NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
संस्कृति
समाज
भारत
टुसू परब : बढ़ते सामाजिक तनावों के बीच भी दे रहा है साझापन का ज़मीनी संदेश
‘टुसू परब’ का केंद्र महिलाएं होतीं हैं। यह पूरी तरह से यहाँ के मूलनिवासियों (सदान) का अपना त्योहार है लेकिन आदिवासी व अन्य समुदायों के लोग भी सपरिवार इसमें शामिल होते हैं। इस पर्व या परब का प्रतीक चिह्न “टुसू का चौड़ल” बिल्कुल मुस्लिम समाज में निकाले जाने वाले ताजिये जैसा होता है।
अनिल अंशुमन
29 Jan 2020
टुसू परब

देश में गंगा–जमुनी तहज़ीब की अनेक मिसालें हैं, ये दीगर बात है कि हालिया समय में इसे खत्म कर देने की एक सुनियोजित कवायद बदस्तूर जारी है। झारखंड प्रदेश में भी ऐसी ही कोशिशें इस वक्त में तेजी से बढ़ायी जा रहीं हैं। लेकिन इससे परे झारखंडी सामाजिक जीवन के पटल पर यहाँ के सामाजिक – सांस्कृतिक साझापन की जड़ें इतनी गहरी हैं कि ऐसी कवायदें असरदार नहीं बन पा रहीं हैं। जिसका मूलाधार हैं यहाँ के ग्रामांचलों में समय समय पर मनाए जाने वाले लोक उत्सव यानी साझे परब–त्योहार। जो यहाँ के मूलवासियों के मन मिज़ाज में पूरी सघनता से अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं।

टुसू 3.png

इसी का जीता जागता उदाहरण है प्रत्येक वर्ष के जनवरी माह के मकर संक्रांति के समय पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जानेवाला ‘टुसु परब ’। जिसका केंद्र महिलाएं होतीं हैं। यह पूरी तरह से यहाँ के मूलनिवासियों (सदान) का अपना त्योहार है लेकिन आदिवासी व अन्य समुदायों के लोग भी सपरिवार इसमें शामिल होते हैं। गाँव – गाँव से लड़कियों – महिलाओं की टोलियाँ इस परब का प्रतीक चिन्ह “ टुसु का चौड़ल ” सजा धजाकर इस अवसर पर लगने वाले मेले में शामिल होती हैं। रंग बिरंगे काग़ज़ व कपड़ों से बनाया गया “ चौड़ल” जो हू ब हू मुस्लिम समाज के ताजिये जैसा ही होता है। पहले ये छोटे आकार के हुआ करते थे लेकिन अब काफी बड़े बड़े आकार के बनाए जाने लगे हैं। क्योंकि मेलों में अब ‘चौड़ल प्रतियोगिता' भी होने लगी है और जो चौड़ल सबसे आकर्षक होता है उसे खस्सी अथवा नगद इनाम दिया जाता है।

