NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अर्थव्यवस्था
सोवियत रूस के विघटन के पश्चात असमानता तेज़ी से बढ़ी, ज़िंदगी और बदतर हुई
सोवियत संघ के पतन ने शक्तिशाली कुलीन वर्गों के एक वर्ग का निर्माण शुरू किया जबकि रूस में रहने वाले लोगों की ज़िंदगी बदतर हो गई।
सुबिन डेनिस
20 Nov 2017
Russia

अक्टूबर क्रांति की शताब्दी ने रूस में चर्चा को काफी प्रेरित किया है। "उदार" मीडिया समेत ज़्यादातर मुख्यधारा की मीडिया ने सोवियत संघ के पतन को पूंजीवाद की अंतिम जीत और समाजवाद की असफलता के "सबूत" के रूप में देखा है। अंतर्निहित धारणा यह है कि रूस तथा अन्य देशों में रहन-सहन की स्थिति जो पूर्ववर्ती समाजवादी क्षेत्र का हिस्सा थी, उन देशों के लोगों के लिए बेहतर हो गई। आखिर यह तथ्यों से कैसे मेल खाता है?

सोवियत संघ को वर्ष 1991 में भंग कर दिया गया। मिखाइल गोर्बाचेव ने सोवियत संघ के राष्ट्रपति पद से इस्तीफ़ा दे दिया, और रूस के राष्ट्रपति के रूप में बोरिस येल्त्सिन ने देश के लगभग 2,25,000 राज्य-स्वामित्व वाली उद्यमों का तेज़ी से निजीकरण शुरू कर दिया। उन्होंने उस वर्ष अक्टूबर में मूल्य नियंत्रण इस उम्मीद में हटा लिया था कि "क़ीमतों का उदारीकरण सभी चीज़ों को अपने उचित स्थान पर रखेगा"।

प्रभाव तात्कालिक तथा विनाशकारी थे। बड़े पैमाने पर मुद्रास्फीति ने लाखों लोगों को अपनी ज़िंदगी के जमा बचत को ख़त्म कर दिया। आबादी का क़रीब एक तिहाई हिस्सा गरीबी रेखा से नीचे चला गया। 1990-99 में औद्योगिक उत्पादन में 60 प्रतिशत की गिरावट आई, जबकि जीडीपी में 54% की गिरावट दर्ज की गई थी। यह नुक़सान द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रूस को हुई हानि से ज़्यादा था, जब औद्योगिक उत्पादन में 24 प्रतिशत की गिरावट आई थी। जैसा कि नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिग्लिट्ज़ ने वर्ष 2002 में अपनी पुस्तक 'ग्लोबलाइजेशन एंड इट्स डिसकन्टेंट्स' में लिखा, "एक संक्षिप्त संक्रमण मंदी के रूप मेंजिसका कल्पना किया गया वह एक दशक या उससे अधिक समय में परिवर्तित हो गया था। इस दृश्य में नीचला भाग कभी नहीं दिखा ... पशुधन आधा हो गया,विनिर्माण में निवेश क़रीब रूक सा गया।"

यहां तक कि अधिकांश लोगों के सहन करने के बावजूद, अच्छी तरह से पकड़ रखने वाले कुलीन वर्गों ने अरबों की सार्वजनिक संपत्ति हड़पने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया जो बिक्री के लिए तैयार थे। नाओमी क्लेन की 2007 की पुस्तक 'द शॉक डॉक्ट्रिन्स' से एक संक्षिप्त टिप्पणी लूट के पैमाने को बताने के लिए पर्याप्त है:

