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सर्विलांस राज्य ही विश्व का 'न्यू नॉर्मल'
सर्विलांस की अकूत ताकत की वजह से राज्य चाहे जो मर्जी सो कर सकता है।
बी. सिवरामन
25 Jul 2021
सर्विलांस राज्य ही विश्व का 'न्यू नॉर्मल'

अक्सर ऐसा होता है कि कुछ देशों से संबंधित कोई गंभीर घटना प्रमुख वैश्विक परिघटनाओं को सुर्खियों में ला देती है। विपक्ष के नेताओं के फोन टैप करने के लिए इज़रायली खूफिया एजेंसी एनएसओ के पेगासस सॉफ्टवेयर को लेकर उठा विवाद ऐसा ही एक मामला है। जब पिछले एक दशक में वैश्विक स्तर पर एक सामान्य दक्षिणपंथी झुकाव हुआ है, तो राज्य की संस्था कैसे बच सकती है? राज्य के दक्षिण झुकाव की जो सबसे प्रमुख अभिव्यक्ति है - वह है उसका लगातार और अधिक निरंकुश होते जाना। इस किस्म के नव-तानाशाही में हम देखेंगे कि निगरानी या सर्विलांस केवल विरोधी ताकतों पर नहीं बल्कि संपूर्ण नागरिक समाज पर होता है।

इसके बावजूद कि सभी प्रमुख देशों में निजता की रक्षा के लिए कानून है, स्थिति आज यह है कि हरेक नागरिक का फोन टैप हो सकता है और हर बातचीत रिकार्ड होती है। हरेक अकाउंट होल्डर के ई-मेल आदान-प्रदान भी ‘बिग डाटा’ तक पहुंच जाते हैं, जो सत्ताधारियों के हाथ में होता है। ये मेल ट्रैक किये जाते हैं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित सॉफ्टवेयर का प्रयोग करके कम्प्यूटरों के जरिये इनका विश्लेषण किया जाता है, ताकि अपराध और राज्य-विरोधी गतिविधियों पर नजर रखी जा सके। फिर सारी सूचनाएं भारी सर्वरों में आरकाइव की जाती हैं, जिससे कि भविष्य में कभी भी उन्हें उपलब्ध कराया जा सके और उनका अध्ययन हो सके।

उदाहरण के तौर पर आप इंटरनेट पर क्या-क्या देखते हैं और क्या खरीदते हैं इस सूचना को भी कॉरपोरेट्स घराने अध्ययन करते रहते हैं। अपकी हर पसंद-नापसंद का पता उन्हें रहता है। सबसे खतरनाक बात तो यह है कि हर नागरिक का चेहरा भी एक मास्टर डाटाबेस में दर्ज होता है। इसीके आधार पर आप कौन से स्टोर या मॉल में गए और आपने क्या खरीदा, यह सारी जानकारी एक सर्वर में मौजूद डाटाबेस में एकत्र होती है, जो सत्ताधारी प्रतिष्ठान के ऐक छोटे से हाई-टेक मण्डली द्वारा नियंत्रित की जाती है। फिर यह जीएसटीएन डाटा के साथ कॉरपोरेट्स को भेज दिया जाता है। सर्विलांस पूंजीवाद को मार्केटिंग की जरूरतों से अलग नहीं किया जा सकता।

इसी तरह प्रतिस्पर्धा में जो कम्पनियां हैं, उनके व्यवसाय संबंधी जानकारी उनके कॉरपोरेट विरोधियों द्वारा हासिल की जा सकती है, यदि सत्ताधारी गुट में उनके ठीक-ठाक संपर्क हों। और भी बुरा तो यह कि स्टॉक मार्केट व अन्य वित्तीय बाज़ारों में निवेशकों के लाखों करोड़ रुपयों के रोजाना वित्तीय निवेश आदान-प्रदान को ‘रियलटाइम’ में ट्रैक किया जा सकता है।