रांची से सटे पांचपरगना के इलाके में टुसू परब काफी सघनता से मनाया जाता है। इसी क्षेत्र के बुण्डू अनुमंडल स्थित हुमटा गाँव में भी हर वर्ष मकर संक्रांति, 14 जनवरी के बाद 25 जनवरी से पहले किसी भी तिथि को टुसू मेला लगता है। 19 जनवरी को इसी मेले के दौरान युवा आदिवासी साहित्यकार सानिका मुंडा से मिलने पर उन्होंने टुसू से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ दीं। जिसमें उन्होंने टुसू को लेकर लोकप्रचलित जनश्रुति को बताते हुए कहा कि वर्षों पहले टुसूमनी बंगाल के राजा की छोटी सी बेटी का नाम था। जो काफी सुंदर और पूरी प्रजा को बेहद प्यारी थी लेकिन असाध्य बीमारी के कारण उसकी अकाल मौत हो गयी। उसी की याद में गाँव की कुंवारी कन्याओं ने पत्तों और बांस की कमानियों से छोटा सा घरौंदा बनाकर उसमें टुसूमनी की प्रतीक मिट्टी की छोटी सी मूर्ति रखकर तथा फूलों से उसे सजाकर उसका चौड़ल निकालने की परंपरा शुरू की। साथ ही उसकी याद में उपवास रखकर पारंपरिक अनुष्ठानों के बाद महिलाओं का समूह बनाकर नाचते गाते हुए उसे नदी के किनारे विसर्जित कर देतीं थीं। उस दौर में बंगाल में नवाब सिराजुद्दौला का राज था। संभवतः मुस्लिम संस्कृति के ताज़िये की बनावट से प्रभावित होकर ही वर्तमान का चौड़ल स्वरूप सामने आया है। टुसू को लेकर प्रचलित कुछेक सांप्रदायिक भाव की कहानियों को वे बाद में गढ़ी व लोकप्रचरित बताते हैं। जिनमें कहा गया है कि 18वीं सदी में कुर्मी किसान परिवार में जन्मी अतिसुन्दर किशोरी का नाम टुसूमनी था। जिसकी सुंदरता पर मोहित होकर तत्कालीन बंगाल के नवाब सिरजुद्दौला के सैनिकों ने उसका अपहरण कर लिया था। नवाब को जब पता चला तो उसने अपहरणकर्त्ता सैनिकों को दंडित कर टुसू को पूरे समान के साथ उसके गाँव भेज दिया। लेकिन गाँव के लोगों ने उसे अपवित्र कहकर गाँव में रखने से इंकार कर दिया। दुखी टुसू ने अपनी पवित्रता साबित करने के लिए गाँव की ही नदी में डूबकर अपनी जान दे दी। इस घटना ने स्थानीय सभी कुँवारी लड़कियों और महिलाओं को काफी व्यथित और क्षुब्ध कर दिया। तब से टुसू के बलिदान की याद में टुसू परब मनाते हुए उसकी मूर्ति चौड़ल में रखकर नाचते–गाते हुए घुमाकर नदी में उसे विसर्जित करने की परंपरा चली आ रही है।

IMG-20200129-WA0027.jpg

झारखंड के पूर्वी सीमा रांची ज़िला स्थित सिल्ली–पांचपरगना के इलाकों, उससे सटे पश्चिम बंगाल के पुरुलिया ज़िले और ओड़ीसा के मयूरभंज से सटे कई इलाकों में यह त्योहार काफी प्रचलित है। लोक प्रचलित परंपरा के अनुसार इसे कृषि आधारित पर्व भी कहा जाता है। जिसमें नए वर्ष में आने वाली खेती–किसानी के लिए अनुष्ठान पूर्वक खेतों में पहली बार हल चलाकर उसकी शुरुआत करते हैं। मकर संक्रांति के समय से शुरू होने वाला यह त्योहार वसंत पंचमी के पूर्व सम्पन्न हो जाता है। इस त्योहार के उत्सव-मेलों में विशेष रूप से मूलवासी समाज के अलावा आदिवासी समाज और बाकी समाज के सारे लोग भी सपरिवार शामिल होते हैं।

टुसू परब बरसों बरस से झारखंड क्षेत्र की सामाजिक अनेकता में एकता की अनूठी मिसाल बना हुआ है। विशेषकर जबकि एक समुदाय विशेष को टार्गेट कर इस राज्य को मॉब लिंचिंग प्रदेश और सांप्रदायिकता की प्रयोगशाला बनाने की हरचंद कोशिशें जारी हैं और कई बार कामयाब होती भी दीखतीं हैं। लेकिन इस प्रदेश कि साझी सामाजिक–सामुदायिक एकता की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि अभी तक यह दंगा प्रदेश नहीं बनाया जा सका है।