"फ्रांस के कुल आकार के बराबर तेल कंपनी का चालीस प्रतिशत 88 मिलियन डॉलर (वर्ष 2006 में कुल बिक्री 193 अरब डॉलर था) में बेच दिया गया था। नोरिल्स्क निकेल, जिसने दुनिया के निकेल का पांचवां हिस्सा उत्पादन किया, उसे 170 मिलियन डॉलर में बेच दिया गया था भले ही उसका लाभ अकेले जल्द ही1.5 बिलियन अमरीकी डॉलर वार्षिक तक पहुंच गया। व्यापाक तेल कंपनी युकोस जो कुवैत की तुलना में ज़्यादा तेल को नियंत्रित करता है उसे 309 मिलियन डॉलर में बेच दिया गया था; यह अब एक वर्ष में 3 अरब डॉलर से अधिक राजस्व अर्जित करता है। तेल के विशालकाय सिडनाको का इकावन प्रतिशत हिस्सा 130मिलियन डॉलर में बेचा गया; सिर्फ दो साल बाद यह हिस्सेदारी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में 2.8 अरब डॉलर की होगी। एक विशाल हथियारों की फ़ैक्ट्री 3 मिलियन डॉलर में बेची गई जो ऐस्पेन में छुट्टियां बिताने के लिए लिए गए एक घर की क़ीमत है।"

कुलीन वर्ग ने रूसी लोगों की मुसीबतों से भी काफी धन कमाया और देश के बाहर अपना धन निकालना शुरू किया। स्टिग्लिट्स के अनुसार, रूस में पैसा रखने का मतलब होता देश में इसे गहरे मंदी में निवेश करना, और यह जोखिम भी था कि अगली सरकार निजीकरण प्रक्रिया को अवैध बताते हुए संपत्ति को ज़ब्त कर लेगी।

इस पतन का मानवीय नुक़सान काफी भीषण था। उदाहरण स्वरूप मृत्यु दर में तेजी से वृद्धि हुई – वर्ष 1990 में महीला वयस्कों की मृत्यु दर 116 प्रति 1000 से बढ़कर वर्ष 1994 में 178 प्रति 1000 हो गई, जबकि इसी अवधि में पुरूष वयस्कों की मृत्यु दर 316 से बढ़कर 486 हो गई। देश में मृत्यु दर 2005 के बाद कम होने लगी, लेकिन वर्ष 2014 में भी मृत्यु दर 1990 के मुकाबले अधिक थी। (पुरुष तथा महिला मृत्यु दर के बीच का बड़ा अंतर ज़्यादातर पुरुषों में वोडका के उच्च इस्तेमाल के कारण होता है।)

थॉमस पिकेट्टी और उनकी टीम द्वारा रूस में लोगों के विभिन्न वर्गों के आय हिस्सेदारियों के नए अनुमानों के प्रकाशन जिसे फिलिप नोवोकेट, थॉमस पेक्तेटी और गेब्रियल ज्यूकमन द्वारा जुलाई 2017 के पत्र में पुनः प्रकाशित किया गया था, ने सोवियत यूनियन की पूर्व तथा विघटन के बाद स्थितियों पर तुलनात्मक रूप से बेहद अहम प्रकाश डाला।

ज़ार (Tsarist) रूस में आय असमानता बहुत अधिक था। वर्ष 1905 में देश में शीर्ष 10% आय अर्जित करने वालों का कुल राष्ट्रीय आय का 47% हिस्सा था। इस वर्ष सबसे अमीर 1% की आय हिस्सेदारी 18% थी।

बोल्शेविक क्रांति के बाद के समय में आय असमानता में भारी कमी देखी गई, साथ ही शीर्ष 10% के आय हिस्सेदारी में वर्ष 1928 में 22% तक की गिरावट आई तथा 4% तक शीर्ष 1% की गिरावट आई। सोवियत संघ के पतन तक ये शेयर लगभग समान स्तर पर बना रहा।

सोवियत संघ के पतन के बाद की अवधि में आय असमानता में वृद्धि प्रबल रही है। सबसे अमीर 10% की आय हिस्सेदारी वर्ष 1991 में 25% से बढ़कर वर्ष2008 में 52% हो गई। शीर्ष 1% की हिस्सेदारी वर्ष 1991 में 8% से बढ़कर 2007 में 27% पर पहुंच गई। बाद के वर्षों में सबसे अमीर वर्गों की आय हिस्सेदारी नीचे आ गई - शीर्ष 10% की हिस्सेदारी वर्ष 2012 में 46% तक पहुंच गई और तब से समान स्तर पर रही। शीर्ष 1% की हिस्सेदारी वर्ष 2009 में घटकर 21%हो गई और उसके बाद से अब तक 20-21% के आसपास रही।

