NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अर्थव्यवस्था
वैश्विक पूंजीवाद एक व्यवस्थागत संकट में प्रवेश कर गया है 
मात्र फेरबदल से संकट हल नहीं होने वाला है, अगर सरकारी खर्च में बढ़ोतरी नहीं हुई तो स्थिति अधिक बिगड़ जाएगी और ऐसे खर्च को बढ़ाने का अंतरराष्ट्रीय वित्त पूंजी विरोध करती है।
प्रभात पटनायक
27 Aug 2019
Translated by महेश कुमार
G7
G7 के खिलाफ Biarritz, फ्रांस में विरोध प्रदर्शन Image courtesy: Twitter

एक प्रणालीगत संकट की पहचान जो कि चक्रवाती या छिटपुट संकट से अलग, पूंजीवाद का वह संकट है जिसे कि व्यवस्था के व्यापक दायरे के भीतर हल करने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है, जो इसके प्रचलित वर्ग विन्यास को परिभाषित करता है, और संकट को केवल बदतर बना रहा है। यह इस अर्थ में है कि अब नव-उदारवादी पूंजीवाद एक प्रणालीगत संकट में प्रवेश कर गया है। इसे केवल कुछ अदल-बदल या फेरबदल से हल नहीं किया जा सकता है; उदाहरण के लिए, नव उदारवादी वैश्वीकरण के व्यापक ढांचे को ढहाए बिना केवल संरक्षणवाद की शुरुआत करने से पार नही पायी जा सकती है, उदाहरण के लिए, अंतरराष्ट्रीय वित्त पूंजी पर पार पाए बिना, जो इस वैश्वीकरण के पीछे की ताकत है, जैसा कि डोनाल्ड ट्रम्प अमरीका में कर रहा है, इस परेशानी से पार नहीं पाया जा सकता है। अमेरिका, इस संकट को ओर खराब करेगा। 

इस संकट के लक्षण पूरी दुनिया को मालूम हैं। 2008 का संकट जो अमेरिका और अन्य देशों में "सस्ते पैसे की नीति" का पालन करने से आया था, ताकि ब्याज की दरों को लगभग शून्य तक लाया जा सके। यह विश्व पूंजीवाद को सिर्फ कुछ अस्थायी साँसें प्रदान करने में कामयाब रहा; लेकिन अब एक बार फिर से इसे मंदी का सामना करना पड़ रहा है।

अमेरिका में, जुलाई के महीने में व्यापर से जुड़ा व्यावसायिक निवेश गिरावट पर है और औद्योगिक उत्पादन पिछले महीने की तुलना में 0.2 प्रतिशत कम रहा। इस वर्ष की दूसरी तिमाही के दौरान ब्रिटिश अर्थव्यवस्था संकुचित हुई है, जैसा कि जर्मनी में हुआ था। इटली, ब्राजील, मैक्सिको, अर्जेंटीना और भारत जैसी सभी जगहों पर तस्वीर काफी समान है। यहां तक कि चीन भी विश्व मंदी के परिणामस्वरूप अपनी विकास दर को धीमा कर रहा है।

इस उभरती मंदी पर हर जगह के नीति निर्माताओं की नज़र फिर से ब्याज दरों में कटौती करने पर है। यूरोपीय सेंट्रल बैंक, जिसने पहले से ही अपनी महत्वपूर्ण ब्याज दर को नकारात्मक क्षेत्र में धकेल दिया है, इसे और कम करने की योजना बना रहा है। भारत में, ब्याज दरों में पहले ही कटौती की जा चुकी है। इस तरह की ब्याज दरों में कटौती के पीछे का विचार इतना ही नहीं है कि कम दरों के चलते बड़ा निवेश होगा; इसके बजाय कि कम दरों के कारण उनकी परिसंपत्ति की कीमत "बुलबुले" की तरह बढ़ेगी, जो इस तरह के परिसंपत्ति मूल्य को इस बढ़े "बुलबुले" के कारण धनी महसूस करने वालों के जरीए बड़े खर्च के माध्यम से कुल मांग को बढ़ावा मिलेगा।

क्यों हर जगह नीति निर्माताओं की इसी तरह की प्रतिक्रिया होती है, इसे स्पष्ट रुप से समझना चाहिए। द्वितीय विश्व युद्ध के  बाद की अवधि में, यानी नव-उदारवादी वैश्वीकरण के आने से पहले, जब भी मंदी का खतरा होता था, तो कुल मांग को बढ़ाने के लिए सरकारी खर्च को बढ़ा दिया जाता था। यदि आवश्यक हो तो सरकारें राजकोषीय घाटे को बढ़ा देती थी, क्योंकि पूंजी नियंत्रण लागू था और राजकोषीय घाटे में वृद्धि की स्थिति में किसी भी तरह से पूंजी के बाहर जाने का कोई खतरा नहीं था।

