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सुशील कुमार: एक महान पहलवान के गर्त में गिरने का दुख
रविवार को सुशील कुमार को गिरफ़्तार कर लिया गया। उन्हें 6 दिन की हिरासत में भेजा गया है। कुश्ती के अखाड़े से बाहर सुशील कुमार का जो पतन हुआ है, उसमें उनका तो दोष है ही, लेकिन खेल व्यवस्था ने भी उनको उतना ही निराश किया है। WFI के सचिव ने जो वक्तव्य दिया है, उससे साफ़ हो गया है कि खेल संघ, अखाड़े के बाहर अपने खिलाड़ियों के बारे में कितना चिंतित रहता है। भारतीय खेलों के भले के लिए इस व्यवहार को बदलना होगा।
लेस्ली ज़ेवियर
26 May 2021
 सुशील कुमार: एक महान पहलवान के गर्त में गिरने का दुख

जो चीज लगातार टल रही थी, रविवार को वही हो गई। पहलवान सुशील कुमार को दिल्ली पुलिस ने राज्य के बाहरी इलाके मुंडका के आसपास गिरफ़्तार कर लिया। संयोग है कि 23 मई, रविवार को ही विश्व कुश्ती दिवस था। पूर्व विश्व विजेता, दो बार ओलंपिक पदक विजेता और वह इंसान, जिसने भारतीय कुश्ती को दुनिया के मंच पर अलग मुकाम दिलाया, वही सुशील कुमार अब जेल में हैं। 23 मई भयावह संयोग भरा दिन रहा।

रोहिणी जिला न्यायालय ने पूर्व कनिष्ठ पहलवान सागर धनखड़ की हत्या के मामले में चल रही जांच में मदद करने के लिए सुशील कुमार को 6 दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया है। सागर धनखड़ की छत्रसाल स्टेडियम में पिटाई हुई थी, जिससे आई चोटों से 5 मई को उनकी मौत हो गई थी। छत्रसाल स्टेडियम में ही एक रात पहले उनका कुछ लोगों से विवाद हुआ था, जिनमें कथित तौर पर सुशील भी शामिल थे। केस से जुड़ी जानकारियों का अभी सार्वजनिक होना बाकी है। इनमें वह मोबाइल कैमरा फुटेज भी शामिल है, जो सुशील कुमार की भूमिका की पुष्टि करती है। इस बीच जांच की दिशा कई मोड़ ले चुकी है, जिसमें एक संपत्ति विवाद भी शामिल होता है, तो कभी गैंगों की दुश्मनी की बात सामने आती है, जिसमें राजनधानी के अंडरवर्ल्ड के केंद्र में सुशील कुमार के होने के बात कही जा रही है।

हर कोई यह उम्मीद कर रहा है कि जांच के ज़रिए मृत व्यक्ति और जो लोग शक के दायरे में हैं, उन्हें न्याय मिले। लेकिन जिस तरीके से चीजें हुई हैं, उससे ऐसा होने का विश्वास बहुत ज़्यादा नहीं है। जैसा सुशील कुमार के वकील दावा कर रहे हैं कि वे निर्दोष हैं, अगर ऐसा है तो उन्हें कानून से भागना नहीं चाहिए था। फिर जैसे केस की जानकारियां ख़बरों में बाहर निकलकर आ रही हैं, उसके लिए दिल्ली पुलिस जिम्मेदार है। खेल से जुड़े पन्नों पर निश्चित ही थ्रिलर लिखी जा रही है। लेकिन यहां भारत का एक सबसे महान खिलाड़ी दांव पर लगा हुआ है। तो इसलिए जरूरी हो जाता है कि उन चीजों पर विचार करें, जिनके चलते आज सुशील कुमार इस गड्डे में फंस गए हैं। यह भारतीय खेल के भविष्य के लिए भी अहमियत रखता है।

सुशील की गिरफ़्तारी, फिर गिरफ़्तारी के आसपास की स्थितियां, उसके बाद जो धारणाएं बनाई गईं, वह उसी घटना की तरह रहस्यमयी हैं, जिनके चलते भारत का सबसे बड़ा पहलवान 15 दिनों तक कानून से छुपता रहा। इस बारे में दो कहानियां आईं। पहली कहती है कि उन्होंने 22 मई को पंजाब पुलिस के सामने जालंधर में आत्मसमर्पण कर दिया था। दूसरी के मुताबिक़, दिल्ली पुलिस की विशेष टीम ने उन्हें और उनके सहयोगी को तब धर दबोचा, जब वे मुंडका में स्कूटर पर चल रहे थे। दोनों को ही मीडिया में चर्चा मिली और दोनों के लिए ही पुलिस के सूत्रों का हवाला दिया गया।

