NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
बेरोज़गारी से जूझ रहे भारत को गांधी के रोज़गार से जुड़े विचार पढ़ने चाहिए!
गांधी के नाम पर राजनीति करने वालों को गांधी के रोजगार से जुड़ी विचार पढ़ने चाहिए।
अजय कुमार
02 Oct 2021
Gandhi

गांधी या इतिहास का कोई भी नायक वर्तमान में मौजूद नहीं होता है। वह इतिहास का हिस्सा होता है। अपने समय और माहौल के हिसाब से दुनिया को रोशन कर जा चुका होता है। इसलिए वर्तमान में गांधी या इतिहास के किसी भी नायक की प्रासंगिकता यह नहीं है कि उस से हुबहू वैसा ही सीखा जाए जैसा वह इतिहास में था। इतिहास तो बीत गया।

वर्तमान का माहौल यह मांग करता है कि वह अपने अतीत से उन ब्यौरे और प्रवृत्तियों को उठा कर ला पाए, जिससे वर्तमान की सबसे गहरी परेशानियों को हल करने की दिशा मिलती है। गांधी और इतिहास के किसी भी नायक के मर्म को समझते हुए उससे अपने वर्तमान की परेशानियों को हल करने की रोशनी हासिल कर सकें। इसलिए पूरा का पूरा गांधी नहीं बल्कि वर्तमान को उतना ही गांधी चाहिए जितना वर्तमान की गहरी परेशानियों के लिए गांधी अब भी प्रासंगिक है।

इसे भी पढ़े: हमारी राजनीति में गांधी का नाम एक विज्ञापन के सिवा कुछ भी नहीं!

गांधी का जाति व्यवस्था पर विचार नहीं, बल्कि गांधी का अहिंसा, सत्याग्रह, करुणा सद्भाव, मेहनत, मजदूरी, रोजगार बेरोजगार से जुड़ा चिंतन हमेशा प्रासंगिक रहेगा। गांधी इन मुद्दों पर भारत को हमेशा रोशनी दिखाते रहेंगे। लेकिन दिक्कत यही है कि हमने गांधी की रोशनी को नारों में कैद कर दिया है। नेताओं के दफ्तर में लगने वाले फोटो फ्रेम में कैद कर दिया है। हमारे समाज को गांधी को सच का वाहक बनाना चाहिए था लेकिन समाज की राजनीति ने उसे अफवाहों का वाहक बना दिया है। जितनी अफवाह गांधी पर हैं,उतनी अफवाहें तो शायद अफवाहों पर भी ना हो। इसलिए हम गांधी के विराट शख्सियत से हमेशा अनजान ही रहते हैं।

मौजूदा वक्त में बेरोजगारी भारत की सबसे बड़ी समस्या है। कईयों के पास दो हाथ दो पैर और एक कुशल दिमाग होने के बावजूद काम करने के लिए काम नहीं है। जो काम कर रहे हैं दिन भर खट रहे हैं, उन्हें मुकम्मल जिंदगी जीने के लिए ढंग का मेहनताना नहीं मिलता है। इस तरह से बेरोजगारी और बेहतर मजदूरी से जूझती भारत की बहुत बड़ी आबादी भारत के विचार के सामने सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती है।

गांधी के श्रम संबंधी यानी मेहनत से जुड़े विचारों से गुजरने के बाद भारत की बेरोजगारी की परेशानी पूरी तरह से दूर तो नहीं हो सकती लेकिन गांधी के विचार नीति निर्माताओं को ऐसी कई तरह की परेशानियों से अवगत करा सकते हैं जिन को सुलझाए बिना बेरोजगारी से जुड़ी परेशानियों को हल करने के बाद भी एक स्वस्थ समाज नहीं बनाया जा सकता है।

इसे भी देखें: क्या आज गाँधी और अम्बेडकर के धर्मनिरपेक्ष देश के सपने को ख़तरा है?

