NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
उतरती “मोदी लहर” और फासीवाद से मुक़ाबले की गम्भीर होती चुनौती
संपादक मंडल, आह्वान
11 Oct 2014

मोदी लहर”, “अच्छे दिन” आदि जैसे शब्द अब राजनीतिक गलियारों और यहाँ तक कि रोज़़मर्रा की ज़िन्दगी के कुछ लोकप्रिय चुटकुलों में तब्दील हो चुके हैं। मिसाल के तौर पर, अब दुर्वस्था में पड़े किसी व्यक्ति को अक्सर लोग यह कहते पाये जा सकते हैं, “इसके तो अच्छे दिन आ गये!” उसी प्रकार, भारतीय टीम के इंग्लैण्ड दौरे पर टेस्ट श्रृंखला पर हार पर सोशल मीडिया पर यह लतीफ़ा ख़ासा चल निकला था कि भारतीय टीम की हालत तो “मोदी लहर” जैसी हो गयी, हल्ला ख़ूब मचा पर पटाखा एकदम फुस्स निकला। लगता है कि इसी प्रकार नये राजनीतिक और सामाजिक जीवन के चुटकुलों और मुहावरों की रचना होती है! भारतीय जनता पार्टी के कई पिताओं में से एक जनता पार्टी के बारे में भी 1980 के दशक से इसी प्रकार चुटकुले बने थे। मिसाल के तौर पर, पहले टुकड़े-टुकड़े कर डालने के लिए इस रूपक का इस्तेमाल होता था, “अभी तुझे जनता पार्टी बना दूँगा!” इन नित्यप्रति रचित होते रचनात्मक चुटकुलों के पीछे की राजनीतिक परिघटना पिछले 100 दिनों में ही अभूतपूर्व रफ़्तार से परत-दर-परत खुलती गयी है। भारतीय लोकतन्त्र के इतिहास में किसी भी चुनी गयी सरकार की लोकप्रियता के गिरने की दर में मोदी सरकार ने निश्चित तौर पर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है।

मोदी हर प्रकार के हथकण्डे अपना कर अपनी जनविरोधी नीतियों के चरित्र को छिपाने की कोशिश कर रहा है। चुनाव के पहले मोदी ने जो-जो वायदे किये थे, हज़ारों करोड़ रुपये पानी की तरह प्रचार में बहाकर जिस प्रकार का माहौल तैयार किया था, और जिस किस्म की अपेक्षाएँ पैदा की थीं, वे ताश के पत्तों के समान ढहती हुई नज़र आ रही हैं। मोदी सरकार के बनने के बाद महँगाई में बढ़ोत्तरी हुई है, खुदरा व्यापार और रक्षा में एफ़.डी.आई. को मान्यता देकर भाजपा की सरकार ने दिखला दिया है कि फासीवादियों से ज़्यादा दोगली और कोई राजनीतिक प्रजाति नहीं हो सकती है। 9 सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण को हरी झण्डी दिखा कर और अन्य 13 सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण के प्रस्ताव को पेशकर मोदी सरकार ने दिखला दिया है कि उसकी पूँजीपरस्त नीतियाँ रोज़़गार पैदा नहीं करेंगी बल्कि ख़त्म करेंगी; मोदी सरकार द्वारा श्रम क़ानूनों में सुधार भी वास्तव में मज़दूरों के बीच बेरोज़़गारी को बढ़ायेंगे। मिसाल के तौर पर, ओवरटाइम को बढ़ाने से संगठित क्षेत्र में भी रोज़़गार सृजन की दर में कमी आयेगी, क्योंकि अभी संगठित क्षेत्र में ही ओवरटाइम के क़ानून का एक हद तक पालन होता है। इसी प्रकार, जिस प्रकार मोदी सरकार ने जापानी, चीनी, अमेरिकी व अन्य विदेशी कम्पनियों के सामने भारतीय मेहनत और कुदरत को लूट के चरागाह के समान पेश किया है, वह अन्ततः भारतीय मज़दूर वर्ग के लिए और मुश्किल कार्य और जीवन स्थितियों को जन्म देगा। यह सच है कि भारतीय टटपुँजिया वर्ग आश्चर्यजनक रूप से राजनीतिक चेतना की कमी का शिकार है और उसकी कूपमण्डूकता का मुकाबला दुनिया के कुछ ही देशों के टुटपुँजिया वर्ग कर सकते हैं; लेकिन इसके बावजूद मोदी सरकार ने जिस रफ़्तार के साथ पूँजीपतियों की ताल पर ‘डांस’ किया है, उसने उनके सामने भी इस सच्चाई को साफ़ करना शुरू कर दिया है कि मोदी सरकार को पूँजीपतियों ने हज़ारों करोड़ रुपये ख़र्च करके सत्ता में इसलिए पहुँचाया है, ताकि वह हर प्रकार के दमन-उत्पीड़न के रास्ते को अिख़्तयार करके पूँजीपतियों के लूट के रथ का रास्ता साफ़ रखे। इससे देश के आम मेहनतकश अवाम को कुछ भी नहीं हासिल होने वाला है। मज़दूर वर्ग तो मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही श्रम क़ानूनों में सुधार और निजीकरण आदि की नीतियों के विरुद्ध विरोध का सिर उठा रहा था। अब निम्न मध्यवर्ग का भी एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा मोदी के ख़िलाफ़ होता जा रहा है।

