NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
शिक्षा
संस्कृति
फिल्में
पुस्तकें
कला
रंगमंच
समाज
साहित्य-संस्कृति
भारत
राजनीति
स्मृति शेष : इतना आसां नहीं कर्नाड होना...
गिरीश कर्नाड के रूप में सिर्फ़ एक रंगमंच का कलाकार, या फ़िल्म कलाकार, या लेखक ही हमने नहीं खोया है, बल्कि समाज के भेदभाव, लगातार हो रही हिंसा के ख़िलाफ़ बोलने वाले एक मुकम्मल इंसान को भी खोया है।
सत्यम् तिवारी
11 Jun 2019
Girish

जब से दुनिया में विभिन्न सभ्यताओं की शुरुआत हुई है, समाज बना है, बढ़ा है, तब से ही कई तरह के भेदभाव और कुरीतियाँ, समय समय पर समाज में बढ़ती ही रही हैं। ऐसे समय में जब  एक वर्ग शोषक हो जाता है, और एक वर्ग शोषित और समाज उन सब चीज़ों के इर्द-गिर्द काम करना शुरू कर देता है, जो सिर्फ़ निजी हित के लिए हैं, तब हमारे पास कला एक सहारा बन कर आती है। कविता, कहानी, रंगमंच, संगीत; ये सब चीज़ें हमें ज़िंदा रखती हैं, हमें बेहतर बनाती हैं। इन चीज़ों के साथ हम एक इंसान बने रह सकते हैं। यही वो चीज़ें भी हैं, जिनसे हम समाज में होते आ रहे भेदभाव,शोषण पर सवाल उठा सकते हैं, उनके ख़िलाफ़ बोल सकते हैं। 

वे कलाकार, जो अपने काम को पूरी तरह से अपने क्षेत्र, अपनी कला और अपनी जनता के नाम समर्पित कर देते हैं, ऐसे कलाकारों की समाज को ज़रूरत होती है। समाज को ज़रूरत होती है उन कलाकारों की, जो अपने काम के साथ-साथ असली ज़िंदगी में भी समाज में हो रहे भेदभाव, होती आ रही हिंसा को ले कर मुखर तौर पर बात कर सकें। और साथ ही अपने नाटकों, अपनी कविता, कहानियों के ज़रिये इन्सानों की उस नस्ल की बात कर सकें जिनका शोषण होना इस समाज का एक नियम बन चुका है। दुनिया भर की सभी सभ्यताओं को देखें, तो हमें ऐसे कई कलाकार मिल सकते हैं। इसका अगला पहलू ये है, कि जब ये कलाकार इस दुनिया से चले जाते हैं, तो हमें एक लंबे समय तक की ख़ामोशी का एहसास होता है। एक ख़ालीपन महसूस होता है, जिसे भरना बहुत मुश्किल होता है। ऐसे कलाकार और ऐसे इंसान, जो समाज का एक अहम हिस्सा रहे हैं, उनकी मौत इस समाज के सामने एक बड़ा सा खुला आसमान छोड़ जाती है; जिस आसमान का इस्तेमाल करने की ज़िम्मेदारी इस समाज की होती है। ये वो कलाकार होते हैं,जिनके जाने के बाद, उनके क्षेत्र में एक चुप्पी छा जाती है। रंगमंच, सिनेमा, लेखन की दुनिया आज ऐसी ही चुप्पी छाई है। जिसकी वजह है गिरीश कर्नाड का जाना। गिरीश कर्नाड, जो कि एक मशहूर रंगमंच कलाकार, नाटककार, फ़िल्म अभिनेता और निर्देशक थे; उनका सोमवार की सुबह बंगलुरु में निधन हो गया। 

आज़ादी के फ़ौरन बाद भारत में रंगमंच को स्थापित करने में जो शुरुआती नाटककार शामिल थे, उनमें मोहन राकेश, विजय तेंदुलकर, बादल सरकार,हबीब तनवीर के साथ गिरीश कर्नाड उनमें सबसे युवा और एक अहम नाम थे। गिरीश कर्नाड ने अपना पहला नाटक ययाति 1961 में लिखा था। गिरीश भारत के आधुनिक रंगमंच के पुरोधा के तौर पर याद किए जाएंगे।  गिरीश कर्नाड की कलात्मक ज़िंदगी विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी थी। नाटक लिखने के अलावा, नाटक बनाने, फ़िल्मों में काम करने, फ़िल्में बनाने; हर क्षेत्र में उन्हें ख्याति प्राप्त है, और समय समय पर कई पुरस्कार भी मिले हैं। अपने नाटकों के माध्यम से जिन कुरीतियों, जिस भेदभाव को गिरीश ने उजागर किया था, और क्यों उनके नाटक आज भी दिल्ली के साथ-साथ कई हिस्सों में खेले जाते हैं, इस पर बात करना ज़रूरी है। 