जब निवेश-संबंधी निर्णय लिए जाते हैं और निवेश से एक सेकेन्ड पूर्व भी राज्य में कोई भी यदि ‘रियलटाइम डाटा’ को नियंत्रित कर ऐसे निवेशों  के साथ हेर-फेर करे, वह अरबों कमा सकता है । बस उसे अन्य निवेशकों की सूचनाओं से लैस होकर वित्तीय बाज़ार में हस्तक्षेप करने की देर रहती है। सही सूचनाओं पर काबू करके अरबों की अवैध कमाई हो सकती है। मुकेश अंबानी ने सही ही कहा था कि डाटा ही आज का तेल है। इसी तरह डिजिटल सर्विलांस अर्थव्यवस्था की एक संपूर्ण सत्ता उभरती है।

जन सुरक्षा के नाम पर, कौन सी गाड़ी आप चलाते हैं, आपके साथ कौन चलता है, आप कहां जाते हैं और कहां- कहां ठहरते हैं-यह सब भी मॉनिटर किया जाता है। बड़ी टेक कम्पनियों के अमेरिकन सीनेट सुनवाइयों से पता चला कि फेसबुक ने लाखों-लाख प्रयोगकर्ताओं का निजी डाटा वोटर एनालिटिक्स के लिए केम्बरिज एनालिटिका को बेच दिया था ताकि वह भारी शुल्क लेकर राजनीतिक दलों को चुनावी सलाह दे सके। केवल विपक्षी दलों के राजनीतिक नेताओं की नहीं, बल्कि सत्तधारी दल के नेताओं के और मंत्रीमण्डल के साथियों तक के फोन की टैपिंग करना कोई नई बात नहीं है। यह 1970 के दशक में यूएस राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के शासनकाल में वाटरगेट स्कैण्डल के समय से होता आ रहा है। हमारे देश में भी जब प्रणव मुखर्जी वित मंत्री थे, उन्होंने मनमोहन सिंह से शिकायत की थी कि उनके फोन तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदाम्बरम द्वारा टैप किये जा रहे हैं।

‘बड़े भाई’(BigBrother) देख रहे हैं

पेगासस द्वारा फोन टैपिंग को लेकर चले विवाद में जो नई बेहूदगी दिखती है, वह है इज़रायल के एनएसओ (NSO) जैसे विदेशी जासूसी एजेन्सी को लगाना; फिर पेगासस जैसे उनके स्पाईवेयर का प्रयोग कर देश के विपक्षी राजनेताओं के फोन टैप करना। ज्ञातव्य है कि आरएसएस-भाजपा मार्का तथाकथित राष्ट्रवादियों ने पहले प्रिज़्म (PRISM) को चुना था। प्रिज़्म अमरीकी सुरक्षा सेवा नैश्नल इंटेलिजेन्स एजेन्सी, (NIA) का सॉफ्टवेयर है, जिसे देशी सॉफ्टवेयर नेटवर्क ट्रैफिक एनेलिसिस (NETRA) की जगह चुना किया गया था। NETRA को स्थानीय तौर पर अत्यधिक गुप्त सेंट्रल मॉनिटरिंग सिस्टम (CMS) के लिए सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ टेलीमैटिक्स (Centre for Development of Telematics) द्वारा विकसित किया गया था। बाद में, काफी आलोचना के पश्चात सीएमएस नेट्रा का भी प्रयोग करने लगा। इस CMS के तहत भारत के सभी फोन वार्ता और ई-मेल के आदान-प्रदान एक हज़ार स्थानों या लोकेशन्स में मेगा-सर्वरों में संग्रहित किये जाएंगे और उन्हें सुना-पढ़ा जाएगा। यहां तक कि देश के निजी टेलिकॉम ऑपरेटरों को भी कानूनी तौर पर बाध्यता रहती है कि सभी फोन चर्चाओं का रिकार्ड वे CMS को दे दें।