मोदी सरकार अपने मैनेजमेण्ट गुरुओं वाले तमाम तौर-तरीक़ों का इस्तेमाल करके इस छीछालेदर की रफ़्तार को कम करने की कोशिश कर रही है। एक तो मोदी की छवि को लगातार बनाये रखने के लिए तमाम न्यूज़ चैनल के राजनीतिक वेश्यावृत्ति करने वाले पत्रकार दिनों-रात मेहनत कर रहे हैं। कभी यह दिखलाने की कोशिश कर रहे हैं कि मोदी ने पहली बार विश्व मंच पर भारत का सिर ऊँचा करने वाले रुतबे को दिखलाया है, कभी यह बता रहे हैं कि मोदी कितने ‘स्मार्ट’ और कुशल प्रधानमन्त्री हैं, कभी यह जता रहे हैं कि मोदी 18 घण्टे काम करते हैं (इसीलिए देश के मज़दूरों को भी 18 घण्टे काम करना चाहिए!!), कभी मोदी को शिवभक्त तो कभी दुर्गा-भक्त तो कभी गंगा-भक्त के तौर पर पेश करके भारत के जनसमुदायों में मौजूद कूपमण्डूकता का लाभ उठाने का प्रयास किया जा रहा है। साथ ही, मोदी तीर्थस्थलों के लिए ट्रेनें चलाकर और छोटे व्यापारियों के लाभ की कुछ नीतियाँ बनाकर अपने उजड़ते समर्थन आधार को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। इन दिखावटी प्रतीकात्मक हरकतों और छवि-निर्माण की कवायदों के अलावा भाजपा ने अपनी पुरानी कुत्सित और घृणित चाल भी चली। ‘लव जेहाद’ और धर्मान्तरण आदि का नकली मसला उठाकर उत्तर प्रदेश और एक हद तक बिहार में वोटों के साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का पूरा प्रयास किया गया। मुज़फ्रफ़रनगर समेत पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में साम्प्रदायिक तनाव को बनाये रखने का भी पूरा प्रयास किया गया। लेकिन इन सबके बावजूद उत्तराखण्ड, बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के उपचुनावों में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। यहाँ तक कि गुजरात में भी तीन सीटों पर कांग्रेस ने भाजपा को हरा दिया। इससे स्पष्ट दिख रहा है कि नरेन्द्र मोदी का प्रतीकवाद और साम्प्रदायिक कार्ड काम नहीं आ रहे हैं।

लेकिन फासीवादियों की पुरानी फितरत रही है कि राजनीतिक तौर पर सितारे गर्दिश में जाने पर वे ज़्यादा हताशा में क़दम उठाते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध में हारते हुए नात्सी जर्मनी में यहूदियों व कम्युनिस्टों का फासीवादियों ने ज़्यादा बर्बरता से क़त्ले-आम किया था; उसी प्रकार हारते हुए फासीवादी इटली में मुसोलिनी के गुण्डा गिरोहों ने हर प्रकार के राजनीतिक विरोध का ज़्यादा पाशविकता के साथ दमन किया था। इसलिए कोई यह न समझे कि नरेन्द्र मोदी की फासीवादी सरकार गिरती लोकप्रियता के बरक्स देश के मेहनत-मशक़्क़त करने वाले लोगों और छात्रों-युवाओं पर अपने हमले में कोई कमी लायेगी। वास्तव में, मोदी को 5 साल के लिए पूर्ण बहुमत दिलवा कर देश के बड़े पूँजीपति वर्ग ने सत्ता में पहुँचाया ही इसीलिए है कि वह पूँजी के पक्ष में हर प्रकार के क़दम मुक्त रूप से उठा सके और 5 वर्षों के भीतर मुनाफ़े के रास्ते में रोड़ा पैदा करने वाले हर नियम, क़ानून या तन्त्र को बदल डाले। 5 वर्ष के बाद मोदी की सरकार चली भी जाये तो इन 5 वर्षों में वह शिक्षा, रोज़़गार से लेकर श्रम क़ानूनों तक के क्षेत्र में ऐसे बुनियादी बदलाव ला देगी, जिसे कोई भावी सरकार, चाहे वह वामपंथियों वाली संयुक्त मोर्चे की ही सरकार क्यों न हो, रद्द नहीं करेगी। यही काम करने के लिए अम्बानी, अदानी, टाटा, बिड़ला आदि ने नरेन्द्र मोदी को नौकरी पर रखा है।

