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नदियों के संरक्षण के लिए ज़रूरी धन के प्रवाह में अब भी बड़ी बाधाएं
हर साल नदियों का प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। लेकिन नमामि गंगे जैसे बहुप्रचारित-प्रसारित परियोजनाओं के बावजूद, नदी संरक्षण के लिए आवंटन और ख़र्च में कमी बरक़रार है।
भरत डोगरा
14 Sep 2021
नदियों के संरक्षण के लिए ज़रूरी धन के प्रवाह में अब भी बड़ी बाधाएं
Image Courtesy: The Quint

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार अक्सर नदियों के संरक्षण के लिए अपनी प्रतिबद्धता का प्रचार-प्रसार करती रहती है। कई बार सरकार गंगा को बचाने को अपनी मुख्य प्राथमिकताओं में बता चुकी है। लेकिन क्या नदियों को बचाने का यह दावा सरकार द्वारा धन के आवंटन की मंशा से मेल खाता है?

चलिए प्रतिनिधिक योजना नमामि गंगे और इसमें हुए आवंटन को देखते हैं। बीजेपी सरकार द्वारा बहुत जोर-शोर से यह योजना शुरू की गई थी। इस परियोजना को 20,000 करोड़ रुपये की योजना घोषित किया गया, यह पैसा आने वाले कई सालों में खर्च किया जाना था। इस परियोजना को केंद्र सरकार की उच्च प्राथमिकता वाली योजनाओं में माना जाता है। 

लेकिन 26 जुलाई, 2021 को प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो ने जल शक्ति मंत्रालय के जो आंकड़े जारी किए हैं, उनके मुताबिक़ 2017-18 में नमामि गंगे को 3,023 करोड़ आवंटित किए गए थे। तबसे अब तक यह आंकड़ा नीचे ही आया है। सरकार ने आवंटन को 2018-19 में 2,370 करोड़ और 2019-20 में 1,553 करोड़ रुपये कर दिया। 2020-21 में इसे और घटाते हुए सिर्फ़ 1300 करोड़ रुपये इस योजना के लिए दिए गए। दूसरे शब्दों में कहें तो 2020-21 में इस योजना के लिए किया गया आवंटन, 2017-18 की तुलना में सिर्फ़ 43 फ़ीसदी रहा। 

2021-22 में इस योजना के लिए 1,450 करोड़ रुपये आवंटित हुए, जो पिछले साल की तुलना में थोड़ा सा ज़्यादा है, लेकिन यह भी 2017-18 के आवंटन की तुलना में 47 फ़ीसदी ही है। 

योजना के लिए पर्याप्त आवंटन ना होना समस्या का सिर्फ़ एक पहलू है। लेकिन यहां ध्यान देने वाली बात है कि इतने प्रचार-प्रसार से शुरू की गई इस योजना में आवंटित निधि में से धन जारी करने में बहुत कटौती की गई। नमामि गंगे परियोजना के लिए सबसे पहले साल में 2,053 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे। आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि उस साल भारत सरकार ने परियोजना के तहत आवंटित निधि में से गंगा को साफ़ करने के राष्ट्रीय मिशन के लिए सिर्फ़ 326 करोड़ रुपये ही जारी किए। दूसरे शब्दों में कहें तो अपने पहले ही साल में इस योजना में आवंटित निधि में से सिर्फ़ 16 फ़ीसदी निधि ही जारी की गई। यह काफ़ी गलत था, क्योंकि पहला साल ही किसी बड़ी परियोजना के लिए आगे का रास्ता और गति तय करता है। अगर पहले साल में ही मौका खो दिया, तो बाद के सालों में योजना की गति की कल्पना करना भी मुश्किल है। खासकर ऐसी स्थिति में जब भारतीय अर्थव्यवस्था अच्छा नहीं कर रही है। 

कुछ लोग कह सकते हैं कि अपर्याप्त आवंटन इसलिए किया गया, क्योंकि हमारे सामने दूसरी विकराल समस्याएं थीं, जिनका निदान पहले किया जाना जरूरी था। अगर ऐसा है, तो बाद के सालों में आवंटन को बढ़ाना था। बाद के सालों में ज़्यादा आवंटन ही पहले साल के घाटे को पाट सकता था। लेकिन यहां तो काफ़ी कम, कुल 1650 करोड़ रुपये का आवंटन ही किया गया। 

2017-18 इस परियोजना के लिए सबसे ज़्यादा आवंटन वाला साल था। लेकिन तब भी सिर्फ़ 1,433 करोड़ या कुल आवंटन का 46 फ़ीसदी ही जारी किया गया। कुल मिलाकर 30 जून, 2021 तक इस योजना के लिए 15,074 कररोड़ रुपये आवंटित हुए हैं, जिनमें से अब तक 10,792 करोड़ रुपये ही जारी किए गए हैं।