गांधी ने अपने अनुभव से जाना था कि रोजगार की परेशानी केवल रोजगार की परेशानी नहीं है। बल्कि रोजगार के परेशानी के व्यापक आयाम है। पूंजी और रोजगार के संबंधों के स्वस्थ हुए बिना एक स्वस्थ समाज की कल्पना निराधार है। यह बात वर्तमान समय में बिल्कुल फिट बैठती है। अकूत पूंजी होने के बावजूद भी रोजगार पैदा नहीं हो रहा है। जिनके पास रोजगार है उन्हें मालिक से कई गुना कम मेहनताना मिलता है। जो मालिक और अमीर हैं वह बिना रोजगार के ही पूंजी से पूंजी बनाते रहते हैं, अपना जेब भरते रहते हैं। ऐसे में गांधी की बातें बहुत बड़ा रास्ता दिखाती हैं कि केवल रोजगार पैदा करने के बारे में सोचकर रोजगार नहीं पैदा किया जा सकता बल्कि उस हिसाब से पूंजी को भी समायोजित करना पड़ेगा।

प्रतिमान पत्रिका में डॉक्टर शंभू जोशी की किताब अहिंसक श्रम दर्शन का एक अंश छपा है। जिसमें लिखा है कि गांधी भारत में एक नई कार्य संस्कृति लाना चाहते थे। जिसमें शारीरिक और बौद्धिक श्रम के बीच स्तर का भेद ना हो। जिसमें समाज के दो छोरों पर खड़े लोगों को एक साथ लाया जा सके। गांधी द्वारा प्रस्तावित नई तालीम का मकसद भी शारीरिक श्रम के साथ-साथ बौद्धिक विकास का था। गांधी का मानना था कि इस तरह से जिस श्रम मूलक संस्कृति का निर्माण होता है, वह एक अहिंसक समाज का निर्माण करती है। इसमें कृत्रिम आवश्यकताएं ना होने से संसाधनों का शोषण भी नहीं होता है। अतः यह ना केवल मनुष्य - मनुष्य के बीच बल्कि प्रकृति और मनुष्य के बीच भी प्रेम मूलक होगी। यह श्रम के सृजन के आनंद की बात कर उसे व्यक्तित्व विकास के साथ भी जोड़ती है। जो व्यक्ति को अकेलेपन और अलगाव की समस्या से दूर ले जाता है।

बड़े ध्यान से इस अंश पर पढ़ने पर पता चलता है कि गांधी रोजगार को महज आर्थिक प्रक्रिया की तरह नहीं देखते हैं। गांधी ऐसा नहीं मानते हैं कि कोई काम मिल जाए और काम के बदले पैसा मिल जाए तो एक संपूर्ण जीवन जिया जा सकता है। गांधी पूरे कार्य संस्कृति पर विचार करते हैं। उनका पूरी कार्य संस्कृति पर विचार करना बहुत अधिक महत्वपूर्ण इसलिए भी हो जाता है क्योंकि एक व्यक्ति अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा काम करते हुए ही गुजरता है। व्यक्ति को काम करने के नाम पर कुछ भी करना पड़े, तब उस व्यक्ति का जीवन नरक के बराबर हो सकता है। गांधी इस महत्वपूर्ण बिंदु के तरफ विचार करते हैं। जिसकी जरूरत मौजूदा समय में भी बहुत अधिक है।

गांधी हमारे समाज में शारीरिक श्रम को लेकर बनी हेय दृष्टि पर नजर दौड़ते है। यह भी बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है। हमारे समाज में पढ़ने लिखने वाले और तकनीक के जानकारों को छोड़कर बाकी सभी शारीरिक श्रम करके जीने वाले लोगों के जीवन को बड़े ही ओछे ढंग से देखे जाने की आदत है। यह आदत मनोवैज्ञानिक तौर पर बहुत बड़ी आबादी के साथ नाइंसाफी करती है। एक व्यक्ति दिन भर ठेला लगाकर और सब्जी लगाकर मेहनत करता है लेकिन उसे वह सम्मान नहीं मिलता जो पढ़े लिखे संभ्रांत व्यक्ति को मिलता है।

