NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
उत्पीड़न
भारत
राजनीति
कश्मीर में मुठभेड़ हत्याएं जारी हैं
क्या कश्मीर हमारी चिंता में है? कश्मीर में जो लगातार ख़ून-खराबा जारी है, क्या उसकी फ़िक्र हमें है?
अजय सिंह
28 Jul 2021
kashmir
फ़ाइल फ़ोटो

क्या कश्मीर हमारी चिंता में है? कश्मीर में जो लगातार ख़ून-खराबा जारी है, क्या उसकी फ़िक्र हमें है? कश्मीर में भारतीय सेना व अन्य सुरक्षा बलों के साथ तथाकथित मुठभेड़ों में इतनी बड़ी तादाद में जो कश्मीरी नौजवान मारे जा रहे हैं, क्या उससे हमें परेशान व चिंतित नहीं होना चाहिए? क्या हमने मान लिया है कि भारत से कश्मीरी जनता के भयानक अलगाव व दूरी को दूर करना लगभग असंभव है?

केंद्र-शासित क्षेत्र जम्मू-कश्मीर से मुठभेड़ हत्याओं के बारे में जो सरकारी ख़बरें व आंकड़े जारी होते हैं, वे डरावनी तस्वीर पेश करते हैं। इनसे पता चलता है कि ऐसी घटनाओं में कश्मीरी नौजवान अच्छी-ख़ासी संख्या में मारे जा रहे हैं। इन नौजवानों को जिन्हें कभी मिलिटेंट (विद्रोही) तो कभी टेररिस्ट (आतंकवादी) कहा जाता है, ज़िंदा पकड़ने की बजाय सेना का सारा ज़ोर उनका सफ़ाया कर देने और न्यूट्रलाइज़ कर देने पर रहता है। (मार डालने की कार्रवाई के लिए सेना ने एक नया शब्द निकाला है, न्यूट्रलाइज़ कर देना, यानी ख़त्म कर देना। अंगरेज़ी शब्द न्यूट्रल—यानी, तटस्थ या निष्क्रिय—का यह अर्थ विस्तार है!)

दूसरी बात जो इन सरकारी आंकड़ों से सामने आती है, वह और भी चिंताजनक है। वह यह कि सेना की कार्रवाइयों में मारे गये नौजवानों में क़रीब 80 प्रतिशत लोग कश्मीर के हैं। यानी वे कश्मीर के बाशिंदे हैं, भारत के नागरिक हैं, विदेशी (पाकिस्तानी) नहीं हैं। (ग़ैर-सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, मारे गये लोगों में 95 प्रतिशत कश्मीरी बाशिंदे हैं।) इतनी बड़ी तादाद में कश्मीरी नौजवान—भारतीय नागरिक—सेना की गोलीबारी में मारे जा रहे हैं, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। सिर्फ़ लोग ही नहीं मारे जाते, अनगिनत घर ध्वस्त कर दिये जाते हैं, तबाह हो जाते हैं, उजड़ जाते हैं। सेना की कार्रवाई में ध्वस्त कर दिये गये मकानों व इमारतों की संख्या अच्छी-ख़ासी है।

अब आइये, देखते हैं, इन सरकारी आंकड़ों से क्या तथ्य उभरता है।

वर्ष 2021 में जनवरी से लेकर 27 जुलाई तक सेना द्वारा चलाये गये 37 अभियानों में 89 कश्मीरी विद्रोही मारे गये हैं। इनमें 83 कश्मीर घाटी में और 6 जम्मू क्षेत्र में मारे गये। 39 विद्रोही तो सिर्फ़ जून और जुलाई में ही मारे गये। जुलाई में 21 दिन के अंदर 11 तथाकथित मुठभेड़ें हुईं, जिनमें 23 विद्रोही मारे गये।

 वर्ष 2020 में सेना ने 103 बार मुठभेड़ अभियान चलाया—कश्मीर घाटी में 90 और जम्मू क्षेत्र में 13 बार। इन अभियानों में 225 कश्मीरी विद्रोही मारे गये—207 कश्मीर घाटी में और 18 जम्मू क्षेत्र में।

सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2016 से वर्ष 2020 तक के चार वर्षों में सेना के साथ तथाकथित मुठभेड़ों में 958 कश्मीरी विद्रोही मारे जा चुके हैं। सिर्फ़ चार साल के अंदर क़रीब 1000 कश्मीरी नौजवान हलाक कर दिये गये! सोचिये कि भारत के किसी अन्य राज्य में ऐसा हुआ होता, तो क्या होता! यह सिर्फ़ कश्मीर की ही नहीं, शेष भारत की भी अपार जन-धन हानि है, गहरी मानवीय त्रासदी है—जो जानबूझकर पैदा की गयी है।

कश्मीर में जो नौजवान इस तरह की ‘मुठभेड़ों’ में मारे जाते हैं या पुलिस व सेना की हिरासत में जिनकी हत्या हो जाती है, उनकी पस्टमार्टम रिपोर्ट उनके परिवार वालों को सौंपने से सरकारी अधिकारी आम तौर पर इनकार कर देते हैं। कश्मीर में यह दस्तूर-सा बन गया है कि ऐसी पोस्टमार्टम रिपोर्ट परिवार वालों को न दी जाये। इसके लिए सरकारी अधिकारी ‘इससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा है’- जैसे तर्क का सहारा लेते हैं! पोस्टमार्टम रिपोर्ट हासिल करना हमारा हक़ है, लेकिन इसके लिए पीड़ित परिवारवालों को कई अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, अच्छा-ख़ासा पैसा व वक़्त बर्बाद करना पड़ता है, सूचना का अधिकार क़ानून का सहारा लेना पड़ता है, फिर भी रिपोर्ट नहीं मिल पाती।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह पता चलता है कि संबंधित व्यक्ति की मौत कैसे, किन परिस्थितियों में हुई, हिरासत में उसे शारीरिक यातना (टॉर्चर) दी गयी या नहीं, अगर मुठभेड़ हुई, तो गोली दूर से मारी गयी या नज़दीक से, आगे से या पीछे से, और कहां-कहां गोली मारी गयी, वगैरह। पोस्टमार्टम रिपोर्ट कई बार सरकारी दावे की पोल खोल देती है।