इसलिए हमें सिर्फ़ इस बात से सन्तुष्टि का अनुभव नहीं करना चाहिए कि जिन फासीवादियों के चेहरे टीवी स्क्रीन पर आज से दो माह पहले तक चमक रहे थे, वे हालिया चुनावों में करारी शिकस्त मिलने और ‘मोदी लहर’ के चुटकुले में तब्दील होने से मुरझा गये हैं। यह सच है कि टीवी पर सुधांशु त्रिवेदी, शाहनवाज़ हुसैन आदि जैसे फासीवादियों के घी लगे चिकने-चुपड़े चेहरों की उतरी रंगत इस समय देखते ही बनती है। लेकिन यह फासीवादी सरकार उस काम को अगले 5 वर्षों तक करती रहेगी, जिसके लिए देश के पूँजीपतियों ने उसे काम पर रखा है। इसलिए देश भर की क्रान्तिकारी ताक़तों को इन फासीवादियों की हर चाल का सड़कों पर उतरकर पुरज़ोर विरोध करना चाहिए और जनता की निगाह में इसे अधिक से अधिक बेनक़ाब करना चाहिए।संसदीय वामपंथियों की लड़ाई चुनावों तक थी और उसके बाद वे अपने-अपने बिलों में समा गये हैं।क्रान्तिकारी शक्तियों की लड़ाई तो अब शुरू हुई है। इसलिए सभी क्रान्तिकारी शक्तियों की इस फासीवादी सरकार की हर जनविरोधी साज़िश को नाकाम करने के लिए सड़क पर उतरने के वास्ते कमर कस लेनी चाहिए।

सौजन्य: http://ahwanmag.com

 

डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख मे व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारो को नहीं दर्शाते ।

सांप्रदायिक ताकतें
साम्प्रदायिकता
फासीवादी
नरेन्द्र मोदी
नवउदारवाद
लव जिहाद
सांप्रदायिक ध्रुवीकरण

Related Stories

पेट्रोल और डीज़ल के बढ़ते दामों 10 सितम्बर को भारत बंद

मीडिया पर खरी खरी – एपिसोड 2 भाषा सिंह के साथ

ABVP ने अपने असली रंग फिर से दिखाए : JNUSU के पूर्व अध्यक्ष पर हमला

चीन-भारत संबंधः प्रतिद्वंदी दोस्त हो सकते हैं

सीपीआई (एम) ने संयुक्त रूप से हिंदुत्व के खिलाफ लड़ाई का एलान किया

नकदी बादशाह है, लेकिन भाजपा को यह समझ नहीं आता

दिल्ली में अखंड भारत मोर्चा द्वारा सांप्रदायिक दंगे भड़काने की कोशिश

नीतीश कुमार BJP-RSS के राजनीतिक बंधक हैं : उर्मिलेश

ये दंगे सुनियोजित थे

बाज़ारीकरण और सार्वजनिक क्षेत्र


बाकी खबरें

  • lakheempur
    अनिल जैन
    विशेष: किसिम-किसिम के आतंकवाद
    24 Oct 2021
    विविधता से भरे भारत में आतंकवाद के भी विविध रूप हैं! राजकीय आतंकवाद से लेकर कॉरपोरेट आतंकवाद तक।
  • china
    अनीश अंकुर
    चीन को एंग्लो-सैक्सन नज़रिए से नहीं समझा जा सकता
    24 Oct 2021
    आख़िर अमेरिका या पश्चिमी देशों के लिए चीन पहेली क्यों बना हुआ है? चीन उन्हें समझ क्यों नहीं आता? ‘हैज चाइना वॉन' किताब लिखने वाले सिंगापुर के लेखक किशोर महबूबानी के अनुसार "चीन को जब तक एंग्लो-सैक्सन…
  • Rashmi Rocket
    रचना अग्रवाल
    रश्मि रॉकेट : महिला खिलाड़ियों के साथ होने वाले अपमानजनक जेंडर टेस्ट का खुलासा
    24 Oct 2021
    फ़िल्म समीक्षा: किसी धाविका से यह कहना कि वह स्त्री तो है, लेकिन उसके शरीर में टेस्टोस्टेरोन की मात्रा अधिक होने के कारण वह स्त्री वर्ग में नहीं आ सकती अपने आप में उसके लिए असहनीय मानसिक यातना देने…
  • hafte ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    शाह का कश्मीर दौरा, सत्ता-निहंग संवाद और कांग्रेस-राजद रिश्ते में तनाव
    23 Oct 2021
    अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी किये जाने के बाद गृहमंत्री अमित शाह पहली बार कश्मीर गये हैं. सुरक्षा परिदृश्य और विकास कार्यो का जायजा लेने के अलावा कश्मीर को लेकर उनका एजेंडा क्या है?…
  • UP Lakhimpur
    अब्दुल अलीम जाफ़री
    ‘अस्थि कलश यात्रा’: लखीमपुर खीरी हिंसा में मारे गए चार किसानों की अस्थियां गंगा समेत दूसरी नदियों में की गईं प्रवाहित 
    23 Oct 2021
    12 अक्तूबर को लखीमपुर खीरी से यह कलश यात्रा शुरू हुई थी, यह देश के कई राज्यों में फिलहाल जारी है। उत्तर प्रदेश में ये यात्रा पश्चिमी यूपी के कई जिलों से निकली, जिनमें मुझफ्फरनगर और मेरठ जिले शामिल थे…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License