NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
यूक्रेन विवाद : आख़िर दक्षिणपूर्व एशिया की ख़ामोश प्रतिक्रिया की वजह क्या है?
रूस की संयुक्त राष्ट्र में निंदा करने के अलावा, दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों में से ज़्यादातर ने यूक्रेन पर रूस के हमले पर बहुत ही कमज़ोर और सतही प्रतिक्रिया दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा दूसरों के मामलों में हस्तक्षेप पर क्षेत्रीय सावधानी के चलते हो सकता है।
डेविड हट
09 Mar 2022
यूक्रेन विवाद : आख़िर दक्षिणपूर्व एशिया की ख़ामोश प्रतिक्रिया की वजह क्या है?

यूक्रेन पर रूस के हमले के करीब दो हफ़्ते होने वाले हैं। इस बीच बाकी दुनिया से इस हमले पर मिलने वाली प्रतिक्रिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं। पिछले बुधवार को 11 दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों में से 9 ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के उस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें आक्रमण के लिए मॉस्को की निंदा की गई थी, साथ ही शांति की अपील भी की गई थी। इस मतदान में रूस के ऐतिहासिक साथी रहे विएतनाम और लाओस नदारद रहे थे। 

लेकिन कूटनीतिक मतदान के अलावा, दक्षिणपूर्वी एशियाई सरकारों की प्रतिक्रिया अलग-अलग रही है, बल्कि कुछ का कहना है कि यह देश चुप रहे हैं। सिंगापुर ने बेहद दुर्लभ फैसला लेते हुए रूस पर प्रतिबंध लगाए, इंडोनेशिया ने भी तेजी से प्रतिक्रिया देते हुए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की कार्रवाई की आलोचना की। वहीं अमेरिका का पारंपरिक मित्र रहे फिलिपीन्स ने बिल्कुल उल्टी प्रतिक्रिया देते हुए खुद को तटस्थ घोषित कर दिया। इस बीच थाईलैंड और मलेशिया चुप ही रहे। 

रूस को माना जा रहा है बड़ा व्यापारिक साझेदार

कई क्षेत्रीय नेताओं ने शांति की अपील की है, लेकिन उन्होंने इस विवाद में किसी का पक्ष नहीं लिया है। रूस, आसियान का नौवां सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। यह एक वज़ह हो सकती है जिसकी वज़ह से कई नेताओं ने रूस की आलोचना नहीं की। सबसे अहम, रूस इस इलाके का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता (स्टॉकहोम अंतरराष्ट्रीय शांति शोध संस्थान के मुताबिक़) है।

विएतनाम की सेना के 80 फ़ीसदी से ज़्यादा उपकरण साल 2000 से रूस से आ रहे हैं। मॉस्को ने इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड और फिलिपीन्स को भी हथियार दिए हैं। जबकि फरवरी, 2021 में सत्ता में आने वाली म्यांमार की सैन्य सरकार का मुख्य आपूर्तिकर्ता भी रूस ही है। पिछले दिसंबर में जकार्ता ने पहली बार रूस-आसियान संयुक्त समुद्री अभ्यास भी आयोजित किया था।   

अमेरिका में नेशनल वॉर ऑफ़ कॉलेज में प्रोफ़ेसर जाकरी अबूज़ा का कहना है कि ऐसा लगता है कि सैन्य नज़रिए को ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर बताया जा सकता है। अबूज़ा कहते हैं कि रूस के हथियारों का ज़्यादातर निर्यात विएतनाम और म्यांमार में केंद्रित है, जबिक मॉस्को की उम्मीद से इतर दूसरे क्षेत्रीय देशों में यह निर्यात नहीं फैला। कई असफल समझौते हुए हैं।

 अबूजा दक्षिण-पूर्व एशिया की चुप्पी की वज़ह बताते हुए आगे दूसरी व्याख्याएं बताते हैं। वे कहते हैं कि दक्षिणपूर्व एशियाई राजनेताओं का एक वर्ग पुतिन को मजबूत नेता मानता है, जिन्होंने अमेरिका के नेतृत्व वाली विश्व-व्यवस्था को चुनौती दी है। हाल में निर्वतमान फिलिपीन्स के राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते ने पुतिन को अपना पसंदीदा हीरो बताया था। पिछले साल कंबोडिया के प्रधानमंत्री हुन सेन ने रूस के राष्ट्रपति को "मित्रता पदक" से भी नवाजा था। 

