NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
वाइब्रेंट गुजरात; एक ताश का महल
इस तरह के निवेश सम्मेलनों में किए गए वादे गुजरात और पूरे देश में केवल 25 फीसदी ही पूरे हुए हैं। 2007 के बाद से निवेश की घोषणाएं सबसे कम हुई हैं।
सुबोध वर्मा
21 Jan 2019
Translated by महेश कुमार
Vibrant Gujarat investment summit
Image Courtesy: ndtv

एक और वाइब्रेंट गुजरात निवेश शिखर सम्मेलन अहमदाबाद में संपन्न हो गया। जहां भारतीय उद्योग जगत के सभी बड़े नाम- अंबानी, अडानी, बिड़ला, टाटा आदि ने गुजरात में निवेश की बड़ी घोषणाएं कीं, जो कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी कॉर्पोरेट फ्रेंडली सरकार की गाल बजाही के सिवा कुछ भी नहीं। क्या यह उच्च रोजगार हीनता, तड़क-भड़क वाले निवेश, कम क्षमता के उपयोग और औद्योगिक उत्पादन को ठप करने की त्रासदी की गाथा नहीं हैं, इस तरह के शिखर सम्मेलन का होना मौजूदा स्थिति के लिए एक नाटक से कम नही है। लेकिन फिर, मोदी सरकार की ट्रेडमार्क शैली - घटनाओं और बयानबाजी पर ज्यादा टिकी हुई, जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है।

इस मौजूदा नौवें वाइब्रेंट गुजरात शिखर सम्मेलन में, पहले दिन ही, मुकेश अंबानी ने घोषणा की कि रिलायंस अगले 10 वर्षों में 3 लाख करोड़ रुपये का निवेश करेगा, गौतम अडानी जो कथित तौर पर मोदी के करीबी हैं, ने कहा कि वे 55 000 करोड़ रुपये का निवेश करेंगे, और कुमारनगलम बिड़ला ने 15,000 करोड़ रुपये के निवेश की योजना की घोषणा की। अन्य लोगों ने भी इसी तरह की घोषणा की, और इसी तरह की ऊंची घोषणाओं का महौल अंतिम दिन तक जारी रहा।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के आंकड़ों से पता चलता है कि 2016 तक, गुजरात में ऐसे निवेशक शिखर सम्मेलन में 4.1 लाख करोड़ रुपये (2003 से) के वादे किए गए थे, लेकिन उनमें से केवल 25 प्रतिशत ही वास्तव पूरे हो पाये। उद्योग जगत के कप्तानों को एक साथ लाने का यह सिलसिला जो नरेंद्र मोदी और उनके शासन की प्रशंसा करते हैं, अपनी अगली उड़ान से पहले शानदार निवेश का वादा करने वाले इस तरह के मॉडल को मोदी के शासन के तहत पिछले पांच वर्षों में कई भाजपा शासित राज्यों में अपनाया गया है। उभरता हरियाणा, मोमेंटम झारखंड, रिसर्जेंट राजस्थान और इसी तरह के नामों के साथ इन्हें आयोजित किया गया है। लेकिन इस तरह के हर समारोह की कहानी एक ही है – जहां दिखाने के लिए बहुत कुछ नहीं है जब एक बार धूल जम गई और शामियाने उखड़ गए।

कठोर वास्तविकता यह है कि सीएमआईई के आंकड़ों के अनुसार नई निवेश घोषणाएं 12 साल के सबसे निचले स्तर पर हैं। (नीचे चार्ट देखें)

CMIE chart.jpg

दिसंबर 2018 में समाप्त होने वाली तिमाही में, सीएमआईई द्वारा ट्रैक की गई निवेश की घोषणाएं केवल 48.1 लाख करोड़ रुपये की थीं, जबकि दिसंबर 2007 की तुलना में जब इस तरह की घोषणाएं हुईं तो वह 47.8 लाख करोड़ रुपये की थीं। यहां यह भी याद रखें कि, 2007-08 वैश्विक वित्तीय संकट के वर्ष थे।

औद्योगिक विकास के अन्य संकेतक भी लाल रंग में रंगे हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक के OBICUS (क्षमता उपयोग और अन्य संकेतकों के सर्वेक्षण) के अनुसार, स्थापित औद्योगिक क्षमता का केवल 73.8 प्रतिशत ही 2018-19 की पहली तिमाही में उपयोग किया गया। जून 2014 से शुरू हुए मोदी के शासन के दौरान, दो तिमाहियों को छोड़कर सभी तिमाहियों में क्षमता का उपयोग 75 प्रतिशत से नीचे रहा है।

औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी), जो उद्योग प्रदर्शन कैसा हो रहा है पर नज़र रखता है, उसने भी यह मापा है कि नवीनतम नवंबर 2018 के आंकड़ों के अनुसार वृद्धि का प्रदर्शन बहुत धीमा रहा है, जिसमें साल दर साल विकास दर केवल 0.5 प्रतिशत रही है।

बैंकिंग क्षेत्र में संकट (खराब ऋणों के विस्फोट) के कारण उद्योग के लिए ऋण स्वाभाविक रूप से आंशिक रूप से लाल झंडी दिखा रहा है, लेकिन यह स्थिति अनिवार्य रूप से उत्पादन में बीमार विकास और क्षमता का विस्तार करने के लिए औद्योगिक व्यवसायों की अनिच्छा के कारण भी है।

और, ज़ाहिर है कि सीएमआईई के अनुसार, केवल 2018 में ही एक करोड़ से अधिक नौकरियों खो गयी जो कि सबके लिए चौंका देने वाला तथ्य है। पिछले कुछ वर्षों में, कार्य सहभागिता की दरों में लगातार गिरावट आई है, जो कि वर्तमान में भारत की अर्थव्यवस्था में आने वाली प्रणालीगत संकट को दर्शाती है, यह एक उग्र कृषि संकट के साथ-साथ औद्योगिक ठहराव के जुड़वां और परस्पर कारकों के कारण हुआ है।

इस धूमिल परिदृश्य में, भव्य निवेशकों के शिखर सम्मेलन के झूठे वादे और अतिशयोक्ति से क्या उम्मीद की जा सकती है। हालाँकि, नरेंद्र मोदी और उनके सहयोगियों को इस तरह के मेगा-इवेंट्स के आयोजन से निकलने वाली प्रशंसा की कविता के बजाय जमीन से आवाज़ सुनने का काम करते तो शायद कुछ अच्छा हो जाता।

VIBRANT GUJRAT
investment summit
Vibrant Gujarat investment summit
Gujrat
Narendra modi
VIJAY RUPANI
mukesh ambani
adani group
ambani adani

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

भाजपा के लिए सिर्फ़ वोट बैंक है मुसलमान?... संसद भेजने से करती है परहेज़

हिमाचल में हाती समूह को आदिवासी समूह घोषित करने की तैयारी, क्या हैं इसके नुक़सान? 


बाकी खबरें

  • नीलांजन मुखोपाध्याय
    यूपी: योगी 2.0 में उच्च-जाति के मंत्रियों का दबदबा, दलितों-पिछड़ों और महिलाओं की जगह ख़ानापूर्ति..
    02 Apr 2022
    52 मंत्रियों में से 21 सवर्ण मंत्री हैं, जिनमें से 13 ब्राह्मण या राजपूत हैं।
  • अजय तोमर
    कर्नाटक: मलूर में दो-तरफा पलायन बन रही है मज़दूरों की बेबसी की वजह
    02 Apr 2022
    भारी संख्या में दिहाड़ी मज़दूरों का पलायन देश भर में श्रम के अवसरों की स्थिति को दर्शाता है।
  • प्रेम कुमार
    सीबीआई पर खड़े होते सवालों के लिए कौन ज़िम्मेदार? कैसे बचेगी CBI की साख? 
    02 Apr 2022
    सवाल यह है कि क्या खुद सीबीआई अपनी साख बचा सकती है? क्या सीबीआई की गिरती साख के लिए केवल सीबीआई ही जिम्मेदार है? संवैधानिक संस्था का कवच नहीं होने की वजह से सीबीआई काम नहीं कर पाती।
  • पीपल्स डिस्पैच
    लैंड डे पर फ़िलिस्तीनियों ने रिफ़्यूजियों के वापसी के अधिकार के संघर्ष को तेज़ किया
    02 Apr 2022
    इज़रायल के क़ब्ज़े वाले क्षेत्रों में और विदेशों में रिफ़्यूजियों की तरह रहने वाले फ़िलिस्तीनी लोग लैंड डे मनाते हैं। यह दिन इज़रायली क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ साझे संघर्ष और वापसी के अधिकार की ओर प्रतिबद्धता का…
  • मोहम्मद सज्जाद, मोहम्मद ज़ीशान अहमद
    भारत को अपने पहले मुस्लिम न्यायविद को क्यों याद करना चाहिए 
    02 Apr 2022
    औपनिवेशिक काल में एक उच्च न्यायालय के पहले मुस्लिम न्यायाधीश, सैयद महमूद का पेशेवराना सलूक आज की भारतीय न्यायपालिका में गिरते मानकों के लिए एक काउंटरपॉइंट देता है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License