रोजगार पर विचार करते हुए गांधी का इसलिए यह कहना था कि समाज के सबसे दो छोरों पर मौजूद लोगों के हिस्से में शारीरिक श्रम और बौद्धिक विकास दोनों का होना बहुत जरूरी है। यही आज के लिए बहुत बड़ी परेशानी है। स्पेशलाइजेशन की वजह से पढ़ने-लिखने का कर्म कुछ ही लोगों के हिस्से में आ रहा है। बाकी सभी लोग कम मजदूरी पर बदतर जिंदगी जीने की लड़ाई लड़ रहे हैं। इन लोगों का बौद्धिक विकास नहीं हो पा रहा है। इस तरह से कोई समाज स्वस्थ समाज नहीं बन सकता है।

इसे भी पढ़े: भारत में ओ'डायरवाद: गांधी और प्रशांत भूषण के साहस और 'अवमानना'

अगर सभी तरह के रोजगार में शामिल लोगों का बौद्धिक विकास  होगा तभी जाकर समाज प्रेम, शांति, सद्भाव, नैतिकता जैसे मूल्यों के महत्व को समझेगा। भयंकर उपभोग की आदत से खुद को दूर रखेगा। संसाधनों का सम्मान करेगा। प्रकृति से प्रेम करेगा। अहिंसा उसके जीवन की आदत बन पाएगी। इस तरह से गांधी रोजगार पर विचार करते हुए, उन सभी पहलुओं पर विचार करते हैं जो व्यक्ति के आनंद, रचनात्मकता से लेकर प्रकृति से जुड़े जलवायु परिवर्तन तक की परेशानियों का समाधान करता हुआ नजर आता है।

गांधी के बारे में कहा जाता है कि वह तकनीक के विरोधी थे। लेकिन यह बात पूरी तरह से सही नहीं है। गांधी के ही शब्द हैं कि मेरा उद्देश्य तमाम यंत्रों का नाश करने का नहीं बल्कि उनकी हदें बांधने का है। गांधीवादी विचारक कहते हैं कि हम माने या ना माने लेकिन आधुनिक तकनीकों ने हमारे सामने न्याय, पारिस्थितिकी और स्वतंत्रता की चुनौती पेश की है। उदाहरण के तौर पर अमेजन की एक कंपनी ने न जाने कितने खुदरा व्यापारियों के रोजगार छीन लिए। हर तरह की तकनीक किसी न किसी तरह से पारिस्थितिक तंत्र को प्रभावित करती है। भले वह मोबाइल से निकलने वाली तरंगें हों या बड़ी-बड़ी गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाला ईंधन। पेगासस बता रहा है कि हमारी स्वतंत्रता गिरवी रख दी गई है। इसलिए तकनीक बहुत जरूरी होने के बाद भी गांधी के शब्दों में कहा जाए तो उस पर जरूरी हद बंदी लगाना बहुत जरूरी है।

गांधी का पूरा जोर इंसान को नैतिक बनाने का जोर है। इसलिए वह साध्य और साधन की पवित्रता पर जोर देते हैं। साफ शब्दों में कहते हैं कि वह अर्थनीति बेकार है जिसका आधार नीतिशास्त्र नहीं है।

गांधी जैसा विचारक पूरे जीवन और समाज के आपसी संबंध पर गहरे तौर पर सोच रहा है। तब जाकर रोजगार संबंधी अपने विचार रख रहा है। अर्थशास्त्र संबंधी अपने विचार रख रहा है। रोजगार पर विचार करते हुए गांधी ने ऐसे कई पहलू बताए हैं जिन्हें साधने के बाद ही एक मुकम्मल समाज बनाया जा सकता है। जिससे मौजूदा परेशानी के कई तरह के समाधान भी निकलते हैं।

कुछ समाधान तो साफ-साफ दिख रहा है कि चंद लोगों की मुट्ठी में कैद पूंजी से पूरी आबादी का भला नहीं हो सकता है। न्यूनतम मजदूरी से भी कम मजदूरी दे कर के लोगों का भला नहीं किया जा सकता। चन्द लोगों का समय बचे वह आनंद भरी जिंदगी जिए बाकी सब मरने के लिए मजबूर रहें यह एक मुकम्मल समाज की निशानी नहीं है।

