NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
संस्कृति
भारत
राजनीति
चांदी का वरक़: ऑनलाइन प्रोडक्ट की चमक ने फीका किया पारंपरिक कारोबार
लखनऊ और वाराणसी की जिन तंग गलियों में कभी चांदी का वरक कूटने की ठक-ठक हुआ करती थी, वहां अब ख़ामोशी है। वरक़ कूटने का कारोबार लगभग ख़त्म हो गया है। शुद्ध चांदी के वरक़ को बनाने के लिए लगातार तीन घंटे तक लोहे के हथौड़े से कूटा जाता था। मगर अब न ये काम है और न ही इसे करने वाले कारीगर।
समीना खान
20 Feb 2022
silver sheet

लज़ीज़ पकवान सदा से ज़ायके के साथ सजावट के भी मोहताज रहे हैं। नवाबी दौर से जारी ये सिलसिला जो कभी चांदी के वरक़ तक सीमित था, आज अपने बदले रूप और बाजार के फैलाव की बदौलत गोल्ड और सिल्वर डस्ट का रूप ले चुका है। इन सजावटों से झिलमिलाते पकवान, मिठाईयां, पान की गिलौरी और केक पेस्ट्री के बावजूद इसका पारंपरिक कारीगर गर्त में गिरता गया और अपने हुनर और कारोबार से बेदखल हो गया। 

लखनऊ और वाराणसी की जिन तंग गलियों में कभी चांदी का वरक कूटने की ठक-ठक हुआ करती थी वहां अब ख़ामोशी है। वरक़ कूटने का कारोबार लगभग ख़त्म हो गया है। शुद्ध चांदी के वरक़ को बनाने के लिए लगातार तीन घंटे तक लोहे के हथौड़े से कूटा जाता था। मगर अब न ये काम है और न ही इसे करने वाले कारीगर।

पुराने लखनऊ के चौक इलाके में आज से दो दशक पहले तक हाथ से चांदी का वरक़ बनाने वाले तकरीबन 400 कारीगर थे। उस वक़्त इस गली में वरक़ कूटने के शोर के चलते कोई दूसरी आवाज़ सुन पाना मुश्किल होता था। मगर अब बहुत तलाश के बाद पता चला है कि इसके दो कारीगर इलाके में बचे हैं। बातचीत के दौरान कारीगर जावेद ने बताया कि उनके पास कोई दुकान या मशीने नहीं है। केवल यही दो लोग गली के एक कमरे में वरक़ कूटने का काम कर रहे हैं।

कारीगर जावेद का कहना है कि हाथ से चांदी का वरक़ बनाने का काम अब बिलकुल ख़त्म हो चुका है। ज़्यादातर लोग इस काम को कई बरस पहले ही छोड़ चुके हैं। इनमे कोई किराये का बैटरी रिक्शा चला रहा है, तो किसी ने पेट पालने के लिए दूसरा रोज़गार तलाश लिया है। कोविड महामारी का भी इस काम पर बुरा असर पड़ा और इस वक़्त हालात ये हैं कि इतनी भी आमदनी नहीं हो पा रही है कि घर का खर्चा निकाला जा सके। यहाँ तक कि बिजली का बिल भरना भी इनके लिए मुमकिन नहीं और ऐसे में कितने दिन ये लोग इस हुनर से जुड़े रह सकते हैं इसका भी कोई भरोसा नहीं।

कई बरस पहले भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने दावा किया था कि वरक शाकाहारी नहीं है। इसकी पुष्टि के लिए मेनका गांधी एक लेख के माध्यम से ग्राफिक डिटेल भी देती हैं। लेख के मुताबिक़ भारत में बड़े पैमाने पर मुस्लिम समुदाय इस काम से जुड़ा है। वरक को बनाने के लिए मवेशियों की आंत से बनी शीट में रखकर इसे कूटते हुए फैलाया जाता है। मेनका गांधी का बयान ये जानकारी भी देता है कि वरक इंडस्ट्री बहुत बड़ी है। भारत में पान, च्यवनप्राश, तंबाकू, आयुर्वेदिक दवाओं, मिठाई और मंदिरों में 300 टन से ज़्यादा चांदी के वरक का इस्तेमाल किया जाता है। जर्मनी में फ़ूड प्रोडक्ट में इसका प्रयोग किया जाता है। इसे Food Number E 175 दिया गया है। जापान में ये फ्रूट, सलाद, आइसक्रीम से लेकर चाय, कॉफी, शराब और कॉकटेल तथा मंदिर की सामग्री तक में प्रयोग होता है।