इस मामले में जो रहस्यमयी चीजें हैं, उन्हें सबसे पहले साफ़ करने की जरूरत है। आखिरकार सुशील कुमार एक सार्वजनिक शख़्सियत हैं और 4 मई के पहले तक वे राष्ट्रीय मूल्य के व्यक्तित्व थे। फिर हम सभी लोगों को उनके बारे में सच जानने का अधिकार है, क्योंकि अतीत में हमने ही तो उनके उभार पर सबसे ज़्यादा खुशी जताई है।

शायद कानून के चलते पुलिस इस बारे में चीजें सार्वजनिक नहीं कर रही है। लेकिन कई तरीकों से इस बारे में गलत जानकारियां फैल रही हैं, ऐसे में एक खुला स्पष्टीकरण जारी करना जरूरी हो जाता है। पूरी तरह भावनात्मक तौर पर, एक खेल प्रेमी होने के नाते, हमारे लिए यह चीज मायने रखती है कि क्या सुशील कुमार ने पंजाब पुलिस के सामने अपनी मनमर्जी से आत्मसमर्पण किया या फिर वे किसी अपराधी की तरह पुलिस द्वारा धर दबोचे गए। यह कोई छोटी जानकारी नहीं है। इसका असर सुनवाई में कोर्ट द्वारा सुशील कुमार को देखने के नज़रिए पर भी पड़ सकता है।

चाहे वह दोषी साबित हों या ना हों, लेकिन उम्मीद है कि पुलिस और मामले से जुड़े अन्य लोग, जांच और पूछताछ में सभी नियम प्रक्रियाओं का पालन करेंगे और सुशील कुमार को जो इज्जत दी जानी चाहिए, वह देंगे।

रविवार दोपहर से एक वीडियो सोशल मीडिया पर चल रहा है, जिसमें सुशील कुमार को साकेत पुलिस स्टेशन से बाहर ले जाते हुए तस्वीरें दिख रही हैं। वीडियो में सुशील का चेहरा ढंका हुआ है, जबकि दो पुलिसवालों ने उनके हथियार रखे हुए हैं। एक हथियारबंद अधिकारी सबसे आगे नेतृत्व कर रहा है। जो लोग अपराधियों की गिरफ़्तारी से परिचित हैं, उनके लिए यह जानी-पहचानी तस्वीर है।

यह दिल दुखाने और डराने वाली तस्वीरें हैं। मेरे लिए तो इसमें व्यक्तिगत और पेशेवर दोनों तरह की वज़हें शामिल हैं। एक वक़्त मैं पहलवान हुआ करता था, फिर ओलंपिक स्पोर्ट्स बीट पर काम करने के दौरान मैं सुशील कुमार के करीब भी रहा। सालों-साल हम देखते रहे कि हथियारबंद पुलिसकर्मी उनके लिए एक वीआईपी, एक सितारे, एक हीरो और ओलंपिक पदक विजेता की हैसियत से पर रास्ता बनाते रहे। यह दुर्भाग्य है कि अब उन तस्वीरों की जगह नई तस्वीरें ले लेंगी, जो सितारे सुशील कुमार, उन्हें बनाने और बर्बाद करने वाली सभी चीजों को खुद में समेटे हुए होंगी।

लेकिन यह दुख सिर्फ़ पेशेवर योग्यता या व्यक्तिगत दुख से जन्म नहीं लेता। यह सिर्फ़ सुशील कुमार के लिए नहीं, बल्कि सुशील कुमार को बनाने वाली चीजों को झटका है। जब तक सुशील पदक जीत रहे थे, भारत उनके लिए जिम्मेदार था। फिर जब उन्हें पुलिस स्टेशन के बाहर ले जाया जा रहा था, तभी भारत और इसके खेल प्रतिष्ठानों ने उनसे अपने हाथ खींच लिए। कई लोगों ने यह काम चुप्पी साधकर किया, तो कई लोग मुखर रहे। वह कहते हैं कि इस हालत के लिए सिर्फ़ सुशील कुमार ज़िम्मेदार हैं। ऐसा कहने वालों में कुश्ती बिरादरी भी शामिल है। इस बिरादरी की भी सुशील पर वही स्थिति है, जो दूसरे संस्थानों और लोगों की है, जिन्होंने सुशील कुमार को एक विश्व स्तरीय खिलाड़ी बनाकर फलक पर उठाने और बहुत हद तक वहां से गिरने देने में अपनी भूमिका निभाई।

