ही जुटाया गया था। बहरहाल, लेबर पार्टी के सदस्यों के 60 फीसद का समर्थन हासिल कर, कॉर्बिन ने जो कर के दिखाया है, वह न सिर्फ ब्रिटेन के लिए एक महत्वपूर्ण घटना विकास है बल्कि पूरे योरपीय महाद्वीप के लिए इसके महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं। कॉर्बिन की ख्याति लेबर पार्टी में सबसे अविचल वामपंथी नेताओं में से एक की है और बहुत को अचरज में डालते हुए भी वह अविचल रूप से नव-उदारवादी छलावों तथा नव-लेेबर की ब्लेयरवादी बकवास के पीछे भागने का विरोध करते रहे थे। इसी प्रकार, कॉर्बिन ने अविचल रूप से फिलिस्तीनी जनता के संघर्ष के साथ एकजुटता का रिश्ता बनाए रखा था और पश्चिम एशिया में तथा उत्तरी अफ्रीका में पश्चिम की सामराजी कारस्तानियों का तथा इस्राइल के लिए उनकी मुजरिमाना मदद का विरोध करते आए थे।

 

आज की परिस्थितियों में, जब नवउदारवादी नीति के बोझ तले विकसित पश्चिम में असमानताएं बढ़ रही हैं, बढ़ते पैमाने पर रोजगार छिन रहे हैं तथा असुरक्षा बढ़ रही है; जब अरब दुनिया में साम्राज्यवादी हस्तक्षेप से उत्पे्ररित तत्ववाद के बढऩे की प्रतिक्रिया तथा इसके चलते पैदा हो रही अंध-इस्लाम-भीति का काफी असर हो रहा है; बेशक दक्षिणपंथ को ही और ताकत मिलने के लिए उपजाऊ जमीन मौजूद थी। वास्तव में नव-फासीवादी, प्रवासीविरोधी भावनाएं खतरनाक तरीके से जोर पकड़ रही थीं।  लेकिन, जाहिर है कि इसी सब के बीच लेबर पार्टी की कतारों में नीचे से, इस सबके खिलाफ मुकाबला करने तथा इन्हें पीछे धकेलने की भावना भी बल पकड़ रही थी। इसी का साक्ष्य उस राजनीतिक प्रक्रिया के रूप में सामने आया है, जिसने कॉर्बिन को लेबर पार्टी के नेता के पद पर पहुंचाया है। जैसाकि कुछ पे्रक्षकों ने कहा भी, यह एक ‘बगावत’ से कम नहीं थी, जिसने कॉर्बिन की उम्मीदवारी की धुरी पाकर जबर्दस्त जोर पकड़ लिया।

वास्तव में इसी समय पर योरप भी हुई शरणार्थियों के स्वागत की रैलियां, त्याग की जरूरत को पहचानने को दिखाती थीं। अपने प्राणों तथा रोजी-रोटी के संकट में पडऩे के चलते, हताश तथा भयभीत असहाय शरणार्थी, भारी जोखिम उठाकर भूमध्य सागर पार कर के, सुरक्षा की तलाश में योरप में पहुंच रहे थे।

आइलिन कुर्दी और विश्व अंतरात्मा

फिर भी तीन वर्षीय सीरियाई अबोध बाल, आइलिन कुर्दी की तस्वीर ने सारी दुनिया की आत्मा को झिंझोडक़र रख दिया। इस असहाय शिशु और उसके पांच वर्षीय भाई गालिप के साथ, उनके माता-पिता ने, एक अनगढ़ की नाव में भूमध्य सागर पार करने का दुस्साहस किया था। वास्तव में यह परिवार, ऐसे बेईमान मानव-तस्करी करने वालों के चंगुल में फंस गया था, जो मुसीबत के मारे लोगों को निचोडऩे में लगे हुए हैं। लेकिन, इस करुण कहानी के खलनायक क्या ये मानव-तस्कर ही थे?

