NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
फिर बढ़ सकती हैं पेट्रो उत्पादों की कीमतें
हमेशा की तरह सरकार ने फिर से पेट्रो उत्पादों को जीएसटी के भीतर लाने से इंकार कर दिया।
शशि कुमार झा
21 Sep 2021
petrol
फ़ोटो साभार: सोशल मीडिया

देश के आम लोगों के लिए पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों के मोर्चे पर कोई राहत मिलती दिखाई नहीं दे रही, बल्कि इनमें जल्द और बढ़ोतरी होने की ही आशंका मंडराने लगी है। पिछले सप्ताह जीएसटी काउंसिल की बैठक में पेट्रो उत्पादों को जीएसटी के दायरे के तहत लाये जाने और इसकी कीमतों में अच्छी खासी कमी आने की सुगबुगाहटें जोर पकड़ने लगी थीं। लेकिन हमेशा की तरह सरकार ने अपने सबसे अधिक दूध देने वाली इस कामधेनु गाय यानी पेट्रो सेक्टर की आमदनी से मिलने वाली अकूत आमदनी को छोड़ देना स्वीकार नहीं किया और आम लोगों की उम्मीदें पर पानी फिर गया।

गौरतलब है कि पहले प्रधानमंत्री के नेतृत्व में भाजपा ने सत्ता में काबिज होने से पहले पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों को लेकर बहुत हायतौबा मचाई थी और तत्कालीन संप्रग सरकार से केंद्रीय तथा राज्य करों में कमी लाने के जरिये आम जनता को सुकुन देने के लिए दबाव डालती रही थी लेकिन सत्ता में आने के बाद उसके सुर पूरी तरह बदले हुए हैं और पेट्रो कीमतों की लगातार आसमान छूती कीमतों के बावजूद अपने निर्णय से डिगने के लिए टस से मस नहीं हो रही।

इसके अतिरिक्त, कुछ समय तक स्थिर रहने के बाद कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में अब फिर से इजाफा होने से देश में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में और अधिक बढ़ोतरी होने की आशंका मंडराने लगी है। कच्चे तेल का बेंचमार्क क्रूड सोमवार को 75 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गया जिससे देश में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में दो-तीन रुपये की वृद्धि होने की आशंका बलवती हो गई है।

इस सप्ताह कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत 75.34 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं है जबकि एक महीने पहले यह 69.03 डॉलर प्रति बैरल पर थी। देखा लाए तो यह बढोतरी 9 प्रतिशत से भी अधिक की है। कच्चे तेलों की कीमतों में हालिया वृद्धि की वजह आर्थिक गतिविधियों में दुबारा सक्रियता का आ जाना बताया जा रहा है जो कोरोना महामारी के कारण लगाये गए लॉकडाऊन के कारण पिछले लगभग डेढ़ वर्षों से सुप्त स्थिति में थी।

पिछले सप्ताह जीएसटी काउंसिल की 45वीं बैठक में पेट्रो उत्पादों को जीएसटी के दायरे के तहत लाये जाने और इसकी कीमतों में अच्छी खासी कमी आने की संभावनाएं सुर्खियों में थीं, लेकिन सरकार ने एक बार फिर से इस पर अपना फैसला टाल दिया। दरअसल, 1 जुलाई 2017 को जब जीएसटी लागू हुआ था तो केंद्र और राज्य सरकारों ने अपने राजस्व को ध्यान में रखते हुए कच्चे तेल, गैस, पेट्रोल, डीजल और एटीएफ को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा था। इन उत्पादों पर केंद्र सरकार और राज्य सरकारें अपने हिसाब से अलग-अलग शुल्क वसूलती हैं और उससे आने वाला पैसा सरकारी खजाने में जाता है।

दरअसल, जब एक राष्ट्र-एक कर यानी जीएसटी का रास्ता प्रशस्त करने के लिए संविधान में संशोधन किया गया था तो सरकार ने चालाकी से पेट्रोलियम उत्पादों पर जीएसटी लेवी लगाये जाने को रोक दिया था जिससे कि इसे लेकर यथास्थिति बनी रहे और केंद्र तथा राज्य सरकारों दोनों को इससे भारी मात्रा में कर राजस्व की प्राप्ति होती रहे। पेट्रोलियम योजना और विश्लेषण प्रकोष्ठ से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, केंद्र के खजाने में पेट्रोलियम उत्पादों से मिलने वाला कुल योगदान 2014-15 के 1.72 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2019-20 तक 3.34 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया जबकि राज्य सरकारों को पेट्रोलियम उत्पादों से मिलने वाला कुल योगदान 2014-15 के 1.6 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2019-20 तक 2.21 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। जाहिर है, राजस्व के इतने बड़े स्रोत से वंचित होना न तो केंद्र सरकार चाहेगी और न ही राज्य सरकारें ही।