यह दुनिया के जाने माने अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड केन्स द्वारा की गई विश्व की कल्पना थी, जो युद्ध के बाद की  पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था के वास्तुकारों में से एक थे। वह वित्त के अंतर्राष्ट्रीयकरण के विरोध में था ("वित्त को राष्ट्रीय होना चाहिए" उन्होंने कहा था), वास्तव में इस तरह के अंतर्राष्ट्रीयकरण ने राष्ट्र-राज्य की क्षमता को कम कर दिया और इसे वित्त का कैदी बनाकर रोजगार जुटाने की क्षमता को कम कर दिया था, रोज़गार पैदा करने के लिए इसने हमेशा से बड़े सरकारी खर्च का विरोध किया। पूंजीवादी व्यवस्था के रक्षक के रूप में, केन्स को डर था कि जब तक कि राष्ट्र-राज्य पर्याप्त रूप से रोजगार नहीं जुटा लेते, तब तक पूंजीवाद समाजवादी व्यवस्था  के खतरे से बच नहीं सकता।

लेकिन महानगरीय बैंकों के पास वित्त के बड़े भंडार के जमा होने से, और इसी अवधि के दौरान भुगतान संतुलन पर बड़े अमेरिकी चालू खाते के घाटे के कारण, और साथ ही, बाद की तारीख में, राजस्व की बड़ी जमा राशि की वजह से जो 1970 के दशक में तेल मूल्य वृद्धि से ओपेक (पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन) उत्पादकों जमा की गई थी, इसलिए पूंजी नियंत्रण को हटाने का दबाव वित्त पूंजी से आया भारी दबाव आया था। वह  चाहता था कि वित्त के लिए पूरी दुनिया को खोल दिया जाए, और अंतत वह सफल हो गया। इस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी का आधिपत्य स्थापित हो गया, जिसका अर्थ था राजकोषीय हस्तक्षेप के माध्यम से रोजगार के स्तर को बनाए रखने की अपनी भूमिका से राष्ट्र-राज्य की वापसी हो गयी। नव-उदारवादी पूंजीवाद के निज़ाम के तहत कुल मांग को बढ़ाने का जो एकमात्र तरीका था, वह परिसंपत्ति-मूल्य के "बुलबुले" को उत्तेजित करने के माध्यम था; और इस उद्देश्य के लिए ब्याज दर नीति का उपयोग किया गया था।

लेकिन सरकारी खर्च के विपरीत जिसे खाते में विनियमित यानि जोड़-घटा किया जा सकता है, "बबल" को अपनी इच्छा से गायब नहीं किया जा सकता है। कुछ समय के लिए, नब्बे के दशक में (अमेरिका में "डॉट-कॉम बबल" आया) और इस सदी के शुरुआती वर्षों में (यूएस में "हाउसिंग बबल" आया), कुल मांग को बढ़ाने के लिए यह तरीका काम करता दिखाई दिया। लेकिन आवास का "बुलबुले" फूट गया जिसने लोगों को सावधान कर दिया और अब समान परिमाण वाला नया "बुलबुला" दिखाई दे रहा है, बावजूद इसके कि ब्याज दर को शून्य पर लाने की कोशिश की जा रही है।  

इस बीच, पूरे देश में और दुनिया भर में कुल मांग को कम करने की दिशा में शक्तिशाली कारक के रूप से काम करने वाला एक और कारक है; और यह कुल उत्पादन में अतिरिक्त उत्पादन का हिस्सा बढ़ने से है। वैश्वीकरण का अर्थ है, सबसे उपर, पूंजी की मुक्त आवाजाही है, जिसमें वित्त भी शामिल है, सीमाओं के आर-पार, और इसके परिणामस्वरूप उच्च वेतन वाले महानगरो से लेकर कम वेतन वाली तीसरी दुनिया के देशों में वैश्विक मांग को पूरा करने के लिए कई गतिविधियों का स्थानांतरण हुआ है। तीसरी दुनिया और उन्नत देश के श्रमिकों की आपसी प्रतिस्पर्धा की वजह से वे मजदूरी को कम रखने में कामयाब हुए है। आज़, श्रमिकों की मजदूरी उनके निर्वाह के स्तर की बनी हुई है, क्योंकि तीसरी दुनिया के श्रम भंडार इस तरह के स्थानांतरण के बावजूद भी समाप्त नहीं होते हैं। दुनिया भर में मजदूरी की दरों को तब भी नहीं बढ़ाया जाता है, जबकि दुनिया भर में श्रम की उत्पादकता में बढ़ोतरी हो रही होती है। देश और दुनिया में अतिरिक्त उत्पादन या मुल्य के बढ़ने का यह अबसे बड़ा कारण है।