आइलिन की मृत देह लहरों के साथ तुर्की के तट पर जा लगी थी। एक फोटोकारा ने इसी स्थिति में अबोध शिशु की मृत देह की तस्वीर खींच ली और उसे सोशल मीडिया पर डाल दिया। यह तस्वीर वाइरल हो गयी। लाखों लोगों ने इस तस्वीर को शेयर किया और भावनाओं का ज्वार उमड़ पड़ा। इससे हृदयद्रावक तस्वीर की कल्पना करना मुश्किल है--गीली रेत में एक तरह से गढ़ा हुआ सा असहाय चेहरा और फिर भी इतनी खतरनाक यात्रा के लिए जूतों तथा लाल टीशर्ट समेत, अच्छी तरह से तैयार हुआ बच्चा।

यह तस्वीर अभूतपूर्व आकार-प्रकार की मानवीय त्रासदी को जैसे मूर्त रूप दे रही थी। बेशक, यह विश्व मीडिया की प्रकृति पर अपने आप में एक मार्मिक टिप्पणी है कि इस त्रासदी की ओर दुनिया का ध्यान खींचने के लिए ऐसी परिस्थितियों आइलन की शहादत की जरूरत पर पड़ी, जिन पर उसका या उसके समुदाय का कोई नियंत्रण ही नहीं है। यह विकराल त्रासदी सिर्फ सीरिया में ही नहीं बल्कि पश्चिम एशिया के अनेक हिस्सों में लगातार जारी है। सुरक्षित दूरी पर बैठकर, इस पूरे क्षेत्र को युद्घ और टकरावों की त्रासदी के मुंह में धकेलने वाली ताकतों के बारे में यह प्रकरण जो कुछ कहता है, उसका तो खैर जिक्र ही क्या करना।

विकराल संकट

संयुक्त राष्ट्र संघ की शरणार्थी एजेंसी, यूएनएचसीआर का कहना है कि शरणार्थियों की संख्या में बढ़ोतरी, ‘‘अपने शीर्ष पर है क्योंकि हिंसा तथा उत्पीडऩ’’ बढ़ रहे हैं। जहां 2005 में शरणार्थियों की संख्या 3 करोड़ 75 लाख थी, 2014 तक यह संख्या बढक़र 5 करोड़ 95 लाख तक पहुंच चुकी थी।

जिन क्षेत्रों से सबसे ज्यादा शरणार्थी निकल रहे हैं, उनमें इराक, लीबिया, अफगानिस्तान, यमन और जाहिर है सीरिया, प्रमुख हैं। यूएनएचसीआर के अनुसार 2014 में योरप में शरण हासिल करने की कोशिश में 2,19,000 लोगों ने भूमध्य सागर पार करने की कोशिश की थी। 2015 के पहले आठ महीनों में ही यह संख्या बढक़र 3 लाख से ऊपर निकल चुकी थी। सुरक्षा की तलाश में योरप में घुसने की कोशिश करने वालों में, 2500 को मौत को गले लगाना पड़ा है।

सीरिया में हालात सबसे खराब हैं। वहां विस्थापन शुरू होने के बाद से, 40 लाख से ज्यादा शरणार्थी तो संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा ही दर्ज किए जा चुके हैं। इसके ऊपर 70 लाख आंतरिक विस्थापित हैं। इस तरह 2011 के बाद से कुल मिलाकर इस देश की आधी से ज्यादा आबादी अपने घरों से उखड़ चुकी है।

सीरिया का शरणार्थी संकट इसलिए और भी दयनीय है कि वहां से निकलने वाले शरणार्थियों में 51 फीसद, 19 वर्ष से कम आयु के हैं और 39 फीसद तो 11 वर्ष से भी कम आयु के हैं। दूसरे शब्दों में यह एक राष्ट्र और जनगण के करीब-करीब पूरी तरह से ही तबाह हो जाने का ही मामला है।

सीरिया के संकट के लिए जिम्मेदार कौन?

इस सचाई को पहचानने के लिए किसी बहुत भारी विशेषज्ञता की जरूरत नहीं है कि साम्राज्यवाद ने तेल व अन्य ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण की अपनी हवस में तथा क्षेत्रीय वर्चस्व हासिल करने की अपनी वृहत्तर मुहिम के हिस्से के तौर पर और इस्राइल तथा साऊदी अरब की अगुआई में खाड़ी की शेखशाहियों की मदद से, सीरिया में इस तबाही को अंजाम दिया है।

इस प्रक्रिया में उन्होंने ऐसी भयंकर तबाही बरपा की है, जिसकी जैसी दूसरी मिसालें विश्व इतिहास में कम ही मिलेंगी। पहले अफगानिस्तान, फिर इराक, फिर लीबिया और अब ईरान की मुश्कें कसने के चक्कर में सीरिया, ये सब रणनीतिक महत्व के संसाधनों तथा व्यापकतर नियंत्रण की पश्चिम की हवस के  तबाही करने वाले सफर के विराम के ठिकाने हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि यह सफर खून और बर्बादी का ऐसा दरिया पीछे छोड़ता गया है, जिसमें  दसियों लाख लोगों की जिंदगियां खतरे में पड़ गयी हैं। तीन बरस का आइलिन कुर्दी इसी तबाही का शिकार हुआ।

