NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
सुप्रीम कोर्ट और इससे जुड़े कुछ सवाल
शीर्ष अदालत निरंतर विश्वसनीयता के संकट से जूझ रही है जो रफ़ाल मामले, सीबीआई-सीवीसी मुद्दे के साथ-साथ जजों की नियुक्तियों के फैसले में पारदर्शिता के अभाव से पता चलता है।
निखिल वाग्ले
21 Jan 2019
सुप्रीम कोर्ट
साभार -लाइव मिंट

क़रीब एक साल पहले सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके यह संकेत दिया था कि लोकतंत्र का तीसरा स्तंभ ख़तरे में है। शायद ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। प्रेस कॉन्फ्रेंस में जजों ने कहा था कि भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा रोस्टर में फेरबदल कर रहे थें। उन्होंने कहा कि अगर न्यायपालिका पारदर्शी नहीं है तो लोकतंत्र ज़िंदा नहीं बचेगा। इसके ठीक एक साल बाद वास्तव में स्थिति क्या है?

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद चार जजों में से एक जज रंजन गोगोई भी थें, जो वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश हैं। इसके बावजूद न्यायपालिका में पारदर्शिता का सवाल अभी बाकी है। इसके विपरीत आलोचक इस बात को लेकर चकित हो रहे हैं कि क्या मुख्य न्यायाधीश का पद संभालने के बाद गोगोई बदल गए हैं।

हाल में जिस बात को लेकर शोर किया जा रहा है वह है दो नए जजों की नियुक्ति का मामला। कर्नाटक के दिनेश माहेश्वरी और दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश संजीव खन्ना को सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत किया गया है। राष्ट्रपति ने भी इसकी मंज़ूरी दे दी है। लेकिन कुछ अन्य जजों और बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने इसको लेकर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए कहा है कि उन्होंने जजों की वरिष्ठता को नजरअंदाज किया है।

दिलचस्प बात यह है कि 12 दिसंबर को कॉलेजियम ने राजस्थान उच्च न्यायालय के प्रदीप नंदराजोग और दिल्ली उच्च न्यायालय के राजेंद्र मेनन के नाम को अंतिम रूप से चयन किया था। आख़िर एक महीने के भीतर इस फैसले को बदलने के पीछे कारण क्या था? क्या कॉलेजियम ने ग़लती को सुधार लिया या उन्होंने दबाव में अपना फैसला बदल दिया? एक ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के बाद जिसमें पारदर्शिता की कमी की शिकायत की गई थी. ऐसे में सीजेआई गोगोई को अपने पूर्व जजों के लिए निर्धारित मानकों पर खरा नहीं उतरना चाहिए था जिसको उन्होंने तैयार किया था? इस देश के लोग अपने नए नियुक्त न्यायाधीशों की पृष्ठभूमि को जानने के हक़दार नहीं हैं? यदि चयन प्रक्रिया सही है तो इसे छिपाने के पीछे का कारण क्या है? जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलता है तब तक सुप्रीम कोर्ट के ईर्द गिर्द से शक का बादल नहीं छंटेगा।

हाल में आलोक वर्मा की घटना ने भी भारत के सर्वोच्च संस्था के समक्ष मौजूद विश्वसनीयता के संकट को भी तेज़ कर दिया। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के दो शीर्ष अधिकारी एक-दूसरे से टकरा गए और भारत सरकार द्वारा वर्मा को अनौपचारिक तरीक़े से हटाए जाने के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। यह एक ऐसा फैसला था जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था। सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर थीं क्योंकि सीबीआई और सरकार दोनों इसमें शामिल थी। शुक्र है कि सर्वोच्च न्यायालय ने वर्मा को फिर से बहाल कर दिया लेकिन उनकी शक्तियों को सीमित कर दिया। ये फैसला न्यायमूर्ति ए के पटनायक की निगरानी में जांच के बाद आया। न्यायमूर्ति पटनायक को शीर्ष अदालत ने नियुक्त किया था। उन्होंने निर्धारित दो सप्ताह में अपनी रिपोर्ट सौंप दी। सीलबंद लिफाफे में जजों को जांच की रिपोर्ट सौंप दी गई।