अतिरिक्त उत्पादन का हिस्सा बढ़ने से अति-उत्पादन की प्रवृत्ति पैदा होती है, क्योंकि मजदूरी कमाने वाली की प्रति इकाई खपत अतिरिक्त कमाने वाले की तुलना में बहुत अधिक है। इस प्रवृत्ति को प्रत्येक देश के भीतर सरकारी व्यय में वृद्धि के माध्यम से ठीक किया जा सकता था। लेकिन चूँकि यह अब संभव नहीं है, केवल अति-उत्पादन की दिशा में इस प्रवृत्ति के खिलाफ संभव होने वाली एकमात्र प्रवृत्ति संपत्ति-मूल्य से जुड़े बुलबुले को फुलाने का काम है। इस तरह के बुलबुले की अनुपस्थिति में, अधिक उत्पादन की प्रवृत्ति पूरी ताकत के साथ होती है, जिसे आज हम देख रहे हैं।

चूंकि ब्याज दरों को कम करने का पारंपरिक तरीका ऐसे हालत में काम नहीं करता है, और चूंकि कुल व्यय की कमी को दूर करने के लिए सरकारी खर्च में वृद्धि नहीं की जा सकती है, इसलिए ट्रम्प अमेरिका से अन्य देशों को निर्यात करके अपने स्वयं के संकट को दूर करने का प्रयास कर रहा है खासकर अपने संरक्षणवादी उपायों को अपनाने के माध्यम से चीन के साथ ऐसा कर रहा है। चीन से माल के आयात के लिए इसने  25 प्रतिशत तक के टैरिफ लगा दिए हैं और इसी तरह अमेरिका के आयात पर भी चीन ने 25 प्रतिशत टैरिफ लगा कर करारा जवाब दे दिया है।

जिस व्यापार युद्ध की शुरुवात अमेरिका ने संकट से बाहर निकलने के लिए की थी, वह अब वैश्विक अर्थव्यवस्था का गहरा संकट बन गया है, क्योंकि यह दुनिया के पूंजीपतियों के बीच निवेश करने के लिए जो भी  प्रोत्साहन देता है, उसे कम आंकता है। एक नई परिसंपत्ति-मूल्य के बुलबुले को बढ़ाने से दूर, जो ब्याज दरों को कम करने के पीछे का मूल उद्देश्य था, दुनिया भर के शेयर बाजारों में गिरावट का कारण बन गया है। उदाहरण के लिए, वॉल स्ट्रीट ने, 14 अगस्त को वर्ष की सबसे बड़ी गिरावट देखी; और इसकी प्रतिक्रिया में दुनिया भर के बाजारों में भी गिरावट दर्ज की गई।

यदि हर देश के भीतर सरकारी व्यय को बढ़ाया जा सकता है, तो ऐसी नीतियों की आवश्यकता नहीं होगी जो पड़ोसी देशों को नुकसान पहुंचाए। भले ही कुछ संरक्षणवाद का सहारा यह तय करने के लिए लिया जाता है कि सरकारी खर्च के कारण होने वाली मांग में वृद्धि विदेश में "लीक" न हो जाए, क्योंकि इससे अन्य देशों से आयात में कोई कमी नहीं आती है क्योंकि बाजार में तो वृद्धि हो रही है। लेकिन बढ़े हुए सरकारी खर्च के अभाव में, अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी जिसका विरोध करती है (जिसके कारण अधिकांश देशों ने राजकोषीय घाटे के आकार को सीमित करने वाले कानून बनाए हैं), पड़ोसियों को नुकसान पहुंचाने वाली नीतियां कुछ संभावित विकल्पों में से एक हैं जिन्हे देश लागु करते हैं; हालाँकि, यह सभी के लिए संकट को बढ़ा देता है।