हम समझ सकते हैं कि यहां कुछ लोग नाराज़गी के चलते कीचड़ उछाल रहे हैं। मेरे भीतर भी सबसे पहले ऐसी ही भावनाएं आईं। लेकिन जब भावनाओं का यह ज्वार शांत हो गया, तब सारी तस्वीरे बेहद अवसादग्रस्त और स्याह लगने लगी। यह सिर्फ़ केवल अपना सपना सच करने वाले सुशील के बारे में नहीं, बल्कि देश में मौजूद तमाम सुशीलों के बारे में है।

यहां सुशील को दोषमुक्त करने की कोशिश नहीं हो रही है, बल्कि इस पूरी तस्वीर में मौजूद बीच की स्थितियों पर प्रकाश डालने की कोशिश हो रही है। भारत के सबसे बड़े कुश्ती के सितारे होने के नाते सुशील कुमार के पास मौका था कि वे किसी बिंदु पर जाकर अपनी रेखा खींच सकते थे। लेकिन उन्होंने नहीं खींची। यहां हमारे पास एक तरफ़ काली स्याह तस्वीर है, जहां सारे सबूत उनके खिलाफ़ जा रहे हैं। दूसरी तरफ उजली सफ़ेद तस्वीर है, जहां उनके द्वारा हासिल मुकाम और उनकी सार्वजनिक शख़्सियत उज्जवल भविष्य की ओर इशारा कर रही है। इन दोनों रंगों के बीच भी एक मिलाजुला भूरा रंग है, जिसे समझ पाना मुश्किल है- क्या सुशील कुमार अपनी प्रसिद्धि के शिकार बने हैं या उन्हें अपने घमंड और लापरवाही का शिकार होना पड़ा है?

इसी मिलेजुले भूरे क्षेत्र में हमें अपना माइक टायसन मिल जाता है। टायसन की त्रासद कथा और सुशील में समानता नहीं हो सकती। लेकिन इन दोनों की कहानी आपको बताती है कि कैसे सितारों का उनके अपने चुने गए कदमों द्वारा अस्त होता है।

ज़्यादा गहराई से की गई जांच से पता चलेगा कि सत्ता प्रतिष्ठानों और खिलाड़ी के आसपास के माहौल ने उन्हें कभी सही विकल्प चुनने ही नहीं दिया। भारतीय कुश्ती या बॉक्सिंग पर भी यही चीज लागू होती है। याद होगा कि कैसे भारतीय बॉक्सिंग के सितारे विजेंदर कुमार नारकोटिक्स के केस में जेल जाने से बहुत करीब से बचे थे। संयोग है कि विजेंदर और सुशील, दोनों ने ही 2008 के बीजिंग ओलंपिक में कांस्य पदक जीता था।

विजेंदर के मामले में सुशील की तरह ही, इस बात से बहुत लेना-देना रहा कि उन्होंने ख्याति मिलने के बाद किन लोगों की संगत की। दोनों ही खिलाड़ी पारंपरिक भारतीय खेल तंत्र से होकर आए थे, जिनका संचालन खेल संघ और खेल मंत्रालय करते हैं। कैंप या प्रशिक्षण केंद्र एक महिमा मंडित, स्याह और सड़ा हुआ आवरण होता है। इसमें रहने वाले खिलाड़ियों को उसकी सुरक्षा प्राप्त होती है। उन्हें विश्व स्तरीय खिलाड़ी बनने के प्रशिक्षण के दौरान यह आवरण उनका ध्यान बंटने से रोकता है। लेकिन जब उन्हें प्रसिद्धि मिल जाती है, तो उन्हें अपनी मनमर्जी चलाने और एक नई आज़ादी की छूट मिल जाती है और वे गलत लोगों की संगत बना बैठते हैं। तब किसी बाहरी प्रहार या हमले से बचने के लिए उनका रक्षा आवरण बनाया जाता है, लेकिन यह आवरण सामाजिक गड्ढ़ों और जालों से बचने के लिए नहीं होता।