बेशक, साम्राज्यवाद द्वारा छेड़ी गयी सीधी लड़ाई की भी आम नागरिकों को जान-माल से भारी कीमत चुकानी पड़ी थी। लेकिन, साम्राज्यवादी युद्घ ने तो एक नये भस्मासुर को भी खड़ा कर दिया। यह भस्मासुर है--तत्ववादी अतिवाद का। उसके कई अवतार सामने आए हैं--सबसे पहले अल कायदा, फिर अल नुस्रा और ताजातरीन तथा सबसे भयावह, इस्लामी स्टेट। जाहिर है कि ये तो आतंक तथा मध्ययुगीनता के हथियारों के सहारे खड़े कुछ सबसे तथा मुख्य संगठन हैं, जबकि ऐसे ही छोटे-छोटे गु्रपों की संख्या तो अननिगत होगी।

यह तो पूरी तरह से स्पष्टï ही है कि ऐसा समूचा नृशंस घटनाविकास, साम्राज्यवाद के ‘‘निजाम बदलने’’ के खेल और सीरिया में भी उनकी ऐसी ही विचारहीन कोशिशों का ही नतीजा है। बेशक, यह सब कथित रूप से ‘जनतंत्र’ तथा ‘मानव मूल्यों’ की स्थापना के नाम पर किया जा रहा था, ताकि इन समाजों को ‘सभ्य समाज’ के मूल्यों यानी पश्चिम के अनुरूप ढाला जा सके। रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पूतिन ने पिछले ही दिनों यह कहते हुए एकदम सही जगह पर उंगली रख दी कि यह ऐसी धारणा है जिसके तहत पश्चिम में खुद को यह अधिकार दे दिया है कि वह अंतर्राष्टï्रीय कायदे-कानून का उल्लंघन करते हुए, अन्य देशों के जनगणों पर अपनी मर्जी से ऐसे मानक थोप सकता है, जो उन जनगणों की संस्कृतियों तथा सभ्यताओं से मेल तक नहीं खाते हैं।

जेरेमी कॉर्बिन ने तो और भी मुंहफट तरीके से यही बात कही। लेबर पार्टी के नेतृत्व के लिए दावेदारी के अपने अभियान के क्रम में उन्होंने दो-टूक शब्दों में एलान किया कि इराक में युद्घ अपराधों का जो एकदम उपयुक्त मामला बनता है, उसके लिए टॉनी ब्लेयर को हेग की अंतर्राष्टï्रीय आपराधिक अदालत के कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। वही क्यों जार्ज बुश, डिक चेनी, डोनाल्ड रम्जफील्ड, सभी ऐसे ही सलूक के हकदार हैं। अब तो इन देशों की भी जनता अच्छी तरह से समझ गयी है कि ये नेता क्या खेल खेल रहे थे।

संकट का प्रत्युत्तर

इस संकट पर जिस तरह का प्रत्युत्तर सामने आया है, वह भी उनके बारे में काफी कुछ कहता है, जो इस संकट को पैदा करने के लिए जिम्मेदार हैं।

जिन पांच देशों से सबसे ज्यादा शरणार्थी निकल रहे हैं, उन सभी में अमरीका ने ही झगड़े भडक़ाए हैं। इराक में कम से कम दस लाख लोग मारे गए, वहां अल कायदा के पांव जम गए और अब उसने आइ एस का रूप ले लिया है, जिसकी बर्बर हरकतों के चलते 33 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं। उधर अफगानिस्तान में अमरीकी कब्जा तथा युद्घ जोर पकड़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार, अफगान शरणार्थियों की संख्या 26 लाख बैठेगी। लीबिया में, अमरीकी-नाटो अभियान ने पूरे देश को ही तबाह कर दिया है और आइ एस से संबद्घ संबद्घ संगठनों ने उत्तरी अफ्रीका में पांव जमा लिए हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुमान के अनुसार, 3 लाख 60 हजार से ज्यादा लीबियावासी विस्थापित हैं। उधर, अपने सहयोगियों के साथ मिलकर साउदी अरब, यमन पर तबाही बरपा करने में लगा हुआ है और इन हमलों में अब तक 4,500 जानें जा चुकी हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार, 3,30,000 यमनवासी विस्थापित हैं।

लेकिन, जहां तक शरण देने का सवाल है, अमरीका ने सिर्फ 1,500 सीरियाइयों को शरण दी है। इसके विपरीत जर्मनी, 2015 में ही 8 लाख शरणार्थियों को शरण देने का इरादा रखता है।