अमीरों की क़िस्मत में वृद्धि मध्यम आय तथा निम्न आय श्रेणियों से संबंध रखने वाले लोगों की क़िस्मत में गिरावट से प्रतिबिंबित होती है।

वर्ष 1905 में ज़ार रूस में 'मध्यम 40%' की आय का हिस्सा 36% था। यह वर्ष1928 में 48% तक बढ़ गया और सोवियत संघ के अंत तक लगभग समान स्तर पर रहा। सोवियत रूस के बाद निजीकरण के चलते उनकी हिस्सेदारी में गिरावट आई तथा 2001 में 37% तक पहुंचने के लिए सब्सिडी कटौती की गई। तब से मध्यवर्गीय आय की हिस्सेदारी इसी स्तर के आसपास रही।

वर्ष 1905 में निचले भाग की 50% की हिस्सेदारी 17% थी और वर्ष 1928 में 30% को छूने के लिए अक्टूबर क्रांति के बाद तेजी से बढ़ गई। चूंकि अन्य श्रेणियों के मामले में निचले भाग की 50% की हिस्सेदारी वर्ष 1991 तक लगभग इसके आसपास स्थिर रही। उनकी हिस्सेदारी में तेज़ी से कमी आई क्योंकि पूंजीवाद की बहाली के बाद प्रतिशोध के साथ ग़रीबी और बेरोज़गारी रूस में लौट गई। वर्ष 2015 में कुल राष्ट्रीय आय में 50% निचले भाग का हिस्सा लगभग 17% था।

इन सभी का जिन नीतियों ने नेतृत्व किया - बोरिस येल्तसिन द्वारा कुलीन वर्गों को दिए गए उपहार से शुरू हुआ- वह बिना विरोध के नहीं रहा। उदाहरण स्वरूप,रूसी संसद ने इन नीतियों का विरोध किया और येल्तसिन ने संविधान ख़त्म कर और संसद को भंग कर इसका जवाब दिया। इसके परिणाम स्वरूप संसद में येल्तसिन को पदमुक्त करने के लिए 636-2 वोट पड़े। अपनी नीतियों के इस प्रतिरोध को कुचलने के लिए क्रूर सैन्य कार्रवाई की जिसमें लगभग 500 लोग मारे गए और लगभग एक हज़ार घायल हुए।

प्रसिद्ध भारतीय इतिहासकार इरफान हबीब ने भूला दिए गए क्रूरता की इन घटनाओं में से एक का ज़िक्र इन यादगार शब्दों में करते हुए लिखा:"वाशिंगटन के प्रिय बोरिस येल्त्सिन रूस के राष्ट्रपति तानाशाह बन गए, उन्होंने पाया की रूसी महान सोवियत (संसद) राज्य के स्वामित्व वाली उद्योगों को पूंजीपति माफियाओं को सौंपने में एक बाधा है, जिसका निर्माण समाजवाद के तहत हुआ था। इसके बाद उन्होंने सितंबर 1993 में महान सोवियत को भंग कर दिया; और जब उनके अवैध डिक्री स्वीकार करने से इनकार कर दिया गया तो उन्होंने तुरंत सेना बुलाया ... येल्तसिन के सोवियत भवन पर प्रशिक्षित तोपची सैनिक थे। जब गोलीबारी खत्म हुई तो 144 रूसी मृत पाए गए। चूंकि यह रूस के नए अमीरों के महान कार्य के लिए एक जघन्य हत्याकांड था इसलिए इससे किसी की अंतरात्मा परेशान नहीं हुई और मॉस्को में मारे लोगों की स्मृति में न्यूयॉर्क, लंदन या पेरिस में किसी प्रकार की कोई पुष्पांजलि सभा नहीं की गई और न ही कोई बरसी मनाई गई।"