दूर-दराज़ के मामलों में छेड़खानी करने से बचना

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि दक्षिणपूर्व एशिया की सरकारें चीन को परेशान नहीं करना चाहतीं, जिसने अभी तक यूक्रेन युद्ध पर अब तक बहुत खुल कर प्रतिक्रिया नहीं दी है। फिर कुछ दक्षिणपूर्व एशिया के देश दक्षिण चीन सागर में चीन के साथ सीमा विवाद में प्रतिस्पर्धा में भी हैं और वे इस क्षेत्र में चीन और अमेरिका की दुश्मनी बढ़ाना नहीं चाहते। 

लेकिन एशियाई अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर टिप्पणीकार, ब्रूसेल्स में रहने वाले शाद इस्लाम कहते हैं कि इस प्रतिक्रिया का चीन से कम लेना देना है, बल्कि क्षेत्रीय देशों का दूसरे देशों के मामलों में हस्तक्षेप ना करने की परंपरा से ज़्यादा लेना देना है। खासकर एक ऐसा संकट, जो बहुत दूर पूर्वी यूरोप में है। 

आक्रमण के कुछ दिनों बाद फिलिपीन्स के रक्षा सचिव डेल्फिन लोरेंजाना ने कहा था, "यूरोप में वे लोग जो भी कर रहे हैं, उसमें हाथ डालना हमारा काम नहीं है।"

इस्लाम कहते हैं कि अमेरिका और दूसरे यूरोपीय देश "इसके चलते निराश और थोड़ी उलझन में भी हैं, उन्हें उम्मीद है कि वे दक्षिणपूर्व एशियाई देशों की सरकारों को अपना मत बदलने के लिए तैयार कर लेंगे।" कई दशकों से इस क्षेत्र की सरकारों ने दूसरे देशों के मामलों में हस्तक्षेप ना करने की कठोर नीति अपनाकर रखी है- जिसे तथाकथित "आसियान का तरीका" कहते हैं। लेकिन अब इस स्थिति में दरार आती हुई दिख रही हैं, कुछ सरकारों ने म्यांमार की सैन्य सरकार को पिछले साल क्षेत्रीय सम्मेलन से दूर रखने के लिए कड़ा रुख अपनाया था। 

सिंगापुर में एस राजारत्नम अंतरराष्ट्रीय अध्ययन विद्यालय में शोधार्थी जोएल एनजी ने निराशा जताते हुए कहा कि दक्षिणपूर्व एशिया के देश अहस्तक्षेप की नीति का ज़्यादा कड़ाई से पालन नहीं कर रहे हैं। 

एन जी के मुताबिक़, ज़्यादातर सरकारों ने इस मामले में अब तक अपने हिसाब से ही रवैया अपनाया है। उन्हें रूस पर पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का पालन करना होगा, लेकिन एन जी ने यह भी माना कि दूसरे देश रूस पर प्रतिबंध लगाने में सिंगापुर का साथ देने आगे नहीं आएंगे। मतलब वे अपनी तरफ से एकपक्षीय प्रतिबंध नहीं लगाएंगे। 

फिर इस बात भी बहुत बहस है कि आखिरकार यूक्रेन में युद्ध शुरू ही क्यों हुआ, इस मामले पर विचार कई बार राष्ट्रीय संवेदनशीलताओं से प्रभावित होते हैं। दक्षिणपूर्व एशिया सर्वे, जो पिछले महीने ही आएसईएएस-युसुफ इशाक इंस्टीट्यूट द्वारा प्रकाशित किया गया है, इसके हालिया अंक के मुताबिक़, लोगों में अमेरिका और चीन के बीच में पक्ष चुनने को लेकर मतभेद हैं, लेकिन ज़्यादातर का यह मानना है कि उन्हें किसी भी महाशक्ति के पाले में नहीं जाना चाहिए। 

इंडोनेशिया यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफ़ेसर एवी फित्रिआनी कहते हैं, "रूस द्वारा नागरिकों के खिलाफ़ सैन्य ताकत के इस्तेमाल और यूक्रेन की संप्रभुता के उल्लंघन के खिलाफ़ रवैया रखते हुए क्षेत्रीय देशों को इस पर भी बोलना चाहिए कि आखिरकार इस युद्ध की मूल वज़ह क्या है: पूर्वी यूरोप में नाटो का विस्तार जो रूस की असुरक्षा को बढ़ाता है।"  

