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कोनार- शराबबंदी का प्रणेता रहा बिहार का पहला गाँव, आज शराबबंदी की सच्चाई बयां कर रहा है !
इस बारे में महिलाओं का कहना है कि घरेलू हिंसा में जरुर कुछ कमी देखने को मिली है लेकिन अवैध शराब के फलते-फूलते कारोबार ने घरों की आय चौपट करके रख दिया है।
सौरव कुमार
14 Oct 2020
konar

बिहार में शराब पर रोक लगाने को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इसके प्रबल समर्थक रहे हैं, जिसके बारे में सभी लोग भलीभांति परिचित हैं। हालांकि आगामी विधानसभा चुनावों के बीच में उनके द्वारा लागू किये गए शराबबंदी के फैसले के मूल्यांकन की जरूरत है, क्योंकि अप्रैल 2016 से बिहार को शराब के मामले में सूखा राज्य घोषित किये जाने के बाद से यह पहला विधानसभा चुनाव होने जा रहा है।

जैसे-जैसे विधानसभा चुनावों के पहले चरण (28 अक्टूबर) की तारीख नजदीक आती जा रही है, इसे ध्यान में रखते हुए चुनाव आयोग ने राज्य आबकारी विभाग को निर्देश दिया है कि वह मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए अवैध शराब की आवक की जाँच-पड़ताल करे। इस पृष्ठभूमि में आइये रोहतास जिले के एक गाँव की जमीनी हकीकत पर एक नज़र डालते हैं, जिसके बारे में यह मशहूर है कि समूचे राज्य भर में शराबबंदी लगाये जाने की माँग को प्रेरणा यहीं से मिली थी।

सासाराम जिला मुख्यालय से 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कोनार गाँव, वह पहला ग्रामीण इलाका था जिसने बिहार को पूरी तरह से नशामुक्त राज्य बनाये जाने की माँग को बुलंद करने का काम किया था। यह मार्च 2013 के दौरान होली की पूर्व संध्या की बात है, जब कोनार गाँव की 200 महिलाओं ने स्थानीय बाजार में मौजूद निकटतम शराब की दुकान पर धावा बोल डाला था, और लाखों रुपयों की कीमत की शराब की बोतलों को चकनाचूर कर दिया था। चारों तरफ फैली शराब की इस लत के खिलाफ यह पहला कदम था जिसने आगे चलकर शराब बंदी की माँग को लेकर एक विशाल सामाजिक आंदोलन का स्वरूप अख्तियार कर लिया था। कोनार जहाँ तकरीबन 1,500 परिवार रहते हैं, वह तबतक इन विरोध प्रदर्शनों का केंद्र बना रहा, जबतक कि शराबबंदी एक कानून के तौर पर लागू नहीं हो गया।

न्यूज़क्लिक से बात करते हुए सुनीता देवी, प्रगति महिला मंच (पीएमएम) जो कि शराबबंदी के खिलाफ महिलाओं द्वारा खड़ा किया गया एक सामाजिक मंच है, की संस्थापिका हैं ने पुरानी यादों को ताज़ा करते हुए कहा: “सबसे पहले ये हम थे जिन्होंने महिलाओं के खिलाफ परंपरागत तौर पर नशे के हालत में शाम को घरों में घुसने वाले पतियों द्वारा महिलाओं के साथ किये जाने वाले दुर्व्यवहार और घरेलू हिंसा के खिलाफ आवाज उठाने का बीड़ा उठाया था। यह संगठन दिल्ली में 2012 के निर्भया गैंगरेप मामले के बाद अस्तित्व में आया था, जिसका मुख्य उद्देश्य स्थानीय स्तर पर महिलाओं की सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को उठाना था।”

शिवसागर ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले कोनार के पड़ोसी गाँव सीताबीघा के बारे में खबर है कि इस गाँव में 100 से अधिक विधवाएँ हैं, जिन्होंने अपने पतियों को बेइंतिहा शराब पीने की लत के चलते खो दिया था। शराबियों द्वारा भरी दुपहरी में ही लड़कियों और महिलाओं से छेड़छाड़ की घटनायें आम हो चुकी थीं। कोचिंग संस्थानों और स्कूलों के ठीक सामने ही शराब की दुकानों के खुल जाने से लड़कियों के लिए माहौल बेहद अप्रिय था और उनका जीना मुहाल हो गया था। सुनीता कहती हैं "अपराध से भरे इस परिदृश्य में एवं दिन-प्रतिदिन बद से बदतर होते सामाजिक मानदंडों ने हमें शराब के खिलाफ मुहिम छेड़ने के लिए विवश कर दिया था।"

