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तेलंगाना: काश्तकार किसानों पर नए कृषि कानूनों की सबसे अधिक मार!
किसान संगठनों का अनुमान है कि पिछले दो सालों के दौरान सबसे अधिक संकटग्रस्त तकरीबन 350 काश्तकार किसानों ने आत्महत्या कर अपनी परेशानियों से छुटकारा पाने का रास्ता चुना।
पृथ्वीराज रूपावत
13 Jan 2021
telan

हैदराबाद: किसान अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि केंद्र सरकार द्वारा लाये गए नए कृषि कानूनों से काश्तकार किसानों के इससे बुरी तरह से प्रभावित होने की आशंका है, क्योंकि उनकी सामाजिक हैसियत और आजीविका इससे प्रभावित होने जा रही है। तेलंगाना में किसान संगठनों का दावा है कि निज़ाम के दौर से लेकर वर्तमान में मौजूदा तेलंगाना राष्ट्र समिति के दौर तक में कृषक समुदायों के बीच में यदि कोई वर्ग सबसे अधिक संकटग्रस्त स्थिति में रहा है तो वे काश्तकार किसान ही रहे हैं।

पिछले 48 दिनों से देश भर में लाखों किसान विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और इस विवादास्पद कृषि कानूनों को रद्द किये जाने की मांग कर रहे हैं। मंगलवार के दिन सर्वोच्च न्यायालय ने “अगले आदेशों” तक इन कानूनों के कार्यान्वयन पर रोक लगा दी है और सरकार एवं किसानों के बीच बन चुके गतिरोध को हल करने के लिए एक कमेटी गठित कर दी है।

किसान संगठनों के अनुसार तेलंगाना में करीब 14 से 18 लाख पट्टेदार किसान हैं जो कुल 1.25 करोड़ एकड़ कृषियोग्य भूमि में से लगभग 14% पर खेती कर रहे हैं। हालाँकि मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने फरवरी 2019 में घोषित कर दिया था कि सरकार पट्टेदार किसानों एवं खेतिहर मजदूरों को किसान नहीं मानती। इसलिए सरकारी योजनायें और सब्सिडी इन वर्गों पर लागू नहीं होंगी।

ऐसे में राज्य सरकार जहाँ किसानों को ‘रायथू बंधू’ योजना के तहत प्रति एकड़ पर प्रति वर्ष 10,000 रूपये की निवेश सहायता प्रदान करती है, वहीँ पट्टेदार किसानों को इस योजना में शामिल नहीं किया गया है। इसका अर्थ यह हुआ कि भूमि के मालिकों को यह धन प्राप्त होगा, भले ही उनकी जमीनों पर खेती का सारा कामकाज काश्तकार किसानों द्वारा ही क्यों न किया जा रहा हो।

रायथू स्वराज्य वेदिका के रवि कन्नेगंटी का इस पर कहना है कि कृषि पर सीएम केसीआर के बयानों से से इस बात के संकेत मिलते हैं है कि उन्हें इस क्षेत्र की असली समस्यायों की कोई जानकारी नहीं है।अखिल भारतीय किसान सभा के उपाध्यक्ष सरमपल्ली मल्लारेड्डी के अनुसार राज्य में पट्टे पर खेती करने वाले किसानों को जो क़ानूनी अधिकार हासिल हैं, उन्हें अभी तक लागू किया जाना शेष है, जबकि नए केन्द्रीय कानून तो उनकी आजीविका एवं सामाजिक स्थिति के लिए गंभीर संकट पैदा खड़े करने वाले साबित हो सकते हैं।