दूसरी ओर साउदी अबर, यू ए ई, बहरीन, ओमन तथा कुवैत जैसे इस देश के सब से धनी देशों ने एक भी शरणार्थी को अपने यहां शरण नहीं दी है। याद रहे कि इन्हीं देशों ने इराक में तथा सीरिया में अल कायदा, अल नुस्रा और अब आइ एस को खड़ा करने में अपना पैसा लगाया है। संबंधित तथ्य सारी दुनिया के सामने हैं।

संकट पर इस प्रतिक्रिया की तुलना जरा साउदी शेखशाही की तडक़-भडक़ और शानो-शौकत से भी कीजिए। राष्ट्रपति ओबामा से मुलाकात के लिए अपनी तीन दिन की यात्रा के दौरान, साउदी शेख सलमान ने पूरा का पूरा लक्जरी होटल, डीसी होटल, सभी 222 कमरों के साथ बुक कराया था। इस पर कुल 1 अरब डालर प्रति दिन का खर्चा हुआ था। लेकिन, साउदी शेखशाही का कहना है कि शरणार्थियों पर खर्च करने के लिए उसके पास पैसे ही नहीं हैं। अचरज नहीं कि साउदी शासकों ने हाल ही में जब जर्मनी से सीरियाई शरणार्थियों के लिए वहां 200 मस्जिदें बनाने के लिए 20 करोड़ डालर देने की पेशकश की, रिचर्ड डॉकिन्स ने इस पेशकश के प्रति खुलकर हिकारत का प्रदर्शन किया। तत्ववाद के ही मदद देने की चिंता का इससे स्पष्टï उदाहरण और क्या होगा?

सीरिया का उबलता कढ़ाह

इस बीच एक-एक कर तथ्य सामने आ रहे हैं। सीरिया की सरकार काफी पहले से जो आरोप लगाती आ रही थी, अब अमरीकी प्रतिरक्षा खुफिया एजेंसी (डी आइ ए) की रिपोर्ट के माध्यम से एक सच के रूप में सार्वजनिक जानकारी में आ चुका है। यह रिपोर्ट, जिसे पहले क्लासीफाइड ‘‘गोपनीय’’ रिपोर्ट बनाकर रखा गया था, 12 अगस्त 2012 की है। यह रिपोर्ट सेंटकॉम, सीआइए, एफबीआइ, डीएचएस, एनजीए, विदेश विभाग तथा सुरक्षा से जुड़ी अन्य अमरीकी एजेंसियों के बीच सर्कुलेट की गयी थी।

यह रिपोर्ट कहती है: ‘‘पश्चिमी दुनिया, खाड़ी देश तथा तुर्की सीरियाई विपक्ष को समर्थन दे रहे हैं, वहां पूर्वी सीरिया (हसाका तथा डेर जोर) में एक घोषित या अघोषित, सलाफीवादी राज कायम करने की संभावनाएं हैं और ठीक यही हम विपक्ष की समर्थक ताकतों की कोशिश है, ताकि सीरिया के निजाम को अगल-थलग डाला जा सके।’’

लगातार ऐसे साक्ष्य सामने आ रहे हैं जो उस अविचारपूर्ण चालबाजी को सामने लाते हैं, जिसके चलते ही आइ एस के  खतरे ने ऐसा दानवीय रूप लिया है। हाल ही में रूस ने अमरीका तथा उसके कुछ सहयोगियों की आपत्तियों के बावजूद, सीरियाई सरकार के लिए सैन्य साज-सामान पहुंचाने तथा और ज्यादा सैन्य सहायता मदद मुहैया कराने का जो कदम उठाया है, अमरीका के पाखंड को ही उजागर करता है, जो वास्तव में आइ एस के साथ तार जोड़े हुए है, हालांकि  सार्वजनिक घोषणाओं में उसे ध्वस्त करने की बातें करता है। रूसी विदेश मंत्री ने अमरीका के इस दोमुंहेपन की ओर जमकर इशारे किए हैं और रेखांकित किया है कि रूसियों के पास इसकी पर्यापत ठोस जानकारियां हैं किस तरह आइ एस से जुड़े ठिकानों पर पश्चिमी हवाई बमबारियों में, मूल योजना से हटकर चला गया था और इसके स्वत:स्पष्टï संकेत थे कि  आइ एस को पहले से इन हमलों की जानकारी थी।

अविचारपूर्ण तिकड़मों का खेल अब भी जारी है। कुर्द बोलबालेवाले क्षेत्रों में तुर्की द्वारा आइ एस के खिलाफ लड़ाई में लगे कुर्द सशस्त्र प्रतिरोध बलों पर लगातार हमले किए जा रहे हैं। वास्तव में, सीरिया में ‘‘निजाम बदलवाने’’ का पश्चिम का हठ, एकजुट होकर आइ एस का मुकाबला करने की पश्चिम की घोषणाओं को पूरी तरह से पटरी से उतारे दे रहा है।

समाधान कैसे निकले?