अलग-अलग कहानियों में कई समानताएं होती हैं, लेकिन इन समानताओं का अंत भी है। हर कहानी में अपनी व्यक्तिगत अवधारणाएं होती हैं, किरदार बदलते रहते हैं, लेकिन चीजों को प्रभावित करने वाले कारक और स्थायी चीजें इन कहानियों में एक जैसी दिखाई देती हैं। हमें इन्हीं समानताओं को लेकर चिंता करने की जरूरत है। हमें ज़्यादा व्यक्तिगत तंत्र बनाने की जरूरत है, जहां ऐसे लोगों को खिलाड़ियों के आसपास तैनात किया जाए, जो सही वक़्त पर उंगली उठा सकें और नैतिक पैमाने को सही करने का माद्दा रखते हों।

अब चाकू निकल चुके हैं। लेकिन हम इनका इस्तेमाल सड़े हुए हिस्से को निकालने में नहीं, बल्कि घाव को और गहरा करने में करते आ रहे हैं।

भारतीय कुश्ती संघ के शीर्ष से छींटाकशी शुरू हो चुकी है। संघ के सचिव विनोद तोमर ने बयान दिया है कि सुशील ने भारतीय कुश्ती का नाम खराब किया है। यहां तोमर की बातों का पाखंड दोधारी है। पहली बात तो भारतीय कुश्ती की अंतरराष्ट्रीय ख्याति बहुत हद तक सुशील कुमार के कारण है। दूसरी वज़ह वह है, जो तोमर ने आगे कही है।

तोमर ने कहा, "हां, मुझे कहना पड़ेगा कि इस प्रकरण से भारतीय कुश्ती की छवि को गहरा धक्का पहुंचा है। लेकिन पहलवान अखाड़े के बाहर क्या करते हैं, उससे हमारा कुछ लेना-देना नहीं है। हम सिर्फ़ अखाड़े में उनकी प्रदर्शन तक सीमित हैं। इस खेल ने ख्याति अर्जित करने के लिए संघर्ष किया, क्योंकि लंबे वक़्त तक पहलवानों को सिर्फ़ गुंडा माना जाता था।" यहीं तोमर की बात का दूसरा पाखंड उजागर हो जाता है। भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष बीजेपी सांसद ब्रज भूषण शरण सिंह हैं। रिपोर्टों के मुताबिक़, 2014 का उनका चुनावी शपथपत्र कहता है कि अतीत में सांसद महोदय पर कई आपराधिक मामले दर्ज हो चुके हैं।

भारतीय कुश्ती संघ की सबसे बड़ी असफलता यह रही कि उसने कभी कुश्ती को उसके कथित आपराधिक संबंधों से दूर करने की कोशिश नहीं की, बल्कि संघ की कभी मंशा भी नहीं रही। संघ इसलिए चुप रहा, क्योंकि इससे बड़े-बड़े दिग्गजों को इस खेल के ऊपर अपनी पकड़ बनाए रखने में मदद मिलती रही। मॉडल टॉउन स्टेडियम (छत्रसाल स्टेडियम) कई सालों से इस तरह की गतिविधियों का केंद्र रहा है। सभी लोग यह बात जानते हैं, लेकिन तब भी ना तो प्रशासन, ना ही पुलिस ने सरकारी स्वामित्व वाले केंद्र को साफ़ करने की कोशिश की। इसी स्टेडियम में सतपाल सिंह का प्रशिक्षण केंद्र है। इसका बहुत कुछ लेना-देना इस तथ्य से है कि राजनेता बहुत सारे पहलवानों और बॉक्सरों का इस्तेमाल अपनी काली गतिविधियों में करते हैं। इसलिए सारे लोग खुश हैं, क्योंकि इससे उनका फौरी काम बन रहा है। सुशील इसी व्यवस्था के उत्पाद हैं।

