NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
साहित्य-संस्कृति
भारत
राजनीति
तिरछी नज़र :  दो अपराध मिल कर बनता है एक ऐतिहासिक पुरस्कार!
कई बार ऐसा लगता है कि अयोध्या का ये फ़ैसला मेरे ताऊजी द्वारा हम बच्चों के झगड़े सुलझाने के फैसले जैसा है। हमारे ताऊजी फ़ैसला देते हुए फैसले की तार्किकता से अधिक उसके असर पर ध्यान देते थे।
डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
17 Nov 2019
SC on Babri

(डिसक्लेमर : यह एक व्यंग्य आलेख है। जिसमें अयोध्या विवाद पर आए फ़ैसले के विरोधाभासों को उभारा गया है। न्यायपालिका की अवमानना इसका कतई उद्देश्य नहीं हैं - लेखक)

अयोध्या के बारे में उच्चतम न्यायालय का फ़ैसला आ चुका है। अब श्री राम का मंदिर अवश्य बनेगा, मंदिर भव्य बनेगा और मंदिर वहीं बनेंगा। अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी इसका रास्ता साफ कर दिया है।

logo tirchhi nazar_5.PNG

उच्चतम न्यायालय ने यह माना है कि जो बाबरी मस्जिद थी, उसे मंदिर ढहा कर नहीं बनाया गया था। उच्चतम न्यायालय को मंदिर ढहाने का कोई प्रमाण भी नहीं मिला। उच्चतम न्यायालय का यह मानना है कि मस्जिद के नीचे, एएसआई को खुदाई में किसी भवन के होने के प्रमाण अवश्य मिले हैं पर वह मंदिर ही था, यह नहीं कह सकते। उच्चतम न्यायालय को प्रमाण भले ही नहीं मिला हो पर बहुत से लोग अब भी यह मानते हैं और डंके की चोट पर मानते हैं कि मस्जिद मंदिर तोड़ कर बनाई गई थी। वे लोग उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद तो और भी जोर शोर से मानने लगे हैं।

उच्चतम न्यायालय को पता रहा होगा कि बाबर के शासन काल से उस मस्जिद के लिए इमाम भी नियुक्त कर रखा था। उस इमाम की तनख्वाह का जिक्र भी किताबों में है, मात्र साठ रुपये प्रति वर्ष। पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश भी जानते हैं कि ये जो भी कर्मचारी होते हैं तनख्वाह ले लेते हैं पर काम नहीं करते हैं।  ऐसे इमाम थे कि नमाज़ पढ़ाते हुए न सेल्फी खींची और न फोटो खिंचवाई।

ऐसे लापरवाह कर्मचारी सिर्फ आजकल ही नहीं होते हैं, बाबर के समय में भी होते थे। बल्कि उससे पहले भी होते रहे होंगे। बाबर के समय में ही नहीं, उसके बाद के मुगल शासक भी उस मस्जिद में इमाम नियुक्त करते रहे और उनकी तनख्वाह, नमाज़ न पढ़ाने के बावजूद, बढ़ाते रहे। यहां तक कि अंग्रेजों का समय आने तक उनकी तनख्वाह साठ से बढ़ कर तीन सौ साठ रुपये सालाना तक हो गई पर उन कामचोर इमामों ने एक भी बार नमाज़ अदा नहीं कराई।

उच्चतम न्यायालय को 1857 से पहले उस मस्जिद में, जिसे बाबरी मस्जिद कहा जाता था, नमाज़ पढ़ने के कोई सबूत नहीं मिले। उन इमामों ने कभी नमाज़ अदा की होती तो सबूत मिलते न, और शायद निर्णय मस्जिद के पक्ष में होता। उन कामचोर इमामों की वजह से ही मस्जिद पक्ष मुकदमा हार गया। खुदाकसम, अगर इमाम ईमानदारी से नमाज़ अदा कराते रहते, 1857 से पहले भी, तो न्यायाधीश लोग मस्जिद के पक्ष में ही न्याय सुनाते।

