NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
क्या बेरोज़गारी के आंकड़े भयावह मानवीय त्रासदी के दौर की ओर इशारा कर रहे हैं?
सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) ने कहा है कि अप्रैल से अगस्त के दौरान लगभग 2.1 करोड़ वेतनभोगी कर्मचारियों ने अपनी नौकरी खो दी है।
अमित सिंह
11 Sep 2020
बेरोज़गारी

हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां किसी का रोज़ी-रोटी छिनना अब आंकड़े में बदल गया है। उससे भी दुखद यह बात है कि मात्र पांच महीने में दो करोड़ से ज्यादा लोगों की नौकरियां चली गई हैं लेकिन आर्थिक समानता, समावेशी विकास, सामाजिक कल्याण जैसे भारी भरकम शब्दों के जरिए सरकार में आए लोगों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। दूसरी तरफ जब भुखमरी और बेरोजगारी से संकट में आए लोग प्रदर्शन कर रहे हैं तो सरकार ऐसा दिखाने की कोशिश हो रही है कि ऐसी कोई समस्या देश में नहीं है।

फिलहाल आंकड़ों पर चर्चा कर लेते हैं। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) ने कहा है कि अप्रैल-अगस्त के दौरान लगभग 2.1 करोड़ वेतनभोगी कर्मचारियों ने अपनी नौकरी खो दी। इसमें से अगस्त में लगभग 33 लाख नौकरियां गईं और जुलाई में 48 लाख लोगों ने अपनी नौकरी खो दी।

सीएमआईई ने कहा है कि नौकरी के नुकसान में औद्योगिक कर्मचारी और बड़े कर्मचारी भी शामिल हैं। साल 2019-20 के पूरे साल की तुलना में अगस्त में वेतनभोगी नौकरियां देश में 8.6 करोड़ से घटकर 6.5 करोड़ हो गईं।

सीएमआईई ने कहा, ‘सभी प्रकार के रोजगार में 2.1 करोड़ नौकरियों की कमी सबसे बड़ी है। जुलाई में लगभग 48 लाख वेतनभोगी नौकरियां गईं और फिर अगस्त में 33 लाख नौकरियां चली गईं।’

सीएमआईई के मासिक आंकड़ों के अनुसार देश की बेरोजगारी दर अगस्त में बढ़कर 8.35 प्रतिशत हो गई, जो पिछले महीने में 7.40 प्रतिशत थी। शहरी बेरोजगारी दर अगस्त में 9.37 प्रतिशत से बढ़कर 9.83 प्रतिशत हो गई, जबकि अगस्त में ग्रामीण बेरोजगारी दर अगस्त में बढ़कर 7.65 प्रतिशत हो गई थी, जो उससे पिछले महीने की 6.51 प्रतिशत थी।

आपको बता दें कि भारत के कुल रोजगार में वेतनभोगी नौकरियों का हिस्सा करीब 21-22 प्रतिशत होता है। लॉकडाउन के दौरान नौकरी गंवाने वाले लोगों के लिए खेती अंतिम विकल्प रहा है, इसलिए साल 2019-20 के दौरान 11.1 करोड़ कर्मचारियों के मुकाबले अगस्त तक खेती में रोजगार में 1.4 करोड़ की बढ़ोतरी हुई है।

आसान भाषा में कहें तो आंकड़ों के मुताबिक इस वक्त हर 10 में से 1 व्यक्ति बेरोजगार है। राज्यवार चर्चा करें तो हरियाणा की स्थिति सबसे बुरी है। वहां हर तीसरे व्यक्ति के पास कोई काम नहीं है।

अगर हम युवाओं की बात करें तो उनकी स्थिति भी खराब है। पिछले महीने अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और एशियाई विकास बैंक की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार कोविड-19 महामारी के कारण युवाओं के लिए रोज़गार की संभावनाओं को भी झटका लगा है, जिसके कारण तत्काल 15 से 24 साल के युवा 25 और उससे अधिक उम्र के लोगों के मुकाबले ज़्यादा प्रभावित होंगे।