2016 में छपे मेनका गांधी के इस लेख के बाद इस मामले में सरकार ने दखल दिया। परिणाम स्वरुप हाथ से बनने वाले चांदी के वरक़ पर प्रतिबंध लग गया और फ़ूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड के तहत चांदी के वरक के लिए गाइड लाइन बनाई गई। इस गाइडलाइन के मुताबिक़ चांदी की चादर के हर स्क्वायर मीटर का वजन 2.8 ग्राम और चांदी की शुद्धता 999/1000 होनी चाहिए। ये कारीगर अपनी सफाई देने में पिछड़ गए। इस बीच मिठाई की दुकानों पर लगे साइनबोर्ड वरक की तारीफ में उन्हें 'गंदे मानव हाथों से अछूता' बता रहे थे। नतीजा ये हुआ कि उपभोक्ता मशीन से बने शाकाहारी वरक की मांग करने लगे।

सरकार द्वारा फ़ूड सेफ्टी एंड रेगुलेशन 2011 के अनुसार प्रतिबन्ध तो हटा, लेकिन गरीब कारीगर इन कड़े दिशानिर्देश के साथ काम करने लायक नहीं रहे। इस गाइडलाइन की बदौलत धीरे-धीरे ये कारोबार पूंजीपतियों के हाथों में आ गया। 

यहां पर जयपुर के हीरा व्यापारी सुरेंद्र कर्णवत का ज़िक्र ज़रूरी है। सुरेंद्र कर्णवत ने कई साल की मेहनत के बाद एक वरक़ बनाने के एक ऐसे प्रोजेक्ट का दावा किया जिसमें तक़रीबन 2 लाख लोगों को रोज़गार मिल सके। सुरेंद्र कर्णवत एक ऐसी योजना पर काम कर रहे थे जिस पर उन्होंने 15 साल मेहनत की थी। कर्णवत ने इसके लिए एक चीनी मशीन के प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया था। अपनी दलील में उन्होंने ये भी कहा था कि भारत चांदी के वरक के लिए दुनिया का निर्यात केंद्र बन जाएगा। मगर उन्हें कामयाबी नहीं मिली। इस समय सुरेंद्र कर्णवत अपने ट्विटर हैंडल पर चौकीदार सुरेंद्र कर्णवत हैं। इस बीच तकरीबन 1.5 लाख वरक निर्माताओं को अपने रोज़गार से हाथ धोना पड़ा।

सोने और चांदी के वरक को बायोलॉजिकली बेजान माना जाता है, जिन्हें आंत सोख नहीं पाती और ये डाइजेशन सिस्टम से निकल जाते हैं। इस समय सोने और चांदी के ये वरक़ ऑनलाइन मुहैया हैं। सोने के वरक़ की कीमत 10,000 रुपये में 25 परत और चांदी के इतने ही वरक़ तकरीबन 500 रुपये में बिकते हैं। इसके साथ ही पकवानों और केक पेस्ट्री को सजाने के लिए गोल्ड और सिल्वर डस्ट भी खूब चलन में है।

इस रुपहली और सुनहरी सजावट का आधुनिक इतिहास बताता है कि साल 1921 में स्विस चॉकलेट बनाने वालों ने तीन कोनों वाली चॉकलेट को लपेटने के लिए एल्यूमीनियम फॉयल का उपयोग शुरू किया। इसका उद्देश्य खाने को देर तक सुरक्षित रखना था। पिछली सदी की शुरुआत में पूरे यूरोप और पश्चिमी दुनिया में एल्युमिनियम फॉयल ने टिन फॉयल की जगह ले ली थी। एल्युमिनियम फॉयल भोजन और दवा की की प्रकाश, ऑक्सीजन, नमी और बैक्टीरिया से सुरक्षा में काम आई। इस तरह पैकिंग में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका के कारण प्रयोग और उत्पादन बढ़ गया। जल्दी ही पेय पदार्थ, मिठाई, निजी देखभाल और सेहत से जुड़े सामान ने इसे और अन्य औद्योगिक उपयोग में शामिल कर दिया।