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों ने न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की अध्यक्षता में एकमत से माना कि 1949 में कुछ लोगों ने बेईमानी की थी, अपराध किया था। ये न्यायाधीश लोग उल्टी सीधी जादूगरी भरी बातों में विश्वास नहीं करते हैं, और यह ठीक ही है। अब कोई भी मूर्ति, भले ही वह रामलला की ही क्यों न हो, अपने आप कहीं प्रकट थोड़े ही न हो जायेगी। उसे 22-23 दिसंबर की रात को, जब सब निंद्रा मग्न थे, जबरन रखा दिया गया। न्यायाधीशों ने इसे गलत और घोर अपराध माना। पर फिर भी फ़ैसला अपराधियों के पक्ष में सुनाया गया।

यही नहीं, न्यायाधीश तो पूरी तरह सच के साथ ही रहे। उन्होंने यह भी कहा कि छह दिसंबर 1992 को जो भी कुछ किया गया, बाबरी मस्जिद को ढहाया गया, वह बहुत ही बड़ा अपराध था। वैसे भी ये दो अपराध नहीं हुए होते तो आज यह निर्णय भी नहीं हुआ होता। न मस्जिद के गुंबद के नीचे रामलला रखे जाते, न मस्जिद ढहाई होती, तो न्यायाधीशों को इतना अचूक, एकमत न्याय करने में अवश्य ही कठिनाई हुई होती।

मुझे लगता है कि इस फ़ैसले के लिए कानून की किताबों के साथ साथ गणित का भी गहन अध्ययन किया गया है। गणित के अनुसार जब दो माइनस (घटा) को मिलाया जाता है तो प्लस (जमा) हासिल होता है। लगता है, कानून और गणित के सिद्धांतों को मिला कर एक नया सिद्धांत निकाला गया है। कानून का नया सिद्धांत यह है कि दो अपराध मिल कर एक ऐतिहासिक पुरस्कार बनते हैं।

कई बार ऐसा लगता है कि यह फ़ैसला मेरे ताऊजी द्वारा हम बच्चों के झगड़े सुलझाने के फैसले जैसा है। हमारे ताऊजी फ़ैसला देते हुए फैसले की तार्किकता से अधिक उसके असर पर ध्यान देते थे। हम बच्चों के जिस भी झगड़े में उनका बडा़ पुत्र शामिल होता था, उसमें वे उसके पक्ष में ही फ़ैसला देते थे। उन्हें पता था कि अगर वे उसके पक्ष में फ़ैसला नहीं सुनायेंगे तो वह घर में उत्पात मचा देगा, दंगा कर देगा और तोडफोड़ मचा देगा।

हमें समझा दिया जाता था कि यह फ़ैसला घर परिवार की शांति के लिए लिया गया है। बाद में हम सब बच्चे स्वयं ही समझदार हो गए, समझने लगे कि घर की शांति किस किस बात में है। कहीं न कहीं सुप्रीम कोर्ट के सुप्रीम जजों ने भी यह सुप्रीम फ़ैसला इसी सुप्रीम सोच के साथ लिया है और वह सुप्रीम स्थल विश्व के सुप्रीम धर्म को दे दिया गया है ताकि शांति बनी रहे।

(लेखक पेशे से चिकित्सक हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।)

Ayodhya Dispute
Satire
Political satire
Ayodhya Case
Supreme Court
Justice Ranjan Gogoi
Ram Mandir
babri masjid
Babri Masjid-Ram Mandir
Religion Politics
minorities
Hindu-Muslim Politics

Related Stories

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

विचार: बिना नतीजे आए ही बहुत कुछ बता गया है उत्तर प्रदेश का चुनाव

हम भारत के लोग: देश अपनी रूह की लड़ाई लड़ रहा है, हर वर्ग ज़ख़्मी, बेबस दिख रहा है

ख़बरों के आगे पीछे: बुद्धदेब बाबू को पद्मभूषण क्यों? पेगासस पर फंस गई सरकार और अन्य

नफ़रत फैलाने वाले भाषण देने का मामला: सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस

तिरछी नज़र: ओमीक्रॉन आला रे...

