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उत्तराखंड से लौट रहे उद्यमी, सिर्फ़ प्रचार के लिए हैं सरकारी योजनाएं
जिन योजनाओं के नाम पर विज्ञापन बनवाकर वोट मांगे जाते हैं, उन योजनाओं की हकीकत क्या है, उसे आंकड़ों के जाल में उलझा दिया जाता है। उद्योग धंधे चौपट हो रहे हैं और मंदी भी छा रही है।
वर्षा सिंह
30 Aug 2019
schemes of government
सिडकुल की वेबसाइट से ली गई तस्वीर

दिल्ली से अपना व्यापार समेट कर पहाड़ों के लिए कुछ करने का जज़्बा लिए पौड़ी लौटे उद्यमी धीरेंद्र सिंह रावत की कहानी सरकारी सिस्टम के भ्रष्टाचार की परतें उघाड़ती है। अपने जीवनभर की कमाई दांव पर लगा कर पहाड़ की बंजर ज़मीन पर सोलर प्लांट लगाने वाले उद्यमी धीरेंद्र कहते हैं कि कोई कमज़ोर दिल का व्यक्ति होता तो शायद जिंदा न बचता। वे अब दोबारा दिल्ली में अपने पुराने व्यवसाय को नए सिरे से खड़ा करने में जुट गए हैं। कहते हैं कि इस व्यवस्था के रहते पहाड़ में कोई कुछ नहीं कर सकता।

500 किलोवाट की 3 करोड़ 47 लाख के सोलर प्लांट के लिए केंद्र सरकार की 70 प्रतिशत सब्सिडी की योजना पर भरोसा कर इस उद्यमी ने वर्ष 2016 में पौड़ी के कोट ब्लॉक के ओड्डा गांव में सोलर प्लांट लगाया। लेकिन सब्सिडी की रकम पर देहरादून में बंदरबांट हो गई। व्यापारी ठगे रह गए। धीरेंद्र को सब्सिडी नहीं मिल सकी। जिसकी वजह से इस रकम पर हर महीने ब्याज़ अदा करना बेहद मुश्किल पड़ता है। साथ ही सोलर प्लांट के लिए ग्रिड कनेक्टिवटी, कनेक्शन लॉस जैसी कई समस्याएं हैं, जिसके चलते वे परेशान रहते हैं।

धीरेंद्र बताते हैं कि एक साल में 400 घंटे से अधिक समय तक प्लांट ग्रिड ठप होने के चलते बिजली पैदा नहीं कर सका। ऐसी सूरत में कोई उद्यमी यहां क्या व्यापार करेगा? उरेडा (उत्तराखंड रिन्यूएबल इनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी) में सब्सिडी की रकम के घोटाले की खबर पिछले वर्ष सुर्खियां बनी थीं। वे कहते हैं कि यदि सब्सिडी की रकम उन्हें नहीं मिली तो अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे।

ureda pic of solar plant.jpg
ये कहानी अकेले धीरेंद्र की नहीं है। राज्य में बहुत से उद्यमी सरकार की योजनाओं और सुविधाओं की बातें सुनकर खिंचे चले आते हैं लेकिन फिर उद्योग का माहौल न पाकर वापस लौट जाते हैं। बहुत से बेरोजगार नौजवान ऐसे हैं जो इन योजनाओं के ज़रिये ज़िंदगी की गुज़र-बसर की योजना बनाते हैं लेकिन बाद में सरकारी दफ्तरों और बैंकों के लगातार चक्कर उनके हौसले पस्त कर देते हैं।