नमामि गंगे योजना में आवंटन बाद के सालों में गिरता गया है, यहां तक कि जारी किया गया पैसा भी परियोजना के लिए तय किए गए निवेश से बहुत कम है। ऊपर से दूसरी नदियों को बचाने के लिए होने वाला ख़र्च तो और भी कम है। जल शक्ति मंत्रालय के तहत नमामि गंगे परियोजना सिर्फ़ गंगा और उसकी सहायक नदियों के संरक्षण तक सीमित है। बाकी सारी दूसरी नदियां NRCP (राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना) के तहत आती हैं, जिसका प्रशासन पर्यावरण और वन मंत्रालय करता है। कोई भी अपेक्षा रखेगा कि बाकी सारी नदियों को बचाने के लिए गंगा की तुलना में ज़्यादा पैसा आवंटित किया गया होगा। लेकिन ऐसा नहीं है। लोकसभा में सरकार ने जो आंकड़े दिए हैं, उनके मुताबिक़ 12 मार्च, 2020 तक इस योजना के लिए 5,870 करोड़ रुपये आवंटित किए गए, जिसमें केंद्र की हिस्सेदारी 2,510 करोड़ रुपये है। साफ़ है कि एक बहुत बड़े काम के लिए यह बहुत थोड़ा पैसा है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि इस परियोजना के ज़रिए सिर्फ़ 34 नदियों में ही प्रदूषण रोकने की कोशिश की गई, जो 16 राज्यों में बहती हैं।

फिर जब पिछले तीन साल में नदियों के लिए योजनाओं को अनुमति देने की बात आती है, तो रिकॉर्ड और भी ज़्यादा बदतर है। यह जानकारी मार्च, 2020 में दी गई सूचना के आधार पर है। यह जानकारी 2017 से 2020 के बीच की योजनाओं पर लागू है। केवल चार प्रदूषण नियंत्रण परियोजनाओं को ही चार अलग-अलग राज्यों में इस अवधि में अनुमति दी गई। 

धन आवंटन का सबसे अहम काम सरकार ने सूरत की तापी नदी पर एक योजना के लिए किया। यहां सरकार ने 971 करोड़ की बड़ा आवंटन किया। लेकिन पहले साल में मार्च, 2019 से मार्च, 2020 के बीच सिर्फ़ 13 करोड़ ही जारी किए गए। मतलब आवंटन का दो फ़ीसदी से भी कम। 

सितंबर, 2018 में जम्मू-कश्मीर में देविका और तावी नदियों के लिए एक और योजना को स्वीकृति दी गई। यहां सरकार ने 186 करोड़ रुपये का आवंटन किया। लेकिन मार्च, 2020 तक सिर्फ़ 30 करोड़ रुपये ही जारी किए गए। जबकि यहां वास्तविक खर्च (राज्य का हिस्सा मिलाकर) सिर्फ़ 13 करोड़ रुपये ही रहा। 

जुलाई 2018 में सिक्किम के गंगटोक में रानी चू नदी में प्रदूषण कम करने के लिए 95 करोड़ रुपये की स्वीकृति की गई। लेकिन मार्च, 2020 तक सरकार ने सिर्फ़ 27 करोड़ रुपये ही जारी किए हैं। जबकि कुल खर्च सिर्फ़ 17 करोड़ रुपये (राज्यों का हिस्सा मिलाकर) रहा।

जनवरी, 2019 में मणिपुर के इम्फाल में नामबुल नदी में प्रदूषण को कम करने की योजना के लिए 97 करोड़ रुपये का आवंटन हुआ। एक बार फिर मार्च, 2020 तक केंद्र सराकार द्वारा सिर्फ़ 18 करोड़ रुपये के आसपास की राशि जारी की गई। जबकि राज्यों की हिस्सेदारी मिलाकर इस परियोजना पर कुल 3 करोड़ रुपये ही ख़र्च हो सके।

NCRP के तहत 2018-19 में 150 करोड़ रुपये, 2019-20 में 136 करोड़ रुपये और 2020-21 में 100 करोड़ रुपये की राशि ही वास्तविक तौर पर जारी की गई। यह अपर्याप्त है और लगातार कम हो रही है।

गंगा और उसकी सहायक नदियों को छोड़कर, केंद्र सरकार की दूसरी नदियों के संरक्षण के लिए जो प्रतिनिधिक परियोजनाएं हैं, उनके लिए बजट आवंटन तक, उनकी मात्रा गंगा के लिए आवंटित किए गए धन तो छोड़िए, उसमें से जारी किए गए अपर्याप्त धन से भी कम है। 

औद्योगिक अपशिष्ट से लेकर गंदे नालों तक, नदियों को गंदा कर रही कई चीजों को देखते हुए केंद्रीय योजनाओं में आवंटन और निकासी की तस्वीर काफ़ी चिंताजनक है। बांधों और बैराजों में पानी इकट्ठा करने या नदियों के पास अनिष्टकारी खनन गतिविधियां चलाने से कई भारतीय नदियों का जलस्तर कम हो रहा है

आज नदियों के संरक्षण के लिए बजट में होने वाले आवंटन को बढ़ाने और दूसरे जरूरी कदम उठाने की जरूरत है।

लेखक "कैंपेन टू प्रोटेक्ट अर्थ नाऊ" के मानद संयोजक हैं। उनकी हालिया किताबें "प्लानेट इन पेरिल" और "प्रोटेक्टिंग अर्थ फॉर चिल्ड्रेन" हैं। यह उनके निजी विचार हैं।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Still a Massive Block in Flow of Funds to Save Rivers

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