IMG-20200129-WA0034.jpg

टुसू-चौड़ल के अभी तक ताज़िया स्वरूप में होने के संदर्भ में युवा आदिवासी भाषाकर्मी–संस्कृतिकर्मी सोनी तिरिया का कहना है कि इससे यहाँ के मूलवासियों और आदिवासियों को कभी कोई ऐतराज नहीं हुआ है। हालांकि झारखंड के मूलवासियों की अच्छी ख़ासी आबादी का भाजपाकरण हो चुका है लेकिन चूंकि व्यापक आदिवासी समाज के लोग स्वयं को हिन्दू नहीं मानते इसलिए यह सांप्रदायिक विवादित विषय नहीं बन सका है। सबसे बढ़कर हम झारखंड प्रदेश को मिनी हिंदुस्तान जैसा मानते हैं। जहां आदिवासियों ने बिना कसी गंभीर कारण के कभी किसी को नहीं भगाया है। जबकि ये एक कड़वी सच्चाई है कि यहाँ आकर बसनेवाले कई समुदायों के लोगों ने आदिवासियों की जंगल–ज़मीन को छीनकर ही बसने का कम किया है।

टुसू परब झारखंड प्रदेश के मुलवासियों की सामाजिक – सांप्रदायिक एकता की अनूठी मिसाल पेश करता है।

puru festival
puru parab
women festivals
tribals

Related Stories

स्पेशल रिपोर्ट: पहाड़ी बोंडा; ज़िंदगी और पहचान का द्वंद्व

अंतरराष्ट्रीय आदिवासी भाषा वर्ष: हर दो हफ़्ते में एक भाषा पृथ्वी से हो रही है लुप्त


बाकी खबरें

  • kisan
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    लखीमपुर हत्याकांड: देशभर में मनाया गया शहीद किसान दिवस, तिकोनिया में हुई ‘अंतिम अरदास’
    12 Oct 2021
    तिकोनिया में शहीद किसानों को याद में ‘अंतिम अरदास’ कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें किसान नेताओं के साथ विभिन्न राज्यों के किसान और भारी संख्या में अन्य आम लोग यहां पहुंचे।
  • covid
    भाषा
    विशेषज्ञ पैनल ने दो साल तक के बच्चों के लिए कोवैक्सीन के आपात इस्तेमाल को मंजूरी देने की सिफारिश की
    12 Oct 2021
    हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक ने दो से 18 साल तक के बच्चों एवं किशोरों में इस्तेमाल के लिए कोविड-19 रोधी टीके कोवैक्सीन के 2/3 चरण का परीक्षण पूरा कर लिया है।
  • Will Damodar River Again be Bengal’s ‘Sorrow
    रबींद्र नाथ सिन्हा
    क्या दामोदर नदी फिर से बंगाल का 'शोक' बनेगी?
    12 Oct 2021
    5 अक्टूबर को ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री को ख़त लिखते हुए बाढ़ की स्थितियों में आपात हस्तक्षेप की मांग की। उन्होंने दामोदर घाटी निगम के अनियोजित और अनियंत्रित पानी छोड़ने की गतिविधि को दक्षिण बंगाल…
  • taliban
    न्यूज़क्लिक टीम
    तालिबान पर अमेरिकी दांव, EU-नेटो-चीन के बीच कूटनीति
    12 Oct 2021
    'पड़ताल दुनिया भर की' में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने तालिबान से अमेरिकी अधिकारियों की बातचीत के कूटनीतिक मायनों पर न्यूज़क्लिक के प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ से बातचीत की। साथ ही जर्मनी में सत्ता…
  • Nobel in Economics
    अजय कुमार
    न्यूनतम मज़दूरी बढ़ने से रोजगार कम नहीं होता : जानिए इस साल के अर्थशास्त्र के नोबेल की कहानी
    12 Oct 2021
    न्यूनतम मज़दूरी बढ़ाने पर रोजगार बढ़ेगा या घटेगा? ऐसे सवालों का जवाब देना बहुत कठिन काम है। इस कठिन काम को जिन अर्थशास्त्रियों ने सुलझाया है। उन्हें ही इस बार का नोबेल पुरस्कार दिया जा रहा है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License