एमएसएमई में इकाइयां हो रही बंद

26 अगस्त को देहरादून में हुई राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति से मिली जानकारियां इस तस्वीर की तस्दीक करती हैं। बैठक में रखे गए आंकड़े बताते हैं कि एमएसएमई के तहत राज्य में लगाए जा रहे उद्योग लगातार बंद हो रहे हैं। बैठक में बताया गया कि एमएसएमई के तहत वार्षिक लक्ष्य 8,031 करोड़ के सापेक्ष मात्र 3,547 करोड़ की प्रगति दर्ज की गई। यानी उद्यमी मायूस हैं। नए उद्योग के लिए उद्यमियों की ओर से पहल नहीं की गई है। राज्य में इस समय 15970 एमएसएमई के तहत सूक्ष्म, लघु और मध्यम इकाइयां चल रही हैं। समिति की इससे पहले जून में हुई त्रैमासिक बैठक में ये संख्या 16,304 थी। यानी तीन महीने में 334 इकाइयां बंद हो गई हैं। इसका मतलब ये हुआ कि हर रोज तीन से अधिक इकाइयां बंद हुईं। जबकि हमें इकाइयां बढ़ने की उम्मीद करनी चाहिए।

उधर, सरकारी योजनाओं का एनपीए भी लगातार बढ़ रहा है। जून की समाप्ति तक ऋण जमा अनुपात 54 फीसदी रहा। छह जिलों में तो ऋण जमा अनुपात 40 प्रतिशत से भी कम रहा।

सरकारी योजनाएं- नाम बड़े और दर्शन छोटे

इसी तरह प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में इस वर्ष की पहली तिमाही में किसानों के किए गए क्लेम की राशि नहीं दी गई। आजीविका मिशन योजना में लक्ष्य की तुलना में बेहद कम आवेदन आए। उसमें भी ज्यादातर निरस्त कर दिये गये।

पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए वीर चंद्र सिंह गढ़वाली योजना सरकार की महत्वकांक्षी योजनाओं में से एक है। इसके तहत वाहन श्रेणी मे 147 वार्षिक लक्ष्य की तुलना में अगस्त तक मात्र आठ आवेदन स्वीकार किये गये, मात्र सात आवेदन पत्र बांटे गए, 4 वापस हो गए और 8 अभी लंबित हैं। गैर-वाहन श्रेणी में 153 वार्षिक लक्ष्य की तुलना में 47 आवेदन मिले और 13 स्वीकृत हुए, 7 बांटे गए, 14 वापस हो गए और 20 आवेदन लंबित हैं।

गांवों में रोजगार मुहैया कराने के लिए होम स्टे योजना पर भी सरकार का बहुत ज़ोर रहता है। लेकिन इसकी स्थिति भी अच्छी नहीं है। 30 जून तक 94 आवेदन आए, उसमें मात्र 18 स्वीकृत हुए, 5 आवेदन पत्र बांटे गए, 42 निरस्त या वापस हो गए और 34 लंबित है। पिछले वित्त वर्ष में 2000 के लक्ष्य की तुलना में मात्र 252 आवेदन आए, जिसमें से मात्र 39 स्वीकृत हुए। गांवों से हो रहे पलायन को रोकने के लिए ये योजना कारगर मानी जा रही थी। गांववाले अपने घरों को होम स्टे में तब्दील कर कमाई कर सकते थे। कुछ जगहों पर इसके सफल उदाहरण भी हैं। लेकिन इसकी प्रगति तो अच्छी नहीं दिख रही।

राज्य को सोलर एनर्जी का सपना दिखाने वाली योजना भी औंधे मुंह गिर रही है। बैठक में बताया गया कि सोलर खरीद और व्यवसाय के लिए सिक्योरिटी रकम बैंकों ने इतनी अधिक रखी है जिसकी वजह से ग्राहक ऋण लेने से बच रहे हैं। जबकि योजना में किसी भी तरह की सिक्योरिटी मनी नहीं लेने की बात कही गई है। बैठक में मौजूद मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह ने बैंकों से सिक्योरिटी मनी लेने को मना भी किया।