साफ है कि वर्तमान शरणार्थी संकट का सिर्फ एक पहलू ही नहीं है। इसे महज एक मानवतावादी संकट तो किसी भी तरह से नहीं कहा जा सकता है। इसमें शक नहीं कि अब जबकि जनतांत्रिक शक्तियां अंतर्राष्टï्रीय वित्त द्वारा भडक़ाई गयी असहिष्णुता, नव-फासीवाद तथा प्रवासीविरोधी बकवास का मुकाबला कर रही हैं, बढ़ते पैमाने पर इसकी समझदारी भरी आवाजें सामने आने जा रही हैं कि  योरप के विभिन्न हिस्सों में और शायद दुनिया में दूसरी जगहों पर भी, सीरियाई तथा अन्य शरणार्थियों के लिए जगह बनायी जाए।

लेकिन, यह शरणार्थियों को बसाने भर का सवाल तो है नहीं। इस संकट की भेंट चढ़े आइलिन कुर्दी के पिता, अब्दुल्ला कुर्दी का एक बहुत ही मर्मस्पर्शी पत्र हाल ही में प्रकाशित हुआ है। इस पत्र में अभागे पिता ने लिखा है: ‘‘हमारी सीरियाई पितृभूमि, स्थानीय तथा अंतर्राष्टï्रीय सत्ता संघर्ष का केंद्र बन गयी है...जहां न तो सुरक्षा है और न आर्थिक स्थिरता।’’ वह आगे यह भी लिखते हैं कि, ‘‘यही वजह है कि लोग अपने पिता तथा बाबाओं का देश, दूसरे देशों के लिए छोडक़र, अपना बोरिया-बिस्तर लेकर इस उम्मीद में निकल पड़े हैं कि सुरक्षा मिलेगी और इंसानी जिंदगी मिलेगी। इस तरह के सत्ता संघर्षों में हमेशा आम जनता की ही बलि चढ़ती है। राजनीतिक तथा आर्थिक सुरक्षा, दोनों के ही कारणों से...शुरू में मैं सीरिया के एक अन्य इलाके में गया था और वहां से भागकर विदेश आया... इसकी बहुत ज्यादा कीमत चुकानी पड़ी है। मेरी पत्नी और दोनों बच्चों को मैं खो चुका हूं। इसके बावजूद, मेरी त्रासदी पहली नहीं है और आखिरी नहीं होगी।’’

वह आगे यह भी जोड़ते हैं कि, ‘‘मैं अब अपने पुरखों की धरती पर लौट आया हूं और अपने बच्चों तथा अपनी पत्नी की कब्र के साथ यहीं रहूंगा। यह धरती पर उन शहीदों का रक्त बहा है, जिन्होंने कोबाने की हिफाजत की थी...मैं नहीं चाहूंगा कि इस क्षेत्र से किसी को भी, वह चाहे कुर्द हो या अरब या सीरियाई या आर्मीनियाई, उस सब से गुजरना पड़े जिससे मैं गुजरा हूं...मानवता के मूल्य के विरुद्घ जाने वाली विचारधारा से दूर के रास्ते पर एक महत्वपूर्ण कदम यह होगा कि हम मिलकर, सामूहिक स्वनिर्णय के तहत, जनतंत्र तथा भाईचारे के साथ रहें।’’ उन्होंने सारी दुनिया से अपील की है कि जनता के आत्मनिर्णय के आधार पर राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करें।

वांछित रास्ता यही है--जनता की इच्छाओं तथा उसके हितों पर आधारित राजनीतिक समाधान, न कि सारी दुनिया के संसाधनों पर नियंत्रण की हवस से संचालित कार्पोरेटों के हितों से संचालित समाधान। संबंधित क्षेत्रों के जनगण को शामिल किए बिना, युद्घ और तत्ववादी अतिवाद, दोनों को शिकस्त देना संभव नहीं है। एक बार हालात स्थिर हो जाएं, उसके बाद ही हम शरणार्थी संकट के समाधान की उम्मीद कर सकते हैं और यह संकट जल्दी से दूर होने वाला तो नहीं ही लगता है।                            

 

डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख में वक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारों को नहीं दर्शाते ।

 

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ब्रिटिश लेबर पार्टी
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