गिरीश कर्नाड की बात करें तो हमें ययाति याद आता है, जिसमें महाभारत को एक अलग नज़र से देखा गया है।  गिरीश कर्नाड की ये आदत थी, और ये उनका एक तरीक़ा था कि उन्होंने अपने नाटकों में पौराणिक कथाओं का इस्तेमाल आज के दौर में करते हुए, समाज की कुरीतियों पर प्रहार किया। 

इसके अलावा उनके नाटकों में जातिवाद, लिंगभेद, जैसे मुद्दों पर भी सीधी बात होती नज़र आती है। उनके अलग-अलग नाटकों  में जिस तरह से महिलाओं के पात्र मुखर तौर पर बात करते हैं, और अपनी आवाज़ को बुलंद करते हुए दिखते हैं, ये समाज के लिए एक ज़रूरी संदेश की तरह सामने आता है। 

उनकी मौत के बाद देश के विभिन्न कलाकारों ने इसे एक युग का अंत माना है। अभिषेक मजूमदार, जो मुक्तिधाम, कौमुदी जैसे नाटकों के लेखक हैं,ने फेसबुक पर लिखा है, “ एक महान व्यक्ति गुज़र गया है। भारतीय थियेटर  गिरीश कर्नाड के बिना अधूरा है।" 

अभिषेक मजूमदार ने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए कहा, “गिरीश के नाटकों ने पौराणिक कथाओं को एक ज़रिया बना कर समकालीन मुद्दों की बात की है। उनके ये नाटक इसलिए ज़रूरी हैं क्योंकि पौराणिक कथाओं को ऐसा ही होना चाहिए।" 

रंगमंच के अभिनेता-निर्देशक जन नाट्य मंच के सुधन्वा देशपांडे ने कहा, “गिरीश कर्नाड एक नाटककार होने के साथ-साथ एक बड़े अभिनेता भी थे। और उन्होंने अपने नाटकों में महिलाओं की आकांक्षाओं को, उनकी चाहतों को बहुत मज़बूती से उजागर किया है।" 

यहाँ ये बात करनी ज़रूरी है कि गिरीश कर्नाड का रंगमंच, सिनेमा और साहित्य में योगदान के साथ-साथ देश में लंबे समय से चल रही अभिव्यक्ति की आज़ादी की बहस में भी बड़ी हिस्सेदारी थी। 

उन्होंने समय समय पर देश में चल रहे अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमलों के ख़िलाफ़ बोलने में कोई कमी नहीं की। चाहे वो गौरी लंकेश की हत्या हो, या फिर 'अर्बन नक्सल' विवाद, गिरीश कर्नाड हमेशा उस पक्ष के साथ खड़े थे जो सत्ता से सवाल उठा रहा था। गिरीश कर्नाड के रूप में सिर्फ़ एक रंगमंच का कलाकार, या फ़िल्म कलाकार, या लेखक ही हमने नहीं खोया है, बल्कि समाज के भेदभाव, लगातार हो रही हिंसा के ख़िलाफ़ बोलने वाले एक मुकम्मल इंसान को भी खोया है। 

गिरीश कर्नाड के लिए मुश्ताक़ अहमद मुश्ताक़ का एक शेर याद आता है: 

"लिए हर्फ़-हर्फ़ का बोझ वो कई मुद्दतों से सफ़र में था 

ये ख़बर दे कोई किताब को, उसे आज मिट्टी निगल गई" 

गिरीश कर्नाड के जाने के बाद तमाम रंगप्रेमियों और रंग कलाकारों ने यही कहा है कि नाटक जारी रहे, यही उनके लिए उचित श्रद्धांजलि होगी। दिल्ली में स्थापित जन नाट्य मंच ने गिरीश कर्नाड के जाने पर लिखा है, 