जानिए: अस्पताल छोड़कर सड़कों पर क्यों उतर आए भारतीय डॉक्टर्स?

हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व का फ़र्क़

तिरछी नज़र: सरकार जी का बर्थ-डे और एक और नया ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’

विश्वास और आस्था की विविधता ख़त्म करने का राजनीतिक मॉडल


बाकी खबरें

  • पब्लिक का पैसा, सेठों के हाथ
    न्यूज़क्लिक टीम
    पब्लिक का पैसा, सेठों के हाथ
    16 Jul 2021
    पिछले दो दशकों में कई कंपनियों ने सरकारी बैंकों से करोड़ों रूपये का क़र्ज़ लिया और उसे कभी लौटाया नहींI अब सरकारी बैंक कुछ पैसा वापस लेकर इस कर्ज़े को रफादफा कर रहे हैंI इससे जनता का पैसा बड़े…
  • सरकार बनाने में विफल रहने के बाद लेबनान के नवनियुक्त प्रधानमंत्री हरीरी का इस्तीफ़ा
    पीपल्स डिस्पैच
    सरकार बनाने में विफल रहने के बाद लेबनान के नवनियुक्त प्रधानमंत्री हरीरी का इस्तीफ़ा
    16 Jul 2021
    केवल सात महीने सत्ता में रहे प्रधानमंत्री हसन दिआब द्वारा बेरूत विस्फोटों के बाद अपने पद से इस्तीफ़ा देने के बाद लेबनान में पिछले साल अगस्त से कार्यवाहक सरकार थी।
  • "दिल्ली 2041 के लिए डीडीए का मास्टर प्लान कामगार वर्ग की समस्याओं का समाधान करने में नाकाम"
    रौनक छाबड़ा
    "दिल्ली 2041 के लिए डीडीए का मास्टर प्लान कामगार वर्ग की समस्याओं का समाधान करने में नाकाम"
    16 Jul 2021
    गुरुवार को 'मैं भी दिल्ली' कैंपेन ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस बुलाकर दिल्ली-2041 के मसौदे पर चर्चा की। यह एक क़ानूनी दस्तावेज़ है, जिसके पास दिल्ली में शहरी विकास को बदलने की ताक़त है।
  • इंटरकल्चरल एजुकेशन लॉ लागू करने की मांग को लेकर इक्वाडोर के शिक्षक भूख हड़ताल पर
    पीपल्स डिस्पैच
    इंटरकल्चरल एजुकेशन लॉ लागू करने की मांग को लेकर इक्वाडोर के शिक्षक भूख हड़ताल पर
    16 Jul 2021
    इस क़ानून में शिक्षा क्षेत्र के लिए बजट में वृद्धि का प्रावधान है, ये समावेशी और गुणवत्तापूर्ण सरकारी शिक्षा की गारंटी देता है, शिक्षकों के मूल वेतन में वृद्धि करता है। इसमें कोविड-19 महामारी के कारण…
  • अल्जीरिया में 100 से अधिक हिरक प्रदर्शनकारी रिहा
    पीपल्स डिस्पैच
    अल्जीरिया में 100 से अधिक हिरक प्रदर्शनकारी रिहा
    16 Jul 2021
    इस सामूहिक रिहाई से पहले, सरकार विरोधी हिरक विरोध प्रदर्शनों या अन्य विपक्षी समूहों में समर्थन या भाग लेने के लिए अल्जीरियाई सरकार द्वारा 300 से अधिक राजनीतिक क़ैदियों को हिरासत में लिया गया था।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License