कुश्ती संघ के एक राष्ट्रीय स्तर के पहलवान या किसी निचले स्तर के पहलवान के नैतिक फ़ैसलों पर नियंत्रण ना होने की बात को हम समझ सकते हैं। लेकिन यहां हम कुश्ती संघ की राजसी सत्ता की बात कर रहे हैं। दुनियाभर के खेल संगठन अपने खिलाड़ियों की देखरेख बिना शिकायत के करते हैं। यह पुरुष और महिलाएं प्रतिनिधि होते हैं और उनका अच्छा व्यवहार खेल के विकास के लिए जरूरी होता है। इसलिए उनका व्यवहार संबंधित संगठन से जुड़ा होता है। यहां संघ का खिलाड़ियों को समर्थन सिर्फ़ खेल के मैदान में ख़त्म या शुरू नहीं होता। अगर हम भविष्य में और खिलाड़ियों को सुशील की तरह का अंजाम भुगतने नहीं देखना चाहते हैं, तो चीजों को बदलना होगा।

चाहे सुशील का मुकदमा किसी भी दिशा में जाए, इससे भारतीय कुश्ती धराशायी नहीं होगी। भारतीय कुश्ती संघ के अधिकारियों का यह डर सही नहीं है। अगर सुशील ने गलती की है, तो उन्हें कानून के हिसाब से सजा दी जानी चाहिए। इससे खेल की वास्तविकताएं सामने आएंगी। और वास्तविकता पर प्रकाश डालना कभी बदनामी नहीं करता। यह बदनामी तभी होती है, जब संबंधित खेल संघ का पूरा सत्ता प्रतिष्ठान ही एक पहेली हो। बल्कि कई मायनों में कुश्ती संघ एक पहेली ही है।

सुशील का मामला, भारतीय खेल संघों के पाखंड और खिलाड़ियों की ज़िंदगी में सहभागी ना बनने की भावना को उजागर करता है। यह एक बड़ी सीख के तौर पर मौजूद रहेगा और इसका इस्तेमाल बहुत देर होने से पहले स्थितियों को ठीक किए जाने में किया जाना चाहिए। सुशील का उदाहरण खिलाड़ियों और उनके प्रबंधकों को उनके आसपास रहने वाले लोगों के बारे में चेताएगा और उन्हें उन सांठगांठों से सावधान करेगा, जो हर चीज को ख़त्म करने की संभावना रखती होंगी।

पर लगता है शायद मौजूदा स्थिति में यही सबसे बड़ी विडंबना है। जेल में भी सुशील एक आदर्श और एक केस स्टडी हैं, लेकिन यह कुछ ऐसे है, जिसके बारे में किसी ने कभी सोचा नहीं था। 2012 में मुझे सुशील कुमार के आसपास दो दिन तक रहने का वक़्त मिला, ताकि मैं उनकी दिनचर्या समझ पाऊं। जिस तरह से छत्रसाल स्टेडियम के युवा पहलवान उनकी तरफ़ देखते थे, वह देखना काफ़ी उत्साहित करता था। एक बार हम डॉर्मेट्री में थे। तभी एक कोच एक युवा लड़के को पकड़कर लाया। दरअसल वह लड़का थोड़ा आलसी था। जैसे ही लड़के को सुशील कुमार के सामने लाया गया, उसके आंसू निकल गए। सुशील ने उसकी पीठ को थपथपाया और उसे कड़ी मेहनत पर कुछ सलाह दी। इसके बाद सुशली ने लड़के को जूस का ग्लास दिया। ऐसा लगा जैसे इसके बाद लड़का उत्साहित, प्रेरित होकर प्रतिबद्धता के साथ वापस गया।

हो सकता है कि उस वक़्त सागर उन युवा लड़कों में से एक रहा हो और सुशील कुमार से प्रेरणा लेकर सलाह लेने की कोशिश करता रहा हो।

आज 9 साल बाद एक दुखभरा सच बाकी है। भारतीय खेल अब ज़्यादा खस्ताहाल हो गया है। इसके ज़िम्मेदार सिर्फ़ सुशील कुमार नहीं हैं। अब जब हम तथ्यों को खोजने की कोशिश कर रहे हैं, तब हमें एक ऐसे पहलवान के बारे में राय बनाने में सहानुभूति रखनी होगी, जो दोषी होने से ज़्यादा खोया और उलझन में दिखाई दे रहा है, आखिर सुशील कुमार के दोषी होने या ना होने का फ़ैसला हमारा कानून तो करेगा ही।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

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