आलोचकों ने की तीखी प्रतिक्रिया की अपील

लेकिन इस बात को भी लोग मान रहे हैं कि यूक्रेन में पुतिन के रवैये की आलोचना ना करना, खुद दक्षिणपूर्व एशियाई देशों को प्रभावित कर सकता है। इस चीज को भी माना जा रहा है कि यूक्रेन में पुतिन के युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय कानून का माखौल उड़ाया जा रहा है और वहां पश्चिमी देशों द्वारा छोटे देशों की संप्रभुता को बचाने की प्रतिबद्धता को भी जांचा जा रहा है। 

सिंगापुर के विदेश मंत्री विवियन बालाकृष्णन कहते हैं, "अगर हम एक देश के तौर पर छोटे देशों की स्वतंत्रता और संप्रभुता के लिए खड़े नहीं होंगे, तो एक देश के तौर पर हमारे खुद के अस्तित्व और खुशहाली के अधिकार पर सवाल उठाया जा सकता है।"

यह विभाजित करने वाला मुद्दा दिखाई देता है। कुछ के लिए यूक्रेन में युद्ध एक दूर का मुद्दा है, जिसके ऊपर दक्षिणपूर्व एशियाई देश बहुत प्रभाव नहीं डाल सकते, बल्कि इसमें किसी भी तरह के हस्तक्षेप से खुद के लिए ही मुश्किलें खड़ी होंगी। दूसरों के लिए यूक्रेन का इस क्षेत्र पर सीधा असर होगा। 

अबूजा कहते हैं, "एक सिंगापुर को छोड़कर कोई भी दूसरा देश यह नहीं मान रहा है कि यूक्रेन पर हमले को सही ठहराने के लिए लिए रूस द्वारा दी गई वज़हों से अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन हुआ है और इससे एक बहुत ख़तरनाक परिपाटी की शुरुआत हो सकती है।"  

वह आगे कहते हैं, "अगर रूस एकतरफा ढंग से एक संप्रभु देश की ज़मीन पर कब्ज़ा करने के लिए सांस्कृतिक संबंधों और इतिहास को वज़ह बता सकता है, तो चीन को ऐसा करने से कौन रोकेगा?"

Courtesy: DW 

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Ukraine Conflict: What's Behind Southeast Asia's Muted Response?

 

Asia. Ukraine War. Russia-Ukraine. ASEAN

Related Stories


बाकी खबरें

  • Abhisar sharma
    न्यूज़क्लिक टीम
    दबंग राजा भैया के खिलाफ FIR ! सपा कार्यकर्ताओं के तेवर सख्त !
    28 Feb 2022
    न्यूज़चक्र के आज के एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार Abhisar Sharma Ukraine में फसे '15,000 भारतीय मेडिकल छात्रों को वापस लाने की सियासत में जुटे प्रधानमंत्री' के विषय पर चर्चा कर रहे है। उसके साथ ही वह…
  • रवि शंकर दुबे
    यूपी वोटिंग पैटर्न: ग्रामीण इलाकों में ज़्यादा और शहरों में कम वोटिंग के क्या हैं मायने?
    28 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश में अब तक के वोटिंग प्रतिशत ने राजनीतिक विश्लेषकों को उलझा कर रख दिया है, शहरों में कम तो ग्रामीण इलाकों में अधिक वोटिंग ने पेच फंसा दिया है, जबकि पिछले दो चुनावों का वोटिंग ट्रेंड एक…
  • banaras
    सतीश भारतीय
    यूपी चुनाव: कैसा है बनारस का माहौल?
    28 Feb 2022
    बनारस का रुझान कमल खिलाने की तरफ है या साइकिल की रफ्तार तेज करने की तरफ?
  • एस एन साहू 
    उत्तरप्रदेश में चुनाव पूरब की ओर बढ़ने के साथ भाजपा की मुश्किलें भी बढ़ रही हैं 
    28 Feb 2022
    क्या भाजपा को देर से इस बात का अहसास हो रहा है कि उसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से कहीं अधिक पिछड़े वर्ग के समर्थन की जरूरत है, जिन्होंने अपनी जातिगत पहचान का दांव खेला था?
  • Mothers and Fathers March
    पीपल्स डिस्पैच
    तख़्तापलट का विरोध करने वाले सूडानी युवाओं के साथ मज़बूती से खड़ा है "मदर्स एंड फ़ादर्स मार्च"
    28 Feb 2022
    पूरे सूडान से बुज़ुर्ग लोगों ने सैन्य शासन का विरोध करने वाले युवाओं के समर्थन में सड़कों पर जुलूस निकाले। इस बीच प्रतिरोधक समितियां जल्द ही देश में एक संयुक्त राजनीतिक दृष्टिकोण का ऐलान करने वाली हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License