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भारत
राजनीति
फिर बढ़ सकती हैं पेट्रो उत्पादों की कीमतें
हमेशा की तरह सरकार ने फिर से पेट्रो उत्पादों को जीएसटी के भीतर लाने से इंकार कर दिया।
शशि कुमार झा
21 Sep 2021
petrol
फ़ोटो साभार: सोशल मीडिया

देश के आम लोगों के लिए पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों के मोर्चे पर कोई राहत मिलती दिखाई नहीं दे रही, बल्कि इनमें जल्द और बढ़ोतरी होने की ही आशंका मंडराने लगी है। पिछले सप्ताह जीएसटी काउंसिल की बैठक में पेट्रो उत्पादों को जीएसटी के दायरे के तहत लाये जाने और इसकी कीमतों में अच्छी खासी कमी आने की सुगबुगाहटें जोर पकड़ने लगी थीं। लेकिन हमेशा की तरह सरकार ने अपने सबसे अधिक दूध देने वाली इस कामधेनु गाय यानी पेट्रो सेक्टर की आमदनी से मिलने वाली अकूत आमदनी को छोड़ देना स्वीकार नहीं किया और आम लोगों की उम्मीदें पर पानी फिर गया।

गौरतलब है कि पहले प्रधानमंत्री के नेतृत्व में भाजपा ने सत्ता में काबिज होने से पहले पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों को लेकर बहुत हायतौबा मचाई थी और तत्कालीन संप्रग सरकार से केंद्रीय तथा राज्य करों में कमी लाने के जरिये आम जनता को सुकुन देने के लिए दबाव डालती रही थी लेकिन सत्ता में आने के बाद उसके सुर पूरी तरह बदले हुए हैं और पेट्रो कीमतों की लगातार आसमान छूती कीमतों के बावजूद अपने निर्णय से डिगने के लिए टस से मस नहीं हो रही।

इसके अतिरिक्त, कुछ समय तक स्थिर रहने के बाद कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में अब फिर से इजाफा होने से देश में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में और अधिक बढ़ोतरी होने की आशंका मंडराने लगी है। कच्चे तेल का बेंचमार्क क्रूड सोमवार को 75 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गया जिससे देश में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में दो-तीन रुपये की वृद्धि होने की आशंका बलवती हो गई है।

इस सप्ताह कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत 75.34 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं है जबकि एक महीने पहले यह 69.03 डॉलर प्रति बैरल पर थी। देखा लाए तो यह बढोतरी 9 प्रतिशत से भी अधिक की है। कच्चे तेलों की कीमतों में हालिया वृद्धि की वजह आर्थिक गतिविधियों में दुबारा सक्रियता का आ जाना बताया जा रहा है जो कोरोना महामारी के कारण लगाये गए लॉकडाऊन के कारण पिछले लगभग डेढ़ वर्षों से सुप्त स्थिति में थी।

पिछले सप्ताह जीएसटी काउंसिल की 45वीं बैठक में पेट्रो उत्पादों को जीएसटी के दायरे के तहत लाये जाने और इसकी कीमतों में अच्छी खासी कमी आने की संभावनाएं सुर्खियों में थीं, लेकिन सरकार ने एक बार फिर से इस पर अपना फैसला टाल दिया। दरअसल, 1 जुलाई 2017 को जब जीएसटी लागू हुआ था तो केंद्र और राज्य सरकारों ने अपने राजस्व को ध्यान में रखते हुए कच्चे तेल, गैस, पेट्रोल, डीजल और एटीएफ को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा था। इन उत्पादों पर केंद्र सरकार और राज्य सरकारें अपने हिसाब से अलग-अलग शुल्क वसूलती हैं और उससे आने वाला पैसा सरकारी खजाने में जाता है।