इसे भी पढ़े: महंगाई और बेरोज़गारी के बीच अर्थव्यवस्था में उछाल का दावा सरकार का एक और पाखंड है

इसलिए गांधी के तस्वीर और नारों के सहारे अपनी राजनीति करने वालों के लिए पहला कदम तो यही होना चाहिए कि सब को रोजगार मिले। सबको गरिमा पूर्ण मेहनताना मिला। सबको अपना बौद्धिक विकास करने के लिए समय मिले। सबका जीवन केवल मजदूरी का जीवन बनकर न रह जाए बल्कि उसमें वे रचनात्मकता और आनंद के जीवन की संभावनाओं को भी तलाश सकें।

Mahatma Gandhi
Gandhi Jayanti
unemployment
BJP

Related Stories

ख़बरों के आगे-पीछे: केजरीवाल के ‘गुजरात प्लान’ से लेकर रिजर्व बैंक तक

यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती

इस आग को किसी भी तरह बुझाना ही होगा - क्योंकि, यह सब की बात है दो चार दस की बात नहीं

ख़बरों के आगे-पीछे: भाजपा में नंबर दो की लड़ाई से लेकर दिल्ली के सरकारी बंगलों की राजनीति

बहस: क्यों यादवों को मुसलमानों के पक्ष में डटा रहना चाहिए!

ख़बरों के आगे-पीछे: गुजरात में मोदी के चुनावी प्रचार से लेकर यूपी में मायावती-भाजपा की दोस्ती पर..

कश्मीर फाइल्स: आपके आंसू सेलेक्टिव हैं संघी महाराज, कभी बहते हैं, और अक्सर नहीं बहते

उत्तर प्रदेशः हम क्यों नहीं देख पा रहे हैं जनमत के अपहरण को!

जनादेश-2022: रोटी बनाम स्वाधीनता या रोटी और स्वाधीनता

त्वरित टिप्पणी: जनता के मुद्दों पर राजनीति करना और जीतना होता जा रहा है मुश्किल


बाकी खबरें

  • Lakhimpur
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    वाम दलों ने की लखीमपुर घटना की कड़ी निंदा, सीपीआई-एम के राज्य सम्मेलन में शहीद किसानों को श्रद्धांजलि
    04 Oct 2021
    सीपीआई-एम महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा कि हमारे वीर और दृढ़निश्चयी किसानों के बलिदान को व्यर्थ नहीं जाने दिया जाएगा।
  • afghanistan taliban
    विजय प्रसाद
    बेहिसाब दौलत के बीच जीते अफ़ग़ानिस्तान के ग़रीब लोग
    04 Oct 2021
    ख़ासकर महिलाओं के ख़िलाफ़ तालिबान की सख़्त सामाजिक नीति से कई सहायता समूह इस देश  में वापस आने से हिचकेगी।
  • Launch of NMP
    सुबोध वर्मा
    भारत के इतिहास की सबसे बड़ी 'सेल' की तैयारी
    04 Oct 2021
    मोदी सरकार की राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन की नीति एक झटके में भारत के प्रमुख बुनियादी ढांचे को निजी संस्थाओं को सौंप देगी।
  • Lakhimpur Kheri Update
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    लखीमपुर खीरी अपडेट: किसानों के साथ विपक्षी दलों ने खोला मोर्चा, हड़बड़ी में सरकार 
    04 Oct 2021
    लखीमपुर खीरी की ओर जाने वाले विपक्षी नेताओं को ज़िले में पहुंचने से पहले ही हिरासत में लिया जा रहा है, भाजपा सरकार ने न केवल ज़िले का इंटरनेट बंद कर दिया है बल्कि पूरे ज़िले में धारा 144 भी लगा दी है।
  • no hate
    राम पुनियानी
    असम: नफ़रत की इंतिहा
    04 Oct 2021
    साम्प्रदायिक सोच वाली भाजपा, बांग्लाभाषी प्रवासी मुसलमानों को 'विदेशी' मानती है जबकि तथ्य यह है कि असम में बंगाली मुसलमानों के बसने का बहुत पुराना इतिहास है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License