NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
उत्तर प्रदेश नहीं, एनकाउंटर प्रदेश!
आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनने के बाद उत्तर प्रदेश में ‘पुलिस मुठभेड़’ की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि ने नागरिक समाज और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को बहुत चिंतित कर दिया है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और विपक्षी पार्टियों का कहना है कि 90 प्रतिशत से ज़्यादा इस तरह की मुठभेड़ें नकली और फ़र्जी हैं।
अजय सिंह
07 Feb 2019
सांकेतिक तस्वीर
Image Courtesy: Indian Express (File Photo)

क्या ‘पुलिस मुठभेड़’ या ‘पुलिस एनकाउंटर’ की घटनाओं को, जिन्हें आम तौर पर लोग पुलिस द्वारा की गयी हत्या बोलते-समझते हैं, कोई सरकार अपनी उपलब्धि के रूप में पेश कर सकती है? 

उत्तर प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार ने, जिसके मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं, इस साल 26 जनवरी गणतंत्र दिवस को अपनी ‘उपलब्धियों’ का जो ब्यौरा जारी किया, उसमें ‘पुलिस मुठभेड़’ की घटनाओं का ख़ास तौर पर, और विस्तार से, ज़िक्र किया गया।

राज्य पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) दफ़्तर से जारी किये ब्यौरे के अनुसार,आदित्यनाथ सरकार के पहले 16 महीनों में ‘मुठभेड़’ की 3026 घटनाएं हुईं, जिनमें 78 ‘अपराधी’ मार डाले गये।

यह आंकड़ा मार्च 2017 से जुलाई 2018 तक का है। आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुरसी 19 मार्च 2017 को संभाली थी।

मार्च 2017 से जुलाई 2018 के बीच 3026 ‘मुठभेड़ों’ के दौरान 7182 ‘अपराधी’ पकड़े गये और 838 ‘अपराधी’ घायल हुए। पुलिस ने जो आंकड़ा जारी किया है, उसके मुताबिक मार्च 2017-जुलाई 2018 के बीच औसतन छह मुठभेड़ें हर रोज़ हुईं, 14 ‘अपराधी’ हर रोज़ गिरफ़्तार हुए, और कम-से-कम चार 'अपराधी' हर महीने मारे गये। इन 16 महीनों में 78 लोग मार दिये गये, यह संख्या ख़ुद ही अपनी कहानी कहती है।

आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनने के बाद उत्तर प्रदेश में ‘पुलिस मुठभेड़’ की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि ने नागरिक समाज और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को बहुत चिंतित कर दिया है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और विपक्षी पार्टियों का कहना है कि 90 प्रतिशत से ज़्यादा इस तरह की मुठभेड़ें नकली और फ़र्जी हैं और इनका मक़सद क़ानून और व्यवस्था की स्थिति सुधारने की आड़ में पुलिस द्वारा मुठभेड़ दिखा कर लोगों की हत्या कर देना रहा है। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने पुलिस को गोली चलाने की छूट दे रखी है और वह ख़ुद भी सार्वजनिक सभाओं में ‘अपराधी’ को ‘ठोक देने’ और ‘यमराज के यहां भेज देने’ की बात बोलते रहते हैं।

ऐसी मुठभेड़ हत्याओं के संबंध में मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में 12 फरवरी 2019 को सुनवाई होगी। याचिका में उठाये गये मुद्दों को सुप्रीम कोर्ट ने ‘गंभीर’ बताया है, और कहा है कि इन पर ग़ौर करने की ज़रूरत है।

पिछले साल पीयूसीएल ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर मांग की थी कि मार्च 2017 से लेकर—जब उत्तर प्रदेश में आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनी—जुलाई 2018 तक जितनी मुठभेड़ हत्याएं हुई हैं, उनकी जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) करे, और इस जांच की निगरानी सुप्रीम कोर्ट करे। याचिका में कहा गया है कि जिस बेलगाम छूट के साथ पुलिस मुठभेड़ की घटनाएं हो रही हैं, वे बताती हैं कि इन्हें राज्य सरकार का खुला समर्थन मिला हुआ है। याचिका में कहा गया है कि कई मौकों पर आदित्यनाथ, उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (क़ानून व व्यवस्था) आनंद कुमार के ऐसे बयान आये हैं, जो इन मुठभेड़ हत्याओं को जायज ठहराते हैं और इन्हें प्रोत्साहित करते हैं।

ध्यान देने की बात है कि राज्य में आदित्यनाथ सरकार बनने के ठीक पहले के तीन सालों (2016, 2015, 2014) में मुठभेड़ की घटनाएं कुल 16 हुई थीं। आदित्यनाथ सरकार बनने के बाद इन घटनाओं में जिस तरह अचानक बेतहाशा वृद्धि हुई है, उस पर पिछले साल लोकसभा में भी चिंता जतायी गयी थी।