कोनार में चले इस महिलाओं के नेतृत्व वाले शराब विरोधी आंदोलनों ने शराबबंदी की माँग को राज्य व्यापी दबाव बनाने में मदद दी, जो जल्द ही सासाराम से सटे गाँवों करवन्दिया, सीताबीघा, बेलवा और बासा तक फ़ैल गया।

जुलाई 2015 के दौरान उस वर्ष के अंत में होने जा रहे विधानसभा चुनावों के मौके पर प्रचार करते वक्त तबके मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महिलाओं को इस बारे में आश्वस्त किया था कि यदि वे सत्ता में चुने जाते हैं तो वे शराब पर प्रतिबन्ध लागू करेंगे। एक बार फिर से चुने जाने के उपलक्ष्य में उन्होंने अप्रैल 2016 में शराबबंदी की घोषणा कर डाली, जिसमें पहले पहल शराब-विरोधी कानून का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कड़ी धाराओं को लागू किया गया था। बाद में पटना उच्च न्यायालय द्वारा इस मामले में हस्तक्षेप करने के बाद कहीं जाकर नीतीश कुमार सरकार कुछ विवादास्पद धाराओं को समाप्त करने के लिए बाध्य 
हुई।

इस बात को आज चार साल बीत चुके हैं, लेकिन बिहार एक्साइज एंड प्रोहिबिशन एक्ट, 2016 के तहत जमीनी स्तर पर शराब-बंदी के नतीजे, उस गाँव में जिसने शराब-विरोधी आंदोलनों की अगुआई करने का काम किया था, आज अपेक्षित परिणामों से अधिक तकलीफ़देह साबित हो रहा है।
कोनार गाँव की कुछ महिलाएं, जिन्होंने शराब बंदी विरोध प्रदर्शनों की अगुआई का काम किया था  

महिलाओं के इस समूह ने जिसने 2013 में अपने गांव में शराब की दुकान को तोड़ डाला था, अब उनका कहना है कि इस बंदी से सिर्फ नाम के वास्ते ही फायदा हुआ है।

24 वर्षीय मनोरमा देवी ने बताया कि हमारे पतियों द्वारा मार-पीट की घटना अब रोज-रोज की बात नहीं रह गई है और ऐसा अब छिटपुट तौर पर ही होता है। शारीरिक प्रताड़ना का मामला अब रोज-बरोज का मामला नहीं रह गया है, लेकिन एक बार फिर से अवैध शराब की आपूर्ति ने पिछली मुश्किलों जैसे कि आर्थिक पिछड़ेपन के मुद्दे को वापस ला दिया है।

वे आगे कहती हैं “हम अपनी मासिक आय में से कुछ बचा पाने को लेकर बेहद मुश्किल में हैं क्योंकि सबकुछ तो पीने में ही बर्बाद हो जा रहा है। लेकिन यह सब खुलेआम नहीं चल रहा है, क्योंकि कानून का डर बना हुआ है। गाँव में शराब का धंधा और खपत दोनों ही बदस्तूर जारी है और बेरोजगारों में से बड़ा हिस्सा इसकी तस्करी में शामिल है।”

कोनार गाँव की 55 वर्षीया शांति देवी ने इस बात को स्वीकारा कि उनका पति जो कि सासाराम शहर के एक बरात घर में सिक्योरिटी गार्ड के तौर पर कार्यरत है, नशे की हालत में घर लौटता है। वे कहती हैं कि “जुबानी लड़ाई और शारीरिक हाथापाई का डर लगातार मेरे परिवार में व्याप्त रहता है क्योंकि कड़ी मेहनत से कमाए हुए पैसे अवैध तौर पर ख़रीदे गए बोतलों पर दुगुने दामों में बर्बाद हो रहे हैं।”

मंच की संस्थापिका सुनीता ने बताया कि एक रामबाण दवा के तौर पर शराब बंदी ने घरेलू दुर्व्यवहार की घटनाओं की शिकायतों को महिलाओं के पक्ष में कम करने में आंशिक तौर पर अवश्य मदद की है, लेकिन इसकी उपलब्धता बनी रहने की वजह से निम्न आय के वर्गों के हाथ से पैसे-कौड़ी के बाहर निकलते जाने के रास्ते को खोल दिया है।