यह सही में एक प्रणालीगत संकट की पहचान करना है। जब तक अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी का आधिपत्य बना रहता है, और देश वैश्विक वित्तीय प्रवाह के भंवर में फंसते रहते हैं, यह न केवल संकट जारी रखेगा, बल्कि इस प्रणाली के भीतर जो भी साधन उपलब्ध हैं, उनके माध्यम से संकट को दूर करने का हर संभव प्रयास इस संकत को अधिक बढ़ाएगा। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय वित्त पूंजी के आधिपत्य पर काबू पाने की आवश्यकता है, ताकि हर देश के भीतर कामकाजी लोगों को एक वैकल्पिक एजेंडे के आसपास जुटने में मदद मिले।

World Recession
Emerging Economies
US-China Trade War
Systemic Crisis
Globalisation
World Capitalism
Capitalism Crisis
International Finance Capital

Related Stories

मैक्रों की जीत ‘जोशीली’ नहीं रही, क्योंकि धुर-दक्षिणपंथियों ने की थी मज़बूत मोर्चाबंदी

Squid Game : पूंजीवाद का क्रूर खेल

पूंजीवाद के दौर में क्यों ज़रूरी है किसान-मज़दूरों का गठबंधन

नवउदारवाद और धुर-दक्षिणपंथ की अजीबोगरीब सांठ-गांठ

बाइडेन का कॉर्पोरेट टैक्स रेट प्लान सामाजिक लोकतांत्रिक अजेंडे की प्राथमिकता दिखाता है

अरविंद केजरीवाल, प्रताप भानु मेहता दोनों अपनी विचारधारा के भोगी हैं

टीकाकरण: साथ डूबेंगे या साथ उबरेंगे, पर धनी देश क्या वाकई यह समझेंगे

रामचंद्र गुहा हमारे दौर के इस संकट को ठीक से क्यों नहीं समझ पा रहे हैं!

अमेरिका के WHO को छोड़ने का मतलब है दुनिया को कोरोना से संक्रमित कर दुनिया से भाग जाना

कोरोनो वायरस से लड़ने में 'पूंजीवाद' असफल रहा है


बाकी खबरें

  • cartoon
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    ख़बर भी-नज़र भी: …लीजिए छापेमारी के साथ यूपी चुनाव बाक़ायदा शुरू!
    18 Dec 2021
    आयकर विभाग की टीम ने आज सपा नेताओं के घर और कैंप कार्यालयों पर छापेमारी की है। इसपर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव का कहना है कि “भाजपा का हार का डर जितना बढ़ता जायेगा, विपक्षियों पर छापों का दौर भी उतना…
  • sudan
    पवन कुलकर्णी
    सूडान के दारफुर क्षेत्र में हिंसा के चलते 83,000 से अधिक विस्थापित: ओसीएचए 
    18 Dec 2021
    सूडान की राजधानी खार्तूम, खार्तूम नार्थ, ओम्डुरमैन सहित देशभर के कई राज्यों के कई अन्य शहरों में गुरूवार 16 दिसंबर को विरोध प्रदर्शनों के दौरान “दारफुर का खून बहाना बंद करो” और “सभी शहर दारफुर हैं”…
  • air india
    भाषा
    पायलटों की सेवाएं समाप्त करने का निर्णय खारिज किये जाने के खिलाफ एअर इंडिया की अर्जी अदालत ने ठुकराई
    18 Dec 2021
    अदालत ने कहा, ‘‘सरकार और उसकी इकाई एक आदर्श नियोक्ता के रूप में कार्य करने के लिए बाध्य हैं और इसलिए, उसे पायलटों को ऐसे समय संगठन (एअर इंडिया) की सेवा करने के अधिकार से वंचित करते नहीं देखा जा सकता…
  • Goa Legislative Assembly
    राज कुमार
    गोवा चुनाव 2022: राजनीतिक हलचल पर एक नज़र
    18 Dec 2021
    स्मरण रहे कि भाजपा ने जिन दो पार्टियों के बल पर सरकार बनाई थी वो दोनों ही पार्टियां भाजपा का साथ छोड़ चुकी है। गोवा फॉरवर्ड पार्टी कांग्रेस का समर्थन कर रही है तो महाराष्ट्रवादी गोमंतक पार्टी तृणमूल…
  • Nuh
    सबरंग इंडिया
    नूंह के रोहिंग्या कैंप में लगी भीषण आग का क्या कारण है?
    18 Dec 2021
    हरियाणा के नूंह में लगी आग में रोहिंग्याओं की 32 झुग्गियां जलकर खाक हो गईं। उत्तर भारत के रोहिंग्या शरणार्थी शिविर में इस साल इस तरह की यह तीसरी आग है
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License