2014 में सूचना के अधिकार (RTI) के तहत भारत सरकार के उत्तरों का अध्ययन करते हुए सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर ने उजागर किया कि केवल केंद्र ने प्रति वर्ष एक हज़ार से अधिक टेलिफोन्स को टैप करने का आदेश दिया था। यदि हम इसमें उन टेलिफोन टैपिंग के मामलों को जोड़ दें जो राज्यों द्वारा आदेशित हैं, तो संख्या 20 लाख तक पहुच गई होगी। कोई भी व्यक्ति, जिसका मीडिया, राजनीति या व्यवसाय में थोड़ा भी नाम है अब नेट्रा की निगरानी में होगा और उसका नाम निश्चित ही इन 20 लाख की सूचि में होगा। इस रिपोर्ट के प्रमुख बिन्दु आउटलुक पत्रिका में छपे थे

तो हम समझ सकते हैं कि 40 विपक्षी राजनेताओं के फोन पेगासस स्पाईवेयर द्वारा टैप करना CMS ‘बड़े भाई’ की तुलना में केवल एक अधिक सुगम स्थानीय व्यवस्था है।

18 दिसम्बर 1996 को सर्वोच्च न्यायालय ने पीयूसीएल द्वारा फोन टैपिंग के विरुद्ध दायर एक याचिका पर एक ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि किसी के साथ बिना दखल अंदाज़ी के बात करने की आज़ादी के मायने हैं निजता के अधिकार का होना।

इसलिए टेलिफोन टैपिंग संविधान की धारा 21 और 19(1)ए में निहित जीवन जीने के अधिकार और भाषण व अभिव्यक्ति के अधिकार का उल्लंघन है। दुर्भाग्य की बात यह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने हमेशा की भांति एक केवियट लगा दिया ‘‘जबतक कि कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत उसे अनुमति नहीं मिलती’’। दुखद है कि इस केवियट के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय तार अधिनियम या इंडियन टेलिग्रेफी ऐक्ट के अनुच्छेद 5(2) के तहत टेलिफोन में दखल अंदाज़ी की संवैधानिक वैद्यता को बर्करार रखा। सरकार ने इसे एक लाइसेंस के रूप में ले लिया और 14 इंटेलिजेन्स  व अन्य सुरक्षा एजेंसियां, जैसे रॉ, आईबी, एनआईए, सीबीआई, ईडी, व डीआरआई आदि को व अन्य को भारत में किसी भी व्यक्ति के टेलिफोन टैप करने का अधिकार दे दिया।

पर अब मोदी सरकार सर्वोच्च न्यायालय को भी बाइपास करने का प्रयास कर रही है। इसके लिए वह नौकरशाही द्वारा तैयार किये गए नए आईटी नियम 2021 का प्रयोग कर रही है, जो संसद द्वारा अब पारित कर दिया गया है और वरिष्ठ अधिकारियों को अधिकार देता है कि वे सोशल मीडिया पोस्ट्स में भी दख़ल अंदाज़ी कर सकते हैं। जो न्यूनतम बचाव सर्वोच्च न्यायालय की ओर से रखे गए थे-जैसे कि फोन टैपिंग केवल सचिव स्तर के अधिकारी के आदेश से या फिर मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना नहीं हो सकती- यूएस या यूरोपीय देशों, खासकर यूके में दी गई सुरक्षा से काफी कमज़ोर है।

