NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
तेलंगाना: काश्तकार किसानों पर नए कृषि कानूनों की सबसे अधिक मार!
किसान संगठनों का अनुमान है कि पिछले दो सालों के दौरान सबसे अधिक संकटग्रस्त तकरीबन 350 काश्तकार किसानों ने आत्महत्या कर अपनी परेशानियों से छुटकारा पाने का रास्ता चुना।
पृथ्वीराज रूपावत
13 Jan 2021
telan

हैदराबाद: किसान अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि केंद्र सरकार द्वारा लाये गए नए कृषि कानूनों से काश्तकार किसानों के इससे बुरी तरह से प्रभावित होने की आशंका है, क्योंकि उनकी सामाजिक हैसियत और आजीविका इससे प्रभावित होने जा रही है। तेलंगाना में किसान संगठनों का दावा है कि निज़ाम के दौर से लेकर वर्तमान में मौजूदा तेलंगाना राष्ट्र समिति के दौर तक में कृषक समुदायों के बीच में यदि कोई वर्ग सबसे अधिक संकटग्रस्त स्थिति में रहा है तो वे काश्तकार किसान ही रहे हैं।

पिछले 48 दिनों से देश भर में लाखों किसान विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और इस विवादास्पद कृषि कानूनों को रद्द किये जाने की मांग कर रहे हैं। मंगलवार के दिन सर्वोच्च न्यायालय ने “अगले आदेशों” तक इन कानूनों के कार्यान्वयन पर रोक लगा दी है और सरकार एवं किसानों के बीच बन चुके गतिरोध को हल करने के लिए एक कमेटी गठित कर दी है।

किसान संगठनों के अनुसार तेलंगाना में करीब 14 से 18 लाख पट्टेदार किसान हैं जो कुल 1.25 करोड़ एकड़ कृषियोग्य भूमि में से लगभग 14% पर खेती कर रहे हैं। हालाँकि मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने फरवरी 2019 में घोषित कर दिया था कि सरकार पट्टेदार किसानों एवं खेतिहर मजदूरों को किसान नहीं मानती। इसलिए सरकारी योजनायें और सब्सिडी इन वर्गों पर लागू नहीं होंगी।

ऐसे में राज्य सरकार जहाँ किसानों को ‘रायथू बंधू’ योजना के तहत प्रति एकड़ पर प्रति वर्ष 10,000 रूपये की निवेश सहायता प्रदान करती है, वहीँ पट्टेदार किसानों को इस योजना में शामिल नहीं किया गया है। इसका अर्थ यह हुआ कि भूमि के मालिकों को यह धन प्राप्त होगा, भले ही उनकी जमीनों पर खेती का सारा कामकाज काश्तकार किसानों द्वारा ही क्यों न किया जा रहा हो।

रायथू स्वराज्य वेदिका के रवि कन्नेगंटी का इस पर कहना है कि कृषि पर सीएम केसीआर के बयानों से से इस बात के संकेत मिलते हैं है कि उन्हें इस क्षेत्र की असली समस्यायों की कोई जानकारी नहीं है।अखिल भारतीय किसान सभा के उपाध्यक्ष सरमपल्ली मल्लारेड्डी के अनुसार राज्य में पट्टे पर खेती करने वाले किसानों को जो क़ानूनी अधिकार हासिल हैं, उन्हें अभी तक लागू किया जाना शेष है, जबकि नए केन्द्रीय कानून तो उनकी आजीविका एवं सामाजिक स्थिति के लिए गंभीर संकट पैदा खड़े करने वाले साबित हो सकते हैं।

मल्लारेड्डी इस बारे में विस्तार से बताते हुए कहते हैं “गाँवों में किराए पर खेती-किसानी का चलन रहा है, क्योंकि वहाँ पर कई लोगों के बीच में मान्यता है कि शहरों और कस्बों में पलायन कर अन्य कार्य करने की अपेक्षा खेतीबाड़ी के काम से सामाजिक हैसियत को बेहतर आंका जाता है। काश्तकार किसान पहले से ही अपनी उपजाई हुई फसलों को सरकारी खरीद केन्द्रों में बेच पाने की समस्या से संघर्ष कर रहे हैं। क्योंकि जमीनों के स्वामित्व के कागजात न होने के कारण उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से वंचित कर दिया गया है। इसके अलावा नए कानूनों में से एक में अनुबंध पर खेती को बढ़ावा दिए जाने से वे उस जमीन पर अपना कब्जा खो देंगे, जिसपर वे अभी तक खेती कर रहे थे। ऐसी स्थिति में उनके परिवारों को आजीविका के खतरे का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि वे कॉर्पोरेट के साथ मुकाबला नहीं कर सकते हैं।”

ये तीन नए कानून हैं कृषक (सशक्तीकरण एवं संरक्षण) मूल्य आश्वासन करार एवं कृषि सेवा अधिनियम 2020, कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) अधिनियम और आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम।रवि कन्नेगंटी के मुताबिक “चूँकि नए कानून एमएसपी को एक क़ानूनी अधिकार के तौर पर सुनिश्चित नहीं करते हैं और सरकारी खरीद केन्द्रों के इनसे कमजोर पड़ते जाने का अंदेशा है, ऐसे में पट्टे पर खेती करने वाले किसानों के आगे पट्टे के भुगतान और कम होती आय का बोझ पड़ने वाला है।”