‘एशिया और प्रशांत क्षेत्र में कोविड-19 युवा रोजगार संकट से निपटना’ शीर्षक से आईएलओ-एडीबी की जारी रिपोर्ट में कहा गया, ‘एक अनुमान के अनुसार भारत में 41 लाख युवाओं की नौकरियां गई हैं। सात प्रमुख क्षेत्रों में से निर्माण और कृषि क्षेत्र में सर्वाधिक लोगों के रोजगार गए हैं।’

वैसे इसके लिए सिर्फ कोरोना ही जिम्मेदार नहीं है। रोजगार का संकट उससे भी पुराना है। कोरोना से पहले फरवरी माह में भी बेरोजगारी के आंकड़े सरकार की नाकामियों की कहानी बयां कर रहे थे।

सीएमआईई के मुताबिक अक्टूबर 2019 के बाद देश की बेरोजगारी दर फरवरी 2020 में सबसे अधिक रही। रिपोर्ट के मुताबिक फरवरी में बेरोजगारी दर 7.78 प्रतिशत रही, जो जनवरी में 7.16 थी। सीएमआईई के अनुसार, फरवरी महीने में ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी दर 7.37 प्रतिशत रही, जो जनवरी में 5.97 फीसदी थी। वहीं शहरी इलाकों में यह जनवरी के 9.70 प्रतिशत से घटकर 8.65 प्रतिशत पर आ गयी। ज्ञात हो कि इससे पहले फरवरी 2019 में भारत में बेरोजगारी दर अपने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थी।

आपको यह भी याद दिला दें कि मोदी सरकार ने दूसरी बार सत्ता में आने के बाद बेरोजगारी से संबंधित आंकड़े जारी किए थे। जिसके अनुसार 2017-18 में बेरोज़गारी दर 45 साल में सर्वाधिक रही थी।

हाल ही में जारी जीडीपी के आंकड़े भी निराशाजनक रहे। पहली तिमाही में देश की जीडीपी ग्रोथ में 23.9 फीसदी की गिरावट आई है। पिछली दो तिमाहियों से भारतीय अर्थव्यवस्था में सुस्ती देखी जा रही है। मैन्यूफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन, बिजनस, होटल, ट्रांसपोर्ट सेक्टर जो देश की जीडीपी में 45 फीसदी की हिस्सेदारी रखते हैं, वे लॉकडाउन के चलते प्रभावित हुए हैं। इनकी स्थिति अभी सुधरी नहीं हुए है।

अब सरकार जो उपाय कर रही है, वह कितना नाकाफी है उस पर भी बात कर लेते हैं। अर्थशास्त्री और आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन का कहना है कि मौजूदा आंकड़ों से ‘हम सभी को चौंकाना चाहिए’। सरकार एवं नौकरशाहों को इससे डरने की जरूरत है।

रघुराम राजन का मानना है कि अर्थव्यवस्था की ये चुनौती सिर्फ कोरोना वायरस और लॉकडाउन से हुए नुकसान को ठीक करने के लिए नहीं है, बल्कि पिछले 3-4 साल में उत्पन्न हुईं आर्थिक समस्याओं को ठीक करना होगा। जिस तरह से स्थिति खराब हो रही है, जब तक कोरोना काबू में आएगा, अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी।

आपको बता दें कि संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष अधिकारियों ने इसी हफ्ते सचेत किया है कि कोविड-19 संकट की वजह से आर्थिक एवं स्वास्थ्य पर पड़ने वाले अप्रत्यक्ष प्रभावों के कारण गरीबी बढ़ेगी, औसत आयु कम होगी, भुखमरी बढ़ेगी, शिक्षा की स्थिति खराब होगी और अधिक बच्चों की मौत होगी।

उन्होंने कहा, ‘लॉकडाउन उपायों के जारी रहने, सीमाएं बंद होने, कर्ज के बढ़ने और वित्तीय संसाधनों के डूबने के कारण महामारी हमें दशकों की सबसे खराब मंदी की ओर धकेल रही है।’

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि बदहाल आर्थिक हालात का सबसे ख़राब असर कमजोर समुदायों पर होगा।