स्टैंड अप इंडिया योजना के तहत सभी बैंकों की शाखाओं को कम से कम एक महिला और एक अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग को उद्योग लगाने के लिए 10 लाख से 100 लाख तक का कर्ज़ दिया जाने का प्रावधान है। लेकिन बैंकों ने बताया कि 289 बैंक शाखाएं ऐसी हैं जो वाणिज्यिक श्रेणी में न होने के चलते ये कर्ज मुहैया करा ही नहीं सकती। 1131 ग्रामीण शाखाएं हैं, जहां इस तरह की मांग नगण्य है। इस योजना में पहली तिमाही में महिला श्रेणी में 1091 लक्ष्य के तहत मात्र 49 आवेदन आए। अनुसूचित जाति-जनजाति 1091 के लक्ष्य की तुलना में मात्र 22 आवेदन आए। जबकि पिछले वित्त वर्ष (2018-19) में 1096 लक्ष्य की तुलना में मात्र 329 आवेदन महिला श्रेणी में आए। अनुसूचित जाति जनजाति श्रेणी में 1096 की तुलना में 77 आवेदन ही आए। जो सभी स्वीकृत किये गये।

किसान क्रेडिट कार्ड जैसी कुछ योजनाओं में लक्ष्य से अधिक सफलता भी मिली है।

बैंक कर रहे निराश

इंडस्ट्रीज़ एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड के अध्यक्ष पंकज गुप्ता कहते हैं कि सरकार की तमाम योजनाओं के बावजूद लघु और मध्यम उद्योग उत्तराखंड से लगातार खत्म हो रहे हैं। राज्य में उद्योग के लिए बेहतर माहौल ही नहीं मिल पा रहा। वे कहते हैं कि सरकार ने योजनाएं तो ढेरों चला रखी हैं लेकिन हकीकत में लोगों को इसका फायदा नहीं मिल पा रहा। वे इसके लिए बैंकों को दोषी ठहराते हैं। उनके मुताबिक बैंक ऋण देने में आनाकानी करते हैं। पंकज गुप्ता कहते हैं कि नाम से तो सारी योजनाएं बहुत अच्छी हैं लेकिन काम वे कितनों के आ रही हैं।

निवेशकों में नहीं रहा विश्वास

इस बार पंचायत चुनावों में किस्मत आज़मा रहे उद्यमी देवेश आदमी कहते हैं कि उत्तराखंड की उद्योग नीतियों ने निवेशकों का विश्वास खत्म कर दिया है। जितनी तेजी से प्रदेश में निवेश हुआ उतनी ही तेजी से वाकआउट भी हुआ। इस के कई कारण हैं, मोटे तौर पर यह समझ सकते हैं कि सक्षम नेतृत्व की कमी रही। सूक्ष्म उद्योगों का जन्म नहीं हुआ। नई तकनीक नई मशीनरी लगाने की अनुमति नहीं मिली। मालभाड़े में लागत अधिक रही और कच्चेमाल के लिए नजदीकी बाजार उपब्ध नहीं कराया गया। उद्योग यातायात सुविधा उपलब्ध नहीं हुई। निवेशकों के साथ समीक्षा बैठक नहीं हुई और उद्योग समिति के सुझावों को राज्य सरकार ने नहीं माना।

जिन योजनाओं के नाम पर विज्ञापन बनवाकर वोट मांगे जाते हैं, उन योजनाओं की हकीकत क्या है, उसे आंकड़ों के जाल में उलझा दिया जाता है। उद्योग धंधे चौपट हो रहे हैं और मंदी भी छा रही है। 27 अगस्त को उत्तराखंड संयुक्त ट्रेड यूनियन संघर्ष समिति ने केंद्र सरकार की नीतियों को मंदी के लिए जिम्मेदार ठहराया। साथ ही उद्योगों को इस संकट से उबारने की मांग को लेकर राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन भी भेजा। नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार कह चुके हैं कि देश में 70 वर्षों में सबसे बड़ी नकदी संकट की स्थिति है।

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