इस कारोबार पर अब ऑनलाइन मार्केट का वर्चस्व है। इससे सहूलियत से खाने की मेज़ की सजावट हर दिन और भी गुलज़ार होती जा रही है। लागत से लापरवाह उपभोक्ता इस कीमती वरक और डस्ट की भारी कीमत अदा कर रहा है। इसके बावजूद इस पेशे से जुड़े कारीगर बदहाल हैं और किसी न किसी और पेशे के सहारे अपनी ज़िंदगी बसर करने को मजबूर भी। उत्तर प्रदेश के जौनपुर, वाराणसी, लखनऊ, प्रयागराज, मुरादाबाद, संभल और मेरठ शहरों में चांदी के वरक़ के पारंपरिक कारीगर थे। मगर आज ये कारोबार लगभग पूरी तरह से बंद हो चुका है।

(लेखिका लखनऊ स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

Informal sector workers
Muslim artisans
maneka gandhi
Lucknow
food

Related Stories

लखनऊ: साढ़ामऊ अस्पताल को बना दिया कोविड अस्पताल, इलाज के लिए भटकते सामान्य मरीज़

ई-श्रम पोर्टल में ‘गड़बड़ियों’ से असंगठित क्षेत्र के कामगारों के रजिस्ट्रेशन-प्रक्रिया पर असर

किसानों का मिशन यूपी व छात्र-युवाओं का रोज़गार-आंदोलन योगी सरकार के लिए साबित होगा वाटरलू 

मिशन यूपी 2022ः योगी के ख़िलाफ़ बिगुल फूंका किसानों ने

वैश्विक फैशन ब्रांड महामारी के दौरान 6 एशियाई देशों में मानवीय संकट के कारण बने : रिपोर्ट

यूपी : गन्ना किसानों का सरकार पर हल्लाबोल, पूछा- कहां हैं अच्छे दिन?

जलते मज़दूर, सोती सरकार

नोएडा : बोरवेल में ज़हरीली गैस से दो मजदूरों की मौत, ठेकेदार हिरासत में

मई दिवस विशेष : तकनीकी क्रांति और मुक्त अर्थव्यवस्था के दौर में मज़दूर आंदोलन

सुरक्षा इंतज़ाम के बिना होती रहेगी आग से बर्बादी


बाकी खबरें

  • UP
    सरोजिनी बिष्ट
    'यूपी मांगे रोज़गार अभियान' के तहत लखनऊ पहुंचे युवाओं पर योगी की पुलिस का टूटा क़हर, हुई गिरफ़्तारियां
    03 Dec 2021
    हाथों में बैनर, तख्तियां लिए युवाओं ने मार्च तो निकाला लेकिन विधानसभा पहुंचने से पहले ही पुलिस ने इनकी गिरफ्तारियां करनी शुरू कर दी। आरोप है कि इन युवाओं की पुलिस ने बर्बर तरीके से पिटाई की।
  • bihar
    राहुल कुमार गौरव
    ग्राउंड रिपोर्ट : किडनी और कैंसर जैसे रोगों का जरिया बनता बिहार का पानी
    03 Dec 2021
    इस रिसर्च के मुताबिक बिहार के 6 जिलों(पटना, नालंदा, नवादा, सारण, सिवान एवं गोपालगंज) के पानी में यूरेनियम की मात्रा मानक से दोगुने से ज्यादा मिली है। पहले भी इस जिले के पानी में आर्सेनिक की मात्रा हद…
  • US
    जुआन ग्रैबोइस
    अर्जेंटीना कांग्रेस में अमेरिकन एक्सप्रेस की बेशुमार ख़रीदारी
    03 Dec 2021
    जैसे ही अमेरिकन चेम्बर ऑफ कॉमर्स (एमचैम) ने महसूस किया कि पैकेजिंग कानून अर्जेंटीना में उनका प्रतिनिधित्व करने वाली कंपनियों के मुनाफे के लिए खतरा पैदा कर सकता है, उन्होंने कानून को कमजोर करने के लिए…
  •  Aligarh
    मोहम्मद सज्जाद
    अलीगढ़ के एमएओ कॉलेज में औपनिवेशिक ज़माने की सत्ता का खेल
    03 Dec 2021
    अलीगढ़ आंदोलन और औपनिवेशिक उत्तर भारतीय मुस्लिम अभिजात वर्ग के इतिहास पर मौजूदा साहित्य में इफ़्तिख़ार आलम ख़ान का अहम योगदान।
  • parliament
    एम श्रीधर आचार्युलु
    भारतीय संसदीय लोकतंत्र का 'क़ानून' और 'व्यवस्था'
    03 Dec 2021
    बिना चर्चा या बहस के संसद से वॉकआउट, टॉक-आउट, व्यवधान और शासन ने 100 करोड़ से अधिक भारतीय नागरिकों की आकांक्षाओं को चोट पहुंचाई है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License