सर्विलांस राज्य लोकतंत्र का माखौल बनाता है

सर्विलांस राज निजता का उलंघन कर सकता है और व्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगा सकता है। कुल मिलाकर वह लोकतंत्र का ही माखौल बनाता है। जॉर्ज ऑरवेल ने 1984 तक एक संपूण सर्विलांस राज्य की परिकल्पना पेश की थी, जिसे ‘1984’ नाम की पुस्तक में उन्होंने चित्रित किया है। यह एक ऐसे राज्य के बारे में बताता है जो एक बड़े भाई जैसा आप पर हर समय निगरानी रखता है। उनकी भविष्यवाणी कुछ दशकों के अंतराल में सही साबित हो गई है। उदारवादी जनवादी राज्य, यहां तक कि विकसित एवं सभ्य देशों में भी निरंकुश राज्य का उदय हो रहा है। केवल एक ही बात यहां नई है कि यह नया अधिनायकवाद डिजिटल अधिनायकवाद है, या डाटा-नियंत्रण वाला अधिनायकवाद।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी नई प्रौद्योगिकियां सूचनाएं ट्रैक कर सकती हैं, उन्हें ‘रियलटाइम’ में संग्रहित और संसाधित कर सकती हैं। पर ये दुधारी तलवार हैं। उन्हें रोगों की निगरानी और यहां तक कि किसानों की मदद के लिए मौसम की जानकारी के लिए उपयोग में लाया जा सकता है। पर वे राज्य को जवाबदेही से मुक्त भी कर देते हैं। एक किस्म का राज्य-प्रायोजित अपराध, मस्लन लोगों के निजी डाटा संग्रहित करना दूसरे किस्म की अपराधिक गतिविधियों की ओर बढ़ाता है, जैसे कि गुप्त कार्यवाही और न्यायेत्तर हत्याएं और इसके अलावा सामान्य तौर पर आज़ादी पर अंकुश।

कुछ ऐसे लोग भी हैं जो न्यायपालिका जैसे सापेक्षिक तौर पर स्वायत्त राज्य संस्थाओ के तहत किसीं प्रकार की निगरानी को बाहरी खतरों से राज्य की सुरक्षा के नाम पर सही ठहराते हैं। पर जब यह तर्क तथाकथित जन सुरक्षा तक बढ़ा दिया जाता है और सर्विलांस का अधिकार पुलिस के हाथ आ जाता है, और वे मनमाने ढंग से इसका दुरुपयोग  करने लगते हैं, तब इन्हीं लोगों का मुंह बन्द हो जाता है। यहीं से नागरिकों के निजता के अधिकार का हनन शुरू होता है।

केवल पूंजीवादी राज्य ही अपने नागरिकों को काबू में रखने के लिए सर्विलांस का इस्तेमाल नहीं करता, बल्कि अमेजॉन जैसी कम्पनी कार्यस्थल पर सर्वजांस प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करके अपने कर्मचारियों से अधिकतम काम निकलवा पाते हैं। आईटी कम्पनियां भी अपने कर्मचारियों को निगरानी में रखते है। सर्विलांस राज्य दरअसल सर्विलांस पूंजीवाद का एक हिस्सा ही हो जाता है।

मोदी सरकार के लिए विपक्षी नेताओं के अलावा जन आन्दोलनों के ऐक्टिविस्ट व पत्रकार टार्गट होते हैं। दरअसल पहले तो पेगासस का प्रयोग उन कार्यकर्ताओं के फोन टैप करने के लिए इस्तेमाल किया गया, जिनपर माओवादी समर्थक होने का मुलम्मा चस्पा कर दिया गया और जिनमें से दर्जन भरं को सालों तक बिना आरोप सिद्ध हुए या जमानत के जेल में डाल दिया गया। उन्हें ‘अर्बन नक्सल’ बताया गया पर उनपर कोई विशेष आरोप नहीं लगाए गए।

मूल रूप् से वह यूपीए के चिदम्बरम थे, जिन्होंने ये ‘बड़े भाई’ वाला CMS स्थापित किया।

राहुल गांधी या चिंदम्बरम ने इसके लिए कभी खेद नहीं किया और न ही कोई ठोस वायदा किया कि यदि वे सत्ता में आए तो CMS को भंग कर देंगे, पर वे संसद में पेगासस के विरुद्ध बवाल कर रहे हैं, इतना ही स्वागतयोग्य है!

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