सुप्रीम कोर्ट ने रिपोर्ट के विवरण का खुलासा किए बिना एक उच्च स्तरीय समिति को फैसला लेने के लिए सौंप दिया। इस उच्च स्तरीय समिति में प्रधानमंत्री, विपक्षी पार्टी के नेता और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति सीकरी थें। इस समिति ने वर्मा को फिर से हटा दिया और दावा किया कि उनके ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोप हैं। विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने वर्मा को हटाए जाने के ख़िलाफ़ वोट दिया। बाद में ये बात सामने आई कि जस्टिस सीकरी जो सेवानिवृत्त होने वाले हैं उन्हें मोदी द्वारा लंदन में एक पद देने की पेशकश की गई थी।

अगर वर्मा भ्रष्ट थें तो सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें फिर से बहाल क्यों किया? गोगोई ने जस्टिस पटनायक और केंद्रीय सतर्कता आयोग की रिपोर्ट पर चर्चा क्यों नहीं की? एक उच्च समिति को इसे भेज कर शीर्ष अदालत ने गेंद को दूसरे पाले में फेंकने के अलावा क्या हासिल किया? वर्मा की सेवानिवृत्ति को महज दो सप्ताह बचे थे। उन्हें हटाने की जल्दीबाज़ी क्या था? प्रधानमंत्री मोदी स्पष्ट रूप से उसे नहीं चाहते थें। क्या यह अफवाह के कारण किया गया था कि वर्मा रफ़ाल मामले में एफआईआर दर्ज करना चाहते थें?

न्यायमूर्ति पटनायक ने यह कहते हुए शक को और बढ़ा दिया कि वर्मा के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के कोई सबूत नहीं हैं और उच्च समिति ने अपना फैसला सुना दिया। क्या उच्च समिति ने पटनायक की इस रिपोर्ट की जांच की? सीजेआई गोगोई ने सीकरी के हितों के इस टकराव की अनदेखी क्यों की? मीडिया रिपोर्टों के बाद सीकरी ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली लेकिन सच्चाई यह है कि वह लंदन में पद के लिए दौड़ में शामिल थें जब उन्होंने वर्मा को हटाने का फैसला किया। सीजेआई गोगोई ने न्यायपालिका की विश्वसनीयता को बहाल करने का एक मौक़ा खो दिया।

खोए हुए मौकों की बात करें तो रफ़ाल भी एक मामला था जहां सुप्रीम कोर्ट ने विमान के क़ीमत की जांच करने से इंकार कर दिया था जिससे मोदी सरकार परेशानी से बच गई और आम जनता के बीच इस बात को कहने की उसे इज़ाजत मिल गई कि अदालत ने क्लीन चिट दे दिया। आज तक भारत की जनता यह नहीं जानती है कि रफ़ाल फैसले में ज़ाहिर दोष के लिए कौन ज़िम्मेदार है। क्या सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से झूठ बोला या खुद जजों ने इसकी व्याख्या सही नहीं की थी? यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि रफ़ाल फैसले को मुख्य न्यायाधीश ने खुद लिखा था।

सुप्रीम कोर्ट भीमा कोरेगांव मामले में भी न्याय देने में विफल रहा जहां पुलिस मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को फंसाने के लिए साफ तौर से सबूत गढ़ रही है। जब कार्यकर्ताओं ने न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया तो उन्हें निचली अदालतों में जाने को कहा गया। हाल ही में एक मामले में मशहूर लेखक और एक्टिविस्ट आनंद तेलतुम्बडे ने सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई हार गए जिसने उनके ख़िलाफ़ एफआईआर को रद्द नहीं किया। इस संबंध में उनके हालिया सार्वजनिक अपील से पता चलता है कि अदालती कार्यवाही कितनी अपारदर्शी है।

भारत एक मुश्किल दौर से गुज़र रहा है। सरकार और विधायिका के प्रति लोगों का विश्वास काफी कम हो गया है। स्वतंत्र संस्थाएं अपनी स्वायत्तता खो रहे हैं और शिक्षण संस्थानों पर हमले हो रहे हैं। सरकार के सामने मीडिया झुक गई है। ऐसे समय में लोग न्यायपालिका से उम्मीद करते हैं। उन्हें आश्वस्त करने के बजाय न्यायपालिका बुज़दिली से काम कर रही है।