पेट्रोलियम उत्पादों की लगातार ऊंची कीमतों के बने रहने के कारण जब केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ा तो पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने बढ़ी कीमतों का ठीकरा विपक्ष द्वारा शासित राज्यों पर फोड़ने के लिए उनसे पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने से संबंधित सहमति मांगी। जाहिर है इसके पीछे उद्वेश्य आम लोगों को पेट्रो उत्पादों की कीमतों से राहत प्रदान करना नहीं था बल्कि बढ़ी कीमतों का इल्जाम विपक्ष द्वारा शासित राज्यों पर लगाना था। वैसे भी कई राज्यों ने खुल कर पेट्रो उत्पादों की कीमतों को जीएसटी के तहत लाये जाने से असहमति जताई है क्योंकि इससे उनके राजस्व को भी भारी नुकसान होगा। वैसे भी अलग अलग राज्यों में वैट की दरें अलग अलग हैं। जहां अधिक हैं, उन राज्यों की सरकारों को राजस्व के एक बड़े स्रोत से हाथ धोना होगा तो तो जहां कम हैं वहां पेट्रो उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाये जाने से लोगों के लिए इन उत्पादों की कीमतों में और इजाफा हो जाएगा।  मसलन-महाराष्ट्र में पेट्रोलियम उत्पादों पर 40 प्रतिशत तक वैट लगता है जिससे राज्य सरकार को इस मद में लगभग 25,000 करोड़ सालाना की प्राप्ति होती है जबकि अंडमार निकोबार जैसे राज्यों में जहां वैट की दरें कम हैं, वहां इन उत्पादों की कीमतें बढ़ जाएंगी जिससे आम आदमियों को परेशानी होगी। 

इसमें कोई शक नहीं कि जीएसटी के दायरे में लाए जाने से पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में अच्छी खासी कमी आएंगी क्योंकि अगर इन पर 28 प्रतिशत की दर से भी शुल्क लगाया जाता है तो भी यह मौजूदा दर की तुलना में काफी कम होगा। एक आंकड़े से समझें कि किस प्रकार सरकार को पेट्रोलियम उत्पादों पर भारी उत्पाद कर से लाभ प्राप्त होता है। पेट्रोल पर मार्च 2014 में 10.38 रुपये प्रति लीटर का उत्पाद शुल्क लगता था जो सितंबर 200 तक 300 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 32.98 रुपये प्रति लीटर तक जा पहुंचा था। इसी प्रकार, इसी अवधि के दौरान डीजल पर उत्पाद शुल्क को 4.58 प्रतिशत से बढ़ाकर 31.83 प्रतिशत कर दिया गया जो लगभग 600 प्रतिशत की बढोतरी प्रदर्शित करती है। डीजल जैसे पेट्रो उत्पादों की कीमत में बढोतरी से परिवहन किराये में इजाफा, इससे सब्जियों सहित अन्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि और फिर महंगाई का बढ़ना सारे एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। सरकार की यह दलील कि कर राजस्व में इतनी वृद्धि सरकार द्वारा विभिन्न कल्याणकारी कार्यक्रमों को चलाये रखने के लिए जरुरी है, आसानी से हजम होने वाली नहीं है। आखिर पेट्रोलियम कीमतों में वर्तमान में जारी ऊंचाइयों और उसमें संभावित वृद्धि का कहर भी तो आम लोगों पर ही टूटने वाला है।

इसे भी पढ़ें : क्यों पेट्रोल और डीज़ल जीएसटी के अंदर नहीं लाए जा रहे?

petrol price hike
GST
central gst
Petroleum
Inflation
Cooking gas
Narendra modi
Modi government

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

क्या जानबूझकर महंगाई पर चर्चा से आम आदमी से जुड़े मुद्दे बाहर रखे जाते हैं?


बाकी खबरें

  • Victims of Tripura
    मसीहुज़्ज़मा अंसारी
    त्रिपुरा हिंसा के पीड़ितों ने आगज़नी में हुए नुकसान के लिए मिले मुआवज़े को बताया अपर्याप्त
    25 Jan 2022
    प्रशासन ने पहले तो किसी भी हिंसा से इंकार कर दिया था, लेकिन ग्राउंड से ख़बरें आने के बाद त्रिपुरा सरकार ने पीड़ितों को मुआवज़ा देने की घोषणा की थी। हालांकि, घटना के तीन महीने से अधिक का समय बीत जाने के…
  • genocide
    अजय सिंह
    मुसलमानों के जनसंहार का ख़तरा और भारत गणराज्य
    25 Jan 2022
    देश में मुसलमानों के जनसंहार या क़त्ल-ए-आम का ख़तरा वाक़ई गंभीर है, और इसे लेकर देश-विदेश में चेतावनियां दी जाने लगी हैं। इन चेतावनियों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
  • Custodial Deaths
    सत्यम् तिवारी
    यूपी: पुलिस हिरासत में कथित पिटाई से एक आदिवासी की मौत, सरकारी अपराध पर लगाम कब?
    25 Jan 2022
    उत्तर प्रदेश की आदित्यनाथ सरकार दावा करती है कि उसने गुंडाराज ख़त्म कर दिया है, मगर पुलिसिया दमन को देख कर लगता है कि अब गुंडाराज 'सरकारी' हो गया है।
  • nurse
    भाषा
    दिल्ली में अनुग्रह राशि नहीं मिलने पर सरकारी अस्पतालों के नर्सिंग स्टाफ ने विरोध जताया
    25 Jan 2022
    दिल्ली नर्स संघ के महासचिव लालाधर रामचंदानी ने कहा, ‘‘लोक नायक जयप्रकाश अस्पताल, जीटीबी हस्पताल और डीडीयू समेत दिल्ली सरकार के अन्य अस्पतालों के नर्सिंग स्टाफ ने इस शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन में भाग…
  • student
    भाषा
    विश्वविद्यालयों का भविष्य खतरे में, नयी हकीकत को स्वीकार करना होगा: रिपोर्ट
    25 Jan 2022
    रिपोर्ट के अनुसार महामारी के कारण उन्नत अर्थव्यवस्था वाले देशों में विश्वविद्यालयों के सामने अनेक विषय आ रहे हैं और ऐसे में विश्वविद्यालयों का भविष्य खतरे में है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License