"भारतीय रंगमंच के आदिपुरुष, गिरीश कर्नाड का निधन हो गया। रंगमंच और फ़िल्म जगत के लिए तो ये भारी क्षति है ही, साथ ही भारतीय जनमानस ने एक उत्कृष्ट सामाजिक विचारक को भी खो दिया जो अपने विचारों को निडरता से सार्वजनिक रूप से प्रकट करता था। गिरीश कर्नाड दृढ़तापूर्वक बोलने की आज़ादी, विवेक और तर्कशीलता के हक़ में खड़े थे। भारतीय मिथकों और लोक कथाओं मे रचा-बसा उनका नाट्य कृतित्व मानवीय जीवन और समाज के  आधुनिक प्रश्नों को उकेरता था। कन्नड़ मे लिखे उनके नाटकों की पहुँच अखिल भारत ही नहीं बल्कि कुल दुनिया तक थी। उनके नाटकों का मंचन देश की अनेक छोटी-बड़ी मंडलियों ने अनेक बार किया। ये नाटक न सिर्फ़ एक पीढ़ी, बल्कि भविष्य के तमाम नाट्य कर्मियों और विद्यार्थियों के अध्ययन की सामग्री हैं।  

अंतरराष्ट्रीय थियेटर दिवस के मौक़े पर अपने संदेश में नाटयशास्त्र के पहले सर्ग मे आये भरत मुनि के पहले नाट्य प्रदशन में व्यवधान   की कहानी को रखते हुए गिरीश कर्नाड ने कहा था,

"नाटक यदि बच के चलेगा तो अपनी मौत को बुलावा देगा। हालांकि उसका भविष्य संकट मे दीखता है। नाटक ज़िंदा रहेगा और उकसायेगा।"

नैतिक और सामाजिक मूल्यों पर हमलों के अंधेरे दौर में मानवीय और सामाजिक सरोकारों से जूझते हुए नाटक करना गिरीश कर्नाड को हमारी श्रद्धाजंलि होगी। जन नाट्य मंच आधुनिक नाट्य जगत के भरत मुनि गिरीश कर्नाड को नमन करता है।"


बाकी खबरें

  • Savarkar and gandhi
    राम पुनियानी
    क्या गांधी ने सावरकर से दया याचिका दायर करने को कहा था?
    18 Oct 2021
    विशिष्ट हिंदू राष्ट्र की धारणा को विकसित करने वाले सावरकर ने अंडमान से अंग्रेज़ों को दया याचिकायें लिखी थीं और ऐसा करने के लिए उन्हें किसी और ने नहीं कहा था बल्कि यह उनके ख़ुद का निजी फ़ैसला था।
  • gandhi ji and sawarkar
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    गांधी बनाम सावरकरः हिंद स्वराज बनाम हिंदुत्व
    18 Oct 2021
    असली सवाल महात्मा गांधी बनाम सावरकर का नहीं है। असली सवाल उन दो दृष्टियों का है जो एक दूसरे से भिन्न हैं और जिनकी नैतिकता में जमीन आसमान का अंतर है। यह अंतर्विरोध रहेगा और ‘अमृत महोत्सव’ में इस पर…
  • kisan andolan
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    मंत्री अजय मिश्रा की बर्ख़ास्तगी की मांग को लेकर किसानों का ‘रेल रोको’ आंदोलन
    18 Oct 2021
    एसकेएम के मुताबिक आज का रेल रोको आंदोलन कुल 6 घंटे का रहेगा। इस दौरान पूरे देश में रेल सेवाएं सुबह 10 से शाम 4 बजे तक बाधित की जाएंगी। रेल संपत्ति को बिना क्षति पहुंचाए, रेल रोको शांतिपूर्ण रहेगा।…
  • Coal
    प्रबीर पुरकायस्थ
    बिजली की मौजूदा तंगी सरकारी नियोजन में आपराधिक उपेक्षा का नतीजा है
    18 Oct 2021
    जहां तक बिजलीघरों में पर्याप्त कोयला न रहने के वर्तमान संकट का सवाल है, यह नियोजन के अभाव और सरकार की घोर अक्षमता के योग का नतीजा है। 
  • Putin
    जेम्स डब्ल्यू कार्डेन
    रूस किस तरह का ख़तरा है?
    18 Oct 2021
    रूसी खतरे के अलावा किसी भी विषय पर द्विदलीय सहमति इतनी अचल नहीं है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License