बता दें कि बीते जुलाई महीने में संयुक्त राष्ट्र ने वैश्विक महामारी के पहले 12 महीनों में भुखमरी से लाखों बच्चों की जान जाने की आशंका जताई थी।

जुलाई के शुरुआत में संयुक्त राष्ट्र ने चेताया था कि कोरोना वायरस महामारी इस साल करीब 13 करोड़ और लोगों को भुखमरी की ओर धकेल सकती है।

बीते जून महीने में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) की रिपोर्ट में कहा गया था कि कोविड-19 महामारी के कारण वैश्विक ग़रीबी दर में 22 वर्षों में पहली बार वृद्धि होगी। भारत की ग़रीब आबादी में एक करोड़ 20 लाख लोग और जुड़ जाएंगे, जो विश्व में सर्वाधिक है।

इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र के श्रम निकाय ने चेतावनी दी थी कि कोरोना वायरस संकट के कारण भारत में अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले लगभग 40 करोड़ लोग गरीबी में फंस सकते हैं और अनुमान है कि इस साल दुनिया भर में 19.5 करोड़ लोगों की पूर्णकालिक नौकरी छूट सकती है।

फिलहाल स्थिति लगातार भयावह होती जा रही है। तमाम अर्थशास्त्री और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं लगातार सरकार को आगाह कर रही हैं लेकिन सरकार के कान में जूं नहीं रेंग रही है। निंसंदेह इसका परिणाम बड़ी मानवीय त्रासदी के रूप में सामने आएगा।

समाचार एजेंसी भाषा के इनपुट के साथ

unemployment
Center for Monitoring Indian Economy
CMIE
poverty
Hunger Crisis
Coronavirus
economic crises
Economic Recession
Narendra modi
Nirmala Sitharaman
BJP

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है


बाकी खबरें

  • असद रिज़वी
    CAA आंदोलनकारियों को फिर निशाना बनाती यूपी सरकार, प्रदर्शनकारी बोले- बिना दोषी साबित हुए अपराधियों सा सुलूक किया जा रहा
    06 May 2022
    न्यूज़क्लिक ने यूपी सरकार का नोटिस पाने वाले आंदोलनकारियों में से सदफ़ जाफ़र और दीपक मिश्रा उर्फ़ दीपक कबीर से बात की है।
  • नीलाम्बरन ए
    तमिलनाडु: छोटे बागानों के श्रमिकों को न्यूनतम मज़दूरी और कल्याणकारी योजनाओं से वंचित रखा जा रहा है
    06 May 2022
    रबर के गिरते दामों, केंद्र सरकार की श्रम एवं निर्यात नीतियों के चलते छोटे रबर बागानों में श्रमिक सीधे तौर पर प्रभावित हो रहे हैं।
  • दमयन्ती धर
    गुजरात: मेहसाणा कोर्ट ने विधायक जिग्नेश मेवानी और 11 अन्य लोगों को 2017 में ग़ैर-क़ानूनी सभा करने का दोषी ठहराया
    06 May 2022
    इस मामले में वह रैली शामिल है, जिसे ऊना में सरवैया परिवार के दलितों की सरेआम पिटाई की घटना के एक साल पूरा होने के मौक़े पर 2017 में बुलायी गयी थी।
  • लाल बहादुर सिंह
    यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती
    06 May 2022
    नज़रिया: ऐसा लगता है इस दौर की रणनीति के अनुरूप काम का नया बंटवारा है- नॉन-स्टेट एक्टर्स अपने नफ़रती अभियान में लगे रहेंगे, दूसरी ओर प्रशासन उन्हें एक सीमा से आगे नहीं जाने देगा ताकि योगी जी के '…
  • भाषा
    दिल्ली: केंद्र प्रशासनिक सेवा विवाद : न्यायालय ने मामला पांच सदस्यीय पीठ को सौंपा
    06 May 2022
    केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच इस बात को लेकर विवाद है कि राष्ट्रीय राजधानी में प्रशासनिक सेवाएं किसके नियंत्रण में रहेंगी।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License