मुझे उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट और सीजेआई गोगोई संबंधित नागरिकों द्वारा उठाए गए इन सवालों का जवाब देंगे। कम से कम मुझे उम्मीद है कि वह अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस देखें।
 

Supreme Court

Related Stories

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

आर्य समाज द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र क़ानूनी मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

समलैंगिक साथ रहने के लिए 'आज़ाद’, केरल हाई कोर्ट का फैसला एक मिसाल

मायके और ससुराल दोनों घरों में महिलाओं को रहने का पूरा अधिकार

जब "आतंक" पर क्लीनचिट, तो उमर खालिद जेल में क्यों ?

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश : सेक्स वर्कर्स भी सम्मान की हकदार, सेक्स वर्क भी एक पेशा

तेलंगाना एनकाउंटर की गुत्थी तो सुलझ गई लेकिन अब दोषियों पर कार्रवाई कब होगी?

मलियाना कांडः 72 मौतें, क्रूर व्यवस्था से न्याय की आस हारते 35 साल

क्या ज्ञानवापी के बाद ख़त्म हो जाएगा मंदिर-मस्जिद का विवाद?


बाकी खबरें

  • Yoweri Museveni
    सिलजा फ़्रोलिच
    अफ़्रीका : तानाशाह सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए कर रहे हैं
    11 Jan 2022
    युगांडा के राष्ट्रपति योवेरी मुसेवेनी पर फर्जी सोशल मीडिया एकाउंट्स के ज़रिये अपनी सत्ता को मज़बूत करने का आरोप है। लेकिन वे अफ़्रीका में अकेले नहीं हैं। क्या महाद्वीप में सोशल मीडिया लोकतंत्र के लिए…
  • Elizabeth Holmes
    प्रबीर पुरकायस्थ
    एलिज़ाबेथ होम्स फ़ैसला: अमरीका में ग्राहकों से ठगी जायज़, पर निवेशकों से झूठ नहीं चलेगा
    11 Jan 2022
    अमरीका का जाना-परखा न्याय यही कहता है, कि उपभोक्ता ठग होते हैं और उनको ठगने में कोई गुनाह नहीं है। लेकिन निवेशकर्ताओं के साथ ऐसा सलूक नहीं किया जा सकता है, वे बड़े धनपति जो हैं। 
  • covid
    दित्सा भट्टाचार्य
    भारत की कोविड-19 मौतें आधिकारिक आंकड़ों से 6-7 गुना अधिक हैं: विश्लेषण
    11 Jan 2022
    नए अध्ययन के मुताबिक भारत में 2020 में अपेक्षित मृत्यु दर से कम की तुलना में 2021 में उच्च कोविड मृत्यु दर इस विषय में और अधिक शोध की मांग करता है।
  • Anand
    सत्यम श्रीवास्तव
    मध्य प्रदेश आनंद विभाग: कर्मकांड और प्रचार से दूर 'आनंद' की हक़ीक़त
    11 Jan 2022
    हिंदुस्तान में यह पहली बार हुआ था कि किसी एक राज्य (मध्य प्रदेश) में अपने नागरिकों की खुशहाली को मापने और खुशहाली का प्रचार-प्रसार करने के लिए सांस्थानिक स्तर पर पहल की। लेकिन सरकार द्वारा किए गए काम…
  •  Kashmir’s apple industry
    न्यूज़क्लिक टीम
    कश्मीर के सेब व्यापारी अपने भविष्य के लिए चिंतित, सरकार की तरफ़ से नहीं मिल रही मदद
    11 Jan 2022
    क़रीब 8,000 करोड़ के कश्मीर के सेब उद्योग को इलाक़े की अर्थव्यवस्था की बैकबोन माना जाता है, जिससे 30 लाख से ज़्यादा लोग जुड़े हुए हैं। मौजूदा समय में, #कश्मीरघाटी में 2,400 करोड़ तक की लागत के सेब का बाज़ार…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License