मल्लारेड्डी इस बारे में विस्तार से बताते हुए कहते हैं “गाँवों में किराए पर खेती-किसानी का चलन रहा है, क्योंकि वहाँ पर कई लोगों के बीच में मान्यता है कि शहरों और कस्बों में पलायन कर अन्य कार्य करने की अपेक्षा खेतीबाड़ी के काम से सामाजिक हैसियत को बेहतर आंका जाता है। काश्तकार किसान पहले से ही अपनी उपजाई हुई फसलों को सरकारी खरीद केन्द्रों में बेच पाने की समस्या से संघर्ष कर रहे हैं। क्योंकि जमीनों के स्वामित्व के कागजात न होने के कारण उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से वंचित कर दिया गया है। इसके अलावा नए कानूनों में से एक में अनुबंध पर खेती को बढ़ावा दिए जाने से वे उस जमीन पर अपना कब्जा खो देंगे, जिसपर वे अभी तक खेती कर रहे थे। ऐसी स्थिति में उनके परिवारों को आजीविका के खतरे का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि वे कॉर्पोरेट के साथ मुकाबला नहीं कर सकते हैं।”

ये तीन नए कानून हैं कृषक (सशक्तीकरण एवं संरक्षण) मूल्य आश्वासन करार एवं कृषि सेवा अधिनियम 2020, कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) अधिनियम और आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम।रवि कन्नेगंटी के मुताबिक “चूँकि नए कानून एमएसपी को एक क़ानूनी अधिकार के तौर पर सुनिश्चित नहीं करते हैं और सरकारी खरीद केन्द्रों के इनसे कमजोर पड़ते जाने का अंदेशा है, ऐसे में पट्टे पर खेती करने वाले किसानों के आगे पट्टे के भुगतान और कम होती आय का बोझ पड़ने वाला है।”

जब जवाहरलाल नेहरु भारत के प्रधानमंत्री थे तो उस दौरान आन्ध्र प्रदेश (तेलंगाना एरिया) टेनेंसी एवं कृषि भूमि अधिनियम, 1950 (1950 के अधिनियम 21) को लागू किया गया था, जिसके साथ तेलंगाना कृषक संघर्ष का अंत हुआ था। बाद में जब तेलंगाना और आन्ध्र प्रदेश का 1956 में विलय हुआ, तो उस दौरान आन्ध्र प्रदेश टेनेंसी एक्ट, 1956 को लागू किया गया था। 1974 में इस कानून में और भी संशोधन किये गए। कानून के मुताबिक काश्तकार किसान को सिंचित भूमि के लिए अधिकतम किराए की दर सकल उपज के 25% तक निर्धारित की गई थी, और असिंचित भूमि के मामले में इसे 20% तय किया गया था।मल्लारेड्डी कहते हैं “इस कानून के बावजूद पट्टे पर खेती करने वाले किसानों को अपनी कुल उपज के 80% से लेकर 90% तक के बराबर का किराया चुकाने के लिए मजबूर होना पडता है।”

किसान संगठनों का अनुमान है कि तेलंगाना में पिछले दो वर्षों के दौरान लगभग 350 काश्तकार किसानों की मौतें संकटग्रस्त आत्महत्याओं के कारण हुई हैं। राज्य में 2014 से लेकर 2019 के बीच में कुलमिलाकर 5,912 किसानों की मौतें, आत्महत्याओं की वजह से हुई थीं, जिनमें से 1,478 संख्या काश्तकार किसानों की थी। आंध्र प्रदेश लैंड लाइसेंस्ड कल्टीवेटर्स एक्ट, 2011 के तहत काश्तकार किसानों को पात्रता कार्ड, फसल ऋण, सरकारी सब्सिडी, बीमा एवं प्राकृतिक आपदा के समय मुआवजा प्रदान करने की व्यवस्था की गई थी। हालाँकि इन कानूनों को अभी भी अमल में नहीं लाया जा सका है।


तेलंगाना में तकरीबन 28% ग्रामीण जनता भूमिहीन गरीब वर्ग से है, जबकि आन्ध्र प्रदेश में यह संख्या 70% हैं। बैंकों के मुताबिक आंध्र प्रदेश में लगभग 28 लाख काश्तकार किसान हैं।इन कानूनों को रद्द किये जाने की माँग करते हुए तेलुगु राज्यों के किसान, जारी देशव्यापी किसानों के आन्दोलन के हिस्से के तौर पर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन जारी रखे हुए हैं।

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