कश्मीर में सेना ने ऐसी ‘मुठभेड़ों’ में मारे गये विद्रोहियों की लाशों को उनके परिवार वालों को सौंपना बंद कर दिया है। पिछले एक-डेढ़ साल से यह सिलसिला चल रहा है। इन लाशों को मुठभेड़ स्थल से सौ-डेढ़ सौ किलोमीटर दूर ले जाकर सेना इन्हें किसी अज्ञात जगह पर दफ़ना देती है। परिवार वालों को पता नहीं चलता कि उनके बच्चे कहां दफ़न हैं—वे अंतिम संस्कार भी नहीं कर पाते। सेना/पुलिस की हिरासत में मारे गये लोगों की लाशें भी कई बार परिवार वालों को नहीं सौंपी जाती हैं।

इसके पीछे सेना का तर्क है कि मारे गये विद्रोहियों के जनाजे में भारी भीड़ उमड़ती है, जोशीले भाषण दिये जाते हैं और ये चीजें विद्रोह को ‘लुभावना’ (ग्लैमरस) बनाती हैं—नौजवान विद्रोह की ओर और ज़्यादा खिंचते हैं। सेना इसे रोकना चाहती है। और दूसरा तर्क यह कि कोरोना वायरस बीमारी (कोविड-19) के दौर में शवयात्रा की इजाजत नहीं दी जा सकती।

सेना समझती है कि ऐसे फ़ार्मूलों से वह कश्मीर को नियंत्रित कर सकती है। कश्मीर पर निगाह रखनेवाले एक राजनीतिक विश्लेषक का कहना है कि कश्मीर को पूरी तरह सेना की राइफ़लों और बूटों के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया है।

(लेखक वरिष्ठ कवि व राजनीतिक विश्लेषक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

 

Jammu and Kashmir
Kashmir conflict
Indian army

Related Stories

कश्मीर में ज़मीनी स्तर पर राजनीतिक कार्यकर्ता सुरक्षा और मानदेय के लिए संघर्ष कर रहे हैं

मुहर्रम का जुलूस कवर कर रहे पत्रकारों की पिटाई करने वाले पुलिस अधिकारी के ख़िलाफ़ कार्रवाई का आदेश

हालिया गठित स्पेशल टास्क फ़ोर्स द्वारा संदिग्ध ‘राष्ट्र-विरोधी’ कर्मचारियों को एकांगी तौर पर निष्काषित करना क्यों समस्याग्रस्त है


बाकी खबरें

  • Aruna Roy
    न्यूज़क्लिक टीम
    लोकतंत्र की रक्षा की कुंजी लोक के हाथों में : अरुणा राय
    30 Sep 2021
    रू-ब-रू में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने राजस्थान के भीम में बनी लोकतंत्र शाला (School for Democracy) में जाकर बातचीत की प्रख्यात समाजसेवी अरुणा राय से और साथ में उनके संघर्षों के साथी शंकर सिंह से।…
  • Police
    सबाह गुरमत
    पुलिस सुधार पर सुप्रीम कोर्ट के अनिवार्य निर्देशों का पालन कहीं नहीं हो रहा
    30 Sep 2021
    राज्य सुरक्षा आयोग (SSC) को यह सुनिश्चित करने का प्रस्ताव दिया गया था कि राज्य सरकारें राज्य पुलिस पर अनुचित प्रभाव या दबाव का इस्तेमाल नहीं करे।
  • daily
    न्यूज़क्लिक टीम
    कांग्रेस पार्टी का क्या रहेगा भविष्य, SARS-CoV-2 के नए क़रीबी वायरस पाए गए और अन्य ख़बरें
    30 Sep 2021
    न्यूज़क्लिक के डेली राउंडअप में आज हमारी नज़र देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस में हुए बदलाव, कोविड-19 जैसे वायरस की खोज और अन्य ख़बरों पर।
  •  Bol
    न्यूज़क्लिक टीम
    योगी के राज में मीनाक्षी मनीष को इंसाफ मिलेगा ?
    30 Sep 2021
    हाल ही में उत्तर प्रदेश पुलिस पर, मनीष गुप्ता नाम के एक शख्स को मारने के आरोप लगे हैं. हालाँकि पहले पुलिस ने इस घटना को पूरी तरह से नकार दिया था, पर सोशल मीडिया पर बढ़ते दबाव से पुलिस ने अब इस मामले…
  • 2020 riots
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    अदालत ने फिर उठाए दिल्ली पुलिस की 2020 दंगों की जांच पर सवाल, लापरवाही के दोषी पुलिसकर्मी के वेतन में कटौती के आदेश
    30 Sep 2021
    दिल्ली दंगों के एक मामले में दिल्ली पुलिस के बहुत ही लापरवाह तरीके से सुनवाई स्थगित करने के अनुरोध से नाराज एक अदालत ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर को इसकी जांच करने और दोषी अधिकारी के वेतन से 5,000 रुपये…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License