जिन (महिलाओं) ने शराब पर प्रतिबंध लगाये जाने की मुहिम की अगुआई की थी वे दलित समुदायों से ताल्ल्लुक रखती थीं। उन्होंने समाज में चली आ रही एक मौजूदा बुराई के खिलाफ ऐतिहासिक संघर्ष छेड़ने का काम किया था, जिसे सरकार की ओर मान्यता दिए जाने की दरकार थी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो सका। वे आगे कहती हैं “ऐसा प्रतीत होता है जैसे उनके इस गुमनाम बहादुराना कृत्यों का अब कोई मोल नहीं रहा, क्योंकि हम पाते हैं कि इस क्षेत्र में युवा शराब-तस्करों का एक पूरा विशाल नेटवर्क हमारी अबतक की सारी मेहनत पर पानी फेरने में जुटा हुआ है।” 

60 वर्षीय केदार पांडे, एक स्थानीय निवासी जो कि कोनार से सम्बद्ध पूर्व स्वास्थ्य विशेषज्ञ से चुनावी रणनीतिकार के तौर पर विख्यात प्रशांत किशोर के पैतृक घर के केयरटेकर के तौर पर कार्यरत हैं ने न्यूज़क्लिक को बताया कि “2013 हमारे लिए एक बड़ी सफलता लेकर आया था क्योंकि कोनार की महिलाओं ने बड़े पैमाने पर फैली नशाखोरी के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंकने का काम किया था।” हालांकि "घोर दबाव वाली नीति" ने अवैध शराब के कारोबार को बढ़ावा देने का ही काम किया है। अब चाहे आईएमएफएल (इंडियन मेड फॉरेन लिकर) हो या देशी दारु हो, पीने वाले शराब पीने से बाज नहीं आते। इसके अतिरिक्त जिस मात्रा में बिहार पुलिस द्वारा शराब पर प्रतिबंधों के बावजूद शराब बरामद की जा रही है, वह शराब के बढ़ते समानांतर गैरकानूनी मार्केट को ही दर्शाता है।

रोहतास ने कानून का उल्लंघन करने वाले इलाकों की सूची में अपने स्थान को बना रखा है जहाँ पुलिस अधिकारी तक शराब बंदी कानून का उल्लंघन करते दोषी पाए गए हैं। इस साल मार्च महीने में रोहतास के नोखा पुलिस स्टेशन के एक सब-इंस्पेक्टर को अवैध शराब तस्करों के साथ कथित संबंधों के चलते गिरफ्तार किया गया था। इसी तरह 2017 में नकली शराब पीने के कारण एक गाँव में चार मौतों की सूचना मिली थी।

इन शराब माफियाओं एवं शराब तस्करों द्वारा पुलिस अधिकारियों को मोटी रिश्वत और फायदा पहुँचाया जाता है जिससे उनका यह अवैध व्यवसाय लगातार फल-फूल रहा है। पुलिस मुख्यालय के अनुसार अप्रैल 2016 से जनवरी 2020 के बीच में 517 अधिकारियों (पुलिसकर्मियों सहित) के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई थी,  जिसमें से 454 को निलंबित कर दिया गया था। इसमें से कुल 73 अधिकारियों को बर्खास्त कर दिया गया था जबकि 44 पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दायर की गई और 10 इंस्पेक्टरों पर 10 वर्षों के लिए एसएचओ की पोस्टिंग पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था।

शराब बंदी पर टिप्पणी करते हुए पटना विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री और पूर्व प्रोफेसर नवल कुमार चौधरी का कहना था कि नीतीश कुमार शराब बंदी के कारण आंशिक तौर पर मौजूद सामाजिक लाभों को लेकर तो मुखर बने हुए हैं, लेकिन वे उन सामाजिक लागतों की अनदेखी कर रहे हैं जो अपरिवर्तनीय हैं। इसके साथ ही राजकीय खजाने को होने वाले 5,400 करोड़ रूपये के नुकसान को लेकर भी उन्होंने चुप्पी साध रखी है।

लेखक बिहार स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Konar -- The First Village to Spur Liquor Ban Protests Demystifies Dry Bihar’s Reality

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