दरअसल, जब एक राष्ट्र-एक कर यानी जीएसटी का रास्ता प्रशस्त करने के लिए संविधान में संशोधन किया गया था तो सरकार ने चालाकी से पेट्रोलियम उत्पादों पर जीएसटी लेवी लगाये जाने को रोक दिया था जिससे कि इसे लेकर यथास्थिति बनी रहे और केंद्र तथा राज्य सरकारों दोनों को इससे भारी मात्रा में कर राजस्व की प्राप्ति होती रहे। पेट्रोलियम योजना और विश्लेषण प्रकोष्ठ से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, केंद्र के खजाने में पेट्रोलियम उत्पादों से मिलने वाला कुल योगदान 2014-15 के 1.72 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2019-20 तक 3.34 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया जबकि राज्य सरकारों को पेट्रोलियम उत्पादों से मिलने वाला कुल योगदान 2014-15 के 1.6 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2019-20 तक 2.21 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। जाहिर है, राजस्व के इतने बड़े स्रोत से वंचित होना न तो केंद्र सरकार चाहेगी और न ही राज्य सरकारें ही।

पेट्रोलियम उत्पादों की लगातार ऊंची कीमतों के बने रहने के कारण जब केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ा तो पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने बढ़ी कीमतों का ठीकरा विपक्ष द्वारा शासित राज्यों पर फोड़ने के लिए उनसे पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने से संबंधित सहमति मांगी। जाहिर है इसके पीछे उद्वेश्य आम लोगों को पेट्रो उत्पादों की कीमतों से राहत प्रदान करना नहीं था बल्कि बढ़ी कीमतों का इल्जाम विपक्ष द्वारा शासित राज्यों पर लगाना था। वैसे भी कई राज्यों ने खुल कर पेट्रो उत्पादों की कीमतों को जीएसटी के तहत लाये जाने से असहमति जताई है क्योंकि इससे उनके राजस्व को भी भारी नुकसान होगा। वैसे भी अलग अलग राज्यों में वैट की दरें अलग अलग हैं। जहां अधिक हैं, उन राज्यों की सरकारों को राजस्व के एक बड़े स्रोत से हाथ धोना होगा तो तो जहां कम हैं वहां पेट्रो उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाये जाने से लोगों के लिए इन उत्पादों की कीमतों में और इजाफा हो जाएगा।  मसलन-महाराष्ट्र में पेट्रोलियम उत्पादों पर 40 प्रतिशत तक वैट लगता है जिससे राज्य सरकार को इस मद में लगभग 25,000 करोड़ सालाना की प्राप्ति होती है जबकि अंडमार निकोबार जैसे राज्यों में जहां वैट की दरें कम हैं, वहां इन उत्पादों की कीमतें बढ़ जाएंगी जिससे आम आदमियों को परेशानी होगी। 

इसमें कोई शक नहीं कि जीएसटी के दायरे में लाए जाने से पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में अच्छी खासी कमी आएंगी क्योंकि अगर इन पर 28 प्रतिशत की दर से भी शुल्क लगाया जाता है तो भी यह मौजूदा दर की तुलना में काफी कम होगा। एक आंकड़े से समझें कि किस प्रकार सरकार को पेट्रोलियम उत्पादों पर भारी उत्पाद कर से लाभ प्राप्त होता है। पेट्रोल पर मार्च 2014 में 10.38 रुपये प्रति लीटर का उत्पाद शुल्क लगता था जो सितंबर 200 तक 300 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 32.98 रुपये प्रति लीटर तक जा पहुंचा था। इसी प्रकार, इसी अवधि के दौरान डीजल पर उत्पाद शुल्क को 4.58 प्रतिशत से बढ़ाकर 31.83 प्रतिशत कर दिया गया जो लगभग 600 प्रतिशत की बढोतरी प्रदर्शित करती है। डीजल जैसे पेट्रो उत्पादों की कीमत में बढोतरी से परिवहन किराये में इजाफा, इससे सब्जियों सहित अन्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि और फिर महंगाई का बढ़ना सारे एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। सरकार की यह दलील कि कर राजस्व में इतनी वृद्धि सरकार द्वारा विभिन्न कल्याणकारी कार्यक्रमों को चलाये रखने के लिए जरुरी है, आसानी से हजम होने वाली नहीं है। आखिर पेट्रोलियम कीमतों में वर्तमान में जारी ऊंचाइयों और उसमें संभावित वृद्धि का कहर भी तो आम लोगों पर ही टूटने वाला है।

इसे भी पढ़ें : क्यों पेट्रोल और डीज़ल जीएसटी के अंदर नहीं लाए जा रहे?

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