 

Russia
Soviet Union
Socialism
Communism
inequality

Related Stories

डेनमार्क: प्रगतिशील ताकतों का आगामी यूरोपीय संघ के सैन्य गठबंधन से बाहर बने रहने पर जनमत संग्रह में ‘न’ के पक्ष में वोट का आह्वान

रूसी तेल आयात पर प्रतिबंध लगाने के समझौते पर पहुंचा यूरोपीय संघ

यूक्रेन: यूरोप द्वारा रूस पर प्रतिबंध लगाना इसलिए आसान नहीं है! 

पश्चिम बैन हटाए तो रूस वैश्विक खाद्य संकट कम करने में मदद करेगा: पुतिन

और फिर अचानक कोई साम्राज्य नहीं बचा था

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन में हो रहा क्रांतिकारी बदलाव

एक किताब जो फिदेल कास्त्रो की ज़ुबानी उनकी शानदार कहानी बयां करती है

90 दिनों के युद्ध के बाद का क्या हैं यूक्रेन के हालात

भारत में असमानता की स्थिति लोगों को अधिक संवेदनशील और ग़रीब बनाती है : रिपोर्ट

यूक्रेन युद्ध से पैदा हुई खाद्य असुरक्षा से बढ़ रही वार्ता की ज़रूरत


बाकी खबरें

  • brooklyn
    एपी
    ब्रुकलिन में हुई गोलीबारी से जुड़ी वैन मिली : सूत्र
    13 Apr 2022
    गौरतलब है कि गैस मास्क पहने एक बंदूकधारी ने मंगलवार को ब्रुकलिन में एक सबवे ट्रेन में धुआं छोड़ने के बाद कम से कम 10 लोगों को गोली मार दी थी। पुलिस हमलावर और किराये की एक वैन की तलाश में शहर का चप्पा…
  • non veg
    अजय कुमार
    क्या सच में हिंदू धर्म के ख़िलाफ़ है मांसाहार?
    13 Apr 2022
    इतिहास कहता है कि इंसानों के भोजन की शुरुआत मांसाहार से हुई। किसी भी दौर का कोई भी ऐसा होमो सेपियंस नही है, जिसने बिना मांस के खुद को जीवित रखा हो। जब इंसानों ने अनाज, सब्जी और फलों को अपने खाने में…
  • चमन लाल
    'द इम्मोर्टल': भगत सिंह के जीवन और रूढ़ियों से परे उनके विचारों को सामने लाती कला
    13 Apr 2022
    कई कलाकृतियों में भगत सिंह को एक घिसे-पिटे रूप में पेश किया जाता रहा है। लेकिन, एक नयी पेंटिंग इस मशहूर क्रांतिकारी के कई दुर्लभ पहलुओं पर अनूठी रोशनी डालती है।
  • एम.के. भद्रकुमार
    रूस पर बाइडेन के युद्ध की एशियाई दोष रेखाएं
    13 Apr 2022
    यह दोष रेखाएं, कज़ाकिस्तान से म्यांमार तक, सोलोमन द्वीप से कुरील द्वीप समूह तक, उत्तर कोरिया से कंबोडिया तक, चीन से भारत, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान तक नज़र आ रही हैं।
  • ज़ाहिद खान
    बलराज साहनी: 'एक अपरिभाषित किस्म के कम्युनिस्ट'
    13 Apr 2022
    ‘‘अगर भारत में कोई ऐसा कलाकार हुआ है, जो ‘जन कलाकार’ का ख़िताब का हक़दार है, तो वह बलराज साहनी ही हैं। उन्होंने अपनी ज़िंदगी के बेहतरीन साल, भारतीय रंगमंच तथा सिनेमा को घनघोर व्यापारिकता के दमघोंटू…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License