जब जवाहरलाल नेहरु भारत के प्रधानमंत्री थे तो उस दौरान आन्ध्र प्रदेश (तेलंगाना एरिया) टेनेंसी एवं कृषि भूमि अधिनियम, 1950 (1950 के अधिनियम 21) को लागू किया गया था, जिसके साथ तेलंगाना कृषक संघर्ष का अंत हुआ था। बाद में जब तेलंगाना और आन्ध्र प्रदेश का 1956 में विलय हुआ, तो उस दौरान आन्ध्र प्रदेश टेनेंसी एक्ट, 1956 को लागू किया गया था। 1974 में इस कानून में और भी संशोधन किये गए। कानून के मुताबिक काश्तकार किसान को सिंचित भूमि के लिए अधिकतम किराए की दर सकल उपज के 25% तक निर्धारित की गई थी, और असिंचित भूमि के मामले में इसे 20% तय किया गया था।मल्लारेड्डी कहते हैं “इस कानून के बावजूद पट्टे पर खेती करने वाले किसानों को अपनी कुल उपज के 80% से लेकर 90% तक के बराबर का किराया चुकाने के लिए मजबूर होना पडता है।”

किसान संगठनों का अनुमान है कि तेलंगाना में पिछले दो वर्षों के दौरान लगभग 350 काश्तकार किसानों की मौतें संकटग्रस्त आत्महत्याओं के कारण हुई हैं। राज्य में 2014 से लेकर 2019 के बीच में कुलमिलाकर 5,912 किसानों की मौतें, आत्महत्याओं की वजह से हुई थीं, जिनमें से 1,478 संख्या काश्तकार किसानों की थी। आंध्र प्रदेश लैंड लाइसेंस्ड कल्टीवेटर्स एक्ट, 2011 के तहत काश्तकार किसानों को पात्रता कार्ड, फसल ऋण, सरकारी सब्सिडी, बीमा एवं प्राकृतिक आपदा के समय मुआवजा प्रदान करने की व्यवस्था की गई थी। हालाँकि इन कानूनों को अभी भी अमल में नहीं लाया जा सका है।


तेलंगाना में तकरीबन 28% ग्रामीण जनता भूमिहीन गरीब वर्ग से है, जबकि आन्ध्र प्रदेश में यह संख्या 70% हैं। बैंकों के मुताबिक आंध्र प्रदेश में लगभग 28 लाख काश्तकार किसान हैं।इन कानूनों को रद्द किये जाने की माँग करते हुए तेलुगु राज्यों के किसान, जारी देशव्यापी किसानों के आन्दोलन के हिस्से के तौर पर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन जारी रखे हुए हैं।

Land Tenancy
tenant reform
tenant in telangana
new farm law
BJP
farmer movement

Related Stories

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

दिल्ली : पांच महीने से वेतन व पेंशन न मिलने से आर्थिक तंगी से जूझ रहे शिक्षकों ने किया प्रदर्शन

आईपीओ लॉन्च के विरोध में एलआईसी कर्मचारियों ने की हड़ताल

जहाँगीरपुरी हिंसा : "हिंदुस्तान के भाईचारे पर बुलडोज़र" के ख़िलाफ़ वाम दलों का प्रदर्शन

दिल्ली: सांप्रदायिक और बुलडोजर राजनीति के ख़िलाफ़ वाम दलों का प्रदर्शन

आंगनवाड़ी महिलाकर्मियों ने क्यों कर रखा है आप और भाजपा की "नाक में दम”?

NEP भारत में सार्वजनिक शिक्षा को नष्ट करने के लिए भाजपा का बुलडोजर: वृंदा करात

नौजवान आत्मघात नहीं, रोज़गार और लोकतंत्र के लिए संयुक्त संघर्ष के रास्ते पर आगे बढ़ें


बाकी खबरें

  • yogi bulldozer
    सत्यम श्रीवास्तव
    यूपी चुनाव: भाजपा को अब 'बाबा के बुलडोज़र' का ही सहारा!
    26 Feb 2022
    “इस मशीन का ज़िक्र जिस तरह से उत्तर प्रदेश के चुनावी अभियानों में हो रहा है उसे देखकर लगता है कि भारतीय जनता पार्टी की तरफ से इसे स्टार प्रचारक के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।”
  • Nagaland
    अजय सिंह
    नगालैंडः “…हमें चाहिए आज़ादी”
    26 Feb 2022
    आफ़्सपा और कोरोना टीकाकरण को नगालैंड के लिए बाध्यकारी बना दिया गया है, जिसके ख़िलाफ़ लोगों में गहरा आक्रोश है।
  • women in politics
    नाइश हसन
    पैसे के दम पर चल रही चुनावी राजनीति में महिलाओं की भागीदारी नामुमकिन
    26 Feb 2022
    चुनावी राजनीति में झोंका जा रहा अकूत पैसा हर तरह की वंचना से पीड़ित समुदायों के प्रतिनिधित्व को कम कर देता है। महिलाओं का प्रतिनिधित्व नामुमकिन बन जाता है।
  • Volodymyr Zelensky
    एम. के. भद्रकुमार
    रंग बदलती रूस-यूक्रेन की हाइब्रिड जंग
    26 Feb 2022
    दिलचस्प पहलू यह है कि यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने ख़ुद भी फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से सीधे पुतिन को संदेश देने का अनुरोध किया है।
  • UNI
    रवि कौशल
    UNI कर्मचारियों का प्रदर्शन: “लंबित वेतन का भुगतान कर आप कई 'कुमारों' को बचा सकते हैं”
    26 Feb 2022
    यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया ने अपने फोटोग्राफर टी कुमार को श्रद्धांजलि दी। इस दौरान कई पत्रकार संगठनों के कर्मचारी भी मौजूद थे। कुमार ने चेन्नई में अपने दफ्तर में ही वर्षों से वेतन न मिलने से तंग आकर…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License