पीयूसीएल ने अपनी याचिका में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ द्वारा बार-बार दिये गये इस बयान को उद्धृत किया है कि अपराधी या तो जेल जायेंगे या मुठभेड़ों में मार डाले जायेंगे। याचिका में नवंबर 2017 में दिये गये मुख्यमंत्री के बयान का हवाला दिया गया है कि जो लोग समाज की शांति को भंग करना चाहते हैं, उन्हें बंदूक की भाषा में जवाब दिया जायेगा। पीयूसीएल का कहना है कि यह क़ानून की भाषा नहीं है।

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं एसआर दारापुरी, मोहम्मद शोएब और राजीव यादव का कहना है कि तथाकथित पुलिस मुठभेड़ों में जो 78 लोग मारे गये, उनमें मुसलमानों, दलितों और पिछड़ी जातियों (ओबीसी) की संख्या अच्छी-ख़ासी है। पुलिस की निगाह में ये सभी शातिर अपराधी थे। हर जगह मुठभेड़ की कहानी और तौर-तरीक़ा लगभग एक जैसा था और पैटर्न भी एक-दूसरे से मिलता-जुलता था। इन मुठभेड़ों में से हर एक की जो विधि-सम्मत जांच पड़ताल सरकार को करानी चाहिए थी, जिसके बारे में सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्देश है, वह नहीं हुई। न एफ़आईआर लिखी गयी, न मजिस्ट्रेटी जांच हुई, न मुक़दमा दर्ज़ हुआ। हालांकि सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार ने दावा किया है कि इन सभी मामलों में वैधानिक औपचारिकताएं पूरी की गयी हैं, लेकिन यह दावा भी कठघरे में है।

(लेखक वरिष्ठ कवि और राजनीतिक विश्लेषक हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

UP police
UP Police Encounter
BJP government
Yogi Adityanath
yogi government
fake cases
Fake encounter

Related Stories

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

ग्राउंड रिपोर्ट: चंदौली पुलिस की बर्बरता की शिकार निशा यादव की मौत का हिसाब मांग रहे जनवादी संगठन

यूपी में  पुरानी पेंशन बहाली व अन्य मांगों को लेकर राज्य कर्मचारियों का प्रदर्शन

हैदराबाद फर्जी एनकाउंटर, यौन हिंसा की आड़ में पुलिसिया बर्बरता पर रोक लगे

UPSI भर्ती: 15-15 लाख में दरोगा बनने की स्कीम का ऐसे हो गया पर्दाफ़ाश

क्या वाकई 'यूपी पुलिस दबिश देने नहीं, बल्कि दबंगई दिखाने जाती है'?

तेलंगाना एनकाउंटर की गुत्थी तो सुलझ गई लेकिन अब दोषियों पर कार्रवाई कब होगी?

यूपी: बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच करोड़ों की दवाएं बेकार, कौन है ज़िम्मेदार?

उत्तर प्रदेश राज्यसभा चुनाव का समीकरण


बाकी खबरें

  • नीलांजन मुखोपाध्याय
    यूपी: योगी 2.0 में उच्च-जाति के मंत्रियों का दबदबा, दलितों-पिछड़ों और महिलाओं की जगह ख़ानापूर्ति..
    02 Apr 2022
    52 मंत्रियों में से 21 सवर्ण मंत्री हैं, जिनमें से 13 ब्राह्मण या राजपूत हैं।
  • अजय तोमर
    कर्नाटक: मलूर में दो-तरफा पलायन बन रही है मज़दूरों की बेबसी की वजह
    02 Apr 2022
    भारी संख्या में दिहाड़ी मज़दूरों का पलायन देश भर में श्रम के अवसरों की स्थिति को दर्शाता है।
  • प्रेम कुमार
    सीबीआई पर खड़े होते सवालों के लिए कौन ज़िम्मेदार? कैसे बचेगी CBI की साख? 
    02 Apr 2022
    सवाल यह है कि क्या खुद सीबीआई अपनी साख बचा सकती है? क्या सीबीआई की गिरती साख के लिए केवल सीबीआई ही जिम्मेदार है? संवैधानिक संस्था का कवच नहीं होने की वजह से सीबीआई काम नहीं कर पाती।
  • पीपल्स डिस्पैच
    लैंड डे पर फ़िलिस्तीनियों ने रिफ़्यूजियों के वापसी के अधिकार के संघर्ष को तेज़ किया
    02 Apr 2022
    इज़रायल के क़ब्ज़े वाले क्षेत्रों में और विदेशों में रिफ़्यूजियों की तरह रहने वाले फ़िलिस्तीनी लोग लैंड डे मनाते हैं। यह दिन इज़रायली क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ साझे संघर्ष और वापसी के अधिकार की ओर प्रतिबद्धता का…
  • मोहम्मद सज्जाद, मोहम्मद ज़ीशान अहमद
    भारत को अपने पहले मुस्लिम न्यायविद को क्यों याद करना चाहिए 
    02 Apr 2022
    औपनिवेशिक काल में एक उच्च न्यायालय के पहले मुस्लिम न्यायाधीश, सैयद महमूद का पेशेवराना सलूक आज की भारतीय न्यायपालिका में गिरते मानकों के लिए एक काउंटरपॉइंट देता है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License